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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti

बिगडीं  बेटी से ब्व़े बाबुं दुःख   



                                  भीष्म कुकरेती



बिसेशुर  - अरे पर ! मि कनाडा मा छौ त क्या ह्व़े ग्याई. अच्काल कनाडा बिटेन दुगड्ड मा आण मा कथगा घंटा लगदन ? फोन मा बतै दीन्दो  त मि चौबीस घंटा मा टोरेन्टो से इख पौंची इ जान्दो.

परमेसुर-  पण भैजि   ! अब मि भरवस मा रौं कि आज ना भोळ ना परस्युं  त सुधरी इ जाली !   

यशोदा (परमेसुर घरवळी ) - पण सुंगरूं दगड़  मांगळ लगैक क्या हूंद !

बिशेसुर- ब्व़े तबि बुल्दी छे कि ए परमेसुर न पिछ्ल्वाड़ी क बाड़ी खयुं च . त्वे तैं  टैम पर कुछ बि नि सुझदी. जब टैम थौ त तीन कुटद्वर छोड़िक ये  गैर गदन दुगड्ड मा  जगा ल्याई अर फिर बच्चा पढ़ाणो बच्चो तै  कुटद्वर म किरायो  पर मकान खूब ल्याई इन ना कि  उखि कोटद्वार मा मकान ले लींद अर इख जाणि दीन्दी. बच्ची दगड मा रौंदी  त त्वे तै वींक चाल चलन पता लग जांद . अब बीस सालू ह्व़े ग्याई वा.

सरवेसुर --.पण परमेसुर भैजि ! चलो बिसेशुर भैजी त कनाडा  छ्या मि त इख दिल्ली मा छयो कि ना ? अब जब आपन फोन कार त कन ऐ गवां हम द्वी भाई ! अरे बेटी कैकी बि ह्वाओ तुमारि या मेरी सब्युं क बरोबर इ च .

यशोदा  (परमेसुर घरवळी ) -  ह्यां बेटी क बबाल इनी करदा त फिर क्या हूंद? भली बात थुका छे जु हम डौंर बजै क  धाई ध्यू  लगान्दा

बिसेशुर - पण ब्वारी अब त बबाल नि बि होलू पर  बेटी त अणबिवा इ रालि कि ना ?

सरवेसुर- भैजि या बात दिल्ली तलक पौंचलि त मेरी बारा सालै  बेटी स्वीटी क बि अणभरवस ह्व़े जालि. कै बि छ्वारा न समणि नि आण .

यशोदा - ए सरवेसुर !  ह्यां बुन्याल बल उख दिल्ली मा त छ्वारो कमी थुका च इ ना सै क्वी त आलो स्वीटी क घिराण मा . मुस्किल त हमारि हुईं च इख उनि बि छ्वारो तादात कम च अर फिर ज़रा जरा कैरिक बात सबि जगा सौरी गे  कि हमारि बेटी जौली कै  ढंग की च.दुगड्ड अर कोट्द्वारा क हरेक नौनु तै पता च की जौली कै किस्मौ नौनी च . क्वी बि जौली क्या हमारो बि ध्वार नि आंदो. 

सरवेसुर- भैजि गाँ ज़िना ?

यशोदा - काण्ड इ त लगीं छन की गाँ जिना बि जौली क बात सौर गे, फैली गे.

बिसेशुर - ये सरवेसुर!  इन कौर तू जौली तै दिल्ली ली जा. उख कै तै बि पता नि होलू अर सैत च जौली उख सुदरि जालि

यशोदा - ना भै कखि तै सरवेसुरै बेटी स्वीटी बि जौली जन ह्वे जालि त लोक ब्वालल की हमन अपण बेटी सुदारणो बान द्युरो इख भ्याज अर द्विराणि क बेटी इ बिगाड़ द्याई

बिसेशुर - अच्छा ! डाक्टर म बि दिखाई ?

परमेसुर- हाँ एक ना पाँच छै डाकटरूं मा दिखै आल.

सरवेसुर- क्या बुलणा छन डाक्टर?

परमेसुर-ऊँन  क्या बुलण ! सौब बुलणा छन कि फिकर करणै जरुरत नी च .बल या बात त नॉर्मल  च. अर बुलणा छन बल जब तलक  जौली क इच्छा नि होली उ कुछ नि कौर सकदन

यशोदा - हाँ ऊंक ले क्या जाणो च. मौ त मेरी होणि च बर्बाद. मी अब मुख दिखाण लैक बि नि छौं. 

सरवेसुर- पण भाभी जी तुम त हमर कुटुम  मा सबसे समजदार छंवां. हम त तुमि तै समजदार माणदवां . जब तुम तै पता चौली गे छौ त तुमन जौली तै समजाण छौ कि ना?

यशोदा- कनी लगाई मीन आग.

  परमेसुर- हाँ जब वा बारा  बरस की छे त ..तबी बिटेन ...

यशोदा- कति दै हमन समजाई. मेरी ब्व़े न समजाई. म्यार द्वी भुलों न कथगा समजाई

परमेसुर- हाँ जौली क मामा अर माम्युं न कथगा समजाई

यशोदा - पिछ्ला तीन सालुं  से त वा रोज मेरी मार खाणि च. कबि मी मुठक्यान्द  छौं . कबि थपड्यान्द छौं.

परमेसुर- एक दै त मीन गुस्सा मा मुछ्यळ न  डामि दे .

बिसेशुर - इथगा ढीठ ह्व़े ग्याई हमारि जौली ?

सरवेसुर- पण दिख्याण मा त वा अणबुल्या नी च .

यशोदा- कन ज्यू जळदो म्यार ! जब मी दूसरों बेट्यूँ तैं  स्याम दै  दिखदु. अर एक हमारि च बुलणो बेटी ...कखि जोग मुक  दिखाण लैक नि राख यीं कुलच्छणि न

परमेशुर- मीन त आस छोडि याल

यशोदा - मेरी दगड्याणि , पछ्याणक वळि जब अपण बेट्यु बारा छ्वीं लगांदन त क्या बीतदी मेरी जिकुड़ी मा. अर सौब औड़ -औडिक मेरी बेटी क बारा मा पुछ्दन . वैबरी त ज्यू बुल्यांद पट खड्यारि द्यूं  यीं जौली तै. पन फिर जब नौ मैना क याद आन्द त फिर ..

ममता (सरवेसुरक घरवळी)  - ये दीदि   !  इन करदवां अब हम सौब समजौला.

यशोदा- अब तुमि लोगूँ सारु च .समजावा  अर सैत च समजाण मा ऐ जावा.

बिसेशुर - अच्छा बुलाओ त सै जौली तै .

सरवेसुर- भाभी जी तुम बीच मा डांटिन ना.

ममता - ये बेटा जौली !  डार्लिंग जौली !

जौली- आंटी आन्द छौ जरा मी द मिस्टीक वैरिओर कु लास्ट पैरा  पढ़णु छौं

बिसेशुर - ऊँ ऊँ  .. यू उपन्यास त आध्यात्मिक च 

ममता - बीस सालक उमर मा यू उपन्यास !

जौली - एस आंटी टेल मी . यू कॉल्ड मी ?

बिसेशुर - बेटा यि क्या सुणना छंवां हम?

जौली - बडा जी ! आईम  अनअवेयर व्हट यू आर हियरिंग

यशोदा- जन बुल्यां तू  द्वी  सालक  बच्ची  छे ! समजिक बि बुलणि च बल व्हट दे   आर हियरिंग व्हट दे  आर लिसनिंग .

जौली - मोंम ! जु तीन तून-ताना  दीणो बुलाई त मी जांदू छौं. उनि बि म्यार क्लब जाणो टैम ह्व़े ग्याई.

सरवेसुर- भाभी जी जरा तुम चुप राओ  ना.

ममता - यू क्लब क्या च ?

जौली - आंटी ये क्लबौ   नौ च - चेस्टीटि चेस्तिती फॉर ऑल  एज

ममता - क्या क्लब ?

यशोदा- अरे ब्रह्मचर्य का नियम  सिखान्दन ये क्लब मा 

बिसेशुर - पण बेटा या उमर त तेरी डेटिंग पर जाणै क च

ममता- ए जौली जिठा जी ठीकी बुलणा छन या उमर त रोज स्याम दै बॉय फ्रेंडु दगड मौज करणै च

जौली - हाँ उख म्यार बि बॉय फ्रेंड छन.

यशोदा- हाँ छन पण सौब ब्रह्मचर्य कु पुजारी छन

जौली - बट व्ह्ट्स रोंग इन ओबेइंग  ब्रह्मचर्य

सर्वेसुर - बेटा अच्काल कु जामाना मा क्वी जवान बेटी डेटिंग छोड़िक ब्रह्मचर्य क छ्वीं  लगान्दी त भौत बदनामी होंद, बेटा! 

ममता - अर इख दुगडा मा इ ना डिल्ली अर कनाडा मा बि हमारो परिवार की बडी बदनामी होली कि हमारी भतीजि अबि तलक ब्रह्मचारिण च

बिसेशुर - बेटा जब कनाडा मा इन्डियन सुणल कि  तू अबि तलक ब्रह्मचारिण छे त इन्डियन सोसाइटी मा हमारि नाक कटि जालि. हमारो  बणयूँ -बुणयूँ  स्टेटस माटू मा मिल जालु

सर्वेसुर- बेटा तेरी उमर त डेटिंग पर जाणै च .हमन त अपणी स्वीटी तै अबि बिटेन नौनु दगड उठण बिठंळण गिजे याल अर वा बि अब बिगरौ से अपण बॉय फ्रेंडु बारा मा हम तै पूरो बिरतांत सुणान्दी.

यशोदा - याँ इख कम छन ! सी बगल कि कृष्णा मतबल  क्रिस्टी तै देखी ल्याव्दी सुबेर एक बॉय फ्रेंड अर स्याम डै दुसर बॉय फ्रेंड. बॉय फ्रेंड त वा इन बदलिद लड़  जन बुल्यां फिरौक बदलणि ह्वाऊ अर समण्याकि  मिस्टी त हर रोज अपण बॉय फ्रेंड क दगड इख दुगड्ड  मा घुमणि रौंदी अर ऐत्वारो खुणि  सुबेर बस से कोटद्वार हैंको बॉय फ्रेंडो घुमणो चलि जांदी. अर हम तै जळाणो बान जोर से धाई  लगान्दी ," ममी आइ ऐम  गोइंग टु विजिट  माई न्यूअर   बॉय फ्रेंड ऐट  कोट्द्वारा'. अर मी ज्यू मारिक रै जान्दो . या खड़रींक  त  मई   एक्सपीरियंस विद ब्रह्मचारी किताब मा बिज़ी रौंद .

जौली - अछा  ! चचा  ! तुम त अफु  तै रेडिकल अर कम्पोज्ड थिंकर  समजदवां. जरा ब्थाव्दी कि ब्रह्मचर्य पालन मा क्या कमी च ?

सर्वेसुर- ब्रह्मचर्य पालन मा कुछ कमी नी च बस समौ, जगा अर वर्ग या वर्ण को त खयाल करण इ चयेंद कि ना ? 

जौली- कुज्याण ! ननी क टैम पर नौन्यु कुण पाबंदी छे छ्वारों तरफ द्याखो बि ना , ब्व़े क टैम पर नौन्यु कुणि  पाबंदी छे बल छ्वारो दगड नी घुमो अर अब च कि दस दस बॉय फ्रेंड बणाओ. म्यरो इकास्टी क्लब मा अनुशासन भौत सख्त च . मी त क्लब जाणु छौं . स्याम दै आज मी बडा जी  कुण शिकारो रसा आर  कळेजि भूटण  बणौल . मी अबि चल्दो छौं

यशोदा - कळेजि त तीन मेरी खै याल ...

सर्वेसुर- भैजी मै नि लगद जौली हमारी बात सूणलि ....

यशोदा - मतबल मेरी मवासी त घाम लगी कि ना स्या पचीस साल तक ब्रह्मचारिणि  राली त फिर कुज्याण क्वी तैकू दगड ब्यौ बन्द करदो च कि ना . अब त अरेंज्ड मैरिज को ज़माना त रै नि गे कि झूट  सच बोलिक ब्यौ करै लीन्दा . अब त काण्ड लगि गेन ये जमानो पर पैल साल छै मैना डेटिंग पर जाओ फिर कुछ दिन दगड़ी राओ अर तब जैक समज मा ऐ गे त ब्यौ कारो ...अब त अरेंज्ड मैरिज क्या हुंद क्वी नि जाणदो

ममता- दीदि  ! स्याम दै जौली तै फिर समजौला

यशोदा- कुज्याण कुज्याण ..




Copyright@ Bhishma Kukreti 2/7/2012

Bhishma Kukreti

Naukari: A Garhwali Drama about Exploiting own Relatives

(Review of Garhwali drama 'Naukari' (1999) by playwright Om Prakash Semwal)

                                     Bhishma Kukreti

(Notes on Dramas about Exploitation; Garhwali Dramas about Exploitation; Uttarakhandi  regional language Dramas about Exploitation;  Mid Himalayan regional language Dramas about Exploitation; Himalayan regional language Dramas about Exploitation;  North Indian regional language Dramas about Exploitation;  Indian regional language Dramas about Exploitation; Indian subcontinent regional language Dramas about Exploitation;  SAARC Countries regional language Dramas about Exploitation;  South Asian regional language Dramas about Exploitation;  Asian regional language Dramas about Exploitation)

               One of the exclusive factors of prose literature –stories and dramas by Om Prakash Semwal is that the writer is of firm opinion that there are many opportunities in rural Garhwal in terms of wealth earning.  The 'Naukari 'drama written by Om Prakash Semwal was staged in December, 1999 in a school of (Old) Chamoli Garhwal now, in Rudraprayag.
        The drama is aimed at young generation who is aspiring employment in cities and is dreaming for leaving the village. Mangtu is studying in tenth standard in village school. Mangtu's father wants is married to a Kamgati girl (expert in agriculture works) after getting suitable job in city. The mother of Mangtu wishes that Mangtu is married to a rich family that their family get dowry. She is not worried about job for Mangtu.
      Nartu who is working in Delhi comes to village and assures his uncle that he will arrange best job for Mangtu in Delhi. Nartu takes his cousin Mangtu to Delhi for getting him best job. However, Mangtu is shocked to see the exploiting behavior of Nartu.
   The mini drama 'Naukari 'is very simple and shows the exploitation of unskilled young man by all. The story and dialogues match with the situation of Garhwal.

Copyright@ Bhishma Kukreti, 2/7/2012 
Notes on Dramas about Exploitation; Garhwali Dramas about Exploitation; Uttarakhandi  regional language Dramas about Exploitation;  Mid Himalayan regional language Dramas about Exploitation; Himalayan regional language Dramas about Exploitation;  North Indian regional language Dramas about Exploitation;  Indian regional language Dramas about Exploitation; Indian subcontinent regional language Dramas about Exploitation;  SAARC Countries regional language Dramas about Exploitation;  South Asian regional language Dramas about Exploitation;  Asian regional language Dramas about Exploitation to be continued...

Bhishma Kukreti

अन्तुरी मा त पहाड़ ही ऐला*******





कवि- नरेंद्र गौनियाल



[पहाड़ो के गीत; पहाड़ो की कविताएँ, गढ़वाल की गीत; गढ़वाली गीत;

गढ़वाली कविताये; उत्तराखंडी  भाषा में गीत, उत्तराखंड की कविताएँ ]


हैरी-भैरी छै पुंगड़ी जु कैइ दिन,
जख्या-दुबलू वख आज जम्युं चा.
जौंकि तिबारी मा लगदी छै कछ्डी,
हिन्सोली-किन्गोड़ी वख आज लगीं चा.

बुढया-बुढड़ी अर छवटा  नौनि-नौना,
इकुला-दुकला ही गौं मा रैगेनी.
बुढया बल्द अर ढांगी गौड़ी,
कूड़ी-छनुड़ी बि रीति ह्वैगेनी.

पुंगड़ी-पटली ह्वैगेनी बांजी,
सेरी-घेरी बि रुखड़ी ह्वैगेनी.
सगोड़ा-पतोड़ों मा जमदो कंडेया,
छूटा-पूटा निकज्जू ह्वैगेनी.

उन्द चली गैनी क्वी द्वार ढेकी
कैन ब्वे-बाब रखीं जग्वाल.
ढुन्गु फर्कैकी क्वी चली गैनी,
छट छोडि कि अपणो पहाड़.

गाड-गद्न्युं कु सुक्की गे पाणि,
डांडी-कांठी बि नांगी ह्वैगेनी.
पाणि मोला कु गौं मा ऐगेनी,
पंदेरा-नवल्यूं अग्यार नि रैनी.

दूध -घ्यू का सुकी गईं जळडा,
दारू गौं-गौं मा मिलण लगीं.
दूधि छोडि की पीणा छन नौना,
मूल़ा की कच्बोळी  का दगड़ी

सड़क-इस्कूल खुली की जगों मा
सभ्यता कु विस्तार ही हूंदा .
इन्नू फूटी गे ख्वारो हमारो
सभ्यता सर्र हरचण लगीं चा.

मेरा प्रवासी भै-बन्दों सूणा,
चाहे छा तुम दुन्या कैबि कूणा.
तुम ख़ुशी से कमावा अर खावा
कब्बि -कब्बि तुम पहाड़ बि आवा.

अपणि ब्वेई त अपणि ही हूंद,
अपणि भूमि बि अपणि ही हूंद.
रिंगदा-रिंगदा कखि-कखी बि जैला
अन्तुरी मा त पहाड़ ही ऐला...
      डॉ नरेन्द्र गौनियाल ...सर्वाधिकार सुरक्षित.


पहाड़ो के गीत; पहाड़ो की कविताएँ, गढ़वाल की गीत; गढ़वाली गीत;

गढ़वाली कविताये; उत्तराखंडी भाषा में गीत, उत्तराखंड की कविताएँ जारी ....

Bhishma Kukreti

चबोड़ इ चबोड़ मा                   

                  मानसूनअ दगड मुखसौड़


                                   भीष्म कुकरेती



            ब्याळि गौं मा छौ. अब अबि मि कैमरा सैवी नि ह्व़े सौकु जब कि अच्काल जु बि गाँ जांद वु गढवाळ बिटेन पैलाक तरां तोर, चून, गैहथ त कुछ लांद नी च पण कुछ फोटो लै आन्दन जन कि मेरा पहाड़ का मेहता जी बागेश्वर कि फोटो लैन अर फेस बुक मा इन दिखाणा छन जन बुल्यां ड़्यार बिटेन मेखुण चूडा, जख्या, भंगुल लयां ह्वावन धौं !

      सुचणु छौ कि फेस बुक मा क्या दिखौलू ? गाँ जाओ अर कुछ नि दिखाओ त फेस बुक मा फेस दिखाण लैक नि रै सक्यांद . भलु ह्वाई जु उख मै तै एक कतर मानसूनौ मिलि गे.फेस बोक मा फेस दिखांण लैक त कुछ ना कुछ मीली गे छौ.

         मीन मानसून तै पूछ- हे मानसून कख छयाई रै तु ?'

मानसून न ब्वाल," मि पत्रकारूं मुख नि लगण चांदु. टीवी मा द्याख च क्या क्या बखणा रौंदन - हत्यारा-मानसून , बेरहम मानसून , मानसून की मार ... सूखा .. जन बुल्यां मि यूँ पत्रकारूं नौकर छौं धौं या क्वी नेता हों धौं कि यूं पत्रकारूं बुल्यु मानि ल्यों.पैलक पत्रकार मनुष्य धर्मी छ्या अब त टी. आर. पी. बढ़ाओ , सरकुलेसन बढ़ाओ धर्मी ह्व़े गेन इ पत्रकार '

मीन ब्वाल," मि पत्रकार नि छौं. अर उन बि गढ़वाली लिख्वार जब मुलायम सिंग तै हत्यारा नि बथान्दन त मानसून तै क्या गाळि द्याला!"

" ओ तु गढवाळि लिख्वार छेई ? फिर क्वी फिकर नी च। तीन इ लिखण अर तीन इ बंचण . चल सवाल पूछ. म्यार थ्वडा टैम पास ह्व़े जालु" मानसून कु बुलण छौ.

बुरु त भौत लग पण अब त इन कटाक्ष का शब्द सुणणो ढब पोडि गे.

मीन पूछ," अब तक कख छौ भै ?"

मानसूनो बुलण छौ," कनो कख छौ. इन बोदी कख नि छौ ! जरा सि मीन केरल मा पाणी बुरक , फिर थ्वडा थ्वडा महाराष्ट्र, गुजरात, अर थ्वडा सि बंगाल ज़िना पाणि बुरकाणु छौ.'

मीन मानसून तै बताई ,"अरे इना उना खूब घुमणु रै अर इख गढ़वाल मा किलै नि ऐ .इख गढवाल का गां मा लोक तेरी कथगा जग्वाळ करणा छन. "

मानसून न रुसेक ब्वाल,"' देख हाँ त्वे तै इन पुछणो क्वी अधिकार नी च हाँ. तू त इन पुछणु छे जन बुल्यां तू क्वी बी.बी.सी क रिपोर्टर ह्वेलि ."

मीन सुरक सुरक ब्वाल,' भै इख गढ़वाळ मा गढवळी बि त त्यार प्रेमी छन कि ना ?"

. "अर फिर गढवाळ का गाऊं तै मेरी क्या जरुरत ? अब जब इ लोग ना त मुंगरी बूंदन, ना कोदा-झंगवर बूंदन ना इ क्वी दाळ कि खेती करदन त यूँ गढ़वाळयूँ ले मेरी क्या जरुरात भै?" मानसून को रूखो उत्तर छौ

मीन ब्वाल,' भै पिछ्ला पांच हजार साल से तू ये बगत तलक गढ़वाळ मा खूब पाणि बरखै दीन्दो छौ . ठीक च गढ़वाळयूँ तै खेती क बान पाणि क जरुरात नी होली. पण त्वे तै भेमाता/भगवानो बणयाँ नियम धियम कु त ख़याल करण चयांद कि ना ?"

मानसून क बादल जोर से गड़गडैन ,' तुम मनिख बि ना ! बडी चालु चीज छंवां. अफु त तुम मनिख भगवानो बणयाँ सौब नियम धियम तोड़णा छंवां अर में मानसून से उम्मीद करदवां कि मि भेमाता बणयाँ नियमु पालन कौरु. हौरू तै अड़ाण पण अफु कुछ नि करण . वाह! "

मीन करूण रसीली भौण मा ब्वाल,'' ह्यां इख बि त पीणो पाणि जरुरात च अर फिर रूडि क गरमी से कथगा बुरा हाल छन."

' अरे इखमा क्या च . मि नि बर्खलु त तुमर गाँ वळु मजा ऐ जाला।" मानसून न इन भौणम ब्वाल जन क्वी जासूस क्वी रहस्य क सूत भेद खुलणु ह्वाउ

मीन पूछ, ' क्या बुनू छे भै तु? अरे अबरखौ मा इख गाँव वळु आफत ऐ जाली . तिसा मोरी जाला म्यार गाँ वळ अर तु बुलणि छे बल गाँ वळु मजा ऐ जाला"

मानसून को बथाण छौ," अब क्वी तिसा नि मोरी सकुद. इख अबरखौ क्षेत्र घोषित ह्वाई ना कि उना मुख्यमंत्री सहयोग , प्रधान मंत्री योगदान अर यूनेस्को कि इमदाद का पैंसा ऐ जाला . कथ्युंक त जन ठेकेदार,मंत्री , संत्र्यु सब्युंक घौर रुप्यौनं दबल-चंगेरी भोरे जाला"

मीन ब्वाल," ह्यां इथगा बि निर्दयी नि बणण चएंद हाँ ! "

मानसूनो उत्तर छौ," अरे इख बरखदु त उख शहरू नजीक तालाब खाली रै जाला ."

मीन बताई," पण मुंबई अर पूना मीन फोन लगाई त लोग बुलणा छन बल उख बि तु पाणी नि बरखाणि छे ."

मानसून रूण बिस्याई," अरे उख कन कैकी बरखूं ? वातावरण इथगा गरम च कि म्यार बादल कंडेंस इ नि ह्व़े सकणा छन. बदळ सळाणा इ नि छन . मी उना बरखणो इ जान्दो छौं अर अपण सि मुक लेकी इना उना रिटण बिसे जांदू ."

मिन बोली," त फिर इना गढवाळ मा इ ल़े बरखी जादी !"

मानसून हौर जोर से बगैर अंसदर्युं रुण बिसे ग्याई ," इख बि त बिजोग पड्यु च. अबि रुड्यु मा ज्वा बणाक लगी वां से वातवरण गरम च अर बादलूं तै सळाणो मौका इख बि नि मिलणो च."

मीन पूछ," त अब क्या होलू ?"

मानसून को फड़कुल/कैड़ो /करारा जबाब छौ," जन बुतिल्या तन इ काटिल्या."





Copyright@ Bhishma Kukreti 2/7/2012

Bhishma Kukreti

Ek Dhanga ki Atmkatha: A Humorous, Satirical example of Garhwali Fiction
(Review of story collection 'Ek Dhanga ki Atmkatha' by Bhagwati Prasad Joshi)
                                    Bhishma Kukreti

[Notes on satire and humor in fictions; satire and humor in Garhwali fictions; satire and humor in Uttarakhandi fictions; satire and humor in Mid Himalayan fictions; satire and humor in Himalayan fictions; satire and humor in North Indian fictions; satire and humor in Indian fictions; satire and humor in SAARC Countries fictions; satire and humor in South Asian fictions; satire and humor in Asian fictions]

     Most of the stories by Bhagwati Prasad Joshi are (mild) humorous and satirical stories. Bhagwati Prasad is an expert in creating situation or telling the situation that readers smile.
          A Dhanga (old bull) tells his life story to the writer. Once upon a time the bull was a strong calf and talented calf having great dreams for life. The young calf enjoys his youth and spends time in politicking. The situation made him rebellion.  Everybody in the Patti (area) came to know about his talent and his rebellion activities. Even the tiger leader of the respect his talent and comes for autograph. The bull says," Today, I don't have time"
         The story is an example of best uses of suspense, word play, humor, satire, imagination, depiction of nature, storytelling style, dramatization of a simple situation and transforming the folk song story into modern fiction in Garhwali fiction.
           Story telling style and humorous dialogues are the memorable points of the fiction 'Ek Dhanga ki Atmkatha' by Joshi.

Reference-
Dr. Anil Dabral, 2007, Garhwali Gady Parampara

Copyright@ Bhishma Kukreti, 3/7/2012
Notes on satire and humor in fictions; satire and humor in Garhwali fictions; satire and humor in Uttarakhandi fictions; satire and humor in Mid Himalayan fictions; satire and humor in Himalayan fictions; satire and humor in North Indian fictions; satire and humor in Indian fictions; satire and humor in SAARC Countries fictions; satire and humor in South Asian fictions; satire and humor in Asian fictions to be continued....


Bhishma Kukreti

****एक खुदेड़ गीत-कविता***



कवि - डा. नरेंद्र गौनियाल   




सौणि सलोणि,मेरी सटूली.
कलसिणि आंखि झपन्यळी लटूली

आंख्युं मा तेरि,मै छौं बस्योंऊ.
तेरा रंग मा ,कनु छौं रस्योंऊ.

बड़ी-बड़ी आंखि,पतळी कमर.
लगी जयां त्वैते, मेरी उमर.

कन्दुड़ों मा तेरा,झुमका सुहान्दा.
धक्-धक् दिल मेरो, त्वैते बुलान्दा.

चमकीली दांत-पाटी गोल गलोड़ी.
कनि भलि लगद सोन्याळी ठोड़ी.

तेरा बाना मिन, क्य-क्य नि छोडि.
दगड़ वालों कु, दगड़ो बि छोडि.

तेरि याद औंद,मि बौल़ेई जांदू.
तेरि फोटू देखि,मि चैन पांदू.

जिकुड़ी मा मेरी गबल़ाट हूँणी.
तू भी छै तनि,इनु मिन सूणी

अपणी यी छवीं,कैमा लगेली.
अपणा यी हाल, कैमा बतैली

मौल़ो ही मन तेरो,कुंगल़ो ही गात.
कनु भलु होलू,तेरो-मेरो साथ.

मीठी-मीठी छवीं,भलि-भलि बात.
आंखि झपगिंद,कटि जान्द रात.

तेरि चलक्वार से,मै बि ह्वै गयूं लाल.
त्वेन  कनु ढ़ोळी, मैं म यू जाळ.

जिंदगी कु मोड़ यू,कनु भारी खोळ.
मैतै ह्वैगेयी, कनु  घंघतोळ.

तेरि याद आली त,आग भभराली.
गौळी मा मेरी, भडुळी लगाली.

तेरि खुट्यूं मा बि ,लगाली पराज.
कसिकै करिली तू, काम -काज

कनु तेरो दिल च,कनि तेरि काया.
जोगी का मन मा बि,बसिगे माया

मेरा मनै की, तू छैयी राणी.
हमरि य बात,कैन नि जाणी.
      डॉ नरेन्द्र गौनियाल ..सर्वाधिकार सुरक्षित....


Bhishma Kukreti

चबोड़ इ चबोड़ मा



                                     घुघती दगड मुखाभेंट



                                           भीष्म कुकरेती



                मि ड़्यार गाँ जाणु छौ त मेरा पाहड डौट  कौम का मेहता जीन बोली बल - भीषम जी तुम गाँ जाणा छंवां त जरा घुघती क इंटरव्यू लेक  ऐ जैन . घुघती इज इन डेंजर..

मीन पूछ - घुघती दगड  इंटरव्यू ? कै छौंद  सात बेटों इखुली बुड्या या पांच लड़क्वळि इखुली बुडड़ी इंटरव्यू क बात ह्वाओ त क्वी बांचल बि !

मेहता जीन ब्वाल, "ना ! ना ! अच्काल कै उत्तराखंडी नेट सर्चर तै  इकुलास कटद बूड बुड्यों मा क्वी इंटरेस्ट नी च. ऐना मा अपण बदसूरत अर भौंडी  सूरत देखिक अब सौब तै डौर लगद . अच्काल त उत्तराखंडी नेट सर्चर नेट मा "लुप्त होती गौरया, लुप्त होते हल, लुप्त होते निसुड़ी, लुप्त होते ओखली  "  जन शीर्षकक  लुफ्त उठान्दन .

मीन ब्वाल," त मि लुप्त होती संस्कृति पर इ  कुछ माल मसाला लयांदु !"

           मेहता जीन सूत भेद  ख्वाल," न्है ! न्है  ! भै लुप्त होती संस्कृति बि त  हमारो आइना च अर अब मै तैं बि अपण कनफणि सि  सूरत ऐना मा दिखण मा शरम लगद   ......"

त  मेहता  जीक  बुल्युं मानणो वजै  से मि अपण ड़्यारम   तीन दिन तलक  घुघती क बाटो जग्वाळणु  रौं. जब  मि छ्वटु थौ  त  घाम आई ना कि घुघती चौक अर सग्वड़ मा घुरण मिसे जांदी छे. पण तीन दिन तलक घुघती नि दिखे. आज सुबेर त ना पण घाम आणों कुछ देर बाद म्यार चौक मा घुघती घूर .

मीन घुघती तै पूछ, ए घुघती ! कख जयीं छे  तू ? पैल त हमर चौक मा घुघत्यूँ पिपड़कारो रौंद छौ . तीन दिन बिटेन जग्वाळणु छौ कि तू ऐली "

घुघती न पूछ ," वाह !  तुम त चालीस साल बाद ड़्यार आवो अर हम इख तुमर बान भुकी मोरी जवां है? निठुर मनिख !'

मीन ब्वाल," भुकि  किलै? इख दिखदि हमर चौक मा , सग्वड़ मा  कथगा घास च जम्युं . घासौ बीज अर कीड मक्वड़  कम  छन इख? "

" हम घासौ  बीज नि खांदा.  हम घुघती छंवां ना कि मनिख कि जु हमकुण नि बणयू ह्वाओ वै तै बि खै जवां !" घुघती न करकरो ह्वेक जबाब दे

मीन पूछ," जन कि  ?"

" जन कि क्या! भेमाता ब्वालो भगवान ब्वालो न मनिखों  कु न मांस मछी, ग्यूं  , चौंळ,  जौ इ ना तमाखू बि न बणयूँ छौ पण तुम मनिख इ सौब खाणा छंवां. हम घुघती तुम मनिखों तरां नि छंवां .हम केवल पहाडो मा जख मनिख रौंदन उखम का बीज या उखाक कीड़ा खांदवां " घुघती न बिंगाई

मीन ब्वाल, "ओ त या बात च !"

" ह्यां तू मेरी जगवाळ किलै छै करणु ? वु त मि पली गौं मा छयाई अर कुज्याण कथगा सालों  मा ए  गां बिटेन  मनिखों गंध आई त मी इनै ऐ ग्यों. बोल में से क्या काम  च ?  "घुघती न पूछ

मीन पूछ," ह्यां मीन सूण बल तुम घुघत्यूँ  जात अब लुप्त होणि च. सै च या बात?"

," मी इथगा त नि जाणदो कि हम घुघती लुप्त होणा छंवां कि ना पण मी इथगा जरुर जाणदो कि गढवाळ का गौं खाली ह्व़े गेन, मनिख नि छन इख,  अर याँ से हम खुणि खाणक नि रै गे."घुघती न समजाई

मीन बताई," पण पर्यावरणवादी  जन कि हेमंत ध्यानी, देवेन्द्र कैंथोला , अमरनाथ कान्त, जे.पी. डबराल  जन विद्वान त इनी  लिखणा छन कि घुघती क जात लुप्त होणि च."

" अच्छा !  पर्यावरणवादी बुलणा छन त जरोर हमारि जात खतम होणि इ होली." घुघती न बोलि.

मीन बताई," हाँ ! हाँ ! यि सौब लिखणा छन बल घुघती जात खात्मा के कगार पर है . यूँ विद्वानु  लेख अमेरिका क समाचार पत्र अर लाइफ , टाइम, नेचर  जन बडी मैगजीनू  मा छपद."

" हाँ उन त कानो कान मीन बि सूण छौ बल डिल्ली, मुंबई अर कानाडा का कुछ पहाड़ी ''घुघती को लुप्त होने से बचाओ'' क बारा मा भौत फिकरबंद छन अर उख परदेस मा भौत सा काम करणा छन.इन बि सुण्याण मा आइ कि मुंबई मा 'घुघती बचाओ' नामो एक एन.जी.ओ बि खुल्युं च  "

मीन उत्साह मा ब्वाल," देखी लि घुघती त्यारा बाना  इ प्रवासी विद्वान् कथगा परशान छना"

" तुम मनुष्य कहीं के ! बड़े चालु हो . खुद इ आग लगाते हो और खुद इ आग की परेशानी  पर भाषण भी पेलते  हो . मनुष्य कहीं के "   घुघती करैंक भौण मा किराई 

मीन घंगतोळ मा ब्वाल," मतबल!"

' पैल तुम पहाड़ी गाँव छुड़दां  अर फिर रूणा छंवां  कि घुघती लुप्त होणि च. अरे मेरी इथगा इ जादा चिंता छे त तुमन गाँव छोडि किलै च भै ? प्रवासी पहाड़ी कहीं के " अर घुघती फुर्र  से उड़ी गे



Copyright@ Bhishma Kukreti , 3/7/2012

Bhishma Kukreti

                                                                मानसूनअ दगड मुखसौड़


                                          भीष्म  कुकरेती


                ब्याळि गौं मा छौ. अब अबि मि कैमरा सैवी नि ह्व़े सौकु जब कि अच्काल जु बि गाँ जांद वु  गढवाळ बिटेन पैलाक तरां तोर, चून, गैहथ त कुछ लांद  नी च पण कुछ फोटो लै आन्दन जन कि  मेरा पहाड़ का मेहता जी बागेश्वर कि फोटो लैन अर फेस बुक मा इन दिखाणा छन जन बुल्यां ड़्यार बिटेन मेखुण चूडा, जख्या, भंगुल लयां ह्वावन धौं !

    सुचणु  छौ कि फेस बुक मा क्या दिखौलू ? गाँ जाओ अर कुछ नि दिखाओ त फेस बुक मा फेस दिखाण लैक नि रै सक्यांद . भलु ह्वाई जु उख मै तै एक कतर मानसूनौ मिलि गे.फेस बोक मा फेस दिखांण  लैक त कुछ ना कुछ मीली गे छौ.

मीन मानसून तै पूछ- हे मानसून कख छयाई रै तु ?'

मानसून न ब्वाल," मि  पत्रकारूं  मुख नि लगण चांदु.   टीवी मा द्याख च क्या क्या बखणा रौंदन -  हत्यारा-मानसून , बेरहम मानसून , मानसून की मार ... सूखा .. जन बुल्यां मि यूँ पत्रकारूं नौकर छौं धौं या क्वी नेता हों धौं कि यूं पत्रकारूं  बुल्यु मानि ल्यों.पैलक पत्रकार मनुष्य धर्मी छ्या अब त टी. आर. पी. बढ़ाओ , सरकुलेसन बढ़ाओ  धर्मी ह्व़े गेन इ पत्रकार  '

मीन ब्वाल," मि पत्रकार नि छौं. अर उन बि गढ़वाली लिख्वार जब मुलायम सिंग तै हत्यारा नि बथान्दन त मानसून तै क्या गाळि द्याला!"

" ओ तु गढवाळि लिख्वार छेई ? फिर क्वी फिकर नी च। तीन इ लिखण अर तीन इ बंचण . चल सवाल पूछ. म्यार थ्वडा टैम पास ह्व़े जालु" मानसून कु बुलण छौ.

बुरु त भौत लग पण अब त इन कटाक्ष का शब्द सुणणो ढब पोडि गे.

मीन पूछ," अब तक कख छौ भै ?"

मानसूनो बुलण छौ," कनो कख छौ. इन बोदी कख नि छौ ! जरा सि मीन केरल मा पाणी  बुरक , फिर थ्वडा  थ्वडा महाराष्ट्र, गुजरात, अर थ्वडा सि बंगाल ज़िना पाणि बुरकाणु छौ.'

मीन मानसून तै बताई ,"अरे इना उना खूब घुमणु रै अर इख गढ़वाल मा किलै नि ऐ .इख गढवाल का गां मा लोक तेरी कथगा जग्वाळ करणा  छन. "

मानसून न रुसेक ब्वाल,"' देख  हाँ  त्वे  तै इन पुछणो क्वी अधिकार  नी  च हाँ. तू त इन पुछणु  छे जन बुल्यां  तू क्वी बी.बी.सी क रिपोर्टर ह्वेलि ."

मीन सुरक सुरक ब्वाल,' भै इख गढ़वाळ मा गढवळी बि त त्यार प्रेमी छन कि ना ?"

. "अर फिर  गढवाळ का गाऊं तै मेरी क्या जरुरत ? अब जब इ लोग ना त मुंगरी बूंदन, ना कोदा-झंगवर बूंदन ना इ क्वी दाळ कि खेती करदन त यूँ गढ़वाळयूँ ले  मेरी क्या जरुरात भै?"  मानसून को रूखो उत्तर  छौ

मीन ब्वाल,' भै पिछ्ला पांच हजार साल से तू ये बगत तलक गढ़वाळ मा खूब  पाणि बरखै  दीन्दो छौ . ठीक च गढ़वाळयूँ तै  खेती क बान पाणि क जरुरात नी होली. पण त्वे तै भेमाता/भगवानो बणयाँ  नियम धियम कु त ख़याल करण चयांद  कि ना ?"

मानसून क बादल जोर से गड़गडैन ,' तुम मनिख बि ना !  बडी चालु चीज छंवां. अफु त तुम मनिख भगवानो बणयाँ  सौब नियम धियम तोड़णा छंवां  अर में मानसून से उम्मीद करदवां कि मि भेमाता बणयाँ  नियमु पालन कौरु. हौरू तै अड़ाण पण अफु कुछ नि करण . वाह! "

मीन करूण रसीली भौण मा ब्वाल,'' ह्यां इख बि त पीणो पाणि जरुरात च अर फिर रूडि क गरमी से कथगा बुरा हाल छन."

' अरे इखमा क्या च . मि नि बर्खलु  त तुमर  गाँ  वळु  मजा  ऐ जाला।" मानसून न इन भौणम ब्वाल जन क्वी जासूस क्वी रहस्य क सूत भेद खुलणु ह्वाउ

मीन  पूछ, ' क्या बुनू छे भै तु? अरे अबरखौ  मा इख गाँव वळु आफत ऐ जाली . तिसा मोरी जाला म्यार गाँ वळ अर तु बुलणि छे बल गाँ वळु मजा ऐ जाला"

मानसून को बथाण छौ," अब क्वी तिसा नि मोरी सकुद. इख  अबरखौ क्षेत्र घोषित ह्वाई  ना कि उना मुख्यमंत्री सहयोग , प्रधान मंत्री योगदान अर यूनेस्को कि इमदाद का पैंसा ऐ जाला . कथ्युंक त  जन ठेकेदार,मंत्री , संत्र्यु सब्युंक  घौर  रुप्यौनं दबल-चंगेरी भोरे  जाला"

मीन ब्वाल," ह्यां इथगा बि निर्दयी नि बणण चएंद हाँ ! "

मानसूनो उत्तर छौ," अरे इख बरखदु त  उख शहरू नजीक तालाब खाली रै जाला ."

मीन बताई," पण मुंबई अर पूना मीन फोन लगाई त लोग बुलणा छन बल उख बि तु पाणी नि बरखाणि छे ."

मानसून रूण बिस्याई," अरे उख  कन कैकी बरखूं ? वातावरण इथगा गरम च कि म्यार बादल कंडेंस इ नि ह्व़े सकणा छन. बदळ  सळाणा इ नि छन  . मी उना बरखणो इ जान्दो छौं अर अपण सि मुक लेकी  इना उना रिटण बिसे जांदू ."

मिन बोली," त फिर इना गढवाळ मा इ ल़े बरखी जादी  !"

मानसून हौर जोर से बगैर अंसदर्युं रुण बिसे ग्याई ," इख बि त बिजोग पड्यु च. अबि रुड्यु मा ज्वा बणाक लगी वां से वातवरण गरम च अर बादलूं तै सळाणो मौका इख बि नि मिलणो च."

मीन पूछ," त अब क्या होलू ?"

मानसून को फड़कुल/कैड़ो /करारा  जबाब छौ," जन  बुतिल्या तन इ काटिल्या."





Copyright@ Bhishma Kukreti 2/7/2012

श्रद्देय कुकरेती जी,




नमस्कार! आपकू आज कु लेख पैड़ी मिथें भी कुछ लिखना की खज्जी हवे ग्ये, और मिन शुरू कैर द्येनी अपणा उदगार लिखणा.

आप्थैं ताता ताता उदगार कविता का माध्यम से भिज्नु छौं, आशा च आप अपणी समीक्षा भेजला...



"मानसिंग (मानसून) बोड़ा ऐजा"



छि भै बोड़ा यन्न नि रुसान्दा,

अपणा नौन्यालू और भै-बन्दों थैं, सिन नि तर्सान्दा,

हपार देख! बोड़ी ढयाँ मा जईं धै लगाणु,

बल, उज्याड़ नि जांदा, च्या ठंडी हूणि, प्ये जा,

मानसिंग बोड़ा ऐजा!!!




माना की मैंगै भिंडी हवे ग्ये,

और कमै का वास्ता, तू प्रवासी हवे ग्ये,

नौन्याल भी हाथ नि बटाना छन,

और तू यकुलू प्वैड ग्ये,

पर बोड़ा! नाती-नतिणों की गट्टा-कुंजों की आस लगी च, दये जा.

मानसिंग बोड़ा ऐजा!!!




एक मैना बिटिन्न बोड़ी सज-धजी बैठीं च,

तेरा औण की खुशि मा, देखा कनि तणितणी हुयीं, कन्न ऐंठी च

सुच्णी च अब त बोर्डर पर लड़े वला दिन भी नि छन,

रिटैर आदिम थैं यन्नी देर किलै लग्नी च,

उठ, खड़ू हो और दिखे जा दम ख़म, अपणु प्रेम छलकै जा,

मानसिंग बोड़ा ऐजा!!!




तेरु उत्तराखंड जू अपणी हरयाली कु जणेदु छौ,

देख कनू खरडु, कनू निरस्यु दिखेणु च,

माना की त्येरा भै बंद अब मुंगरी, कखड़ी, गुदड़ी सब बिसरी ग्येनी!

पर त्येरु त अपणु धरम, अपणी मान मर्यादा च,

आ! झमाझम बरखी, कुयेड़ी लौन्कै, अपणु "डिसिप्लिन" दिखै जा,

मानसिंग बोड़ा ऐजा!!! सब्यो की तीस बुझै जा!!! तरस्यु सरेल रुझे जा!!!




विजय गौड़

०३-०७-२०१२

सर्वाधिकार सुरक्षित

Bhishma Kukreti

*****जोगण कु उपकार *****एक गढ़वाली कथा.


  डॉ नरेन्द्र गौनियाल.


कुछ दिन पैली ही जोगण दीदी जांठि टेकी  हमारू घौर मा ऐछे. मेरी ब्वैन दीदी तै सुबेर कल्यो रोटी का टैम पर ढबोण्या रोटी दगड़ मूल़ा अर छीमी कु साग दे.जोगणदी जब बि कब्बि औंदी छै,मेरी ब्वे खाणु- पीणु जरूर दीन्दी छै.अर घार मा लिजाणो बि दीन्दी छै.आज जोगणदी न बोली की ब्वारी !द्वी क्वासा मर्च दे दे.ब्वैन थ्वड़ीसी मर्च,ग्यूं कु पिस्स्युं अर  कंकरेल़ू लूण दे.
     पैली त बिचारी काम-काज का टैम पर खूब औंदी छै अर मदद करदी छै.ग्यूं,झुन्गोरा,मंडुआ,की दाँय मा खूब लगीं रैंदी छै.भट,मास,गैथ,चुआ,काण-मास सब कुटे दीन्दी छै.हर चीज  से थ्वडा-थ्वडा मिलि जांदू छौ.लूण,गुड,साग-पात,नाज-पाणि की कुटरी बाँधी कै दीदी ब्यखुन्या अपणा घौर चली जांदी छै.पैली त बिन काम कर्याँ कुछ नि मंगदी छै,पण अब बुढ़ापा का कारण  कुछ नि कैरि सकदी छै.ये वास्त जब बि औंदी,कुछ नकुछ दे दीन्दा छाया.
गौं मा सुणे कि जोगण दी बीमार पडीं.खाणु-पीणु बंद ह्वैगे.पास-पड़ोस वलोंन बगत-कुबगत मुंगणी कु पाणि दे.मंततु पाणी अर च्या बि दे.पण हर्बी-हर्बी हालत जादा खराब हून्दी गे. अर एक दिन सुबेर भितर म्वरीं ही देखि
जोगण का दगड़ अपणो क्वी नि छौ. बालपन मा ही ब्यो का बाद द्वी नौनि ह्वैगीन.अर निर्भगी इनि कि जवानी मा ही नौन्यूं कु बुबा अचंचक्क बिमार पड़ी कै मरि गे.जवैं ख़तम होना का बाद  सौरास मा क्वेई नि छौ देख-भाल करन्य.कै तरीका से द्वी नौन्यूं का हाथ पिला कैरिकै व बेफिक्र ह्वैगे. यकुलो जीवन वो बि विधवा को ,जीणु कठिन ह्वैगे. कब्बि भूखा-प्यासा दिन बि कटण पडीं.आखिरकार व अपणो मैत जमणधार ऐगे.कुछ दिन अपणा मैत्यों का दगड़ रैणा का बाद वींन गौं मा ही एक कूड़ी मा ठिकणो बनै  दे.वीं कूड़ी वल़ा नौकरी-चाकरी मा देरादूण चली गे छाया.तौन जोगण तै एक ओबर दे दे रैणो.
हमन त जोगण दी तै सदनि वीं ओबरि मा ही देखि. अचार-विचार ठीक हूँणा का कारण कैन बि कब्बि वीं पर अंगल़ू नि उठाई.अप नि क्वी खेती-पाती नि छै,पण लोगों का दगड़ काम करी कै ही गुजर-बसर ह्वै जांदू छौ.सब लोग खुला मन से दे दीन्दा छाया.मेरी ब्वे बि राशन-पाणि ,पुरणि धोती-बन्यान सब दीन्दी छै.अपणि कुटम्दरी मा ब्यो-बंद का टैम पर दक्षिणा,नै धोती-अंगडु बि दीन्दा छाया.जोगण दी तै तम्बाखू पीणे आदत छै,ये वास्त घर्या तम्बाखू बि लिजांदी छै.
पड़ोस वालों जब जोगण सुबेर मरीन देखि ट खबर सारी गौं मा फैली गे..अरे !.जोगण मरि गे.....जनु नाम.तनि बिचरी जोगण.अपनों-पर्या क्वी बि ना .लोगोंन सोची कि बूडा का भितर जी क्य मिलन. गौं का दाना -सयाणों न बोली कि खतड़ी-कम्बळी भैर धारा.बिष्ट बूबा जी न बोली कि देखि ल्या कुछ छा कि ?निथर कफ़न त ल्याणु ही च.हैंका दिन कूड़ी बि त चुख्याण. मौ-मिटोंण त कर्ला.
सरि गौं का दाना-दिवना,बैख-ब्यटुला कट्ठा ह्वैगीन.भितर जैकि बुढड़ी तै भुयां धरी कै ढिकण -डिसाण उठाई.डिसाण मूड़ रुप्या मिलि गैनी.लोगन सोची चलो ठीक ह्वैगे.कफ़न का पैसा त कम से कम बुढड़ीन धरयां छाया.कैको बि नि लीगि परलोग.सर्या गौं क लोग गैनी अर जोगण तै फूकी कै ऐगेनी.
बाद मा सरी गौं क लोगोँन ओबर बिटि एक-एक समान भैर करी.पुराना झुल्ला-झुल्ली,भांडी-कूंडी भैर निकाली कै देखि.भितर तीन ढ्वकरों   मा धान,तीन मा ग्यूं,एक मा चौंल,एक कनस्तर मा सोयाबीन.छवटा-बड़ा कतगे भांडों मा मास,रयांस,गैथ,भट,मंडुआ,झुन्गोरू धर्यूं मिलि गे. एक द्वी किलो कु डब्बा घर्या घ्यू कु बि मिलि...फिर एक डब्बा मिलि.वैपर भैर बिटि एक झुला लपेट्यूं छायो.जब खोली त वै पर कतगे रुप्या मिलि गईं.एक-एक करी गैणीइ त पट्ट डेढ़ हजार.लोग छवीं लगाणा कि जोगण अपणो काम-काज  अर कूड़ी चुख्याणो सब इंतजाम करिगे.अब त सब खाणु-पीनु बि ह्वै जालु अर बोक्ट्या बि ऐ जालो.
सब लोग हक़-चक तब रैगेनी जब एक हैंका डब्बा पर हौरि रुपया मिलिनी.गिणदा -गिणदा  पट्ट १६ हजार.अलग-अलग मुखै बनि-बनि बात.कब बिटि जमा करनी रै होलि जोगण यू सब..के खुणी करी होलू..
दसवों दिन भितर चुखेकी गौं वालों हलवा-परसाद,पूरी-सब्जी खै.एक बोक्ट्या बि मरे गे.इनि चखळ-पखळ त भला-भलों कि दावत मा बि नि हून्दी.सब काम निबटि कै मीटिंग ह्वैगे.भितर कि राशन-पानी जु बचि गे वैतई द्वी हजार मा बेचिदे.अब सवाल यू ह्वै कि यूं रुप्यूं कु क्य कन.?जोगण कि एक बेटी बम्बई अर एक दिल्ली रैंदी छै..पण कैकु अता-पता नि छौ.कब्बि जोगण तै द्यखणो बि नि आया.गौं क पञ्च-परवाण  सब्यों ण आखिर यू फैसला ले कि गौं कि इस्कूल हुईं च उजड़न्य.स्टील कि चादर ल्हेकी मरम्मत ह्वै जाली.गौं वालों सालों बिति इस्कूल कि चूंदी पातळ ठीक नि कारी सकी,अर जोगण बिचारी एक ही झट्गा मा गौं क नौन्यलों क वास्त इतनो बड़ो काम करी गे.जोगण कु ये उपकार तै गौं कि द्वी-चार पीढ़ी का लोग कम से कम याद त रखी सक्दन.जैका कफ़न का वास्त कपडा अर झ्वपडा चुख्यानो वास्त गौं वाला परेशान ह्वै गे छाया,वींन इस्कूल कु जीर्णोद्धार करी कै सर्या गौं चुखे दे.


        डॉ नरेन्द्र गौनियाल.....सर्वाधिकार सुरक्षित...       
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Bhishma Kukreti

Pagal: a Garhwali Drama depicting harmfulness of Blind Faith Rituals 

                                Bhishma Kukreti
[Notes on Dramas depicting harmfulness of Blind Faith Rituals; Garhwali Dramas depicting harmfulness of Blind Faith Rituals; Uttarakhandi Dramas depicting harmfulness of Blind Faith Rituals; Mid Himalayan Dramas depicting harmfulness of Blind Faith Rituals; Himalayan Dramas depicting harmfulness of Blind Faith Rituals; North Indian Dramas depicting harmfulness of Blind Faith Rituals; Indian Dramas depicting harmfulness of Blind Faith Rituals; SAARC Countries Dramas depicting harmfulness of Blind Faith Rituals; South Asian Dramas depicting harmfulness of Blind Faith Rituals; Asian Dramas depicting harmfulness of Blind Faith Rituals]
[रूढ़ीवाद विरोधी नाटक; रूढ़ीवाद विरोधी गढ़वाली नाटक;रूढ़ीवाद विरोधी उत्तराखंडी नाटक;रूढ़ीवाद विरोधी मध्य हिमालयी नाटक;रूढ़ीवाद विरोधी हिमालयी नाटक;रूढ़ीवाद विरोधी उत्तर भारतीय नाटक;रूढ़ीवाद विरोधी भारतीय नाटक;रूढ़ीवाद विरोधी सार्क देशीय नाटक;रूढ़ीवाद विरोधी दक्षिण एशियाई नाटक;रूढ़ीवाद विरोधी एशियाई नाटक लेखमाला ]


        Om Prakash Semwal wrote a Garhwali drama 'Pagal' and staged the same in a school of Chamoli Garhwal in December 2000. Om Prakash aims the drama to all age people.
                  Ramu works out of village and lives there while his family lives in village. Ramu's wife is due to deliver her fourth child. His old parents are separate from their daughter in law. Ramu's wife delivers a child but dies after some time. Ramu's wife became mad. Ramu starts visiting Bakya (Future teller). His family performs all folk rituals but madness of his wife enhances. A village doctor advices Ramu. But it is too late for taking doctor's advice.
            Om Prakash wrote the drama for awakening people that when there is need of physician they should visit physicians and when the need is for rituals they should perform rituals.
   The drama is simple and there is not newness in the drama from my point of view as critic but is useful for social awareness.

Copyright@ Bhishma Kukreti , 3/7/2012
Notes on Dramas depicting harmfulness of Blind Faith Rituals; Garhwali Dramas depicting harmfulness of Blind Faith Rituals; Uttarakhandi Dramas depicting harmfulness of Blind Faith Rituals; Mid Himalayan Dramas depicting harmfulness of Blind Faith Rituals; Himalayan Dramas depicting harmfulness of Blind Faith Rituals; North Indian Dramas depicting harmfulness of Blind Faith Rituals; Indian Dramas depicting harmfulness of Blind Faith Rituals; SAARC Countries Dramas depicting harmfulness of Blind Faith Rituals; South Asian Dramas depicting harmfulness of Blind Faith Rituals; Asian Dramas depicting harmfulness of Blind Faith Rituals to be continued ..
रूढ़ीवाद विरोधी नाटक; रूढ़ीवाद विरोधी गढ़वाली नाटक;रूढ़ीवाद विरोधी उत्तराखंडी नाटक;रूढ़ीवाद विरोधी मध्य हिमालयी नाटक;रूढ़ीवाद विरोधी हिमालयी नाटक;रूढ़ीवाद विरोधी उत्तर भारतीय नाटक;रूढ़ीवाद विरोधी भारतीय नाटक;रूढ़ीवाद विरोधी सार्क देशीय नाटक;रूढ़ीवाद विरोधी दक्षिण एशियाई नाटक;रूढ़ीवाद विरोधी एशियाई नाटक लेखमाला जारी ...