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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti

गढ़वाली भाषा का प्रथम उपन्यास  का कुछ अंश           



                            ब्यळमु -ब्यूराळ


                   उपन्यासकार - बलदेव प्रसाद नौटियाल (कड़ाकोट, गग्वाड़स्यूं , पौ.ग. १८९५-१९८१ )   

                                                   रचनाकाल- १९४०

                   प्रकाशक- गढवाली साहित्य परिषद् , लाहौर

                    इंटरनेट प्रस्तुति - भीष्म कुकरेती 


           चमलोतड़ सिंग , लोक बदन , माळ का बद्युन को नौनो छौ. हर्बि  जन्नि स्कूल जा ण लगे, इस्कूल्या वे सणि   चिरडौण अर चुगन्यौण लगिने . बाठाअ  बटवैइ  तक वै सणि उळयौण लगिने, हीरे चिमडू -चिमड़ा तड़काला त्वे ! ब्वेबुबों कि ढोलक अर लांग छोडिइ   अब पंडित बण लगि गै. हैं! त्यरी दीदि  भूलि  नाचण गाण का नकचौलौं मान आंछरी बणिइ द्यसू की रस्याळु  उडालि, ब्वेबुबा रातु रातु स्वांग बणाइक भस्य्ला, गवणौ  का बिकः नमान खल्याणअ मळयौ  की चाअर घुजकुड्या ह्वेक अर अग्वाड़ी -पिछाड़ी , ढेस -तीर, कख्वडौं-कख्वडौं , रळबिजळ बैठिक ऊंको भासेणो सूणला, निअडौंदारौं  का छ्वबुन्द्या सांद आफु बि भासेणो आर उंदारौणो सीखला, ऊं सनकौंद  अर आँखा  नचौन्द देखला, हहह !  हिहिहि ! '  हैंसला त्यरी ब्वे बादण  चौन्त्युर का मुड ऐंच घाघरा का फफराट   कअरलि , पल्ला , पसारीइ  इनाम किताब मांगलि.  गौं का सिंग्याळ  स्वांग द्यखदि दौं गंडेळअ सी सिंग गाडीइ   अगन्याई ह्व़े जाला. देंदी धांसिंग भितनाई खैंचीइ घाघराइ झिमलाट मा हाटी का कोणों जाने सरकला. ! ओलेअर  ऊं दिखाई तड़बड़-तड़बड़ ताळी 

बजाला , खुटा घुर्सी -  घुर्सिक हैंसला ! फीर बाद्दी बादेण  सिंग्याळ - ज्वंग्याळ आर सेट-सौकानी का स्वांग द्यखाला, सबा मा हैन्सारत पोडली ! गौं की छमना मोर्युं आर दुंळो  बिटि बाद्दि का भंड्वळौ  आर बाद्यणि का नकचौलौं पर खितड़क हैंसलि अर सौजाड़यौं

चुगन्यालि !  आर टु यख 'बिसगुणु खा ! कंदड़ खा ! (बिजगनी क कन्दानु का , ) का उलटा जप से गअळो खराप कन्नु और आपणो धर्म-यमान बिगाणणु  छै।" 

      चिमडु यूँ हवळि का कजीलै छरौळयूँन  बिछान ऐ गे . उ नि रै इ सौक्यो . वेन अपणा नना मा बोले.  वेका ननान भेख्राज गाडे आर वेको मुंड माठी देय . हींग लगि ना फटगडि , नाई बुलौण पोडे  ना न्युटर, बामण त ये कलजुग मा जैन पुछणाइ  छौ! पुराणौ का साक्युं का ज्रायाँ भेखराज न इ  खटड़म-थचड़क खुटर - खुटर मुंड को घोल नीछि-नाछीइ, ल्वंच्याइ-ल्वंच्याइक , कूड़ाअ कअरा की काख पर बाळ- ऊळा को थुपड़ी लगे दे घोल का उड्या पंछि, ल्वेसुरा बच्चा आर घुसराण्या , किटगणयाँ, फिटगणयाँ  आंडरु उळा का पिलौं दगड़ी हड़हड़  घिलमंडी  ख्यन लगिने . खुस्यलोँ चिम्लाट जानू ब्वलेंद किन्ना बरखणा होन. चिमडु  का बर्मंड पर फैड़ी लगि गैने . माळ का बाद्युं नौना की जड़यूण ह्वेगे .उ डौळि मुंडि ल्हेंइक हैकि इस्कूल मा बिसगुण खा ! कन्दूड़ खा ! की संता संता का संतराड़ा से ज्यू छूवडाइक चिमराट चिम्राट अर चबराट का शांत कोठो का कोंसळा बणौण लगे- एक दोअणा द्वी दोण ! द्वी दोअणा चार दोण .

          छ्वूटा मा चिमड़ पाअड़ी गौं मा आपणा माई ममौं का यख जिरू जरू जिवाळ  लगाइक मिसपिगुड़ाआर कळजेंट मार्या करदु छौ. वैको नना मनसाराम जी घाट को मुर्दा ह्व़े गे छौ . दांत खुर सौब झअडि गै छा. दिन मा, जब जौ जनाना पुंगड़ा चलि जांदा छ्या उ बिस्गुण सुकाया करदा छा  आर गुठ्यार मां जाळ  ल्म्तम कैक घ्यंडुड़ा  आर घुगतौं की रासी मा बैठ्याँ रंअदा छा. कबारी जब कैइ औंदा- जौंदाअ  झिमलाटअन सग्वाड़ाअ खडिक पर घकचक  मा बैठ्याँ घ्यंडड़ो डार फुर्र उड़ी जांदी छै , आर उर्ख्याल़ा  ढेस- मळौणि  जुप जुप बैठण  वाळा आर दिवालि  का दान्दा पर मोंण  गडण वाळा घुगता इनाई उनाई टपराइक आपणा उड़ाण- खांटलोँ ल्हेइक सटगि  जांद छा; आर लोळा भौण्याअ ण भसराअ, ज्यूजळौण्या स्यंटुल़ा छौदाणा  मू सबा लगाइक 'चुचुचू ! टुर्र-टुर्र , च्वीं च्वीं , ढेंचु- ढेंचु ! मंसाराम जी की खौळ  कन्न लगदा छा,  तब ऊं का मुंडाअ लटला खड़ा ह्व़े जांद छा, ऊं की जिकुडि   मा ततलाट मची जान्दो छौ आर दाअडि  किटिकिटिइ गाळि देण लगदा छा.... 

          असूज-कातिग  और चैत-बैसाख आर भटग  रुड्यू   बी चिमड़ पान्चा सातां दिन गौं का ख्यचर्या गवैर छवारौं बटोळिक पंछ्युं  का घ्वलू की चराख्वडि मा पाक्युन दुरु दुरु का भेळा-भंगार , बोण- बळवुंडा, बाड़ी-बड्यार, बोट-ब्वट्या, ढया-खया, गाड-गदना, चंगी औंदो छौ. कखी आंडरु  फोड़ीइ घोल उज्याडि देन्दु छौ, कखी ल्वे-पाणी का फुकणा, घ्वलु का ल्वैसुरा  बच्चों रुगडिक स्वटगिन धडकौंदु छौ, आर उ ? उ चीं ! क्यां-प्यां जनु  ब्वलेंद   वेका हुंदा- जलमदौ कु रोणअ हों ! फीर अज्ञलू झाड़ीअ ग्वफळौ आर सौळक्यडौ   मा भड्याइक गौणि टांगणि , बूटी बाटि आफ चाटगाई छौ आर फान्जगा-फुन्जगा , आन्दड़ा प्यंदड़ा   दगडा का फंडध्वळयाँ  , अबोळ  अखळेड ग्वैर छवारों ग्वल्याई  देंदो छौ! कैकी सुता जाग न जाग , क्वीइ ध्यणो चा  झिंझडौ, चिमड़ की हुकुम अर्दुली क्वीइ नि कै सकदो छौ (तड़कौणे जीइ डअर रअन्दी  छे . खिर्साइक  कैइ  नाणा केणा नौना की कुंगळि  हात्युं आर स्वाळि  सि  गल्वाड़ तड़काई देव त उत बबराटनै  मोंअरि जाव !)  सौंजड्यों आर दगडा का काणा-कच्चों दगड नादिरसा अ छौ! काणों देखीअ  वेका मुख पर मड्याञण पोड़ी जांदी छै! आर जथे गरुड़ रिटद छौ उथे बिटि झप आँखा बुजी देन्दु छौ ! वे दिन हिंग्वसा   न कागा द्योल लम्योंद   कागू का ठञठु  का  ठवल्लौ से डाळा बिटि लमडद लमडद जोई बचे ! आर गरुड़ न त उ कफ़न  काई भेळ जोग  कै यालि  छौ!  सांसु देखा न वे चाडा पर चणण  लगे. आर उ बि गरुडो द्योल खंदरोंळू !

                 ह्युन्द्- हिंवाळु  चिमड़ गोद्युं को झमणाट  ल्हेइक रातु-रातु नजखाण तांइ निपण्या चिमचोण्या  गदनो रउ रउ की पैमाईस करदू रअदु उन्द    छौ, आर बिन्सर्या धोरा झुळमुळ  उठीअ फीर गदन्यू  पौंछ जान्दो छौ. गडवाळ -उड्याळ  त दीनैइ  ख्वचरीइ    दुंळयूँ क्या होणा छा, हाँ कैकी गोद्युं पर क्वीई माछी प्वड़ीइ होन त ऊं घर ल्हाई जांदू छौ आर ऊं की जगा आपणी गोद्युं डौखा खण्याइ औंदु छौ.

  सयाणा मा, जौं दिनु चमलो तड़ सिंग कालेज मा पढ़दु छौ, एक दिन उ ठाकुर जीहोस सिंग की बन्दुक ल्हेइक छत का बर्वठाअ  भितर मल्यों  का दोब मा बैठे . मल्यों डर्या छा ऐ नीन . कागो आय , वेण कागा पर इ फैर कर दिने . बस जी, ब्याखुनदा  कागा को चांजोपांजो, निछानिछी चीर फाड़ सुरु ह्व़े गे. मैणमस्यालों  दगड़ी भूटिभाटिक , उज्याई - गळाइक , अखंडि  बणाइक तंदूराअ ढुंगळौ   दगड़ी चाटी -पूंजीइ खैगे ! ब्वन लगे मॉस इ त च  ! कळजेट को हो चा कागा को ! हमन बोले अजी दागदार जी, तुमन एक गलती कर दिने . छ, यपाडा  का आंडरु  आर कुर्गळा पीसिक बी धोळि  छा ट हौर सवादी ह्व़े जांदु! द्वी फुल्का  गअळा   उंदी हौर छीरि जांदा . दगड्या  खौंळेइ गैने , घंकाणेइ गैने, ! हैका दिन ऊन उ देरो ई छोडि देय. 



  आभार- गाड म्यटेकी  गंगा - पृष्ट १८१-१८३     

Bhishma Kukreti

 Kakhi Lageen Ag-Kakhi Lgyun Bag: An Awareness Garhwali Drama about Developing Forest and Protecting Forest Fire

    (Review of 'Kakhi Lageen Ag-Kakhi Lgyun Bag' (1997)A Garhwali Drama written by Kula Nand Ghansala)   

                                                           Bhishma Kukreti

[Notes on Dramas creating awareness about Developing Forests and Protecting Forest Fire; Asian Dramas creating awareness about Developing Forests and Protecting Forest Fire; South Asian Dramas creating awareness about Developing Forests and Protecting Forest Fire; SAARC Countries Dramas creating awareness about Developing Forests and Protecting Forest Fire; Indian subcontinent Dramas creating awareness about Developing Forests and Protecting Forest Fire; Indian Dramas creating awareness about Developing Forests and Protecting Forest Fire; North Indian Dramas creating awareness about Developing Forests and Protecting Forest Fire; Himalayan Dramas creating awareness about Developing Forests and Protecting Forest Fire;  Mid Himalayan  Dramas creating awareness about Developing Forests and Protecting Forest Fire; Uttarakhandi Dramas creating awareness about Developing Forests and Protecting Forest Fire; Garhwali –Kumauni Dramas creating awareness about Developing Forests and Protecting Forest Fire]
[वन विकास - वन संरक्षण जागृति विषयक नाटक; वन विकास - वन संरक्षण जागृति विषयक एशियाई नाटक;वन विकास - वन संरक्षण जागृति विषयक दक्षिण एशियाई नाटक;वन विकास - वन संरक्षण जागृति विषयक सार्क देसिय नाटक;वन विकास - वन संरक्षण जागृति विषयक भारतीय नाटक;वन विकास - वन संरक्षण जागृति विषयक उत्तर भारतीय नाटक;वन विकास - वन संरक्षण जागृति विषयक हिमालयी नाटक;वन विकास - वन संरक्षण जागृति विषयक मध्य हिमालयी नाटक;वन विकास - वन संरक्षण जागृति विषयक उत्तराखंडी नाटक;वन विकास - वन संरक्षण जागृति विषयक कुमाउनी नाटक;वन विकास - वन संरक्षण जागृति विषयक गढवाली नाटक लेखमाला]

                   The Van Chetan kala Mandir a cell of Forest Department, Uttarakhand staged 'Kakhi Lageen Ag-Kakhi Lgyun Bag' a Garhwali drama written by famous Garhwali playwright Kula Nand Ghansala in Gopeshwar, Chamoli Garhwal in 1997. The drama is all about making people aware about the essentials of forest growth for mankind and the public role in protecting the forests. 
                         Bashakhi the wife of Chaitu wants to cut developing Banj (Oak) but Chaitu stops her as if the children were killed the human being wouldn't be there in the earth. Suddenly fire breaks in the forest and the forest produces are burnt. People are worried about fodders for their domestic animals. The tigers are running from the fire and they come nearer to the populations. There is tension among villagers due to tigers coming to villages, the tigers are finding difficult to survive and become man-eaters.  The politicians are taking advantages of the situations. Chaitu lost his life in stopping forest fire. The jungle mafias are busy in cutting the tress. The villagers take oath to save the forest from fire, politicians and jungle mafias. 
               The drama is successful in creating awareness among people for developing forests and protecting them too.

Copyright@ Bhishma Kukreti, 9/6/2012

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वन विकास - वन संरक्षण जागृति विषयक नाटक; वन विकास - वन संरक्षण जागृति विषयक एशियाई नाटक;वन विकास - वन संरक्षण जागृति विषयक दक्षिण एशियाई नाटक;वन विकास - वन संरक्षण जागृति विषयक सार्क देसिय नाटक;वन विकास - वन संरक्षण जागृति विषयक भारतीय नाटक;वन विकास - वन संरक्षण जागृति विषयक उत्तर भारतीय नाटक;वन विकास - वन संरक्षण जागृति विषयक हिमालयी नाटक;वन विकास - वन संरक्षण जागृति विषयक मध्य हिमालयी नाटक;वन विकास - वन संरक्षण जागृति विषयक उत्तराखंडी नाटक;वन विकास - वन संरक्षण जागृति विषयक कुमाउनी नाटक;वन विकास - वन संरक्षण जागृति विषयक गढवाली नाटक लेखमाला जारी ...

Bhishma Kukreti

                   Mamakot: A Garhwali Story about Conflict between inner consciousness and reality

(Review of Garhwali Story Collection 'Joni Par Chhapu Kiali?' (1967) written by Mohan Lal Negi)

                                         Bhishma Kukreti

           Garhwali story 'Mamakot' of story collection 'Joni Par Chhapu Kiali?' by Mohan Lal Negi is about two children Javaru and Surutu. Javaru and Surutu are great friends in the village. They roam together in forest, water source, collect flowers etc. They were waiting school result that in holiday they can visit their Mamakot (mother's parent's village). Surutu did not pass the exam and does not visit his Mamakot. However, Javaru ia able to visit his Mamakot. There in 'Mamakot', Javru saw many things and ate many eatables. However, there he did not see pine fruit (Chhyunti). The story deals again even after getting many things; even after getting new knowledge; there is something left to attain. The story telling style is very simple and no surprise or twist in the tail. The story is able to depict children curiosity and enthusiasm for newer adventure and then frustration for not getting what others have. 
               The phrases are according to time, place and class of characters.

Copyright@ Bhishma Kukreti, 10/6/2012 

Bhishma Kukreti

दुन्या क महान कवि कन्हैया लाल डंडरियालौ बारा मा पाराशर गौड़ की राय


    प्रस्तुतीकरण - भीष्म कुकरेती


भीष्म कुकरेती - पाराशर जी ! आखिर क्या बात च जु गढवाळी साहित्यकार महाकवि कन्हैया लाल
          डंडरियालौ बारा मा जाणण चांद !

पाराशर गौड़ : कन्हयालाल जी मेरा पहाड़ का कालीदास छन ! वो मेरा पाहाडी साहित्य का
          जन कुमाउनी का महान कबि गुमान कवी छा, उनी दंद्रियाल्जी भी वी समक्ष का गड्वाली
          कवि छन ! आज तक  कु जत्गा भी गड्वाली कवित्या कु साहित्य मिल्द जुमा की हमरा
          पूरान महान कबेयु जौं को योगदान च उत छहीच पर , आज का सन्धर्व माँ अगर     
          गड्वाली की कविता कु बिबेचन, वेकु प्रभाऊ/सम समायाकी कु कतका असर हमारा व
          हमारी जन जीवन पर असर करद वे सन्धर्व माँ कनाह्यालाल्ल डंड्रियलजी सर्वोपरि
          ऊकी कविता...कविता  नीन,  वो अपना आपमाँ  मेरा पहाड़ कु दर्पण छन ! जू
          कबिताक माध्यम से पहाड़ की सांस्क्रतिक /सामाजिक व आर्थिक जीवन कु स्वरुप
          आम आदम थै दिख्न्दी !

भीष्म कुकरेती- कन्हैया लाल डंडरियाल जी से मुलाक़ात मा आपन उंको विषय मा क्या धारणा बणे छे
          अर क्या वै इ धारणा पैथर बि रै?

पाराशर गौड़: ये बात सन 1962 -63 की च, जब मिन अपणु पैलू गड्वाली में नाटक  " औंसी की
         रात " लेखी अर वेथै मंच माँ प्रस्तुत करी ! हैका दिन दिखान बाद ऊ मथ मीनू मेरा
         आफिश माँ मै थै मिलणु एनी, वे समय व सफ़ेद कुर्ता -गंदेलु पेजमा अर नंगा खुटा
         ( बिना जुता ) म छा ! यदपि उसे एक बार गडवाल भवन माँ इनी चलदा चलदा भेंट हुई
         छे ! वे समय वख चंदरसिंह  गढ़वालीजी अपनी धर्मपत्नी व बचो का साथ च रुक्या !
         जब हमरी मुलाक़ात हवे त, वो ठेट गौकु सी मानीख छा लगणा !

भीष्म कुकरेती- जरा कन्हैया लाल डंडरियाल जी क व्यक्तित्व तैं कम से कम शब्दों ब्वालादी !

पाराशर गौड़:  कन्हैया लाल डंडरियाल जीक व्यक्तित्व थै नापणोक वास्ता एक विशेष दृष्टि की
          जरूत चैन्द ! वो दिख्नमाँ जतका साधारण लगदा छा उत्की उकी कबिता शसक्त छ !
          वो शब्दों का घट छा ! कलम अर चित्रण का मठ छा ! शब्द उनकी उन्गुल्यू इस्सरो
          नाचदा छा ! उनकी सबसे बड़ी खूबी छेकी वो जू भी बात बुलन चाणा छन वो आम
          आदमी की भासामा लेखी की बड़ी सरलता वे थै प्रस्तुत करदा छा जैकू सीधु प्रभाव
          सुन्न वालो पर पुदुद रा !   

भीष्म कुकरेती- उंका दगड आपै साहित्यिक मेल मिलाप का बारा मा खुलासा कारदी .

पाराशर गौड़ :जन मिन बोली की नाटक देखनक बाद मेरा आफिस माँ एयेने ! नाटक पर बहश का
         बाद वो सीधे सीधे कबिता पर अयेने ! उ दिनों मी गड्वाली माँ गीत लिखदो छो जोंथई
         आकाशबानी से जगदीश थोंदियाल व लीला नेगी गान्दा छा ! उन मेरा गीत आकाशवाणी
         दिल्ली भी सुणा छा ! तब उन बोले छो..आप अछा गीतकार छा त आप गड्वाली माँ   
         कविता क्यों न करदा ? मीन बोले कोशिश करुलू ! इतुगु क्या बुन छो झट से बोलिनी
         की, ऐ इत्व्वरोकु तिमारपुरमा मेशानंद गौड़जी घोरमा एक रातकी बैठक च टक लागैकी
         ऐजया ! मी वाख ग्यु ! हम वख़म चार य पाच आदिम छा जौन्थई मी नि पच्याणदू छो
         ख़ैर परिचय होए .. खुगशालजी" बोल्या ", महेशानान्दजी गौड़, रमेश घीडियाल  वो,
         अर मी ! यु हमरु सबसे पैली कबिता गोष्ठी छे ,अर बतुओर एक कबी का पहलु परिचय
         भी ! यत छे शुरवा ... यका बादत हम एक हैनका बहुत ही कर्रीब एगे छा ! पैलीत हम
         तिमारपुरमाँ मैनामा एक दो बार मिल्ल्दा छा ! वेका बाद कुछ और आदमी जुड़नी
         जनकी नेत्र सिंह असवाल / गणेश शास्त्रीजी, लोकेश नवानी ,बडोला जी, विनोद उनियाल,
         चन्द्रसिंह रही आदि  !
              हमने तब एक संस्था बनाई " गड भारती "  वेकी तत्वाधान मी " फंची " का
         परकशन ! दुसुरु " धै  "  साथ कबियो की कबिता संघ्रह गणेश शास्त्री जी ने यु द्वीयु
         कु सम्पादन करी ! इ " गड भारती" संस्था का ही तत्वाधान माँ ही, गड्वाली साहित्यकु
         सबसे पहलु " स्वर्गीय पंडित टीकाराम गौड़  " डंडरियाल जी की "अन्ज्वाल" पर उथे   
         दिएगे छो !

भीष्म कुकरेती- जब ड़ी.सी.एम् मिल बंद ह्व़े त फिर कन्हैया लाल डंडरियाल जी न नौकरी किलै नि
           खोजी?

पाराशर गौड़ - जबाब सीधु युच की, जब आदिम ४० कु- हवे जान्दत, नौकरी का मामल माँ वैथे कवी
          ज्याद ताबजू नि देन्दु ! डंडरियाल जी ज्यादा पद्या लिख्या त नि छा जू कुवी स्किल
          जोब का वास्ता जांदा ये वास्ता जख्तक उन समझी की बात अब अग्वाडी बन से राइ
          ( नौकरी का मामला माँ ) वो हताश से हवे ह्वेगे छा, पर हिमंत से ना !  उन घोर
          घोर जैकी चा की पत्ती बेचिनी पर केका अग्वाडी हाथ ने फैलाई ..वो एक खुदार मनिखी
          छा !

भीष्म कुकरेती -इन बुले जांद बल कन्हैया लाल डंडरियाल जी क बेटी ब्यौ गढ़वाळी कवि जया नन्द
          खुगसाल 'बौळया' जी नौना दगड हूण मा आपकी बि भागीदारी च. क्या या बात सै च?

पाराशर गौड़ - भागीदारी त मिनी बोलुलू  पर हां, एतुगु  जरुर बुलुलुकी मीसे जू भी बन पड़ी एक मित्र
          का नाता मिल काया ! वे समय पर उनकी स्तिथि जरा खराब छे अर इनु समय माँ
          अगर मित्र मित्रक कामा नि आन्द त , वो मित्र ही क्या ?

भीष्म कुकरेती- कन्हैया लाल डंडरियाल जी अर गढ़वाळी कवि जया नन्द खुगसालऔ कवितौं मा कुछ खास इकजसिपन /साम्यता छन बल जन कि कम आमदनी वलु प्रवाशी क गरीबी क संघर्ष, गढ़वाळ अर दिल्ली क जीवन का बीचऐ दुरी तैं ख़तम करणो एक अजीब सी परेशानी, गढवाळ अर दिल्ली मा मानसिक , भौतिक, आर्थिक स्तिथियुं तैं बैलंस करणे कसमस , असलियतवादी कवितौं पर जादा जोर , चबोड्या शैली आदि . क्या या बात सै च?

पाराशर गौड़ - सै ही ना बल्कि सोला आना सच ! द्वीयु की कबिता पहाड़ व पहाड़ से नौकरी की
      तलाश में भैर आया प्र्बासियो की खैर त्रास्ती  मज़बूरी  की साफ़  झलक मिल्द ! बोल्या जी
      वो बात नि छे !

भीष्म कुकरेती- कन्हैया लाल  डंडरियाल जी क कविता रचणो ढंग ढाळ देख्युं च. कै तरां अर कन परिस्थिति मा वो कविता गंठयांदा छया ?

पाराशर गौड़ - उन  छोटी छोटी आंख्युं , बड़ा बड़ा कोथिक देखिनी ! वे कोथिकोमा कै किसमा का
     उतार चड़ाव छा ! बकत की थपेड़ों ने उनकी राचनो थै वो धार दे ,वो धार दे जैकी बजह से
     आज जब हम उनकी कबिता  पडदा  त  इन लगाद  की  ये मनिख्ल कतका देखि
     अर भोगी  !

भीष्म कुकरेती- कन्हैया लाल डंडरियाल जी क कविता खौळ (कविता संग्रह) छपाण मा बि आप सरीखों हाथ होंदु छौ. क्या या बात सै छन?

पाराशर गौड़- मेरी भरसक कोशिश इ राय की जू क्वी भी अपणी माँ बोली की भी सेवा करद या कनु
       च, अगर  वैथे  कवी  मओं मदद चैन्द त मी अपनी तरफ बीटी जू भी हवे सका वेकि मओं
       मदद करे जा ! उकी मदद जरुर काया उथे गड्वालीमाँ पैलू गड्वाली साहित्यिक  पुरुष्कार  "
       स्वर्गीय  पंडित  टीकाराम गौड़  साहितिक पुरष्कार " से  समानित कैरिकी  दगड म कुछ
       आर्थिक मदद कैरी !

भीष्म कुकरेती- कन्हैया लाल डंडरियाल जी तैं यांको मलाल छौ (जु नागराजा मा बि लिख्युं च, सैत ) बल धनाभाव क कारण नागराजा, अबोध जी क महाकाव्य भुम्याळ से पैलो नि छाप. क्या बात सै च?

पाराशर गौड़- सत्य बचन ! नागराजा  भुम्याल से बहुत पैली उन लेखी याली छो ! उकु और मेरु
      दुर्भाग्य  ही छो की मी १९८३ ८४ माँ उनसे दूर ह्वेगे छो ! अगर मी रैंदु त यु महा काब्य  वे
      से पैली छपी जादू ! पर हूनी वल थै क्वी नि रोकी सकद ! जन अज्वाल थै समान मिली छो
      वनी ये महा काब्य थै भी एक यु समान मिली जांदू !

भीष्म कुकरेती- महा कवि भगत बि छया अर सैत च ऑन पर क्वी दिवता बि आंदो छौ. डा. नन्द किशोर ढौंडियालौ जी न इनी ल्याख, गिरीश सुंदरियालौ न बि इनी ल्याख. आप त उंक दगड भौत रैन आपक क्या राय च?

पाराशर गौड़-  जी  हां  ! नाराज आन्दु छो उन पर !

भीष्म कुकरेती- कन्हैया लाल डंडरियाल जी क कवितौं पर आपकी विवेचना क्या बोलदी!

पाराशर गौड़- बिबेचना का वास्ता  एक लम्बू समय चैद बस इतुगु ही बुलुलूकी उकी हर कबिता मेरा
       पहाड़ की तस्बीर छन, एक आयना च जैमा लोग अपनी अनवार देख सक्दिन !

भीष्म कुकरेती- मिं देखी अबि बि भौत सा कवि कन्हैया लाल डंडरियाल जी क ढंग ढौळ (शैली) तैं अपन्यौणा रौंदन जब कि आजै मांग च बल कन्हैया लाल डंडरियाल जी क ब्युन्तौ विकास करे जाओ. क्या बात च कि हरीश जुयाल तैं छोड़िक इन कम इ हूणु च ?

पाराशर गौड़- शैली थै अपनानू कवी गलत बात नि, पर नक़ल कनी व अछी बात नि !

भीष्म कुकरेती- कन्हैया लाल डंडरियाल जी तैं पैलो टीका राम गौड़ पुरुष्कार मील. टीका राम गौड़ पुरुष्कार का बारा मा संक्षेप मा बतावा त ज़रा !

पाराशर गौड़- टीका राम गौड़ पुरुष्कार  गड्वाली माँ उ लुख थै दिए गया  या दिए जान्द जौन पहाड़ी
        भाषा  गध्य पद्य गीत संगीत नाटक अबिनय माँ काम करी ! ये से अभी तक
        कन्हयालाल  डंडरियाल जी, चंदर सिंह रही,  कंकालजी, शारदा नेगी मवारी-गारी का लेखक
        घिदियाल्जी आदि लोग छन! गड्वाली माँ गड्वाली साहित्यकु - यु पौलू पुरुष्कार च जैमा
        २००० रुपया अर शाल दिए जान्द  !   

भीष्म कुकरेती- कन्हैया लाल डंडरियाल जी बारा मा कुछ हौरी जानकारी दी न चैल्या क्या?

पाराशर गौड़- वो एक बहुत ही सुल्ज्या अवम द्रदर्शी व्यक्ति छा  !

भीष्म कुकरेती- नवाड़ी कवियों तैं कन्हैया लाल डंडरियाल जी से क्या सिखण चएंद ?

पाराशर गौड़-अपनी माँ बोली थै  नि भूल्या !  माँ का बाद,  बोली ही सबसे पवित्र अवम सबसे उत्तम हुन्द !

पाराशर गौड़-

Bhishma Kukreti

चबोड़ -चखन्यौ

                      बीमारी से शख्सियत को पता चलद



                                     भीष्म कुकरेती





                        दुन्या मा तीन चीज सास्वत छन -जनम, बीमार पड़ण अर मिरत्यु. चौथी बिथ्या च ज्वा एक जरूरी बिथ्या च अर वीं बिथ्या-बीमारी क नाम च बीमारूं पूछ ताछ करण वाळु से बीमारौ हैसियत, शख्सियत पता चलण   . अब जब बीमार पड़ी गे त पुछण वाळु संख्या से पता चल्द बल तुमारो हितचिन्तक कथगा छन अर पूछण वाळु संख्या से इन बि पता चलद कि ये मनिखौ गां -गौळ -समाज मा कथगा पूछ छ.



          म्यरा गाँ मा  नरेंदर  ददा  छ्या त जब बीमार पोड़दा छा त कै तै बि वैद मा नि पठान्दा छ्या बल्कण मा पैल सरा गाँ मा रैबार जी पौन्छादा छ्या बल नरेंदर जी बीमार पोड़ी गेन. जरा स्याम तक क्वी नि आई त समजी ल्याओ वैको दगड कुट्टी अर कबि कबि त पैणो बरजणो नौबत बि आई जांद छे. इलै गाँ मा आम बात छे कि नरेंदर ददा बीमार ह्वाओ त झाड़ा तब जाओ पैल नरेंदर ददा का इख हाजिरी लगै द्याओ.  एक दै रातो टैम छौ  खाणो बगत  छौ अर नरेंदर ददा तै खताखती छींक ऐ  गेन. बिचारो जोगी काका अपण ग्वाठंम जाणो तैयारी करणा छया अर चूँकि इकुलास बि छे अर ग्वाठ गां से जरा नजीक इ छौ त भगळव्ट मा क्वी नि छौ पण जोगी काका तै नरेंदर ददा की खबर लीणि  जरोरी छे निथर  नरेंदर ददा कि गाळी कु सूणल ! पण खाली हाजिरी से काम नि चलदो ठौ . हरेक पुछण वाळ तै  पुछण जरोरी छौ कि छींक कै हिसाब से ऐन. छींक दै नाक सी आई कि बै  नाक से आई. छेंकी आई कि सीम्प/सिंगाणा  बि आई. अर फिर नरेंदर ददा जब तक पूरी कथा नि लगै द्याओ  त पुछण वाळ जै बि नि सकद. जोगी काका तै छींको  बारा मा पुछण अर फिर नरेंदर ददा बिटे  छींक रामयण सूणण मा देर ह्व़े ग्याई. मनिखों क्वी  अनुशासन  नि होंद पण रिक बागुं अपण कुछ प्राकृतिक नियम-धियम होन्दन. जथगा देर मा जोगी काका नरेंदर ददा कि छींक-छूंक कि  रामायण सुणणु राई  उथगा देर मा बाग़ गोठ म मेमान  बौ णिक ऐक  जोगी काकाक द्वी गौड़ अपण दगड ली गे. जोगी काका अर  काकी तै गौड़ीयूँ दुःख त छौ पण एक बड़ो सुख छौ कि टैम पर नरेंदर ददा क बीमारी -बिथ्या क पूछ ताछ त कौरी याळी. उन सि दिन होंद त गांव  वाळु न जोगी काका क ग्वाठम   जाण छौ  अर फिर बाग़ की खोज करण छौ. पण सरा गाँ त नरेंदर काका क पूछ ताच मा व्यस्त छौ त कैन बि जोगी काका कि खबर नी ले. नरेंदर ददा क सुचण छौ बल बीमारी मा पूच-  ताच करण वाळु क गणत से अहमियत कु पता चलद. नरेंदर ददा क अपण सबी नौन अर नौनियूँ ब्यौ उनि जगा कार जख समदी तै बीमारी मा पुछणो  जादा से जादा लोक आंदा छ्या.



           अब सूणो ना ! सि हमारी अडगै (इलाका) मा गजे जी छया. त ऊंको बि इनी बुलण छौ बल आदिमों महत्व बीमारी मा पुछण वाळु संख्या से इ हुंद . मातबरी  अर गरीबी  से आदिमक पछ्याणक नि होंद बल्कण मा बीमारी मा पूच -ताच से हुंद कि कथगा लोक पुछणो-जाचणो ऐन.  इलै जनि गजे जी बीमार हूंदा छ्या त अपण आबत मिन्त्रों इख हलकारा भिजदा छ्या कि जां से उंक इख खूब भीड़ ह्व़े जाओ. बीमारौ इख लोखुं भीड़-  पिपड़करो बिटे पता चलदो कि ये मनिखौ क्या पुन्यात च, क्या व्यक्तित्व च.

                आज बि बीमारी अर लोगूँ पुछण अहमियत को एक प्रतीक च , स्टेटस सिम्बल च. मेरी कम्पनी मा म्यार एक दगड्या च नाम? चलो मिस्टर खोबरगड़े  सै . वो दुःख सुख तै अपण प्रमोसन अर अफु तैं अंक्याणो ( मूल्याँकन) साधन माणदन. जब बि जरा थ्वडा सि जादा बीमार ह्वाई ना कि बड़ो से बड़ो अस्पताल मा भर्ती ह्व़े जान्दन. अर सेक्रेटरी तै काम दे दीन्दन कि सरा दुन्या मा खबर जाण चयेंद. सेक्रेटरी सब जगा खबर फैलांदी त 'गेट वेल सून  ' क एस.एम्.एस या मेल आण बिसे जान्दन.    फिर मुंबई का सेल्स मैनु तै काम पर लगाये   कि सौब दुकानदारों तै अस्पताल ल्ये जाओ. जु जथगा दुकानदार (डीलर या डिस्ट्रीब्यूटर ) लांद वैको प्रमोसन वै हिसाब से हूंद. मिस्टर . खोबरगड़े  इन पता लगै दीन्दन कि एम 'डी कख छन अर कबारी कबारी अफिक एम.डी क तरफान बड़ो फुलुं गुलदस्ता अपण  कमरा मा धौरी  दीन्दन कि लोग द्याखन . फिर यांकी पूरी सूचना मिस्टर . खोबरगड़े  अपण एम. डी तै दीन्दन कि कथगा दुकानदार दिखणो ऐन जाण से एम.डी तै पता चली जाओ कि  मिस्टर खोबरगड़े  डीलरूं मध्य कथगा प्रसिद्ध छन. बीमारी से फैदा उठाण सिखण ह्वाओ त मिस्टर खोबरगड़े से सिखण चयेंद.  मिस्टर खोबरगड़े  बीमारी तै स्टेट्स सिम्बल मा बदली दीन्दन.



                 राजनीति मा बि बीमारी स्टेट्स सिम्बल होंद पण इन पता इ नि  चलद कि नेतौं बीमारी -बिथ्या असल च कि नकली. कबि कबि डिप्लोमेटिकल बीमारी बि होंद . अर अच्काल त नेतौ पर एक नई बीमारी बि लगीं च जनि कोर्ट को समन आन्द यूँ नेतौं पर हज्या से बि बडी बीमारी लग जांद अर यि इ .सी.यू पौंची जान्दन. फिर कोर्ट का मुताबिक यूँ पर भंयकर बीमारी होंद अर जमानत मिल जांद पण जनि यि अस्पताल बिटे भैर हुन्दन कुतकण बिसे जान्दन. अब सि अपणा अमर सिंग जी तै देखी ल्याओ. जब तलक जमानत नि मिलि इन लगणु छौ अबि अर तबी पण अब त कुतकणा ही रौंदन!



  खैर नेतौं क बीमारी मा बि राजनीती चलद . कै नेता क दगड घचपच करण  हो त अस्पताल या ड्याराम  पौंची जाओ अर बैर दिखाण होऊ त क्वी खबर नि लीण .



            उन हमर इतियास मा बीमारी क पूछ ताच या भगवान से सुख्यर हूणो दिली प्रार्थना जथगा अमिताभ बच्चन कि ह्व़े उथगा कैकी नि ह्व़े. हाँ अच्काल लोक क्रिकेटर युवराज कि बीमारी क बार मा बि पुछणा रौंदन.



  गितांग  कल्पना चौहान जब अस्पताल मा छे त इंटरनेट मा खूब पूछ ह्व़े



अब जब कि लोक गाइका   कबूतरी देवी की खबर आई पुछणा सबि छन पण इमदाद क्वी क्वी इ दीणा छन. इख तलक कि मी बि मुक लुकाणु छौं.



  अच्काल फेस बुक या इन्टरनेट से पूछ ताच सौंग ह्व़े गे. जब मुंबई का साहित्यकार-सामाजिक कार्यकर्ता डा.राजेश्वर उनियाल बीमार ह्वेन अर अस्पताल मा भर्ती ह्वेन त एस.एम.एस अर मेल इथगा ऐन कि ऊं तै डौरन खबर भिजण पोड़ कि अस्पताल आणो जरूरत नी च. 

गढ़वाली का प्रसिद्ध  कवि पूरण पन्त  बडी बीमारी से लड़णा छन पण उख देहरा दून  का इ साहित्यकार बौं हौड़ पड्या छन एकाध तै छोड़िक  क्वी साहित्यकार दगड्या पुछणो ग्याई इ नी छन.



  खैर भगवान चाओ बल कै तै बि बीमारी नि द्याओ.



Copyright@ Bhishma Kukreti, 10/6/2012

Bhishma Kukreti

Meri Paili Chori: a Hilarious and Satirical Garhwali Drama
(Review note on 'Meri Paili Chori' a Hilarious and Satirical Garhwali Drama written by Playwright Harish Thapliyal)

                                 Bhishma Kukreti

[Notes on Hilarious and Satirical Garhwali Dramas; Hilarious and Satirical Kumauni Dramas; Hilarious and Satirical Uttarakhandi Dramas; Hilarious and Satirical mid Himalayan Dramas; Hilarious and Satirical Himalayan Dramas; Hilarious and Satirical North Indian Dramas; Hilarious and Satirical Indian Dramas; Hilarious and Satirical Indian subcontinent Dramas; Hilarious and Satirical SAARC Countries Dramas; Hilarious and Satirical South Asian Dramas; Hilarious and Satirical Asian Dramas]
[हास्य-व्यंग्य भरे नाटक; हास्य-व्यंग के गढवाली नाटक;हास्य-व्यंगात्मक कुमाउनी नाटक;हास्य-व्यंग्य भरे उत्तराखंडी नाटक;हास्य-व्यंग्य भरे हिमालयी, नाटक;हास्य-व्यंग्य भरे उत्तर भारतीय नाटक;हास्य-व्यंग्य भरे भारतीय नाटक;हास्य-व्यंग्य भरे दक्षिण एशियाई नाटक;हास्य-व्यंग्य भरे एशियाई नाटक लेखमाला ].


                Hastagiri organization presented and staged the 'Meri Paili Chori' a Hilarious and Satirical Garhwali Drama written by Playwright Harish Thapliyal in 1989 in Shanmukhanand Hall, Mumbai.
                 The drama is about that there is theft in house.  People start coming to the house owner and ask relevant and ridiculous questions. People also start providing various suggestions to stop the future theft.  The whole attention of villages is towards the owner and is continued for days. The house becomes the stage for fair (Khaul-Myala).
           The house owner wants to get rid of ridiculous questions, sympathy and suggestions by the people. The house owner takes a decision that is very risky and can harm the owner vary badly. Does the house owner become successful in implementing his plan?   
   Harish Thapliyal (native, Ratuda, Rudraprayag) is a Hindi playwright, stage activist, film and TV artist. He came in Garhwali dramatic field due to joining Uttarakhand Chhatra Sangh, Mumbai. He was happy that the audience laughed many ties while watching the drama. Thapliyal is sad that the drama culture could not be created in Garhwali-Kumauni due to various reasons. 

Copyright@ Bhishma Kukreti, 10/6/2012

Notes on Hilarious and Satirical Garhwali Dramas; Hilarious and Satirical Kumauni Dramas; Hilarious and Satirical Uttarakhandi Dramas; Hilarious and Satirical mid Himalayan Dramas; Hilarious and Satirical Himalayan Dramas; Hilarious and Satirical North Indian Dramas; Hilarious and Satirical Indian Dramas; Hilarious and Satirical Indian subcontinent Dramas; Hilarious and Satirical SAARC Countries Dramas; Hilarious and Satirical South Asian Dramas; Hilarious and Satirical Asian Dramas to be continued...
हास्य-व्यंग्य भरे नाटक; हास्य-व्यंग के गढवाली नाटक;हास्य-व्यंगात्मक कुमाउनी नाटक;हास्य-व्यंग्य भरे उत्तराखंडी नाटक;हास्य-व्यंग्य भरे हिमालयी, नाटक;हास्य-व्यंग्य भरे उत्तर भारतीय नाटक;हास्य-व्यंग्य भरे भारतीय नाटक;हास्य-व्यंग्य भरे दक्षिण एशियाई नाटक;हास्य-व्यंग्य भरे एशियाई नाटक लेखमाला जारी ..

Bhishma Kukreti

Bedvart: Garhwali story depicting Struggle of Badi-Badan (a dancing class)

(Review of 'Joni par Chhapu kilai? (1967) story collection by Mohan Lal Negi)

                                  Bhishma Kukreti

               Bed or badi is dancing singing class of Garhwal. It is said that they are originated from the body dirt (Mail) of lordShiva). The not only sing and dance but play adventurous game to entertain the people –lang khilan it is believed that the land becomes more fertile after lang-play.
   Mohan Lal Negi depicts the struggle of Bed-Badi community. He describes about one type of Lang where Bed/badi slips through along rope along side of hill and in this way he could die too. The story teller could show the readers the struggle and adventure of Bad- Bed community in Bedvart. For the sake of their Thakurs the Bed or badi were ready to play with their lives.
           Bedvat is second story in Garhwali that shows the life of Badi community very seriously. The first was novel byalmu –Biral (1940) by Baldev Prasad Nautiyal.

Copyright@ Bhishma Kukreti, 11/6/2012

Bhishma Kukreti

राजनीति विषयक गढवाली कथाएं-

                             

                                            खड़क सिंग जीक मंत्री पद का बान चड़क


                                                          भीष्म कुकरेती


            कभी कभी जब नक्षत्र अडबंग (बेढंग) पोड्या ह्वावन त देळि क भेळ ह्व़े जांद सैणु रस्ता मा उप्यड़ , खेचळ ( परेशानी)   खड़ो ह्व़े जांद, बगैर बातो उपड़ग (विघ्न -बाधा) अर ह्यूंद मा बि  रुड्यू जन औरुड़ी- औडळ ऐ जांद. सि द्याखो ना खड़क सिंग जीन मुख्यमंत्री पद का खातिर उफ़ाळि मार त ऊं तै हाई कमांड न चड़गट्यु (चढ़यूँ  दिमागौ )  नाम देक बौणबासा  दे द्याई. राजनीति मा बि डंड  होंद  जन ब्व़े बाब अपड बच्चों तै गल्थी करण पर भितर ग्वडै करदन उनि हाई कमांड क विरोध मा जाण मा मुख्यमंत्री पद का दावेदार तै   भौत कुछ खां मा खां खेण पड़द अर मंत्री पद बि नि मिल्दो. अब द्याखो ना खड़क सिंग जीक तकदीर जब विरोधी दल का नेता छ्या त पार्टिक बान क्या क्या टुटब्याग  नि करीन. सरकारी पार्टिक भला कामू तै गाळी दे देकी सरकारी पार्टी तै बदनाम करणै पूरो पुठयाजोर लगाई तब जैक खड़क सिंग जीक पार्टी यू चुनाव जीत अर वु बुल्दन बल मार खान्द दै कख छ्या बल मूंड  ऐंच अर पिठाई  टैम पर कख छ्या बल मूंड तौळ. बस खड़क सिंग जी बगैर मंत्री पद का छ्या. अब बताओ सरकारी पार्टी मा ह्वेक बि क्वी बगैर मंत्री पद का ह्वाओ त नेतौं पर क्या क्या चड़क नि पोड़दन. सींद दै , सुद्बिज मा , बिज्या मा चड़क इ चड़क. बगैर मंत्री पद का खड़क सिंग जीक कुहाल छ्या. अरे जख कबज होण चयेणु छौ उख अदराड़ा [पेचिस] ह्व़े जान्दन अर जख अदराड़ा हुण चयांदन  तब कबज कि शिकैत ह्व़े जाओ. साला अपण ब्वेका मैस क्वी बि आड़ी बगत (खास समय) पर आड़ी (सहारा) नि दीन्दन या इ त राजनीति क उठंग-बिठंग च तरह तरह के खेल छन. उपयड़ मा, परेशानी मा क्या क्या नि होंद ! जु छै अपणा विधायक छ्या वो बि कै सरकारी संस्थान की चाह मा मुख्यमंत्री क उड़्यार पुटुक छिरकी गेन.  अर अब त मुख्यमंत्री अर हाई कमांड मजा मा छन कि विरोधी पार्टी का कथगा इ विधायक सरकारी पार्टी मा शामिल होणो बान अपण बाप ददा  बदलणो तैयार छन.


  जन बगैर पद का राजनीति वळु  दुःख, बीमारी ऐ जान्दन जन कि खड़क सिंग जी पर चडक पोड़ण बिसे गैने.चड़कौ  पैदा ह्व़े गे. विचारा खड़क सिंग जी अमोड़ इ अमोड़ (जिद ) बोली गेन बल 'मंत्री पद मेरी जूती से'. बोली त गेन पण जन स्याळ, बाग़ बगैर शिकार का नि रै सकदन तनी तनी सरकारी दलों विधयाक मंत्री या कुछ हौरी पद बगैर ज़िंदा नि रै सकुद. उनि खड़क सिंग जीक कुहाल छन. ना त संतरी का सलूट अर ना ही  सेक्रेटरियूँ क 'एस!   मिनिस्टर !  की अवाज'. ना ही चमचों की भिणभिणाट, ना ही जनता की आवा-जाई, ना इ मीटिंग सीटिंग अर सेटिंग. ना इ क्वी ठेकेदार दिखेंद ना इ क्वी मालदार मनिख. इन मा पार्टी फंड का नाम पर आण वळ सात पुस्तुं कुण धन -धान्य  को इंतजाम कनै होलू?     


    जब बि राजनीतिग्य परेशानी मा ह्वाओ जन कि सरकारी पार्टी मा ह्वेक बि मंत्री पद नि मिल्दो  त राजनीतिग्य कुछ सनातनी सास्वत कर्मकांड करदो. खड़क सिंग जीन ड़्यारम गां जथगा बि गढ़वाळी  दिवता - नागराजा, नरसिंग, कैंतुरा, हंत्या, देवी-अन्छेरी , ऐड़ी  (अन्छेरी) , रण भूत  सब  नचैना. जैन ज्यूँदि अपण ब्व़े बुबा तै भातौ  एक गफा बि नि खिलाई वूं  खड़क सिंग जीन  कै बूड -खूड की आत्मा-सांति बान नारेणबळि क नाम पर  हरिद्वार, गया, त्रिम्बकेश्वर  मा सैकड़ो भिकार्युं तै बनि बनी क खीर अर पूड़ी खलैन . वै जामाना का बूड खूडु  नाम पर आज का भिखलोई ले खुस ह्व़े गेन.


         खड़क सिंग जीन मंत्रीपद का बान  टूण टणमण  मा बि क्वी कसर नि छोडि. बाबा बाल्टी वाले क बल्टी उठाई, बाबा कचरा वाले को कचरा उठाई, मुर्दा को ड़रख्वा खड़क सिंगन   मड़घट वाले बाबा क  मड़घट बि द्याख, झाड ताड़ सबि कौरिन. अपण बामण से लेकी  तामिल नाडू, केरल का बामणु बात सूणिक  कुज्याण कथगा पाठ धरिन धौ! कुछ अफिक धरिन कुछ जगा दुसरी क्या छ्वड़ी घरवळी   तै बि पूजा प्रतिनिधि बणाइ. वास्तु शाश्त्र कि पुजाई  क चक्कर मा घर का सबि फर्नीचर बदल, घर बदल, जापनी , अफ्रीकी सब तरां की वास्तु शांति कार.


      अब बुल्दन बल मंतर, तंतर,,कर्मकांड, पाठ- पुजाई , टूण टणमण-टोटब्याग त अपण जगा  होन्दन  पण घुण्ड हिलयाँ बगैर बच्चा पैदा थुका होन्दन ! डिल्ली मा हाई कमांड का न्याड़ ध्वारक जथगा बि नेता छा उंको अंगुछा धोई, ऊंका जराब ध्वेक वै पाणी तै चरणा मृत जन प्याई, कैका खुट मलासिन-कैका कुकुर कि भुकी प्याई त कैकी बिरळि तै खुकली मा उठाई. कैक कज्याणि कुण काकी ब्वाल त कैकी कज्याण तै भौज  या बैणि बणाइ. फिर धीरे धीरे कौरिक हाई कमांड तक फिलर भेजिन कि भज्युं कुत्ता ड़्यार आण चाणो च. हाई कमांड त रुस्यूं  छौ  कि खड़क सिंग कि इथगा मजाल कि हाई कमांड की तौहीन करी दे अर हाई कमांड न पैल पैल फिलरूं  क दगड इन ब्यौहार कार जन कै खजी वळ  कुकरो दगड ब्यौहार करे जांद .भिखलोई  जन प्रार्थना कौरि   कौरिक  हाई कमांड तै दया आई कि ठीक च कै दिन त ये कुकरन बडी सेवा करी छे . बस पुराणि सेवाभक्ति का पुण्य का नाम पर खड़क सिंग जी तै मंत्री पड़ दीणो मन बणाइ.


   फिर हाई कमांड न मुख्यमंत्री जी  खुणि राय क नाम पर आदेस देई   कि खड़क सिंग जी क पार्टी मा भौत जरूरत च मंत्री पद दे द्याओ.

अर इन मा खड़क सिंग जी अब मंत्री ह्व़े गेन


(उन त या कथा काल्पनिक च पण जु कैकी कथा इनी सच ह्वेली त भैरों! इख्मा मेरी क्वी गलती नी च ) 


Copyright@ Bhishma Kukreti 10/6/2012   

Bhishma Kukreti

चबोड़ -चखन्यौ

                               अहा !  हमारो विद्यार्थी जीवन



                                                                            भीष्म कुकरेती



    जब हम कॉलेज मा छ्या त हम असल मा कुछ सोचदा इ नि छ्या कि हम क्या क्या करणा छंवां, बुलणा छ्या. अब जब बुड्यान्द होश आई त कौलेज जोग नि छंवां.   

   अब जन कि क्लास हमकुणि धार्मिक अनुष्ठान जन कर्मकांड को क्वी गोरख-धंदा छयो बस विश्वास क बल पर कि क्लास से कुछ फैदा हूंद  हम क्लास मा जांदा छ्या.

  क्लास,  हमकुण डिग्री पाणै प्रोडक्सन फैक्ट्री छे बस. 


टेक्स्ट बुक या सन्दर्भ किताब की अहमियत तब पता चल्दी छे जब हम कै दगड्या मुंड पर खैड़ा क कटांग  जगा पर सन्दर्भ किताब से चोट मारदा छया कि किताब मा दम च. जै  किताब की चोट जथगा जादा होंदी छे वा किताब उथगा इ महत्वपूर्ण होंदी छे. उन  जादातर दगड्या बुल्दा छ्या कि टेक्स्ट बुक झौड़ा संगुळ या माख मारणो काम बि ठीक ढंग से करी लीन्दन . अर यार दोस्त बुल्दा छ्या कि कबि कबि मेज की क्वी टांग छ्वटि ह्व़े जाओ त द्वी चार टेक्स्ट बुक टिक्वा क काम बि ऐ सकदन


  टेक्स्ट बुक कतियूँक आदि बगत पर काम आँदी छे. जब बि सिनेमा दिखणो बान पैसा कि कमी होंद छे त बिचारा टेक्स्ट बुक ही बली क बुग्ठ्या  बणदा छ्या अर बुक सेलरूं  नफा बढान्द  छ्या. मी घुण्ड ठोकिक बोली सकुद वो सच्चो छात्र नि रै होलू  जैन सिनेमा क बान कबि अपणि   क्वी किताब नि बेचीं ह्वेली. अब का छात्र दारु पार्टी क बान अपण कम्प्यूटर बिचदन अर बुले जांद उ असली मोडर्न स्टुडेंट नी च जु दारु पार्टी क बान अपण बुबा क दियुं कम्प्यूटर नि ब्याचो. ऐथरै मुछ्यळि पैथर सरकदि इ च। टेक्स्ट  बुक अर शर्तिया पास हूणो  गाईडु  मा एकी फरक हुंद छौ कि टेक्स्ट बुक का कागज बढिया क्वालिटी क हूंदा छया अर किताब से जादा भार पुट्ठा क हूंद  छौ.


जब हम डिग्री कौलेज मा छ्या त हम रसायन शास्त्र या वनस्पति विज्ञान की खोजूं से जादा  शब्दकोश पर ध्यान दीन्दा छया किलैकि अंगरेजी मा लिखीं किताबु  मा अस्सी टका लिख्युं समज मा इ आन्द थौ,अर हरेक शब्द क बान अंगरेजी -हिंदी शब्दकोश  की मदद लीण पोड़द उन मार्केटिंग क डिप्लोमा लींद दै बि इनी ह्व़े मार्केटिंग की किताबुं से जादा अंगरेजी -हिंदी शब्दकोश  पर नजर होंदी छे अर यांक बान दुबर  पौकेट डिक्सनरी से लेकी  बडी बडी डिक्सनरी खरीदेन.


     कबि कबि क्या जादा तर हम एक प्रोफ़ेसर का लेकचर मा सीन्दा छया त दुसर प्रोफ़ेसर का लेकचर मा इलै बिजदा छया बल इंटरबल मा चाय-समोसा जि खाण छौ. संयुक्त परिवार मा जन हरेक व्यक्ति की पूछ नि होंदी उनि द्वी सौ छात्रों क्लास मा प्रोफ़ेसर तै पता इ नि चलदो छौ कि गुणी पढ़नेर छात्र सीणा छन कि पढाई का आनंद लीणा छन.


    मी तै नि पता छौ कि मी झूट  बुलण मा बि उस्ताद ह्व़े सकुद. प्रोफ़ेसर जब बि क्वी सवाल पुछ्दो छौ त मी क्वी ना क्वी झुटो बहाना बणै दीन्दो छौ अर बहाना बि इथगा तागतबर हुन्दो थौ कि  प्रोफ़ेसर बि सच मानि लीन्दो थौ. 

मास्टर अर विश्व विद्यालय खुण स्टूडेंट की जरुरात से जादा महत्वपूर्ण सिलेबस हूंद छौ अर आज बि या इ संस्कृति विद्यमान च.


    एक साल मेरी सीट खिड़की क बगल मा छे त मीन वै साल गिलहरियूँ जीवन  पर पूरी रिसर्च करी दे. किलैकि सरा साल म्यार ध्यान प्रोफ़ेसर का लेकचरूं र से जादा भैरो  डाळु क  गिलहरियूँ जीवन चक्र  समजण मा गे.



       पास हूणो बान हम सरस्वती देवी से जादा नकल शास्त्र देवी क चरणो मा विश्वास करदा छ्या. हमर मानण छौ बल सरस्वती देवी हमारो ज्ञान जरुर बढाई सकद पण ज्ञान पास हूणो क्वी गारेंटी ना वैबरी दींदु छौ अर ना ही आज दीन्दो, भारत मा ज्ञान से जादा परीक्षा पास करण जरुरी हूंद त हम पढ़न्देर या स्टुडेंट सरस्वती देवी क मन्दिर छोड़िक नकल देवी क मन्दिर पूजा करणो  या मास कौपिंग चर्च मा मॉस  मा  भाग  लीन्दा  छ्या.   



Copyright@ Bhishma Kukreti 11/6/2012   

Bhishma Kukreti

                    Janm Lok Geet: A Traditional Folk Song of Ravain for Celebrating Child Birth   


                              Bhishma Kukreti

  [Notes on traditional folk songs celebrating child birth in culture; traditional folk songs celebrating child birth in Ravain tribe culture; traditional folk songs celebrating child birth in Garhwali culture; traditional folk songs celebrating child birth in Uttarakhandi culture; traditional folk songs celebrating child birth in North Indian culture; traditional folk songs celebrating child birth in Indian culture; traditional folk songs celebrating child birth in Chinese, Japanese and Thai  culture; traditional folk songs celebrating child birth in Asian culture; traditional folk songs celebrating child birth in culture; traditional folk songs celebrating child birth in European and Canadian culture; traditional folk songs celebrating child birth in Jews culture]
{ पुत्र जन्म के लोक गीत; पुत्र जन्म के लोक यूरोपीय गीत; पुत्र जन्म के एशियाई लोक गीत; पुत्र जन्म के जापनी लोक गीत; पुत्र जन्म के चीनी लोक गीत; पुत्र जन्म के थाई लोक गीत; पुत्र जन्म के भारतीय लोक गीत; पुत्र जन्म के उत्तराखंडी लोक गीत; पुत्र जन्म के गढ़वाली लुप्त होते लोक गीत; पुत्र जन्म के रवांइ इलाका में प्रचलित लोक गीत लेखमाला
}

    In most of the culture there are folk songs sung at the occasion of child birth. For examples in Pashto culture (in Afghanistan and Pakistan), Shaan is a celebratory folk song sung at the occasion of child birth and marriage. There are many ethnic groups sing folk songs and dance too at the occasion of childbirth.
               Jintana Thunwaniwat provides information that Thais performed Chinese folk Dragon dance-Song at the occasion of the birth of the son of Crown Prince Mahavijiralongkorn (Chinese Music in Chinese and Thai Culture).
                The international Shakuhachi society's blog (1) provides details of many Japanese folk songs and ceremonies at the time of child delivery for safe delivery and childbirth.
  Hajara folk music was common in Arabic countries to celebrate the childbirth.
  Jay Althouse provides an example of a Spanish folk song – 'A La Nanita nana' performed for celebrating birth of any child (International Folk Songs for Solo Singers).
  Judith Cohen provides examples of Judeo-Spanish folk songs sung in Canada for celebrating childbirth (Jewish Folklore and ethnology review, vol-12-15, page 25) 
                               Folk songs of Child Birth of general Garhwal those are no more sung


    Anjali Cipila states those now days, in Garhwal, people don't sing folk songs once sung for celebrating child birth in her book Images of women in the folk songs of Garhwal Himalaya: a Participatory research (pages 145-147 and 288-289). Cipila provides translation of two folk songs were once popular around Budakedar regions –
1-Dear mother your daughter has won the battle
By giving birth to a son
Helle Primdahl (1993) provides both the above folk songs about celebrating son birth in his book (3)

पुत्र जन्म पर गढ़वाल का एक लुप्त होता एक लोक गीत

जा धौं भौंरा माजी का पास हमारि
जा धौं भौंरा कुशल मंगल बोल आई
जा धौं भौंरा बाबा जी क पास हमारि
कल्याण बोल आई , कुशल मंगल सुणाइ
धियाण तुमारी मै बोलणि भौंरा
जा धौं भौंरा भै क पास तू मेरा
जा धौं भौंरा कुशल मंगल सुणाइ
बैण तुमारि मै, बोलणि भौंरा
धियान तुमारी माजी जाळ तोड़यो
धियान तुमारी माजी रण जीत्यो
जा धौं भौंरा माजी का पास हमारि
Curtsey –Helle Primdahl (3)
Another song is as translated by Anjali Cipila also refred by Helle
2- Dear son!  You are the fruit of my sacrifice!
To attain you, I underwent several austerities
.......
Of light that illuminates the mountain peaks at down
My dear son, may you become the light of my 'kul'.
  This author is also of opinion that baring a couple of regions as Ravain, now a days, people don't sing song celebrating child birth or son birth. Definitely before British took over Garhwal, there was tradition to sing folk song to celebrate son birth.   

              Janm Lok Geet: A Folk Song of Ravain for Celebrating Child Birth   

              A famous Garhwali poet and Hindi writer Dr. Jagdish Prasad (jaggu) Naudiyal provides various types of folk songs of Ravain in his research book.
     Ravain region is on west-north part of Uttarkashi district, Garhwal of Uttarakhand state. The following is a folk song of Ravain, Uttarkashi of celebrating the childbirth. The song is about the birth of lord Krishna

                 रवांइ क्षेत्र का जन्म के समय का लोक गीत

पगूड़ी को पेंट रे लाल कृष्ण , पंगूड़ी को पेंट रे लाल कृष्ण
कृष्ण जी जनम्यों रे लाल कृष्ण , देवकी के पेट रे लाल कृष्ण I
झंगूरा का बाल रे लाल कृष्ण , झंगूरा का बाल रे लाल कृष्ण
देवकी का पेट रे लाल कृष्ण , कंश को काल रे लाल कृष्ण I
फूली जाली जाई रे लाल कृष्ण ,फूली जाली जाई रे लाल कृष्ण ,
गोकुल मा जनम्यों रे लाल कृष्ण ,मथुरा पंहुचाई रे लाल कृष्ण I ,
घड़ी काटो घास रे लाल कृष्ण ,घड़ी काटो घास रे लाल कृष्ण
मथुरा पंहुचाई रे लाल कृष्ण ,यशोदा के पास रे लाल कृष्ण I
हरी काटी लौकी रे लाल कृष्ण , हरी काटी लौकी रे लाल कृष्ण
यशोदा को लाडो रे लाल कृष्ण , मखन को शौकी रे लाल कृष्ण I
डाडू मारी थ्यारी रे लाल कृष्ण ,डाडू मारी थ्यारी रे लाल कृष्ण
यशोदा को लाडो रे लाल कृष्ण , राधा तैकी प्यारी रे लाल कृष्ण I
Translation-
Deviki gave birth to Krishna
  Krishna's birth for killing cruel Kansh
Krishna took birth in Gokul
Krishna is deported to Mathura
Yashoda is now mother of Krishna
Krishna is fond of butter
Krishna loves Radha


Song Curtsey: Dr Jagdish Naudiyal

Reference:
1-International Shakuhachi Society,  http://komuso.com/pieces/pieces.pl?piece=2113
2-Dr Jagdish Prasad Naudiyal, 2011, Uttarakhand ki Dharohar (Ravain kshetr ke lok sahity kaa sanskritik adhyyan)
3- Helle Primdahi, Central Himalayan folklore: folk songs in Rituals of Life cycle

Copyright@ Bhishma Kukreti, 11/6/2012
Notes on traditional folk songs celebrating child birth in culture; traditional folk songs celebrating child birth in Ravain tribe culture; traditional folk songs celebrating child birth in Garhwali culture; traditional folk songs celebrating child birth in Uttarakhandi culture; traditional folk songs celebrating child birth in North Indian culture; traditional folk songs celebrating child birth in Indian culture; traditional folk songs celebrating child birth in Chinese, Japanese and Thai  culture; traditional folk songs celebrating child birth in Asian culture; traditional folk songs celebrating child birth in culture; traditional folk songs celebrating child birth in European and Canadian culture; traditional folk songs celebrating child birth in Jews culture to be continued.
पुत्र जन्म के लोक गीत; पुत्र जन्म के लोक यूरोपीय गीत; पुत्र जन्म के एशियाई लोक गीत; पुत्र जन्म के जापनी लोक गीत; पुत्र जन्म के चीनी लोक गीत; पुत्र जन्म के थाई लोक गीत; पुत्र जन्म के भारतीय लोक गीत; पुत्र जन्म के उत्तराखंडी लोक गीत; पुत्र जन्म के गढ़वाली लुप्त होते लोक गीत; पुत्र जन्म के रवांइ इलाका में प्रचलित लोक गीत लेखमाला जारी ...