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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti

गढ़वाली नाट्य शिल्पी , कवि श्री डी .डी. सुंदरियाल जीक दगड  भीष्म कुकरेती क छ्वीं




भीष्म कुकरेती - आप साहित्यौ दुनिया मा कनै ऐन?*


डी .डी. सुंदरियाल --भाई साहब, मी अपु तै साहित्यकारु की श्रेणी माँ नि मंदो। म्यरू जीवन त
गढ़वाली साहित्यकारु बारा म जणनु , वूथे पढ़्नु माँ बीति कभी कभी कवी खुदी
का उदगार उमाल बणि भैर ऐ जंदन बस ।



भी.कु- वा क्या मनोविज्ञान छौ कि आप साहित्यौ तरफ ढळकेन ?*

डी .डी. सुंदरियाल --प्राइमरी स्कूल म पंचतंत्र, हितोपदेश व जानवर पेड़ पोधो का बारा बाल
साहित्य पढ़नों, गीत संगीत, जनन्यून का थड़ीया-चौंफुला, 'गमत' भजन,
रामलीला, नाटक आदि का वातावरण माँ बीति। शायद ये मनोविज्ञान रै होलु जै
से साहित्या प्रति रुचि पैदा ह्वै।



भी.कु. आपौ साहित्य मा आणो पैथर आपौ बाळोपनs कथगा हाथ च ?*

डी .डी. सुंदरियाल --बचपन बटीकी मी इनी छओं। बालपन बटिकी स्कूली किताबू अलावा हर चीज पढ़्नो
शोक राइ खासकर कहानी, उपन्यास। लिख्णो त बुढ़ापा माँ शुरू करि, खास करि
गढ़वाली म।

भी.कु- बाळपन मा क्या वातवरण छौ जु सैत च आप तै साहित्य मा लै ?

डी .डी. सुंदरियाल --बचपन का वातावरण बारा म पैलि बिंगई याल......



भी.कु. --कुछ घटना जु आप तै लगद की य़ी आप तै साहित्य मा लैन !

डी .डी. सुंदरियाल --चंडीगढ़ म उत्तराखंड रामलीला मंडली, गढ़वाल सभा मंच, गढ़ कला संगम कु गठन
करि गढ़वाली नटकू म रुचि पैदा ह्वै बाद म , कनहैया लाल डंडरियाल, नरेंद्र
सिंह नेगी, जीत सिह नेगी, बलवंत सिंह रावत 'कवि' गणेश खुग्शाल गणी,
गिरीश सुंदरियाल, मदन मोहन डुकलान, नेत्र सिंह असवाल, पाराशर गौड़ तै पढ़ी
पढ़ी गढ़वाली कविता लिख्णो मन करि। हिन्दी ग़ज़ल, कविता और कहानी पैलि भी
लिखदु छो जरा जरा ...



भी.कु. - क्या दरजा पांच तलक s किताबुं हथ बि च ?

दर्जा छै अर दर्जा बारा तलक की शिक्षा, स्कूल, कौलेज का वातावरण को
आपौ साहित्य पर क्या प्रभाव च ?


डी .डी. सुंदरियाल --दर्जा 5 तक भी गैर स्कूली किताब पड़नि । 8- 10 वीं तक प्रेम चंद, व
समकालीन लेखक तथा छायावादी कवि माँ रुचि राया। हिन्दी प्रेमी मन जीवन
यापन का वास्ता इंग्लिश स्टेनोग्राफी कारणो मजबूर ह्वै त हिन्दी साहित्य
से प्रेम ज्यादा ह्वै



भी.कु.- ये बगत आपन शिक्षा से भैराक कु कु पत्रिका, समाचार किताब पढीन जु आपक
साहित्य मा काम ऐन ?- बाळापन से लेकी अर आपकी पैलि रचना छपण तक कौं कौं साहित्यकारुं रचना
आप तै प्रभावित करदी गेन?

डी .डी. सुंदरियाल --कुँवर सिंह नेगी 'कर्मठ' जी कु गढ़ गौरव, पांथरी जी की अलकनंदा और विशेष
रूप से अर्जुन सिंह गुसाइन जी की 'हिलान्स' तथा हिन्दी म धर्मयुग,
साप्ताहिक हिंदुस्तान, सारिका, चंदामामा, हास्य कवि काका हाथरसी, आदि से
बहुत प्रभावित छों । गढ़वाली माँ जीत सिंह और नरेंद्र सिंह नेगी म्यारा
आदर्श छन।

डी .डी. सुंदरियाल --समाचार पत्र और मैगज़ीन कवी भी हो, कनी भी हो बिना पढ़यां नि छोड़ी सक्दु।
अखबार म नौकरी कर्णो मीन 7 साल की सरकारी नौकरी छोड़ि अब बिना पेंशन कु
ठन ठन गोपाल बजाणु छों

डी .डी. सुंदरियाल --गढ़ गौरव पत्रिका पढ़ी पढ़ी की मेरी पैलि रचना ' अर्पण ' 1977 अगस्त म छपाई
छाई। अभी भी म्यारी ज्यादा रचना गढ़वाली म नि छपी।



भी .कु.-- ख़ास दगड्यों क्या हाथ च?आपक न्याड़ ध्वार, परिवार,का कुकु लोग छन जौंक आप तै परोक्ष अर अपरोक्ष
रूप मा आप तै साहित्यकार बणान मा हाथ च ?

डी .डी. सुंदरियाल --गढ़ कला संगम का साथी चंडी भट्ट भारती, एन डी लखेड़ा , बलवंत रावत जाना
दागीड्या, गणी व गिरीश जना साहित्यकार भुल्ला, व नरेंद्र सिंह नेगी व
डंडरियाल जना जणगुरु कु आभारी छों जाऊन या झैल पिलचाई प्रत्यक्ष रूप म ,
अर मेरी बींदनी शुशीला सुंदरियाल, म्यारा बचचा, भाई बंद परोक्ष रूप से
येका जीमेवार छन



भी.कु. कौं साहित्यकारून /सम्पादकु न व्यक्तिगत रूप से आप तै उकसाई की आप
साहित्य मा आओ

डी .डी. सुंदरियाल --बाकी सभी सवालुकू जबाब मथिफुनड ही मिली जाली आप तै। मीन पढ़ी पढ़ी की लिखण
सीखि। अबोध बंधु बहुगुणा, पूरन पंत पथिक, देवेंद्र जोशी, कमल
साहित्यलंकार, जीत सिंह नेगी, आदि भी म्यारा गुरु जना छन
पर व्यक्तिगत रूप से शिष्य मी काइकु निछों। बिंड करि प्रेरणा आपसे ही
मिली... हिलान्स का जमाना से

जुगराज रयां, जु आपन मी योग्य समझु

भीष्म कुकरेती - जी धन्यबाद, जब मि हिलांस मा लिखदु छौ त खुद साहित्य कि ट्रेनिंग लीणु छौ



Copiright @  Bhsihma Kukreti , 11/6/2012

Bhishma Kukreti

गढवळी युवा कविश्री महेन्द्र राणा जी क भीष्म कुकरेती क दगड छ्वीं

भीष्म कुकरेती - आप साहित्यौ दुनिया मा कनै ऐन?

महेन्द्र राणा – पैलाग गुरुवर जी। जब यु सवाल म्यारा मन मा भी आन्दु त
मिते येकु जबाब ते भौsत दूर जाण पड़दु। मि साहित्य मा कनै ऐन येगा
पिछ्यड़ी माँ भगवती की कृपा छन, सन २००० मा जब माँ भगवती की राज जात
यात्रा हुणि छे त वे बकत म्यारा घौर मा एक चौसिंगया खाड़ू पैदा ह्वे अर
वे बकत मि दर्जा आठ मे पड़दु छौ अर राज जात यात्रा का बारा मा भी नि
ज्यांदू छौं, मिते भौत उत्सुकता छे ये का बारा मा भौत कुछ ज्याणु पर
लुगों का मतभेद ही मिली कोसिस करी की कखी कुछ लिख्यु होलु पर वे बकत कुछ
नि मिली। तबी मिन स्वाच की अगिना जै के मि राज जात यात्रा पर एक किताब
लिखलु, वे बकत मन मा एक ग्येड़ बांधी अर अभी तक वु ग्येड़ खुली नि चा।

भी.कु.- वा क्या मनोविज्ञान छौ कि आप साहित्यौ तरफ ढळकेन?
महेन्द्र राणा – जब मिन स्वाच की मि एक किताब लिख्लु त कनै लिख्लु, मेरी
लिखी किताब लुगौं का पसंद नि आली त मेरु लिख्यु क्या फैदा मिन और कुछ
लिख्ण की तैयारी करी अर जब मि दसवीं मा पड़दु छि त मिन एक कविता लिखी।
धीरे-धीरे मिन और कविता भी लिखी अर आज भी लिख्णु चा।

भी.कु.- आपौ साहित्य मा आणो पैथर आपौ बाळोपनs कथगा हाथ च?
महेन्द्र राणा – मेरी बाळोपन की सोच ही मिते साहित्य की तरफ खिचणी चा।


भी.कु- बाळपन मा क्या वातवरण छौ जु सै त च आप तै साहित्य मा लै?

महेन्द्र राणा – बाळपन मा मेरी दादी कु लाड़-प्यार अर माँजी, दादी की
सुनाई औखाण-कथा।

भी.कु.- कुछ घटना जु आप तै लगद की य़ी आप तै साहित्य मा लैन !
महेन्द्र राणा – इनी क्वै खास घटना नि घटी पर राज जात यात्रा पर किताब
लिख्णु का बाना ही मेरो साहित्य से नाता जुड़ी।


भी.कु. - क्या दरजा पांच तलक s किताबुं हथ बि च?

महेन्द्र राणा – दरजा पाँच तलक की किताबुं कु त सबसे खास हथ छ, वे बकत की
पढ़ी किताबुन ही मिते आज यख तक पौंछाई।

भी.कु.- दर्जा छै अर दर्जा बारा तलक की शिक्षा, स्कूल, कौलेज का वातावरण

को आपौ साहित्य पर क्या प्रभाव च?

महेन्द्र राणा – दरजा छै अर बारा तलक द मि साहित्य का बारा मा ज्यांदु भी
नि छे पर अपरोक्ष रूप मा आज भी वें बकत शिक्षा मेरा साहित्य मा भौत
प्रभाव डाल्दी।


भी.कु.- ये बगत आपन शिक्षा से भैराक कु कु पत्रिका, समाचार किताब पढीन जु
आपक साहित्य मा काम ऐन?

महेन्द्र राणा – अभी मि साहित्य मे भली के रची-बसी नि अर कभी कभार ही
क्वै पत्रिका, किताब पड़दु। आज इंटरनेट मा ही मि ज़्यादातर साहित्य ते
पढ़दु अर जै की जरूरत पड़दी इन्टरनेट मे ही खोज्यांदु।


भी.कु- बाळापन से लेकी अर आपकी पैलि रचना छपण तक कौं कौं साहित्यकारुं
रचना आप तै प्रभावित करदी गेन?

महेन्द्र राणा – मेरी पैलि रचना १६ फरबरी २००६ मा छपी, वें बकत तक मिन
सिर्फ बारवीं दरजा तलक का किताबु मा छपी साहित्यकारु की रचना ही पढ़ी चि।

भी.कु.- आपक न्याड़ ध्वार, परिवार, का कुकु लोग छन जौंक आप तै परोक्ष अर

अपरोक्ष रूप मा आप तै साहित्यकार बणान मा हाथ च?

महेन्द्र राणा – मिते साहित्यकार बनाण मा म्यारा दगरियोंक सबसे ज्यादा
भागीदारी छ जूं परोक्ष रूप मा साथ दिन्दा अर परिवार का लोग भी अपरोक्ष
रूप मा साथ दिन्दा, अभी तक त मेरी माँ जी अर पिताजी तें पता भी नि च की
कवितायें भी करदु।


भी.कु- आप तै साहित्यकार बणान मा शिक्षकों कथगा मिळवाग च?

महेन्द्र राणा – शिक्षकौं कु त भौत मिलवाग च, शिक्षकोन जु भी पढ़ाई दिल
लगै के पढ़ाई।

भी .कु.- ख़ास दगड्यों क्या हाथ च /
महेन्द्र राणा – दगड्यों कु त भौत हथ च, दगड्योन हमेशा ही मेरु हौसला
बढ़ाई अर हर बकत मेरी मदद भी करी।

भी.कु.- कौं साहित्यकारून /सम्पादकु न व्यक्तिगत रूप से आप तै उकसाई की

आप साहित्य मा आओ

महेन्द्र राणा – साहित्य मा आणु तै मिते कैन नि उकसाई अर न ही पैलि क्वै
साहित्यकार /सम्पादक दगड़ी ज्याण-पछयाण रै।

भी.कु.- साहित्य मा आणों परांत कु कु लोग छन जौन आपौ साहित्य तै निखारण मा मदद दे?
महेन्द्र राणा – मिते नि लग्दु कि मि साहित्य मा अभी भली के आई, न ही
क्वै मेरी रचनाओं तें निखारण मे मदद करणा छन। पर आपका मेल अर इंटरनेट
पोस्ट मेरी भौत मदद करदी अर इंटरनेट मा औरी साहित्यकारुक की रचना भी
पढ़ते रोन्दु जूं थोड़ी भौत मेरी रचनाओं मा निखार ल्यान्दी।

धन्यवाद श्री कुकरेती जी आपन अपना कीमती बकत मा म्ये दगड़ छ्वी लगाणु कु मन बनाई।

Bhishma Kukreti

चबोड़ -चखन्यौ



                               इतियास अर भूगोल का बदौलत मी साइंस को विद्यार्थी बौण



                                              भीष्म कुकरेती


                   जनि मर्फी रेडिओ मा सेल्स विभाग मा मेरी नौकरी लग अर भैर घुमण मिस्योंउ त मर्फी रेडिओ बिचणेर (मर्फी डीलर)  मी तै पूछ्दा छ्या बल 'कुकरेती जी आपन बोटनी मा एम्.एस.सी कार त आप सेल्स लाइन मा किलै आवा?" या म्यरा जाण पछ्याणक वळा बी खौंळेक  पुछदा छा क्या अबि बि पुछ्दन ," अरे जब सेल्स मा इ आण थौ त कोलेजुं मा  किलै उथगा टेस्ट ट्यूब फ़ोडिन अर किलै बौण  बौण भटकि भटकिक  काई /सिंवळ (मीन एल्गी मा थीसिस लेखी छौ) कट्ठा कौरिक इथगा मेनत कार?' यूँ सब्यू मनण  च या छौ बल सेल्स मा केवल आर्ट या कौमर्स फैकल्टी का लोग ऐ सकदन विज्ञान वळु तै कै कौलेज या लैबोटरी रिसर्च मा इ दिन बिताण चयेंद.ह्व़े सकुद च इ लोग सही ह्वावन .पण इन नी च विज्ञान का विद्यार्थी सेल्स /विक्री विभाग मा ऐ जांद त वो सेल्स मा बि ऐनालिटीकल या विश्लेषणात्मक सोच त लान्दो इ च. अर हमर बगत पर फिलिप्स रेडिओ , ब्लू स्टार ए.सी वळा इंजिनयरूं तै सेल्स विभाग मा लीन्दा छ्या.


                     अर सबसे जादा सवाल त अब हून्दन कि मीन जब साहित्य मा इ आण छौ साइंस /विज्ञान किलै पौड़  ? या फिर मार्केटिंग मा ह्वेक मी गढवळी मा कनकै लेखी सकदु . सैत च मी अपण समौ पैलो साइंस ग्रेजुएट होलू जैन गढवळी जनि भाषा मा कथा लेखी हो! अब त कवि डा. नरेंद्र गौनियल, सुंदरियाल , गितांग  ओम बधानी जी, नाट्य शिल्पी सुरेन्द्र बलोदी आदि बि गढवळी साहित्य मा ऐ गेन पण  म्यरो समौ मा लोगूँ तै अचर्ज हुन्दो छौ बल साइंस वळ साहित्य लिखणु च. उन आज बि एक सास्वत सवाल लोक पूछी लीन्दन ,"कि मीन जब साहित्य मा इ आण छौ साइंस /विज्ञान किलै पौड़ ?".


                असल मा म्यरो साइंस या विज्ञानों विद्यार्थी हूणो पैथर इतिहास, भूगोल अर अंग्रेजी साहित्यों हात छ. जी हाँ आपन बि खौळयाण बल मी क्या बुलणु छौं? पण हमर बगत मा हमर गाँ मा जो  कौंसेलिंग सिस्टम छौ वैको हिसाब से मी साइंस को विद्यार्थी बौण.


                     मी तै इतिहास अर भूगोल पढ़ण  मा बड़ो मजा आन्द  छौ . अर अंग्रेजी सिखणो बड़ो उलार छौ. मी सेक्सपियर या जु बि कवि रै होला ऊंको जीवन चरित्र अर कविता  को अर्थ हगद-मुतद अर नयान्द  दै बि रटणो रौंद छौ. इतिहास-भूगोल मा रूचि अर अंगरेजी मा मेनत से म्यार दर्जा सात परीक्षा मा इथगा  नम्बर ऐन कि सरा गाँ मा   हल्ला ह्व़े गे अरे परीक्षा मा डिस्टिंक्सन  आओ त गाँ  मा हाम होणि छौ. अंग्रेजी अर इतियास-भूगोल मा नब्बे प्रतिशत से जादा नम्बर हूण से मी दर्जा सात मा  डिस्टिंक्सन  मा पास होऊ. हाँ साइंस मा म्यरा नम्बर चालीस या पैंतीस छ्या. हाँ गणित मा पचास से जादा नम्बर छ्या .अब जब मेरी ब्व़े न गाँ मा पास हुणै खुसी मा भिल्ली बंटवै  त हमारि ल्वारण बोडि याने मंगळेरि सुबदा बोडि दौडि दौडि आई अर गीतुं भौण मा मेरी बडै  करण मिसे गे. सुबदा बोडि मैत बिटेन मंगळेर छे त इख ल्वार खानदान मा आण पर बि सुबदा बोडि न मांगळ लगाण नि छोडि अर पूरी अडगै (क्षेत्र) मा मांगळ लगाणो जांदी छे अर दगड मा छूटी मुटि   चीज बि बेचीं लीन्दी छे जन कि काण्ड गडणो चिमटी आदि. त बीस पचीस गाँ वा बोडि घुमणि रौंदी छे. वीं सुबदा बोडिक एक  हौबी छे कि जु बि भैर नौकरी करदो ह्वाऊ वै तै पुछदी छे कि तुमन कथगा पौढ़? कख पौढ़? अर कनकै नौकरी लग/ अर जु भैर पढ़णा रौंदा छ्या वूं तै पुछदी छे कि तुम कख पढ़दा फीस  कथगा च , फीस माफ़ कन कै हुंदी/ आदि आदि . याँ से वा सुबदा बोडि एजुकेसन सिस्टम कि जणगरि या एक्सपर्ट ह्व़े ग्याई. ल्वारण या मंगळेर  हुणों बाद बि गाँ मा पढे  मामला म  वीं बोडिक पूछ छे। 


               जब वीं बोडिन  भिल्ली गुड़ कि एक डळि खाई अर चार डळि खुखलिउन्द धार त वीं बोडिंन एजुकेसन कौंसेलर कि भौण मा ब्वाल," ए भूलि ए भीसम तै ड्यारा डूण भिजण चयेंद. अब  द्यूरम पैसा त छें छन त यू भीसम ठाकुर सोळा तक त पौड़ल इ . जब येन मास्टर नि बणण त  दुगड किलै भिजण ? बस ड्यारा डूण भिजण अर सैंस पड़ाण.' फिर वा बोडि सरा गाँ मा घुमण मिस्याई कि हैंक साल भीसम  तै सैंस पढ़ाणो ड्यारा डूण इ भिजण ठीक रालो.  अर सात दर्जा कि परीक्षाफल आण  से लेकी म्यार आठ की परीक्षा तक वीं बोडिन गाँ का सयाणो अर जणगरों  तै कनविंस करी याल छौ या बिंगाई आल छौ बल  भीसम एक महान वैज्ञानिक बणण  लैक च अर वै तै ड्यारा डूण इ भिजण चयेंद.

  हमर इख गाँ मा  एक परिपाटी छे जु त दस पास कौरिक मास्टर बणण त सिलोगी इ ठीक छौ अर जु बारा पास कौरिक मास्टर बणण त वै तै दुगड्ड भिजे जांद छौ अर उख हमर गाँ का  हिरदेराम ददा जीक होटल छौ अर होटल मालिक से जादा वूको नाम गार्जियन का रूप मा छौ. त दुगड्ड जाण हो त हिरदै ददा जीक होटल मा रौण बाकी परेशानी हिरदै दादा जीक छे.


  जख तलक ड्यारा डूण को सवाल छौ त उख का बारा मा द्वी बात छे. या त डी.ए.ए वी. कौलेज या महंत जीक लक्ष्मण विद्यालय . अब चूँकि महंत जी हमर क्षेत्र का इ छ्या अर लक्ष्मण विद्यालय मा भौत सा मास्टर लोग बि हमर ज़िना का छ्या त हमर जिना का जादातर छात्र लक्ष्मण विद्यालय मा भर्ती हूंदा था.

   अब चूंकि  आठम बि इतियास, भूगोल अर अंग्रेजी मा नब्बे प्रतिशत से जादा नम्बर ऐ छ्या त मेरो महान वैज्ञानिक बणणो पूरा अवसर छ्या त मी तै ड्यारा डूण लक्ष्मण विद्यालय मा भर्ती करे गे. हाँ जब लक्ष्मण विद्यालय का प्रिंसिपल भग्यान रण जीत सिंग नेगी जी (यि बणवस उदयपुर  का छ्या ) न म्यरो दर्जा आठ की  मार्क शीट द्याख त  ब्वाल  बल ," तुमे तो आर्ट में भर्ती होंना चाहिए. साइंस में तो  तुम कमजोर लगते हो"

पण चूंकि म्यार गाँ वळु इच्छा , गाणि , स्याणि मी तै महान वैज्ञानिक बणाणै  छौ 

  त मी तै साइन्स फैकल्टी   मा इ दाखिल करे गे।



Copyright@ Bhishma Kukreti , 12/6/2012

Bhishma Kukreti

Naurtu: a Garhwali Story illustrating Cruelty on Animals for Rituals of Sacrificing Buffalos 

(Review of Story collection ' Jonu Par Chhap Kilai)

                                  Bhishma Kukreti


  [Notes on Stories about Rituals of cruel way of Animal Sacrifices; Asian Stories about Rituals of cruel way of Animal Sacrifices; south Asian Stories about Rituals of cruel way of Animal Sacrifices; SAARC Countries Stories about Rituals of cruel way of Animal Sacrifices; Indian sub continent Stories about Rituals of cruel way of Animal Sacrifices; Indian Stories about Rituals of cruel way of Animal Sacrifices; North Indian Stories about Rituals of cruel way of Animal Sacrifices; Himalayan Stories about Rituals of cruel way of Animal Sacrifices; Mid Himalayan Stories about Rituals of cruel way of Animal Sacrifices; Uttarakhandi Stories about Rituals of cruel way of Animal Sacrifices; Garhwali language Stories about Rituals of cruel way of Animal Sacrifices ]
{ धार्मिक अनुष्ठानो में क्रूर ढंग से पशु बली सम्बन्धित कथा-कहानी; धार्मिक अनुष्ठानो में क्रूर ढंग से पशु बली सम्बन्धित एशियाई कथा-कहानी; धार्मिक अनुष्ठानो में क्रूर ढंग से पशु बली सम्बन्धित दक्षिण एशियाई कथा-कहानी; धार्मिक अनुष्ठानो में क्रूर ढंग से पशु बली सम्बन्धित भारिटी उपमहाद्वीपीय कथा-कहानी; धार्मिक अनुष्ठानो में क्रूर ढंग से पशु बली सम्बन्धित भारतीय कथा-कहानी; धार्मिक अनुष्ठानो में क्रूर ढंग से पशु बली सम्बन्धित उत्तर भारतीय कथा-कहानी; धार्मिक अनुष्ठानो में क्रूर ढंग से पशु बली सम्बन्धित हिमालयी कथा-कहानी; धार्मिक अनुष्ठानो में क्रूर ढंग से पशु बली सम्बन्धित मध्य हिमालयी कथा-कहानी; धार्मिक अनुष्ठानो में क्रूर ढंग से पशु बली सम्बन्धित उत्तराखंडी कथा-कहानी; धार्मिक अनुष्ठानो में क्रूर ढंग से पशु बली सम्बन्धित गढवाली कथा-कहानी लेखमाला }


      All over India and in many communities all over the world,  people sacrifice animals in religious rituals. Mohan Lal Negi narrates the story of sacrifice of buffalo in 'Naurtu' rituals. The children were anxious to join dance and singing in Naurtu but they were disturbed by watching pundit and other villagers injuring sacrificing buffalo by axes , swords etc and then killing the innocent animal for human's benefits from god.
  The story starts with enthusiasm for the Mandan among children but slowly -slowly takes a very sad scene of killing buffalo by cruel means.
  The story is best example of rapture of pathos in Garhwali fiction. The story is able to create awareness about our cruel methods to worship god who created both- human and animals.

Copyright@ Bhishma Kukreti, 12/6/2012

Notes on Stories about Rituals of cruel way of Animal Sacrifices; Asian Stories about Rituals of cruel way of Animal Sacrifices; south Asian Stories about Rituals of cruel way of Animal Sacrifices; SAARC Countries Stories about Rituals of cruel way of Animal Sacrifices; Indian sub continent Stories about Rituals of cruel way of Animal Sacrifices; Indian Stories about Rituals of cruel way of Animal Sacrifices; North Indian Stories about Rituals of cruel way of Animal Sacrifices; Himalayan Stories about Rituals of cruel way of Animal Sacrifices; Mid Himalayan Stories about Rituals of cruel way of Animal Sacrifices; Uttarakhandi Stories about Rituals of cruel way of Animal Sacrifices; Garhwali language Stories about Rituals of cruel way of Animal Sacrifices to be continued ....
धार्मिक अनुष्ठानो में क्रूर ढंग से पशु बली सम्बन्धित कथा-कहानी; धार्मिक अनुष्ठानो में क्रूर ढंग से पशु बली सम्बन्धित एशियाई कथा-कहानी; धार्मिक अनुष्ठानो में क्रूर ढंग से पशु बली सम्बन्धित दक्षिण एशियाई कथा-कहानी; धार्मिक अनुष्ठानो में क्रूर ढंग से पशु बली सम्बन्धित भारिटी उपमहाद्वीपीय कथा-कहानी; धार्मिक अनुष्ठानो में क्रूर ढंग से पशु बली सम्बन्धित भारतीय कथा-कहानी; धार्मिक अनुष्ठानो में क्रूर ढंग से पशु बली सम्बन्धित उत्तर भारतीय कथा-कहानी; धार्मिक अनुष्ठानो में क्रूर ढंग से पशु बली सम्बन्धित हिमालयी कथा-कहानी; धार्मिक अनुष्ठानो में क्रूर ढंग से पशु बली सम्बन्धित मध्य हिमालयी कथा-कहानी; धार्मिक अनुष्ठानो में क्रूर ढंग से पशु बली सम्बन्धित उत्तराखंडी कथा-कहानी; धार्मिक अनुष्ठानो में क्रूर ढंग से पशु बली सम्बन्धित गढवाली कथा-कहानी लेखमाला जारी ...

Bhishma Kukreti

                Haul Ku lagal?: A Garhwali Play discussing Migration problem of Garhwal

(Review of Garhwali Play 'Haul Ku Lagal?' written by Harish Thapliyal)


                             Bhishma Kukreti

           There was vibrancy in the field of Garhwali theatre/ dramas and Garhwali films in nineties in Mumbai.  Dinesh Bhardwaj, Balraj Negi ,Kanta Prasad Garhwali like drama activists were very active in that period.
          Harish Thapliyal's Garhwali drama 'Haul Ku Lagal?  was staged in Deena Nath Mangeshkar Hall, vile Parle, Mumbai in 1987. Kanta Prasad Garhwali directed the drama and Balraj Negi was in main role. Balraj Negi also staged and directed 'Jhauda Latu' a Garhwali drama at that time too.
  The drama 'Haul Ku Lagal?' is about the problem of mass migration from rural Garhwal to various cities of indie.  Migration of young male brought many other problems. One of the problems exists till date about ploughing. There are no male to plough in villages of Garhwal. When there is no person to plough, there can't be agricultural activities. The drama deals this problem effectively and at the end suggests the solution too.
   The drama is relevant still today.

Copyright@ Bhishma Kukreti, 12/6/2012

Bhishma Kukreti

Sau Rupya ku Note:  A Psychological Garhwali Story about Greed and Contentment


(Review of Garhwali Story collection 'Burans Ki Peed (1987) by Mohan Lal Negi)

                               Bhishma Kukreti

[Notes on  Psychological  Stories about Greed and Contentment; Psychological Garhwali Story about Greed and Contentment; Psychological Uttarakhandi   Story about Greed and Contentment; ; Psychological  Mid Himalayan Story about Greed and Contentment; ; Psychological  Himalayan Story about Greed and Contentment; ; Psychological North Indian  Story about Greed and Contentment; ; Psychological  Indian Story about Greed and Contentment; ; Psychological  Indian Subcontinent  Story about Greed and Contentment; ; Psychological  SAARC  countries Story about Greed and Contentment; ; Psychological  South Asian Story about Greed and Contentment; ; Psychological  Asian Story about Greed and Contentment]
{लालच व संतोष के मध्य द्वंदात्मक मनोवैज्ञानिक कहानी -कथा;लालच व संतोष के मध्य द्वंदात्मक मनोवैज्ञानिक गढवाली कहानी -कथा; लालच व संतोष के मध्य द्वंदात्मक मनोवैज्ञानिक उत्तराखंडी कहानी -कथा;लालच व संतोष के मध्य द्वंदात्मक मनोवैज्ञानिक हिमालयी कहानी -कथा;लालच व संतोष के मध्य द्वंदात्मक मध्य हिमालयी मनोवैज्ञानिक कहानी -कथा; लालच व संतोष के मध्य द्वंदात्मक मनोवैज्ञानिक उत्तर भारतीय कहानी -कथा; लालच व संतोष के मध्य द्वंदात्मक मनोवैज्ञानिक भारतीय कहानी -कथा;लालच व संतोष के मध्य द्वंदात्मक मनोवैज्ञानिक सार्क देसिय कहानी -कथा;लालच व संतोष के मध्य द्वंदात्मक मनोवैज्ञानिक मध्य एशियाई कहानी -कथा;लालच व संतोष के मध्य द्वंदात्मक मनोवैज्ञानिक एशियाई कहानी -कथा लेखमाला }.

               Mohan Lal Negi is famous for providing different subjects for his each story. The deep observations of Mohan Lal Negi about psychology of various people are credible.
         The present story 'Sau Rupya ku Note' is fine example of observations of Negi. A peon lost a hundred rupee note at that time when the average salary was below two hundred per month. The peon blames the theft on other colleague. Both indulged into sharp arguments and conflicts. A honest person gets the hundred rupee note. However, the honest person starts dreaming about the pleasure of getting hundred rupee note. The story illustrates the drama of getting money and conflicts between honest nature and greed or dream of suddenly getting uncalled or unearned money. The story also tells the pain of loss of property.
The story writers used 'Vyas Shaili' in this story (Br Anil Dabral-2007).
  The story is examples of deep observations of Negi, storytelling style and different psychological aspects of various people for same thing or materials

Reference-
Dr. Anil Dabral, 2007, Garhwali Gady  Parampara: Itihas se vartman
Copyright@ Bhishma Kukreti 13/6/2012
Notes on  Psychological  Stories about Greed and Contentment; Psychological Garhwali Story about Greed and Contentment; Psychological Uttarakhandi   Story about Greed and Contentment; ; Psychological  Mid Himalayan Story about Greed and Contentment; ; Psychological  Himalayan Story about Greed and Contentment; ; Psychological North Indian  Story about Greed and Contentment; ; Psychological  Indian Story about Greed and Contentment; ; Psychological  Indian Subcontinent  Story about Greed and Contentment; ; Psychological  SAARC  countries Story about Greed and Contentment; ; Psychological  South Asian Story about Greed and Contentment; ; Psychological  Asian Story about Greed and Contentment to be continued ... 
लालच व संतोष के मध्य द्वंदात्मक मनोवैज्ञानिक कहानी -कथा;लालच व संतोष के मध्य द्वंदात्मक मनोवैज्ञानिक गढवाली कहानी -कथा; लालच व संतोष के मध्य द्वंदात्मक मनोवैज्ञानिक उत्तराखंडी कहानी -कथा;लालच व संतोष के मध्य द्वंदात्मक मनोवैज्ञानिक हिमालयी कहानी -कथा;लालच व संतोष के मध्य द्वंदात्मक मध्य हिमालयी मनोवैज्ञानिक कहानी -कथा; लालच व संतोष के मध्य द्वंदात्मक मनोवैज्ञानिक उत्तर भारतीय कहानी -कथा; लालच व संतोष के मध्य द्वंदात्मक मनोवैज्ञानिक भारतीय कहानी -कथा;लालच व संतोष के मध्य द्वंदात्मक मनोवैज्ञानिक सार्क देसिय कहानी -कथा;लालच व संतोष के मध्य द्वंदात्मक मनोवैज्ञानिक मध्य एशियाई कहानी -कथा;लालच व संतोष के मध्य द्वंदात्मक मनोवैज्ञानिक एशियाई कहानी -कथा लेखमाला जारी ....

Bhishma Kukreti

Junyali Rat: One of the finest Stories of Modern Garhwali Literature

(Review of Short Story Garhwali Collection (1967) by Mohan Lal Negi)

                                        Bhishma Kukreti


[Notes on finest stories ; finest Asian stories; finest south Asian stories; finest SAARC Countries stories; finest Indian language stories; finest North Indian stories; finest Himalayan stories; finest Mid Himalayan stories; finest Uttarakhandi stories; finest Kumauni stories; finest Garhwali stories]
[महान आधुनिक कहानियाँ कथाएँ; एशियाई महान आधुनिक कहानियाँ कथाएँ; दक्षिण एसिया की महान आधुनिक कहानियाँ कथाएँ;सार्क देशों की महान आधुनिक कहानियाँ कथाएँ;भारतीय उपमहाद्वीप की महान आधुनिक कहानियाँ कथाएँ;भरत की महान आधुनिक कहानियाँ कथाएँ;उत्तर भारत की महान आधुनिक कहानियाँ कथाएँ;हिमालयी महान आधुनिक कहानियाँ कथाएँ;मध्य हिमालयी महान आधुनिक कहानियाँ कथाएँ;उत्तराखंड की महान आधुनिक कहानियाँ कथाएँ;गढ़वाली की महान आधुनिक कहानियाँ कथाएँ लेखमाला ]

                  Dr. Anil Dabral claims the modern Garhwali short story 'Junyali Rat' or "jonu par Chhapu kilai?' of Mohan Lal Negi as one of the finest stories of modern Garhwali stories. 
  The story deals with children helping farm jobs as to take animals to grazing fields; carelessness of children due to their age of playing and not the age of working; the husband and wife working full night for harvesting the ripped crop.
         Sonu and his wife are alone in agriculture work and they have to spend full night to cut ripped crops in moonlight.
   The story teller Mohan Lal Negi is successful in creating atmosphere of average village of Garhwal when there is heavy load of works for cutting the ripped crops. Negi also create images of children taking the (forcibly) job of taking care of animals for grazing but they become busy in their games. Mohan lal negi depicts the moon light scene when Sonu and his wife are cutting ripped Kharif crop-Jhangora.
    The story teller illustrates the emotions and happening in the nature through various enjoyable means such as through plains words, metaphors, figure of speeches, allegory, parable, proverbs, common sayings etc. the story writer Mohan Lal Negi is master of creating images by using exact phrases or symbols.
        Mohan Lal Negi is always master for portraying children psychology very well. Here in Junyali Rat, Negi perfectly illustrate children psychology and shows how children create new world through their own story creation. 
   Mohan lal Negi is master of words and phrases and he showed his capability in the story 'Junyali Rat'. One of the differences between folk story and modern story is that folk story tellers assert the belief but modern fiction writers search the belief and Mohan Lal Negi searches many aspects of life in 'Junyal Rat'. There is black spot on the moon because the light is non-applicable for common man except that moon light helps the thieves or dacoits. Moonlight helping dacoits and thugs is the black spot on the moon.  However, the works by farmers in moonlight is capable wiping the black spot of moon.
  The story is very artful and with morality too but, morality is never sermonic in this story but the whole story tells the morality and value of morality.

  The story is proof about observing power of Negi and his sensibility for various aspects of life.
   'junyali rat' makes Mohan Lal Negi one of the modern finest fiction writers of world literature and 'Junyali Rat' is one of the finest stories of world fiction literature.

Reference
Dr Anil Dabral, Garhwali gady Parampara, Itihas se vartman
Notes on finest stories ; finest Asian stories; finest south Asian stories; finest SAARC Countries stories; finest Indian language stories; finest North Indian stories; finest Himalayan stories; finest Mid Himalayan stories; finest Uttarakhandi stories; finest Kumauni stories; finest Garhwali stories
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Bhishma Kukreti


गडवाळि कवि अर स्वांग लिख्वार डा. नरेंद्र गौनियालौ जीs दगड  भीष्म कुकरेतीs   छ्वीं



भीष्म कुकरेती - आप साहित्यौ दुनिया मा कनै ऐन?

डा. नरेंद्र गौनियाल-- जनु कि ब्वले जान्द ''बियोगी होगा पहला कवि '' मेरी पैली कविता हमारो एक प्यारो भोटू कि अप्रत्याशित मौत पर लिखे गे.  जु मिन सिर्फ १३ साल कि उम्र मा लिखी छै.ख़ुशी अर ग़म द्वी स्थिति इनि छन जैम मन्खी भारी भावुक ह्वै जान्द अर फिर अपणो  मन  कि बात लिखित रूप मा ले आन्द.गीत या कविता मान का भाव का दगड़ ज्यादा सहज होना का कारण साहित्य  लेखन मा सबसे पैली गीत, कविता कि प्रवृति हूंद.अपणा मन का भाव सहज रूप मा गीत,कविता का रूप मा प्रकट ह्वै जन्दीन.

भी.कु- वा क्या मनोविज्ञान छौ कि आप साहित्यौ तरफ ढळकेन ? 
न.गौ. -साहित्य लेखन खुद मा ही  परिस्थितिजन्य एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव अर परिणाम छ,जै तै व्यक्ति कि सोच,बौद्धिक क्षमता,प्रवृति,देशकाल परिस्थिति,निकट वातावरण,सुख-दुःख,आश्चर्य,आक्रोश,भय आदि प्रभावित करदीं.म्यार दगड बि ए तरह कि परिस्थिति समय-समय पर घटनै अर मनोभाव समय-समय पर पैदा हुने कारण साहित्य लेखन कि प्रवृति ह्वै.मन कि बात ब्वलन या ल्यखन से एक तृप्ति कु भाव पैदा हूंद.साहित्य लेखन से एक विशिष्टता कु भाव बि मन मा पैदा हूंद ,किलै कि हर क्वी मन्खी साहित्य नि ल्य्ख्दू,कविता नि करदू,गीत नि रच्दू.प्राचीनकाल से ही साहित्यकारों कु समाज मा एक बिशेष स्थान रहे.साहित्य लेखन से मान-सम्मान कि वृद्धि ,एक अलग पछ्याण मन्खी कि हूंद.


भी.कु. आपौ साहित्य मा आणो पैथर आपौ बाळोपनs कथगा हाथ च ?
न.गौ. - साहित्य लेखन मा बालपन कि महत्वपूर्ण भूमिका हूंद.दरअसल साहित्यकार अर वैको साहित्य कि आधारशिला त बालपन मा ही पड़ी जान्द.भौत काम लोग होला जु कि खूब  पढ़ी-लिखी कि बाद मा परिपक्व होणा का बाद ही साहित्य ल्य्ख्नो शुरू कारला.साहित्य अर विशेषकर गीत-कविता जबरदस्ती या सोची-सोची कै नि लिखे जै सकेंदी.वो त जब आलि त समझो अफ्वी ऐ जाली.घचोरी-घचोरी कै नि औंदी.

भी.कु- बाळपन मा क्या वातवरण छौ जु सै त च आप तै साहित्य मा लै ?
न.गौ. -बालपन मा पहाड़ कु वातावरण,यख कु समाज,समस्या,प्रकृति से निकटता,यख कि परिपूर्णता अर यख का अभाव ए तरह का विरोधाभास सब्बि कुछ कुछ ना कुछ ल्यखणा वास्त प्रेरित करदन.

भी.कु. कुछ घटना जु आप तै लगद की य़ी आप तै साहित्य मा लैन !
न.गौ. - जनु कि मिन बोली छौ कि अपणा एक कुक्कर कि अचानचक मौत से दुखी ह्वै कि मिन पैलू गीत-कविता लेखी छौ.ए का साथ-साथ बचपन मा गौमा रामलीला,खुदेड गीत,थड्या-चौफुला ,रेडियो मा गीत,किताबों मा कविता पाठ ,रामायण,महाभारत कि कथा,गौं मा काकी-बोडी ,दादी-नानी कि परी,रागस,भूत-पिचास,देवी-द्य्ब्तों कि कथा बि प्रभावित करण वळी रैनी.

भी.कु. - क्या दरजा पांच तलक s किताबुं हथ बि च ?
न.गौ. --दर्जा पांच तक कि कितब्यों एक वातावरण तैयार करे.विशेषकर कविताओं कि भूमिका महत्वपूर्ण रहे.छंद बद्ध कविताओं तै लय बद्ध ,मदमस्त ह्वैकी गाण से कविता का तरफ झुकाव ह्वै.




भी.कु. दर्जा छै अर दर्जा बारा तलक की शिक्षा, स्कूल, कौलेज का वातावरण को आपौ साहित्य पर क्या प्रभाव च ?
न.गौ-- -दर्जा ६ से १२ अर वैका बाद कॉलेज शिक्षा क्रमशः साहित्य लेखनमा मददगार रहे.जनि-जनि ल्यखणो   पढ्नु बढ्दू गै उनी-उनी साहित्यिक प्रवृति बि बढ्दी गै. विद्यार्थी जीवन मा मिन कविता शुरू करी याली छै.स्कूल पत्रिकाओं मा बि कविता-लेख शुरू ह्वै गे छया




भी.कु.- ये बगत आपन शिक्षा से भैराक कु कु पत्रिका, समाचार किताब पढीन जु आपक साहित्य मा काम ऐन ?
न.गौ-- -स्कूल-कॉलेज मा हिंदी साहित्य कि किताब्यों का साथ-साथ बाजार मा उपलब्ध तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं कु बि योगदान रहे.कादम्बिनी मेरी तब कि फेब्रेट छै.यंका दगड़ी दैनिक अख़बारों का साहित्यिक परिशिष्ट बि द्य्ख्दू छौ. ९- रामायण,रामचरितमानस,विनय पत्रिका,सूर सागर,कबीर-रहीम का दोहा,आधुनिक युग मा निराला,मुक्तिबोध ,सुमित्रानंदन पंत,आदि कविताओं कि रचना विशेष रूप से भली लगीं.     

भी.कु- बाळापन से लेकी अर आपकी पैलि रचना छपण तक कौं कौं साहित्यकारुं रचना आप तै प्रभावित करदी गेन? आप तै साहित्यकार बणान मा शिक्षकों कथगा मिळवाग च ?

न. गौ. वरिष्ठ साहित्यकार श्री विष्णु दत्त जुयाल जी  हमारी स्कूल मा तब शिक्षक छया.उंकी साहित्य साधना,रचनाधर्मिता से बि प्रेरणा मिली.

भी.कु. आपक न्याड़ ध्वार, परिवार,का कुकु लोग छन जौंक आप तै परोक्ष अर अपरोक्ष रूप मा आप तै साहित्यकार बणान मा हाथ च ?
न.गौ- - गुरुकुल आयुर्वेद कॉलेज मा कॉलेज पत्रिका मा कविता छपिना का बाद  गुरुजनों अर छात्र-दग्द्यों न मेरी प्रशंसा करी अर साहित्य लेखन तै ईथर बढ़ोना कि सलाह दे ..१२-.मेरो एक दगडया डॉ अशोक रस्तोगी  तै मेरी हिंदी कि कविता भौत अच्छी लगदी छै.कॉलेज टाइम कि मेरी कविताओं कु अशोक जी न अब्बी तक संग्रह कर्यूं.

भी.कु-ख़ास दगड्यों क्या हाथ च ?कौं साहित्यकारून /सम्पादकु न व्यक्तिगत रूप से आप तै उकसाई की आप साहित्य मा आओ ?साहित्य मा आणों परांत कु कु लोग छन जौन आपौ साहित्य तै निखारण मा मदद दे ?
न.गौ- - स्कूल टाइम मा कत्गे पत्र-पत्रिकाओं मा ल्याख्नो शुरू करे.वैका बाद धाद से जुडी गयूं.वैका दगड़ी चिठ्ठी-पत्री,हिलांस,स्वास्थ्य सन्देश,नैनी जन दर्पण,गढ़ ऐना,हिमाचल टाईम्स,हिमालय टाईम्स,नैनीताल समाचार,सहित कई पत्र पत्रिकाओं मा कविता लेख छपिनी. हिंदी का बाद गढ़वाली मा ल्य्ख्ने प्रेरणा मुख्य रूप से भाई लोकेश नवानी जी से मिली.पैली मि हिंदी मा जड़ा,गढ़वाली मा काम ल्य्ख्दु छौ.मेरो गढ़वाली साहित्य कि तरफ झुकाव नवानी जी कि ही देन छ.मेरी गढ़वाली कविताओं तै बेहतर रूप-स्वरूप देना माबी वूंको बड़ो योगदान छ. मेरो पैलो गढ़वाली कविता संग्रह ''धीत ''तै  अस्तित्व मा ल्याण मा बि उंकी महत्वपूर्ण भूमिका छ.यंका अतिरिक्त अपणा दगड्या महेंद्र ध्यानी,देवेन्द्र जोशी,दर्शन सिंह बिष्ट,निरंजन सुयाल,मदन दुक्लान,बीना कंडारी,बीना देव्शाली, वीरेन्द्र पंवार, गणेश खुकसाल गणी, नरेंद्र सिंह नेगी,आदि कु बि आभारी छौं जौंका दगड  कविता यात्रा मा  कई सुखद साहित्यिक अनुभूति ह्वै.यांका साथ-साथ आकाशवाणी लखनऊ,, आकाशवाणी नजीबाबाद , भाई सुभास थलेडी,भाई विभूति भूषन भट्ट,विनय ध्यानी,आदि को बि आभार छ ,जौन गढ़वाली कविता को विकास मा अपनी भूमिका अदा करे.एका अतिरिक्त आज का समय मा गढ़वाली साहित्य तै नेट पर उपलब्ध करना मा भीष्म कुकरेती जी ,मेहता जी सहित मेरा पहाड़ फोरम,पहाड़ी फोरम,ई मैगजीन,आदि से जुड़याँ सब्बि दगड्यों कि महत्वपूर्ण भूमिका छ.




Copyright@ Bhishma Kukreti 14/6/2012

s = आधी अ

Bhishma Kukreti

Chatti ki Ek Rat: A Garhwali Suspense and Superstitious Drama 

{Review of Garhwali drama- 'Chatti ki Ek Rat' (1970)}

                                        Bhishma Kukreti

    Chatti ki Ek Rat' is first Garhwali Drama adapted from an Irish drama' Night in an Inn' written by Lord Dunsany.   Vishva Mohan Badola (Native Thantholi, Malla Dhangu, Pauri Garhwal)directed the drama 'Chatti ki Ek Rat' and the drama was staged in Dehradun in 1970. Initially various creative of Delhi were together to adapt the famous drama 'Nigh in an inn'. However, at the end, Prem Lal Bhatt took the lead and adapted the same. 
  The drama is about loot of a ruby from an idol from an Indian tribe temple by four sailors. The priests of temple are after these thugs who are hidden in an inn. Priests reached to the inn. By trick, these thugs killed three pundits. However there is another powerful personality and all four thugs are shocked to see the reality.
    There is suspense in every scene of drama. Once, you sit on the theatre seat you can't leave seat till the end. However, the audience will think about the drama whenever they remember the drama.

   The drama is one of the mile stones of Garhwali theatre which broke the conventional drama structure of Garhwali theatre. The drama has everything required for an audience.  Chatti ki Ek Rat' paved the way for modernizing the modern Garhwali drama style of theatre.
Reference:
1-Dr Sudharani , 1990, Garhwal ki Jeevit Vibhutiyan
2- Talk with Vishva Mohan Badola

Copyright@ Bhishma Kukreti, 14/6/2012

Bhishma Kukreti

Folk songs of Ravain Tribe, Uttarkashi, Garhwal on the occasion of Marriage


                                                           Bhishma Kukreti

[Notes on Traditional Folk Songs of Marriage; Asian Traditional Folk Songs of Marriage; South Asian Traditional Folk Songs of Marriage; SAARK countries Traditional Folk Songs of Marriage; Indian subcontinent Traditional Folk Songs of Marriage; Indian Traditional Folk Songs of Marriage; North Indian  Traditional Folk Songs of Marriage; Himalayan Traditional Folk Songs of Marriage; Mid Himalayan Traditional Folk Songs of Marriage; Uttarakhandi Traditional Folk Songs of Marriage; Traditional Folk Songs of Marriage of Uttarkashi , Garhwal ; Traditional Folk Songs of Marriage of Ravain tribe , Garhwal]
{ विवाह संबंधी लोक गीत; एशियाई विवाह संबंधी लोक गीत; दक्षिण एशियाई विवाह संबंधी लोक गीत; सार्क देशीय विवाह संबंधी लोक गीत; भारतीय उप महाद्वीपीय विवाह संबंधी लोक गीत; भारतीय विवाह संबंधी लोक गीत; उत्तर भारतीय विवाह संबंधी लोक गीत; हिमालय के विवाह संबंधी लोक गीत; मध्य हिमालय के विवाह संबंधी लोक गीत; उत्तराखंड के विवाह संबंधी लोक गीत; उत्तरकाशी के विवाह संबंधी लोक गीत; रवांइ आदि वासी क्षेत्र का विवाह संबंधी लोक गीत लेखमाला }
                        Singing folk songs or auspicious folk songs is very common in most of the communities. Folk songs for the occasion for marriage are usually of love songs.  Jan Ling provides a couple of wedding folk songs of love rapture in his book," A History of European Folk Music' (pages-49-56). Moisei Beregovsky and Mark Slobin provide various types of folk songs common in Jewish community in the book 'Old Jewish Folk Music'. Monger gives us the ideas of love songs sung in the marriage occasion of various regions in the book 'Marriage Custom off the world' (example- a folk song Paper of Pins, page 210). The song is as
I will give to you a paper pin
That is way our love begins
If you will marry me, me, me
I will not accept ......
............
Oh I won't marry you
Here, the girl or boy teases their lover this way. Senoga –Zake presents many folk songs of Kenya related to marriage occasion in the book 'Folk Music of Kenya'



            रवांइ क्षेत्र का विवाह संबंधी लोक गीत

         Folk songs of Ravain Tribe, Uttarkashi, Garhwal on the occasion of Marriage


   The marriage ceremony is very important cultural event in the region of Ravain tribal region. However, there is no Hindu way fo Karmkand ritual performances in the tribal community of Ravain, Uttarkashi region. They show the happiness, enjoyment, joy of marriage by folk songs of their own community and in their own language.

  The following traditional folk song is very popular in Ravain tribal region at the time of marriage.The song is the sister in law tells the description of another beautiful girl to her brother in law.


रवांइ क्षेत्र का विवाह संबंधी लोक गीत
Folk songs of Ravain Tribe, Garhwal on the occasion of Marriage

विमला सूणी बांदा
हे बल तन्दाली ती तांदा, हे बल विमला तन्दाली ती तांदा
हे बल पट्टी न बदियाद , हे बल विमला सूणी बांदा
हे बल सलोरा की सेटी , हे बल सलोरा की सेटी
हे बल विमला सूणी बांदा , हे बल गुलाबू की बेटी
हे बल सीर लाइ कांगी , हे बल सीर लाइ कांगी
हे बल विमला सूणी बांदा , हे बल उबी लाओ माँगी


गीत संकलन- डा. जगदीश नौडियाल, २०११, उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर ( रवांइ क्षेत्र के लोकसाहित्य का सांस्कृतिक अध्ययन ), विनसर पब्लिशिंग कं. देहरादून
Translation is as-
It is heard that there is a beautiful girl Vimla in Badiyad patti region. Her father name is Gulab Singh. Go and get married with beautiful girl Vimla.

Copyright@ Bhishma Kukreti
Notes on Traditional Folk Songs of Marriage; Asian Traditional Folk Songs of Marriage; South Asian Traditional Folk Songs of Marriage; SAARK countries Traditional Folk Songs of Marriage; Indian subcontinent Traditional Folk Songs of Marriage; Indian Traditional Folk Songs of Marriage; North Indian  Traditional Folk Songs of Marriage; Himalayan Traditional Folk Songs of Marriage; Mid Himalayan Traditional Folk Songs of Marriage; Uttarakhandi Traditional Folk Songs of Marriage; Traditional Folk Songs of Marriage of Uttarkashi , Garhwal ; Traditional Folk Songs of Marriage of Ravain tribe , Garhwal
विवाह संबंधी लोक गीत; एशियाई विवाह संबंधी लोक गीत; दक्षिण एशियाई विवाह संबंधी लोक गीत; सार्क देशीय विवाह संबंधी लोक गीत; भारतीय उप महाद्वीपीय विवाह संबंधी लोक गीत; भारतीय विवाह संबंधी लोक गीत; उत्तर भारतीय विवाह संबंधी लोक गीत; हिमालय के विवाह संबंधी लोक गीत; मध्य हिमालय के विवाह संबंधी लोक गीत; उत्तराखंड के विवाह संबंधी लोक गीत; उत्तरकाशी के विवाह संबंधी लोक गीत; रवांइ आदि वासी क्षेत्र का विवाह संबंधी लोक गीत लेखमाला जारी ....