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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti

*******पहाडा कि नारी ! तू जाग-जाग !!********


कवि- डा. नरेंद्र गौनियाल

पहाड़ा कि नारी,पहाड़ा कि लाज .
त्यारा कान्ध्यों मा, भार च आज.

दरवल्य़ा ह्वैगेनी  मर्द आज.
तौंकू नि छा क्वी काम-काज.

अपणा पति तू, जब बाट ल्हेली.
ख़ुशी-ख़ुशी तू ,तब ही रैली.

नारी तू जाग,जाग तू जाग.
तिन बणोण खुद अपणो भाग.

पहाड़ा कि बेटी,ब्वारी सूणि ल्यावा.
नौनि-नौना तै  तुम, खूब पढ़ावा.

नौनि-नौना मा, नि कनु फरक.
निथर जाण पोडालू, घोर नरक.

बाळी नौनि तै,अबी नि पिचगावा.
तैंकू भविष्य तुम,पैली बणावा.

पढ़ी-लिखी कि बड़ी ह्वै जाली.
अपणि खुट्यूं खड़ी ह्वै जाली.

नौकरी पाली खुद ही कमाली.
दहेज़ कुंड मा तब नि ड़ूबाली.

एक से के ब्योला मिलाला.
बिन दहेज़ ब्योऊ कराला.

हंसी-ख़ुशी तब द्वी झण राला.
स्वस्थ-सुन्दर समाज बणाल़ा.

    डॉ नरेन्द्र गौनियाल ..सर्वाधिकार सुरक्षित... 


Bhishma Kukreti

School: A Garhwali Story Portraying Weakening of Cooperative Institutions by States 

(Review of Garhwali story collection 'Bwari' by Durga Prasad Ghildiyal)
                                              Bhishma Kukreti

[Notes on short stories Portraying Weakening of Cooperative Institutions by States; Garhwali short stories Portraying Weakening of Cooperative Institutions by States; Uttarakhandi short stories Portraying Weakening of Cooperative Institutions by States; Mid Himalayan short stories Portraying Weakening of Cooperative Institutions by States; Himalayan short stories Portraying Weakening of Cooperative Institutions by States; North Indian short stories Portraying Weakening of Cooperative Institutions by States; Indian short stories Portraying Weakening of Cooperative Institutions by States; south Asian short stories Portraying Weakening of Cooperative Institutions by States;  Asian short stories Portraying Weakening of Cooperative Institutions by States]
[राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी कथाये;राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी गढ़वाली कथाये; राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी उत्तराखंडी कथाये; राजकीय सहकारी संस्थाएं सम्बन्धी मध्य हिमालयी कथाये;राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी उत्तर भारतीय कथाये; राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी भारतीय कथाये;राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी दक्षिण एशियाई कथाये;राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी एशियाई कथाये लेखमाला ]


    The village needs a school. Villagers form a cooperative organization. The villagers built a school through Shramdan( cooperation). The villagers are very much enthusiastic in building a school for their children.  The cooperative organization runs the school. However, when the states takes over the organization the cooperation among villagers diminishes.
  The story deals many facets of cooperation and non cooperation moods of people.
Reference-
1-Abodh Bandhu Bahuguna, Gad Myateki Ganga
2-Dr Anil Dabral, 2007 Garhwali Gady Parampara
3-Bhagwati Prasad Nautiyal, articles on Durga Prasad Ghildiyal l in Chitthi Patri
4-Dr. Nand Kishor Dhoundiyal, Garhwal Ki Divangat Vibhutiyan

Copyright@ Bhishma Kukreti, 7/7/2012
Notes on short stories Portraying Weakening of Cooperative Institutions by States; Garhwali short stories Portraying Weakening of Cooperative Institutions by States; Uttarakhandi short stories Portraying Weakening of Cooperative Institutions by States; Mid Himalayan short stories Portraying Weakening of Cooperative Institutions by States; Himalayan short stories Portraying Weakening of Cooperative Institutions by States; North Indian short stories Portraying Weakening of Cooperative Institutions by States; Indian short stories Portraying Weakening of Cooperative Institutions by States; south Asian short stories Portraying Weakening of Cooperative Institutions by States;  Asian short stories Portraying Weakening of Cooperative Institutions by States to be continued...
राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी कथाये;राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी गढ़वाली कथाये; राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी उत्तराखंडी कथाये; राजकीय सहकारी संस्थाएं सम्बन्धी मध्य हिमालयी कथाये;राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी उत्तर भारतीय कथाये; राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी भारतीय कथाये;राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी दक्षिण एशियाई कथाये;राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी एशियाई कथाये लेखमाला जारी ...

Bhishma Kukreti

चबोड़ इ चबोड़ मा गंभीर छ्वीं                                   

                  गढ़वळि संस्कृति क खोज मा -२



                                                  खुजनेर - भीष्म कुकरेती



(ब्याळि आपन बांच बल लिख्वार गढ़वळि संस्कृति दगड मुखाभेंट करणो अपण गाँ गे अर उख वैक भेंट एक जंदरौ तौळअ  पाट से ह्व़े. फिर लिख्वार संन्युं ज़िना गे )



             मीन तौळ नजर मारी त  सनै सनै   लोगुक तादात बडणि छे . सैत च दुसर गाँव क लोग बि परोठी-बोतल लेकी ये बाटो बिटेन कखि जाणा छया.

मीन कील तै पूछ," ये म्यार बाडा जी बांठौ  कील यि लोग परोठी-बोतल लेकि  कख जाणा छन ?"



कील न मेरो जाबाब क जगा पर ब्वाल,' ओ त अबि बि तुमारि टक मै तै हथियाणो नि ग्याई? तबी त म्यार बाडा जी बांठौ कील क नाम से मि तै भट्याणि छे."

मीन ब्वाल," हाँ या बात सै च बल बिगळयाणो परांत  बि म्यार बुबा जी अर बाडा जी मा प्यार मा कमी नि ऐ पण म्यार बुबा जी ये कील तै कील ना अपण ददा जी क समळौण  माणदा छया."



कील न बोली," जन त्यार बाडा जी अपण ददा क लगायुं गदनौ आमौ   डाळ तै बुल्दा छा, 'भाई क बांठौ   आम '  "

मीन ब्वाल," हाँ ! उन त  हम वै आम क एकेक हड्यल  तै द्वी हिस्सों मा बंटद छ्या.पण फिर बि बुले जांद छौ कि म्यार बुबा जीक बांठौ आम. यू आम बल म्यार दादा जीक ददा जी न लगै छौ .अर म्यार बडा जी बिगळयाणो बाद बि ये आम की देख भाळ बच्चो जां करदा छा." मि अब भावुक हूण बिसे गौं.



कील न पूछ," त क्या तेरी या त्यार बुबा क टक मोरद मोरद तक ड़्यारम म त्यार  बूड ददा क बणयूँ  चौंतरा पर  नि छे."

मीन हुन्गरी पूज ,"  हाँ बाबा जी तै वै  चौंतरा से बड़ो प्यार छौ. बडा जी अर म्यार बुबा जी जडु मा दगड़ी घाम तापदा छया अर रुड्यू  रात वेई चौंतरा मा सीन्दा छया . बिगळयाण से बि दुयुंक प्यार मा फ़रक नि पोड़."



कील न ब्वाल,' हाँ जब बि त्यार बुबा उन्ना देसन (परदेस न ) ड़्यार आन्द छयो त मि तै प्यार से मलासदो छौ. "

मीन ब्वाल," अर जब बुबा जी उन्ना देसन ड़्यार आन्द छ्या त एक राति खुणि अपण भैजी याने म्यार बडा जी क दगड डाँडो कूड़ मा सीणो जरूरर जांदा छा."



कील न बोली," अच्छा अच्छा तू भद्वाड़ो डांडौ बात करणि छे. जख त्यार बडा अर बुबा न द्वी कुठड्यू  कूड़ लगै छौ."

मीन उलार मा ब्वाल,"  हाँ. उख पांच दूणो भद्वाड़ छौ त उख रात दिन काम करण पोड़द छौ त दुयूं न साजो कूड़ चीण बल  खेती टैम पर हम कामगती उखी से जंवां. बुबा जी जब बि उन्ना देस बिटेन आन्द छया त म्यार बडा खुण अलग से मिठाई लांदा छया अर फिर एक दिन उख डांडो कूड़ म दगड़ी खाणक  बणान्दा छ्या, उखी एक रात बितान्दा छया  . बुबा जी क लईं चीजुं मजा लीन्दा छया. सारा  अडगै  (इलाका ) मा म्यार बडा जी अर म्यार बुबा जी खुणि  लोकर राम लक्ष्मण बुल्दा छया."



कील न पूछ," ये त्यार कथगा भै भुला छन ?"

मीन जबाब दे," तीन इ छन भै."

"औ ! त दगड़ी इ रौंदा ह्वेला नी ?" कील अ सवाल छौ.

मीन अणमण ह्वेक जबाब दे,; ना '



कील न ब्वाल,ना अ ?"

"ना हम दगड़ी नि रौन्दां ."  मेरो खड़खड़ो  जबाब छौ

कील न फिर पूछ," क्या हाल छन हौरी भायुं क ?"

'कुज्याण ठीकि होला " म्यरो उदासीन जबाब छौ.



कील न खौंळे  क ब्वाल," कुज्याण मतबल ?"

' कुज्याण मतलब मै पता नी च कि ऊंका क्या हाल छन .' मीन बोल

" हैं ! क्या बुनी छे ?" कील न पूछ

मीन  अणमणो ह्वेक जबाब दे,' हाँ सैत च हम चारेक साल बिटेन नि मील होलां "



' पण तुम लोग त एकी शहर मा छन वां ना ?" कीलो सवाल छौ

मीन ब्वाल," हाँ. पण हम तिन्यु मा कथगा सालुं से बातचीत  नी च ."

कील न ब्वाल," ये झूट  नि बोल हाँ !"

मीन ब्वाल," हाँ हम क्वी बि एक हैंक से नि बचळयान्दवां ."



कील क सवाल छौ  ," क्यांक बान  झगड़ा  ह्व़े ?"

" पैल त भौत सालू तक बुबा जीक कमायिं  जायजादो बान झगड़ा राई  फिर हमार बूड खूडू क  एक भगवती क भाग्यशाली खुन्करी छे. वींक बान त इथगा झगड़ा ह्व़े कि आज तक हम एक हैंकाक मुख बि नि दिखण चाँदवां " मीन भेद ख्वाल



कील न ब्वाल,' त ...?"

मीन मुंड हलाई.

कील न पूछ , त जग्गी जुग्गी मा ?"

मीन बताई ," ना .हम एक तै देखिक मुख फरकै दीन्दा "

कील न ब्वाल,' बड़ो खराब ह्व़े भै,"



अब मीन बात घुमाणो बान पूछ , " ह्यां ! सी लोग परोठी-बोतल लेक कख जाणा छ्या ?"

इथगा मा एक अवाज आई," ये ठाकुर जरा इना आदि ."

मी चचरै ग्यों कि या अवाज  कैकी च

कील न बताई,' तुमर सनि पैथर  ज्वा सनि च वा भट्याणि च ."



फिर से अवाज आई," ह्यां जरा देरो खुणि इना ऐन जरा."

कील न बोल, "जा जयादी . जब तू छ्वटो छौ त वीन सनी म जान्दो इ छौ "

मीन ब्वाल, " हाँ पण यि लोक परोठी-बोतल लेक कख जाणा छन ?"



कील न ब्वाल" वीं तै इ पूछी लेन ."

मी अपण सनी पैथरा  सनि क तरफ जाण लगी ग्यों

 



(गांका लोग कख अर किलै भागणा छया? वीं सनि ण क्या ब्वाल? क्या मै तै संस्कृति क दर्शन ह्व़ेन ? अर ह्वाई च त संस्कृति क्या ब्वाल ? यांक बान अगलो भाग..३  )

Read second part----

Copyright@ Bhishma Kukreti , 8/7/2012

Bhishma Kukreti

Bansuli: Garhwali Story about Love for sister

(Review of Garhwali Story Collection 'Bwari' by Durga Prasad Ghildiyal)

                           Bhishma Kukreti
               You cannot write history of Garhwali Story without mentioning Durga Prasad Ghildiyal. Durga Prasad was a famous name in Garhwali fiction world before Ghildiyal published three story collection and a novel.
                        'Bansuli' story is about love for sister. A boy runs away from his house due to bad behavior for him from Sauteli mother and father. The boy returned home after many years due to love for his sister. The story is having many dramatic instances.

Reference-
1-Abodh Bandhu Bahuguna, Gad Myateki Ganga
2-Dr Anil Dabral, 2007 Garhwali Gady Parampara
3-Bhagwati Prasad Nautiyal, articles on Durga Prasad Ghildiyal l in Chitthi Patri
4-Dr. Nand Kishor Dhoundiyal, Garhwal Ki Divangat Vibhutiyan

Copyright@ Bhishma Kukreti, 6/7/2012

Bhishma Kukreti

*********हे दिदा !**********(म्यार पहाड़ कि व्यथा )



कवि - डा नरेंद्र गौनियाल

पाणि बोगी माटू बोगी ,बोगिगे मन्खी दिदा.
डालि -बूटी बि नि राली ,तब क्य होलू हे दिदा.
        गौं-गल्या सुनपट  ह्वैगीं,छनुड़ी रीति हे दिदा.
         डांडी-कांठी खरड़ी होलि,तब क्य होलू हे दिदा.
छोड़-तीरों पानौ घास ,पुन्गड़ी रुखड़ी हे दिदा.
सारी हर्बी बांजी होलि,तब क्य होलू हे दिदा.
          बल्द-भैंसी,गौड़ी ढांगी,हड्गी दिखेणी हे दिदा.
          ऐकि ली जालो कसाई,ठेला भरिकै हे दिदा.
बोडी-बोडा पहुँची गैनी, अस्सी-नब्बे हे दिदा.
एक दिन कडगच्च ह्वै जाला,तब क्य होलू हे दिदा.
          बिजुली पाणी,सब्बि धाणी,तौं खुणी च हे दिदा.
          ग्यूंकि दाणी पाणि हमखुण, ह्वैगे मुश्किल हे दिदा.
डांडी-कांठी गाड-गदनी,कनि छन किराणी हे दिदा.
डाली-बूटी ढुंगी-गारी, सब छन बगणी हे दिदा..
          गौं की दीबा अर भुम्या,रक् रके की छन देखणा.
           यखकु मन्खी कखगे सट्गी,हम यख क्या जि कराँ
देबतों की भूमि सैरी,आज रागसों ल़ा घेरी दे.
कंस-रावण जन्मी गैनी,अब क्य होलू हे दिदा.
          जौं मा सौप्यूं राज-पाट,ह्वैगेनी निख्वर्या दिदा.
          खांदा-पींदा कन भुखारा,पड़ीगीं यून्तई हे दिदा.
लदोड़ी दणसट कैरिकै बि,ल्यावा-ल्यावा छन बुना.
माटु बि भसगैली यूंन ,अब क्य होलू हे दिदा.
          यूंन दुर्गत कैरि हमारी,बांठी करणा छन दिदा.
           हर्चि जाली भै-भयात,तब क्य होलू हे दिदा.
वोट मंगदा,चोट करदा,टुकड़ा-टुकड़ा छन कर्याँ.
क्वी भग्यान ऐकि हमते,जोड़ी जांदू हे दिदा.
          डॉ नरेन्द्र गौनियाल....सर्वाधिकार सुरक्षित...


Bhishma Kukreti

श्रीमती बीछा देवी जी का गढ़वाली नाटकों में योगदान

प्रिय भाई कुकरेतीजी,

हाल में ही अखिल भारतीय उत्तराखंड महासभा चंडीगढ़ क्षेत्र के अध्यक्ष
दिनेश राणा की माता बीछा देवी जी का स्वर्गवास हो गया। बहुत कम लोगों को
पता है की स्व0 श्रीमति बीछा देवी जी चंडीगढ़ के गढ़वाली मतया मंच की प्रथम
महिला कलाकारों में से थी तथा उनका स्वाभाविक घरेलू महिला का अभिनय
चंडीगढ़ के उत्तरखंडी समाज में बहुत ही पसंद किया गया था। टिपिकल सास और
माँ  की भूमिकायों में बहिन बीछा देवी जैसा अभिनय पेशेवर कलाकार भी नहीं
कर पाएंगे ये मेरा मानना है। उनके बारे में और अधिक जानकारी भेजने की
कोशिश करूंगा।
श्रद्धांजली के रूप में उनको याद करते हुये आपसे विनती है कि ये सूचना
सभी को भेज दें।

धन्यवाद सहित ,
ड़ी ड़ी सुंदरियाल ,  शैल कुंज,  49, शिवालिक विहार jeekarpur

ddsundriyalchd@gmail.com

Bhishma Kukreti

Mwari: A Story about observing Garhwali Women from various angles

(Review of Garhwali Story Collection 'Mwari' (1986) by Durga Prasad Ghildiyal)

                              Bhishma Kukreti
   The story of 'Mwari' from Garhwali Story collection 'Mwari' is narrated in telling events styles and there are a couple of stories or events in the story. The events talk about admiration, pride, affection, struggles, conduct of women, the content of women and the behavior of male especially negative behavior towards women.
The story has many stories and the writer could not justify various events in the story. The story has various raptures in it. The stories observes Garhwali women from many angles

Reference-
1-Abodh Bandhu Bahuguna, Gad Myateki Ganga
2-Dr Anil Dabral, 2007 Garhwali Gady Parampara
3-Bhagwati Prasad Nautiyal, articles on Durga Prasad Ghildiyal l in Chitthi Patri
4-Dr. Nand Kishor Dhoundiyal, Garhwal Ki Divangat Vibhutiyan

Copyright@ Bhishma Kukreti, 6/7/2012

Bhishma Kukreti

चबोड़ इ चबोड़ मा           


                                          दुमुख्या गुरा 


                                           भीष्म कुकरेती



                अब सि द्याखदी ब्याळि भैर देस या उन्ना देस अ एक पत्रिका (टाईम्स  ) म अपण प्रधान मंत्री मनमोहन सिंग जी क काट करे गे त बी.जे. पी. क प्रवक्ता रवि शंकर जी  इन नाचणा, गाणा छया जां बुल्यां  यू मनिख पुळेक , खुसी मा प्रसन्नता से  बौळे गे होलू . रवि शंकर जी क बुल ण से गंध आणि छे कि  कि टाइम्स मग्जीन जु बि लिखद सै इ  लिखद. पण जब पूछे गे बल कुछ साल पैल यीं पत्रिका न अटल विहारी  वाजपई जी कु न लेखी छौ ट आप लोग बुलणा छ्या कि टाइम्स वाळ कबि सै लिखदा इ नि छन. रवि शंकर प्रसाद जीन जो बि जबाब दे उ बौगाणो बहाना  छयो.  कोंग्रेस वळु तै पूछे ग्याई बल यू क्या च त कोंग्रेसी बुलणा बल इनी अटल विहारी वाजपई जी क बारा मा बि छौ . अपण बारा मा जबाब नि दीण दुसरो पूठो गू बथाण.  क्या डबल स्टैण्डर्ड यांकुणि बुल्द होला? .

             अपणा उत्तराखंडअ मुख्यमंत्री विजय बहुगुणाबुलणा छन बल  बहुगुणा बंगाली छ्या. पण बहुगुणा वंशावली मा याँ पर बहस हुंई च कि जु बहुगुणा लोक बंगाली छया त बहुगुणौ कुलदेवी काली देवी ना गौरा देवी किलै च ?  अर जरूर श्रीमती रीता बहुगुणा जोशी लखनौ चुनाव मा बुल्दी होली कि ब्व़े त हमारी त्रिपाठी च . जरुरत बगत उळकाणु (उल्लू) तै बुबा बुलण यांकी बुल्दा होला?

    इन सुण्याण मा आई कि उत्तराखंड क्रान्ति दल का ऐरी जी कोंग्रेस का एजेंट ह्व़े गेन , अर भौत सा लोक ऐरी जी पर भगार (लांछन) लगाणा छन. अब बिचारा कब ऐरी जी तलक भूका तीसा राला अरे कुछ त खाणि द्याओ ऊं तैं.

          एकन  पूछ बल हमर पहाडो मा कृषि क्रान्ति किलै नि आणि च , सरकार किलै कुछ नि करणि च ? मीन ब्वाल बल जब नब्बे टका पुंगड़ो मालिक उन्नादेस ( परदेस ) मा ह्वाला त कृषि क्रान्ति क बात सुचण बेमानी इ होली.

कति रूणा छन बल पहाड़ो मा सिक्षा अर बतेरी चीज ठीक नि छन. मि बुल्दो बल ये भै पहाडो बात इ किलै हौरी जगा बि इनी जख्या- भंगुल जम्युं च

भंगुल  पर याद आई बल पैल जख्या क क्वी पूछ नि छे अब कुज्याण  जख्या क स्टेट्स किलै बढ़ धौं ?

मीन जब मंत्र तंत्र पर लेख लेखिन त कथगा इ लोग मै पर रुसेन कि मि अंध विश्वास तै बढ़ावा दीणु छौं. अर यि सौब तिसाला  गाँ जैक घड्यळ , टूण टण मण, गाड-गड्याळ  सौब पूजिक आन्दन.

            कुछ दिन पैलि एक उत्तराखंडी सामाजिक कार्यकर्ता मीम ऐक रूणा छया कि उत्तराखंडी संस्कृति ख़तम हूणि च अर हमारा लोग समजणा नि छन . अर यूंक वैलेंटाइन डे, फादर डे, मदर डे, क्रिस्चियन न्यू ईयर कुणि मेकुणि ग्रीटिंग कार्ड आन्दन पण गौ बुरी चीज च कि मकरैणि, बसंत पंचमी अर बिखोती क्वी ग्रीटिंग कार्ड आन्द ह्व़ावन  धौं .

   हमारा गढ़वळि लिख्वार सरकार तै गाळि दीन्दन बल सरकार गढ़वळि भासा बचाणो कुछ नि करणि च अर अपण बच्चों ब्यौवक न्योतो हिंदी मा छपवान्दन. सरकार तै एक नियल बणाण चएंद बल जु बि गढ़वळि लिख्वार सरकार तै गढ़वळि भाषा क अवहेलना बान गाळि द्याओ वै तै शादिक कार्ड गढ़वळि मा छपाण आवश्यक ह्वाओ निथर इन लिख्वार तै जेल मा बन्द करे जाओ.

  फेस बुक आज एक सच्चाई च अर इख मा लोक अपण अपण विचार धरदन. जादातर लोग पलायन तै गाळि दीणा रौंदन अर अपण बच्चों  तै अमेरिका या भैर देस भिजणो इंतजाम मा लग्यां रौंदन.. दुमुख्या गुरौ सैत इनी हूंद होला जु एक मुखान अहिंसा क गीत गांदा होला  अर हैंक मुखा न मूस-मिंड क घळकांदा होला. 

  एक मास्टर जी परेशान छ्या बल यार इ पटवरि घूस खांद अर उत्तराखंड मा भ्रष्टाचार बढ़ी गे अर अफु घीयक घंटी लेकी फेल नौनु तै पास बि करद.

   अमेरिका क अर्थ शास्त्री भारत अर ग्रीस (यूनान) क बारा मा परेशान छन बल इखाक राजनीतिग्य कामक नी छन अर यूं देसक  अर्थ व्यवस्था ठीक नी च. ये भै यि अपण अर्थव्यवस्था किलै नि दिखणा होला? गूणि अपण पूछ नि दिखदु अर बांदरौ बुलद बल तैकू पूँछ लम्बो च.


Copyright@ Bhishma kukreti , 10/7/2012

Bhishma Kukreti

*********फर्शी *********एक गढ़वाली कथा.



           कथाकार- डा. नरेंद्र गौनियाल


सफ़ेद धोती,सफ़ेद कुर्ता,कबरिणी-डबरिणी फतुगी अर कांधी मा लाल गमछा पंडजी पर खूब खिल्दु छौ.कपाल मा लगीं चन्दन की लाल-पीली पिठे त 'सून मा सुहागा'.खानदानी पंडित का साथ, इलाका का नामी-गिरामी मन्खी.कर्मकांडी होणा का कारण जात-पात को कुछ जादा ही ख्याल करदा छाया.उंकी अपणी एक अलग फर्शी छै.वै पर तम्बाकू कै हैंका तै नि खाणि दीन्दा छाया.मेहमानों का वास्त एक हैंकि फर्शी,अर एक चिलम-सजुडा  छौ.गस्त मा बि अपणि एक छवटि चिलमणि धरीं रैंदी छै.जजमान लोग,कामी-काजी सब्बि ऊंको भौत मान-सम्मान करदा छाया,पण जरा ऊंका च्व्ख्यापन से डरदा छाया.
           एकदा धन्नू लोहार कु नौनु घंतू छवटा नौन्यालोँ का दगड़ पिट्ठू खेलदा-खेलदा गिन्दू ल्य़ाणा का वास्त गलती से उंकी तिबारी मा चलि गे.वैका खुटन पंडजी  की फर्शी भुयां लट्गीगे.छवटा नौन्यालोंन हल्ला मचे दे अर य बात सरि गौंमा फैलिगे.पंडजी जब गश्त बिटि घार ऐनी  त य बात ऊंका कंदुणों मा चलिगे.ऊंतई भौत गुस्सा ऐ अर ऊंन धन्नू लोहार तै अपणा घार बुलाए.धन्नू बिचरु डरदु-डरदु ऐ अर वैन हाथ जोड़ी कै माफ़ी मांगी.वैन अपणु काल़ू टुपला पंडजी की खुट्यूं मा धरि कै बोलि,''ननु छवारा से गलती ह्वैगे.'' पण पंडजी नि माना अर बोले,''ईं फर्शी तै तू ही लीजा.अर एकी कीमत द्वी सौ तीस रुप्या दे दे.मि हैंकि ले औंलू.अब य फर्शी म्यार काम की नि रैगे.धन्नू बोले,''तुमारा ही लूण-गुड से पल्याँ   छौ.माफ़ करि द्या.'' पण पंडजी टस से मस नि ह्वाया अर ऊंन फर्शी धन्नू का तरफ चुटे दे..आंख्यूं मा डब्ब-डब्ब अयाँ आंसू फुंजदा-फुंजदा धन्नू फर्शी लेकि अपणा घौर चलिगे.द्वी सौ तीस रुप्या कख बिटि ल्यूं अचनचक... स्वच्दा-स्वच्दा वैकु ध्यान लुवनी कि हंसूळी पर चलि गे.घार ऐकि वैन हंसूळी सुनार मा बेचिकै पंडजी का रुप्या दे दीं.घंतू तै पकड़ी कै खूब चट्गे दे.अर बोले,''निकळ जा तू घार बिटि.तिन आज सरि गौंमा मेरी नाक कटै दे''. घंतू राति रूंदा-रूंदा बिन खाणु खयां ही सेगे.वैकि निंद बार-बार टुटी जाणी छै.ऊ यु ही स्वचणु रहे कि अब क्य करलू,कख जौंलू?
           रतबियन्य मा जनि धन्नू उठिकै दिसा-फरागत गै,घंतुन वैकी फतुगी का खीसा जपगे अर डेढ़ सौ रूप्या खसगे दीं..यु वैकी ब्वैकी हंसूळी बेची कै पंडजी का रूप्या देकी बच्यां छाया.जब तक धन्नू हाथ-मुख ध्वेकी कि ऐ तब तक घंतू चम्पत ह्वैगे.ऊ सुबेर जडाऊखांद बिटि छै बजी वळी बस से रामनगर चलिगे.पुछदा-पुछदा दिल्ली वळी बस मा बैठिकी ब्यखुन्या पांच बजी आनंदविहार बस अड्डा पहुँचीगे.वख जैकि वैकि आंखि रकरे गीं.वैकी समझ मा नि आई कि कै रास्ता भैर निकलूँ. आखिर कुछ मुसाफिरों का पिछ्नैं -पिछ्नैं ऊ भैर ऐगे.एक प्राईवेट बस वल़ो बुनू छौ,''सेवानगर,लोदी रोड,प्रेमनगर.'' वैन सूणि अर चट बस मा बैठिगे.कंडक्टरन पूछे,''कहाँ जाना है ?  घंतुन बोलि,''सेवानगर जाण,माधु भैजी का क्वाटर मा.'' कंडक्टर तै ख़ित्त हैंसी ऐगे. वैन घन्तु कु गिचु देखि अर वैन पांच रूप्या कु टिकट दे दे.
           सेवानगर मा उतरी कै ऊ फिर रिंगण बैठिगे इना-फुना,पण माधु दा कु क्वाटर नि मिलो.माधु वैकु ठुलू मामा कु नौनु छा जु एक सरकारी दफ्तर मा चपडसी लग्यूं.घर बिटि आन्द दा मारामारी मा ऊ माधु कु क्वाटर नंबर ल्य़ाणु बिसरिगे.रिंगदा-रिंगदा द्वी घंटा ह्वैगीं.हर्बी रुमुक पड़नि शुरू ह्वैगे.चरि तरफ चमाचम लाइट जळणी छै.वैन चलदा-फिरदा लोगोँ तै पूछी पण सब्युंन यी बोलि कि कै ब्लॉक मा,कतगा नंबर च ? आखिर घुमदा-घुमदा ऊ सेवानगर सब्जी मंडी मा पहुँचीगे.वख वैन देखि कि गढ़वळी भौत छन.वैते कुछ सहारो मिलगे.इना-फुना द्यखदा अचणचक वैते धनुली बौ टिमाटर बिरांद दिखेगे. ऊ चट वींका समणी ऐ अर बोलि,''सिमनी बौ.'' धनुली हकचक रैगे कि यु कु ऐगे.वींन वैतै नि पछ्याणि अर द्यखणि रै. वा स्वचणि रै कि कु होलू यु जलांगण.घंतुन बोले,''मि घंतराम छौं बौजी,गनधार  गौं कु.तुमरु द्यूरू'.'धनुली तै तब कुछ याद ऐ.वींन बोले,''हाँ रे तू तो तब भौत छोटा था,जब हम एकदा घार आये थे.अब तो तू जवान ह्वै गया है''.फिर वींन साग-पात ले अर घन्तु तै दगड़ मा लेकि क्वाटर मा ऐगे.भैजी तै सेवा लगौणा बाद वैन अपणि आप-बीती सुणाई अर बोले,''अब त मिन कतई घौर नि जाणु,मै तै अपणा दगड़ ही रखा अर कखि नौकरी पर लगाई द्या.माधुन बोले,'तू अबी छवतू छै.' पढ़ी-लिखी ले.घार चलि जा अर बाद मा ऐ जैलू''.घंतुन बोले,''भैजी अब त मि घौर कतई नि जण्या''. वैन ह्यळी लगाई दीं.धनुलिन वैते समझाईकि चुप कराइ दे.राति खाणु खैकी ऊ सेगे..आधा-राति मा स्वीणो मा ऊ बबणाणों छायो,''हमारू पिट्ठू बणिगे.मिन कुछ नि कारो,मै तै नि मारा.'' माधु अर धनुली कि निंद खुली त देखि कि घन्तु बबडान्दा हाथ-खुटा बि झट्गाणू छौ.माधुन वैतई हैंका हैड पडाळी दे.
           माधु की द्वी नौनि छै.दिन भर ऊ उंकी देखभा ळ करदू छौ.हर्बी ऊ धनुली का दगड़ काम-धंधा बि सीखी गे.धनुली चार-पांच महीना बाद फिरि हुण्या छै.कुछ दिन बाद त खाणु -पीणु,लत्ता-कपडा,झाड़ू-पोंछा सब कुछ घन्तु ही करदू छौ.पैली त वती गैस जा ल़ा नि बि नि आंदी छै,पा न अब ऊ एक्सपर्ट ह्वैगे.खुशकिस्मती से यींदा धनुली कु नौनु ह्वैगे.माधु अर धनुली कि ख़ुशी जनु कि घन्तु ही लेकि आई.घंतुन स्वीली कि सेवा-पाणि से लेकि पुरु घर समाळी दे.
             कुछ दिन बाद घंतुन बोलि कि भैजी मि तै कखि नौकरी मा लगाई द्या.माधुन बोले,''भुला घंतराम तू कुल आठ पास छै.जादा पध्यूं हूंदू,य फिर आई टि आई करीं हून्दी त नौकरी चट लगी जांदी,पण इनि हालत मा क्य होलू ?फिरबी तू फिकर नि कैर.मि कोशिश करदू.तीन साल तक घन्तु भाई-बौजी कि ही सेवा मा लग्युं रहे.तब माधुन घन्तु तै एक साब कि कोठी मा लगाई दे.यख वै तै खायी-पेकि पांच सौ रूप्या मिलणा शुरू ह्वैं.वै तै कोठी मा ही एक सर्वेंट क्वाटर मिलि गे.अब घन्तु का भला दिन शुरू ह्वैगीं.
              घन्तु अब अपणा ब्वे-बाब तै मन्योडर भ्यजण लगी गे.घन्तु का गौं का दगडया दस-बार मा फेल ह्वैकी सुद्दी लट्गीणा रैगीं अर ऊ गौं बिटि भज्युं छवारा मन्योडर भ्यजण लगी गे.जब-जब धन्नू लोहार मन्योडर फॉरम मा अंगुठो लगैकी रूप्या अपणि खीसी मा धर्दु छौ,तब-तब वैकि आंख्युं मा पाणि ऐ जांदू छौ.अपणा हाथों तै ऐथर कैरिकै ऊ द्यख्दु छौ कि यूंली ही मिन अपणो बाल़ो नौनु तै थींचु छौ.हस भरिकै वैकि आंख्युं मा पाणि ऐ जांदू छौ.वैन घन्तु का वास्त एक चिट्ठी भेजवाई,''तेरि ब्वे बुनी च कि मै तै अपणा घन्तु कि खुद लगीं.टक लगेकि  कुछ दिनौ वास्त घार ऐजा.''चिट्ठी पढ़ी कै घन्तु तै बि खुद लगी गे,पा ण गौं कु नौ सु णि कै जनि फर्शी कि याद ऐ , वैका बदन पर झर कांडा बबरी गीं.वैन जबाब भेजि कि मितै अबी छुट्टी नि मिलणी छन.
            कुछ दिनों का बाद घंत राम कि सेवा से खुश ह्वैकी साबन वै तै अपणी फैक्ट्री मा चौकीदार लगे दे.एक कमरा -कीचन वा ल़ो क्वाटर बि मिलि गे.अब त घन्तु  असली घंत राम बा णी गे.ऊ फैक्ट्री कि बर्दी मा भौत बढ़िया दिखेंदु छौ.हर्बी ऊ खूबसूरत जवान ह्वैगे.बैशाख का मैना वै तै इक्कीस साल पूरा ह्वैगे छाया.जात-बिरादरी का लोग अब वैका क्वाटर मा घुसी ण लगी गीं.ऊ स्ब्यों कि इज्जत-खातिर करदू छौ.जब भी माधु का क्वाटर मा जांदू छौ,वैका नौनूं का वास्त टॉफी,चौकलेट,सेब-संतरा जरूर लिजांदु छौ.माधु का पास अब घन्तु का बाना कतगे रिश्ता आणा शुरू ह्वैगीं.पण ऊ सब्यों तै टळणु रहे.दरअसल वैकि अपणी एक स्याळी छै,जेंका का  दगड़ ऊ घन्तु कु जंकजोड़ कन छंदु छौ.माधु कि ब्वारी धनुली कि जिद्द छै कि घन्तु कु ब्यो मेरी भुली चंपा का दगड़ ही कन..माधुन अपणी स्याळी सिलायी-बुनाई  सिखणा बहाना से दिल्ली अपणा पास बुलै दे.
           चंपा घार बिटि त सुद्दी आईं छै त्यूरण्या ह्वैकी,पण दिल्ली मा चार दिन मा ही वीं पर चल्क्वार ऐगे..गौंकि कळपट्ट छोरी का कुछ दिन मा ही गल्वडा लाल ह्वैगीं.वींतै ये साल सत्रह साल पूरा ह्वैगे छाया.ये बीच ऐतवार का दिन घंतु सेवानगर ऐगे.वैकि बौजिन बोलि कि मेरी ताब्यात कुछ ख़राब च.तू जरा सब्जी मंडी चलि जा ,साग-पात ले आ.मीत-माछी बि लेलु त ले ऐ.चंपा तै बि दगड़ लीजा.घूमी कि ऐ जाली वा बि.दीदी का बुन पर चंपा नयो सूत पैनी कि सेंत चिद्की कै दगड़ मा चलिगे.द्वी गप शाप लगन्दा चलि गीं.एक जगा मा घंतुन वींतै दूध-जलेबी खिलै.सब्जी लेकि आन्द दा चौकलेट बि खिलै. राति चंपा ही खाणु  बणाण लगी गे.बीच-बीच मा घंतु बि कीचन मा घुसेणु रहे.धनुली जाणि-बुझिकै बौगि ह्वैगे.खांद बगत माधुन मजाक करे कि आज त घंतु रे ! खाणु कुछ जादा ही स्वादिस्ट हुयूं.घंतु बात समझी गे अर चंपा बि शर्मैकी किचन मा चलिगे.खाणु खैकी कुछ देर बाद घंतु अपणा घौर चलि गे.राति बड़ी देर तक वैतै निंद नि आई. वैकि आंख्युं मा रात भर चंपा ही रिंगणी रहे.अर यख चंपा का हाल बि कुछ  इनि छाया.राति बड़ी देर तक वल्या-पल्य हैड पलटणी रहे.सुबेर बिन सियाँ वींकी आंखि कुछ लाल सि हुईं छै.
             अब त घंतराम हर इतवार चंपा तै मिलणा बाना माधु का घौर चलि जांदू छौ.कब्बि त बीच मा बि ऐ जांदू छौ.चंपा तै बि हर इतवार कि इंतजारी रैंदी छै.माधु अर धनुली ईं बात से खुश ह्वैगीं कि घंतु अर चंपा एक दूसरा तै पसंद करदीं.कुछ दिन बाद माधुन घंतु का बूबाजी तै बुलैकी द्वीयोंकु रिश्ता पक्कू करि दे अर दशहरा का दिन दिल्ली मा ही ब्यो बि ह्वैगे.घंतु घर-गृहस्थी मा रमी गे.चंपा वै तै मनपसंद ब्वारी मिलिगे.द्वी साल बाद वैकु नौनु ह्वैगे.हर्बी तनखा बि भलि ह्वैगे.अब ऊ एक इज्जतदार आदिम बणीगे.
           दिल्ली मा गौं का प्रवासी बंधुओं कि संस्था''विकास समिति लमधार''को वै तै उपमंत्री बणये गे.महीना कि हर मीटिंग मा ऊ जांदू छौ.एक दिन जब ऊ मीटिंग मा गए,तब वै पता चलि कि गौं बिटि पंडितजी एक जजमान का घौर अयाँ छाया.दूसरा जजमान का क्वाटर मा जांद बगत बस से उतरंद दा भुयां पडिगीं अर कपाळ मा भौत चोट लगीगे.ल्वे-खाळ हालत मा अस्पताळ भर्ती कर्यूं.अब्बी ऊ सफदरजंग मा इमरजेंसी मा छन.ल्वे भौत गिरण से हालत खराब च.डाक्टर खून कि व्यवस्था का बान बुना छन.मीटिंग बंद करि कै सब लोग ऊंतई द्यखणो चलि गीं.पंडत जी अबी बेहोश पड्यां छाया.खून दीणकि बात सूणी कि कुछ लोग खिसगी गीं. अपणो बौंल़ू उब कैरि घंतुन डाक्टर से बोलि,''मेरी खून निकाल़ा,जतगा चएणी''.देखा -देखि कुछ हौरि बि तैयार ह्वैगीं,पण बाकी लोगोँ कु खून मेल नि कारो,सिर्फ घंतु कु खून मैच करि.घंतु कि एक यूनिट खून पन्डतजी तै चढ़ीगे.वैका बाद घंतु अपणा क्वाटर मा चलिगे.
           कुछ दिन बाद पंडितजी ठीक ह्वैकी अपणा एक जजमान का घर आर के पुरम ऐगीं.जब ऊं तै पता चलि कि घंतु  का खून से उंकी जान बचि त ऊंका आंख्युं मा डब्ब-डब्ब पाणि ऐगे.भौत साल पैली करीं अपणि गलती पर ऊंतई खुद से नफरत सि ह्वैगे.ऊ तुरंत शाम दा घंतु का क्वाटर मा एक डब्बा मिठाई लेकि पहुँची गीं.क्वाटर मा पहुँची कि घंतू तै भट्ट अंग्वाळ डाळी दे.घंतू अर पंडितजी द्वीयों कि आन्ख्यों मा पाणिकि धार ऐगे.पंडित    जिन बोलि,''बेटा मि तै माफ़ करि दे.' तेरो यु एहसान मि....'' घंतुन बोलि,''इन ना बोला.आप हमारा पूज्य छन.मिन क्वी एहसान नि करि.यु त मेरो फर्ज छा.मि आज जु कुछ बि छौं सिर्फ आप कि कृपा से छौं.'' पंडितजिन बोलि,'' ना ना ब्यटा मि तै अब जादा शर्मिंदा नि कैर..तेरो यु एहसान मि कबी पुरु नि करि सकदु.'' घंतुन बोलि,''एहसान त आपन करि मी पर.तुम फर्शी का बाना बबंडर नि करदा त मेरो बुबन मीतै नि मरणू छौ, तब मिन भाजि कै दिल्ली नि औणु छौ.अपण बुबा का दगड़ अनस्यळ मा ही घैण लगाणु छौ.भाजि कै ऐग्युं त एक गफ्फा ठीक से खाणू छौं.
            कुछ दिन बाद पंडित जि गौंमा वापस ऐगीं.ऊ एक डब्बा मिठाई कु धन्नू लोहार का घर बि लेकि गैनी अर बोलि कि, ''धन्नू मेरि फर्शी मी तै दे दे.मेरी आंखि खुलि गैनी..मी अपणि गलती पर भौत शर्मिंदा छौं''.ऊंन एक हजार रूप्या धन्नू का खीसा मा धरीं अर खटुली मूड़ धरीं फर्शी तै लेकि अपणा घौर चलिगीं.अब पंडितजि रोज तिबारी मा बैठि कै खुटी मा खुटी धरि गुड़-गुड़-गुड़ लग्यां रंदीन.
             डॉ नरेन्द्र गौनियाल..सर्वाधिकार सुरक्षित...     

Bhishma Kukreti

************चुप बि कारा,मानि जावा.************(जनसँख्या वृद्धि अर लिंग भेद पर एक रैबार )



कवि- डा, नरेंद्र गौनियाल


एक द्वी ही भौत छन,नौनु हो या नौनि दा.
होलि मुश्किल सैंतणा की,निथर तब हे दिदा.
             बिंडी ह्वाला तब क्य खाला,पुट्गी राली खाली दा.
              सबि नंगा-भूखा उन्नी राला,तब क्य होलू हे दिदा.
ल्यखणु-पढणु, झुल्ला-गफ्फा,आलो कख बिटिकी रे.
फिर एक बन्दा अर सौ धंधा,तब क्य होलू हे दिदा.
               भर्ती हूणू इस्कुलों मा,ह्वैगे मुश्किल यूं दिनों.
                ढेबरा-बखरा ही चराला,नौनि-नौना हे दिदा.
नौनि-नौनु एक ही छा,फरक तुम कुछ नी करा.
एक नौना का ही बाना,थुपड़ी नौन्युंकि ना लगा.
                छैंयी पडीं गलोड्यों मा वींकी,आंखि बैठीं क्वार छन.
                 फिर एक बि हैंकु ह्वै जालु,तब क्य होलू हे दिदा.
मेरि बात सूणि ल्यावा, टक लगैकी ध्यान से.
हाथ ज्वड़दू चुप बि कारा,मानि जावा हे दिदा..
               डॉ नरेन्द्र गौनियाल ...सर्वाधिकार सुरक्षित