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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti

चबोड़ इ चबोड़ मा 'घचकाण'


                                     जिंदा  गढ़वळि साहित्यकारों  हंत्या पूजै 


                               भीष्म कुकरेती



पुछेर (थाळि माँगक पील चौंळ सुंगद ) -  ओम नमो गुरु को आदेस .... आप पौड़ी बिटेन खबर सार का सम्पादक विमल नेगी छन ?

विमल नेगी - जी माराज

पुछेर, बक्की ( घुण्ड हिलैक)  - आप पर भगवती प्रसाद नौटियाल जीक  हंत्या लगीं च.

विमल नेगी - पण माराज मी ह्वाई नेगी अर भगवती प्रसाद जी ह्वाई नौटियाल. अर  हंत्या त परिवारौ  लोगूँ आन्द

पुछेर, बक्की - आप पर साहित्यिक हंत्या लगीं च. आप सौब लोग साहित्यिक कुटम का छंवां

विमल नेगी - पण माराज हंत्या त मोर्याँ  लोगूँ आन्द. अपण नौटियाल जी त क्या सुन्दर छन , बिलकुल तंदुरस्त छन . अचला नन्द जीक दगड गढवाली शब्दकोश प्रकाशन कि तैयारी करणा छन.   पण माराज यि नै किस्मौ हंत्या कैन पुजण . कख छन जागरी जु ज़िंदा मनिखौ हंत्या पूजन?

पुछेर, बक्की -  या कळगुगि हंत्या च. जाओ गढवाल भवन मा जाओ उख ज़िंदा गढ़वळि साहित्यकारों हंत्या पूजै  हुणि च.

[ विमल नेगी क गढ़वाल भवन क तर्फां जाण ]

विमल नेगी- चलो उना इ जये  जाओ जख ज़िंदा साहित्यकारों हंत्या पूजै च

                                        [गढ़वाल भवन को चौक मा भीड़ लगिं  च ]

एक दर्शक - यि कनफणि सि हंत्या घड्यळ उरयूँ च .

हैंको दर्शक - हाँ भै  हंत्या ज़िंदा मनिखों  अर जागरी छन भग्यान स्वर्गवासी लोग

तिसरु दर्शक - हाँ सि द्याखो ना जागरी छन स्व. अबोध बंधु बहुगुणा अर थाळि बजौण वाळ छन  गोविन्द चातक अर भौण पुजण वाळु मा छन डा. हरि दत्त भट्ट शैलेश, डा. शिवा नन्द नौटियाल आदि आदि सौब भग्यान हुंयाँ  छन.

अबोध बंधु बहुगुणा डौञरु ब्जान्दन अर  डा. गोविन्द चातक थाळि छणकांदन

अबोध बंधु बहुगुणा - भै जै जै तै डौर लगदि ह्वाऊ या आलोचना सहन नि  करी सकदा ह्वावन ओ भैर चली जवान . आज दुनिया मा पैलि दै ज़िंदा लोगूँ  हंत्या पूजै  हुणि च अर हम सौब जागरी अर भौणेर स्वर्गवासी छंवां.

[कुछ लोग भैर चली जान्दन ]

अबोध बंधु बहुगुणा --


ओ ध्यान जागि जा

गरीबी का मरयाँ गढवाली साहित्यकार को  ध्यान जागि जा

डा. हरि दत्त भट्ट शैलेश, डा. शिवा नन्द नौटियाल आदि आदि  (भौण पुजदन ) -ओ ध्यान जागि जा

अबोध बंधु बहुगुणा -- ओ अपण बाड़ी पळयो खैकी भाषा सेवा का भड़ को ध्यान जागि जा

डा. हरि दत्त भट्ट शैलेश, डा. शिवा नन्द नौटियाल आदि आदि (भौण पुजदन ) -भाषा सेवा का भड़ को ध्यान जागि जा

अबोध बंधु बहुगुणा --वो प्रकाशक को थिन्च्याँ  गढवळी साहित्यकार को ध्यान जागि जा

डा. हरि दत्त भट्ट शैलेश, डा. शिवा नन्द नौटियाल आदि आदि (भौण पुजदन ) - ओ गढवळी साहित्यकार को ध्यान जागि जा

अबोध बंधु बहुगुणा -- ओ सरकारी  अवहेलना का मरयां , पिट्यां  साहित्यकार को   ध्यान जागि जा

डा. हरि दत्त भट्ट शैलेश, डा. शिवा नन्द नौटियाल आदि आदि (भौण पुजदन ) - मरयां , पिट्यां साहित्यकार को ध्यान जागि जा

अबोध बंधु बहुगुणा -- ओ अपणो इ समाज से तिरयां, दुतकर्याँ  गढवळी साहित्यकार को ध्यान जागि जा

डा. हरि दत्त भट्ट शैलेश, डा. शिवा नन्द नौटियाल आदि आदि (भौण पुजदन ) -तिरयां, दुतकर्याँ  साहित्यकार को ध्यान जागि जा

अबोध अबन्धु बहुगुणा - हिंदी , अंग्रेजी की धौंस का रुवयां गढवळी साहित्यकार को ध्यान जागि जा

डा. हरि दत्त भट्ट शैलेश, डा. शिवा नन्द नौटियाल आदि आदि (भौण पुजदन ) -धौंस का रुवयां गढवळी साहित्यकार को ध्यान जागि जा

अबोध बंधु बहुगुणा (जोर से )  --  ओ भाषा संस्थान को अनुदान जागि जा 

डा. हरि दत्त भट्ट शैलेश, डा. शिवा नन्द नौटियाल आदि आदि (भौण पुजदन ) - अनुदान जागि जा 

अबोध बंधु बहुगुणा (हौर जोर से )- संस्कृति विभाग कि कृपा जागि जा

डा. हरि दत्त भट्ट शैलेश, डा. शिवा नन्द नौटियाल आदि आदि (भौण पुजदन ) - कृपा जागि जा , कृपा जागि,  जागि जा

अबोध - हाँ त मेरा सुणदेरा ! अब जागर कथा चातक जी अर नौटियाल जी सुणाला

गोविन्द चातक - ओ जैन्तो बार मा अभिमन्यु रुपी गढ़वळि भाषा  तै मारणो  चक्र व्यूह रच्यूं च 

भौणेर - व्यूह रच्युं च,

चातक - अभि मन्यु का समणि कौरवों का क्वी भड़ नि टिक साकू 

भौणेर -क्वी भड़ नि टिक साकू 

शिवानन्द नौटियाल - तब जैन्तो बार मा बाळा अभिमन्यु तै सात जोधाउं न मारी दे

एक पर हंत्या आई - (वै तै धुपण सुंगये जाणु च . ) ये दिदाओं . वो कु कु जोधा छ्या जौन इकदगड़ी अभिमन्यु मारे ?

विश्वम्बर चंदोला - पैलो जोधा छयो ब्रिटिश राजशाही जैन गढवाली रुपी अभिमन्यु की साँस रोकी.

भौणेर - गढ़वळि कि साँस रोकी

सदानंद कुकरेती - अंग्रेजी की धौंस  दुसरो जोधा छयो जैन  गढ़वळि कि मौणि मड़काई

भौणेर -गढ़वळि कि मौणि मड़काई

शिव नारायण सिंग बिष्ट - तिसरो जोधा भारतीय सरकार न  भंयकर रूप मा हिंदी का बाण  गढ़वळि कि छाती मा मारिना

भौणेर -गढ़वळि कि छाती मा बाण मारिना

भजन सिंग सिंग - चौथो जोधा छयो उत्तर प्रदेश को शासन  तैन गढ़वळि का हथ खुट तोड़ीन

भौणेर -गढ़वळि का हथ खुट तोड़ीन

हरि दत्त भट्ट शैलेश- पंचों जोधा छयो उत्तराखंड शासन जैन गढ़वळि का घुण्ड मुंड फोड़ीन

भौणेर -गढ़वळि का घुण्ड मुंड फोड़ीन

सबि [एक दगड़ी ]- अर सातों जोधा छयो गढ़वाली समाज जैन   गढ़वळि  भाषा तै तिराई , भगाई, लत्यायी

सबी [एक दगड़ी ] औ इन मा गढ़वळी  रुपी अभिमन्यु मारे ग्याई

गढ़वळी रुपी अभिमन्यु मारे ग्याई

भौणेर - अपडो न अपड़ो तै लात मारी

केशव अनुरागी  - ये दिदा भिलन्कार पोड़ी गे, दैसत पोड़ी गे. कुंती बुल्दी बल कनो बाळि  उमर मा अपणो न इ अपण तै मारि .

[इथगा मा दर्शक दीर्घा बिटेन एक दर्शक पर  हंत्या आई ]

अबोध बंधु बहुगुणा - ये पौन माराज अपणो घौर च कैको नुकसान ना करी . तेरी पूजा होली. त्वे तै  से प्रशंशा पत्र  कि बळि द्योला मानि  जा पौन दिबता ..

भौणेर - मानि जा पौन दिबता .

अबोध बंधु बहुगुणा - अपणो नाम बथा, अपणो कुल बथा, अपणो लालसा बथा . तेरी जळकटे होली .

भौणेर -पौन दिबता अपणो नाम बथा, अपणो लालसा बथा

जीत सिंग नेगी - मी जीत सिंग नेगी छौं . नई नई कज्याण्यु बिगरौ मा जन बुल्यां सौब में बिसरी गेन . म्यरा कैसेट नी  छन त क्या मी गितांग नि छौं /  क्या इतियास मै से यि पूछल बल मीन इथगा गीत लेखिन अर फिर गैबि छन पण चूंकि   मेरा नया ज़माना का हिसाब से कैसेट नि ऐन त मि गितांग इ नि छौं ?

भजन  सिंग सिंग - भुला जीत सिंग ! जब तलक  ये संसार मा  सूरज रालो त्यरा नाम गढ़वळी  संसार मा रालों .  धष्माना जी अर तुम   इ वो जोधा छंवां जौंका  रिकोर्ड पैलि बार रिकोर्ड ह्वेन  पौन दिबता मानि जा

भौणेर - जब तलक सूरज रालो जीत सिंग जीको  नाम गढ़वळी संसार मा रालों

दर्शक दीर्घा से बालेन्दु बडोला  को पौन - होई होई मोरि  ग्यों मोरि  गयौं . मि बालेन्दु बडोला  छौं .  क्वी सुणदेर नी च, क्वी पूछंदेर नी च.

भौणेर -गढ़वाली भाषा  थौळ मा क्वी सुणदेर नी च, क्वी पूछंदेर नी च

भौणेर - क्वी सुणदेर नी च, क्वी पूछंदेर नी च

भौणेर -  क्वी पूछंदेर नी च

डंडरियाल भौणेर - ओ दिदा बालेन्दु  ! इन कठोर बचन ना बोल.  , भुला तन ना बोल

भौणेर -  भुला कठोर  बचन  ना बोल

बालेन्दु  कु पौन - ओ जब भीष्म कुकरेती तै खबर सार मा एक ना द्वी दफैं पूछे गे. ऊं पर संदेह करे गे कि तुमन सची इथगा ल्याख त मेरो क्या हाल होला

भौणेर -त मेरो क्या हाल होला , त मेरो क्या हाल होला

महावीर गैरोला भौणेर - ये पौन दिवता इन क्या होई ग्याई जु तू पौन रूप मा आई गेयी

भौणेर -पौन रूप मा आई गेयी

बालेन्दु बडोला  कु पौन - खबर सार मा भीष्म कुकरेती भगार लगाये गे बल भीष्म कुकरेती झूट बोलणु च कि वैन बारा सौ तेरा सौ से जादा लेख लिखेन .

भौणेर -बारा सौ तेरा सौ से जादा लेख लिखेन

बालेन्दु बडोला - अर वो बि इलै कि भीष्म कुकरेती क क्वी किताब नी छपी. 

भौणेर-बारा सौ तेरा सौ से जादा लेखुं क बाद बि  क्वी किताब नी छपी. क्वी किताब नी छपी

डंडरियाल भौणेर - पण भुला या त कुकरेती कि परेशानी च

भौणेर-कुकरेती कि परेशानी च , तेरी परेशानी नी च

बालेन्दु बडोला कु पौन [डौञड्या नरसिंग का विकराळ रूप मा ] -  फूं , फूं ,फूं  फ्वां ,फूं फ्वां 

शिव नारायण सिंग बिष्ट - ये पौन माराज अपनों भेष   मा आ   .सांत ह्व़े जा माराज

भौणेर- औ औ सांत ह्व़े जा माराज , अपणो  मिजाज मा आओ माराज .

शिव नारायण सिंग बिष्ट -तुमारि ल़ाळसा   क्याच माराज

बालेन्दु बडोला कु पौन- मीन बि पचास से बिंडी कथा लेखिन, पत्रिकाओं मा छपैन 

भौणेर-पचास से बिंडी कथा लेखिन

भौणेर- पत्रिकाओं मा छपैन 

बालेन्दु बडोला कु पौन-  अर अब नरेंद्र कठैत  सरीखा युवा जोधा मै से सवाल कारल कि मैन क्या लेखी ? अर मेरो लिख्युं पर संदेह कारल त मै पर क्या बीतली !

भौणेर- इथगा लिख्युं पर संदेह कारलु

भौणेर- मै पर क्या बीतली !  जिकुड़ी जौळळि

भौणेर-जिकुड़ी जौळळि

जबर सिंग कैंतुरा, मोहन लाल ढौंडियाल अर ललित केशवान का पौन नाचण मिसे गेन

जबर सिंग कैंतुरा - मि जबर कैंतुरा छौं अर मेरी किताब नी छपीं त क्या  मि गढ़वळि  कथाकार नि छौं ?

मोहन लाल ढौंडियाल - मीन बि कथा पत्रिकाओं मा छपाईन .पण किताब नि आई

भौणेर- अपड़ो न अपड़ो तै मार . बथा केशवान जी क्या बिपदा च ?

केशवान कु पौन - मेरी बि कथा छपीं छ्न. पण किताब क्वी नि छपी 

भौणेर- औ औ किताब क्वी नि छपी 

केशवान - कठैत सरीखा मै तै पूछल कि मीन कुछ नि ल्याख त मै पर क्या बीतली ?

भौणेर- औ औ मै पर क्या बीतली ?

अर्जुन सिंग गुसाईं भौणेर-मि अर्जुन सिंग गुसाई भर्वस दिलांदु बल गढ़वळि कथाओं मा  केशवान को नाम  रालो

भौणेर- औ औ कथाओं मा केशवान को नाम रालो

केशवान (रुंद रूंद )  - ना मेरी क्वी किताब छप, नाइ इ कथा मेरा पास छन

भौणेर- औ औ नाइ इ कथा मेरा पास छन

केशवान ( भाकोरा भाकोरिक  रूंद ) - अपण कठैत सरीखा क्वी नवाड़ी  भड़ शक्क कारल त क्या होलू ?

भौणेर- औ औ नवाड़ी भड़ शक्क कारल त क्या होलू ?

अर्जुन सिंग गुसाईं -  कवा ककड़ान्दन ढाकरी चलदा रौंदन

भौणेर- औ औ  कवा ककड़ान्दन ढाकरी चलदा रौंदन

भजन सिंग सिंग -- ये कथाकारों सांत  ह्व़े जाओ.  किताब छप या ना छप तुमारो मिळवाग क बड़ी  बडै होलि

भौणेर- औ औ किताब छप या ना छप तुमारो मिळवाग क  बडै  होलि

भौणेर- कठैत की बात से याद आँदी बल  अपड़ो न अपड़ो तै मार .

शिव नारायण सिंग बिष्ट - माध्यम बदलदा रौंदन पण मिळवाग त मिळवाग होंद. माध्यम क्वी बि ह्वाओ अंशदान त अंशदान होंद.

भौणेर- कठैत की बात से याद आँदी बल अपड़ो न अपड़ो तै मार .

अबोध बंधु बहुगुणा - सांत ह्व़े जाओ ये सौब पश्वा माराज

भौणेर- कठैत की बात से याद आँदी बल अपड़ो न अपड़ो तै मार .

जाय लाल वर्मा ---आधुनिक गढ़वाली काव्य तू जाग . त्यरो ध्यान  जागी जा

आधुनिक गढ़वाली काव्य का भौं भौं ब्युंत तू जाग

आधुनिक  गढ़वाली कथा तू जाग

आधुनिक  गढ़वाली नाटक तू जाग

आधुनिक गढ़वाली समीक्षा तू जाग

आधुनिक गढ़वाली व्यंग्य तू जाग

आधुनिक गढ़वाली निबंध  तू जाग

आधुनिक गढ़वाली साहित्य का  भौं भौं ब्युंत  तू जाग

भौणेर -  साहित्य का सबि ब्युंत जाग , युंका ध्यान जागि जा

गुणा नंद जुयाल - प्रकट ह्व़े जान, प्रकट ह्व़े जान भौंभौं  किस्मौ का ब्युंत  प्रकट ह्व़े जान,

भौणेर - औ औ भौंभौं किस्मौ का ब्युंत प्रकट ह्व़े जान,

मदन डुकलाण कु पौन - मै छयो मेरा दामी निंदरा  भुल्युं

अर मेरा दामी मै छयो सियूँ

झलकारा बेडशीट , झलकारा कौट

अर मेरा दामी तुइन लगाए  पराज   

भौणेर - औ औ अर मेरा दामी तुइन लगाए पराज   

तारा दत्त गैरोला - प्रकट ह्व़े जैन , प्रकट ह्व़े जैन , सम्पादकीय ब्युंत प्रकट ह्व़े जैन

भौणेर - औ औ सम्पादकीय ब्युंत प्रकट ह्व़े जैन

ललिता वैष्णव  - संपादकों का भड़पन तू जाग

जाग जाग रे संपादकों का निस्वार्थ सेवा तू जाग

पुंगड़ी पाटळि बेचीं , लौड़ गौड़ नि  देखी ,

हे संपादको का त्याग तू जाग

भौणेर - औ औ अपड़ो ना अपड़ो तै मारी

अलग भौण का भौणेर - औ औ हे संपादको का त्याग तू जाग

अर्जुन सिंग गुसाईं - धाद का ध्यान सौंजा

चिट्ठी पत्री को ध्यान सौंजा,

गढ़ ऐना को ध्यान सौंजा,

अन्ज्वाळ को ध्यान सौंजा,

बुरांस को ध्यान सौंजा

गढ़वळी धाई को ध्यान सौंजा

रन्त रैबार को ध्यान सौंजा 

खबर सार को ध्यान सौंजा 

भौणेर - आजक  सबि गढवळि पत्रिकाओं क ध्यान सौंजा

भौणेर -  आज का सबि संपादकों का ध्यान सौंजा

दामोदर प्रसाद थपलियाल - हिंदी की आंचलिक पत्रिकाएं जु गढवळी तै मजबूत करणा छन कु ध्यान सौंजा

शिखरों के गरजते  स्वर को ध्यान सौंजा


पराज को ध्यान सौंजा

शैलवाणी को ध्यान सौंजा

गढ़ जागर को ध्यान सौंजा

अर्जुन सिंग गुसाईं - हे ज़िंदा पितरों !  कैको नाम रै गे हो त माफ़ कर्याँ माराज

भौणेर - औ औ ज़िंदा पितरों माफ़ कर्याँ माराज

बिगळयाँ  भौण का भौणेर - कठैत की बात से याद औंद  बल अपड़ो न अपड़ो तै मार .

मदन डुकलाण कु पौन - कु सुणलु मेरी बात ?

भौणेर - औ औ कु सुणलु मेरी बात ?

जाय कृष्ण उनियाल  - मि फ्यूंळी पत्रिका का कु सम्पादक  जय कृष्ण उनियाल सुणलु तेरी  बात

लोकेश नवानी को पौन (झिंग्री लेक )- धाद कु मि लोकेश . कु सुणलु मेरी बात ?

दामोदर थपलियाल - मि रान्को कु सम्पादक दामोदर थपलियाल सुणलु तेरी बात

इश्वरी प्रसाद उनियाल कु पौन - मि पैलो दैनिक गढ़ ऐना अर रंत रैबार कु सम्पादक इश्वरी प्रसाद उनियाल छौं. कु सुणलु मेरी बात ?

सकुंत  जोशी - मी रैबार कु सकुंत  जोशी छौं मि सुणलु तेरी बात

पूरण पंत - मि गढ़वाली धाई कु सम्पादक पूरण पंत .कु सुणलु मेरी बात ?

सतेश्वर आजाद - मि मैती कु सम्पादक सतेस्वर  आजाद . मि सुणलु तेरी बात

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार .

सदानंद कुकरेती - विशाल कीर्ति की जय हो . मि सबि संपादको तर्फान सदानंद कुकरेती आपसे अरज करदो कि आप तैं क्या दुःख च . आपकी क्या लाळसा रै ग्याई ये मेरा सौंजड्या जरा सुणाओ त सै

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार

सबि इकी भौण मा -  नरेंद्र कठैत  अपणी किताब 'लग्यां छां' (२००८) मा लिखदन बल 'पिछ्ल्या लंबा टैम बिटि गढवळि  साहित्यकार , पत्रकार बडा भै विमल नेगी गढवळि पाक्षिक 'उत्तराखंड खबर सार ' मा कुणा कुमच्यरो बिटि' नौ का कालम मा छपणा छन. गढ़वाली भाषा साहित्य पर विमल भै कि लगन अर मेहनत भौत कुछ सिखलाणि च . वूंका देखा देखी हौरी आंचलिक पत्र पत्रिकौन बि गढवळि व्यंग्य छपण सुरु कर याली ."

अर्जुन सिंग गुसाईं - घोर अन्याय. घोर अन्याय . हिलांस मा त गढवळि व्यंग्य छपदा छया. हिलांस से व्यंग्यकारो विज्वाड़ पैदा ह्व़े  पत्रिकाओं दगड घोर अन्याय

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार . अपडो न अपडो पर अन्याय  कार

लोकेश नावानी कु पौन (डौञड्या नरसिंग आंदो  ) हु हु धाद से त व्यंगकारो की फ़ौज खड़ी ह्व़े 

पराज कु विनोद  नेगी अ पौन -  फूं फूं फ्वां फ्वां !  पराज का  गढवळि व्यंग्यों से त सभाओं मा बहस सुरु ह्व़े.

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार . अपडो न अपडो पर अन्याय कार

इश्वरी प्रसाद उनियाल कु पौन (हथ मा खुन्करी अर तलवार लेकी अपण छाती पर कटांग लगान्द लगान्द. ल्वे का छींटा .. ) झूट सब झूट . बेज्जती, सरासर बेज्जती, तौहीन . तिरस्कार

भौणेर -बेज्जती, सरासर बेज्जती, तौहीन . तिरस्कार

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार . अपडो न अपडो कि बेज्जती कार

भौणेर -अपडो न अपडो कि बेज्जती कार

इश्वरी प्रसाद उनियाल कु पौन ( अब गरम ज़िंदा कवीला  बुकांद बुकांद ) - दैनिक गढ़ ऐना मा रोज व्यंग्य छ्पदो छौ

भौणेर -दैनिक गढ़ ऐना मा रोज व्यंग्य छ्पदो छौ

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार

इश्वरी प्रसाद उनियाल कु पौन ( उछळि उछळिक ) - दैनिक गढ़ ऐना मा रोज व्यंग्य चित्र छ्पदो छौ

भौणेर -दैनिक गढ़ ऐना मा रोज व्यंग्य चित्र छ्पदो छौ

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार

इश्वरी प्रसाद उनियाल कु पौन (डाळ बूट इना उना ल्हसोर्दु  )  हू हू झूट सौब झूट . गरजते स्वर अर रंत रैबार मा खबर सार से पैलि व्यंग्य छपणा रौंदा छया

भौणेर -खबर सार से पैलि व्यंग्य छपणा रौंदा छया

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार

मदन डुकलाण  (मुंड  झिंगरैक , झुल्ला फाडिक ) - चिट्ठी पत्री मा त व्यंग्य छपणा इ रौंदा छा. घोर अपमान . घोर अपमान

भौणेर -घोर अपमान . घोर अपमान

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार

पूरण पंत पथिक- मि पथिक छौं, म्यरा क्थ्गासम्पाद्कीय व्यंग शैली मा छन . बेज्जती , बेज्जती

विश्वम्भर दत्त चंदोला - हे माराज !  सबि सम्पादक सांत ह्व़े जाओ. 

भौणेर -सबि सम्पादक सांत ह्व़े जाओ. 

विश्वम्भर दत्त चंदोला - इतिहास तुम तै कबि नि बिसरल. मनिख हाड मांस को पिंड च . गलती सब्युं से हुंद. कठैत जी से गलती ह्व़े गे होली.

भौणेर -इतिहास तुम तै कबि नि बिसरल

शिव नारायण सिंग बिष्ट - औ औ समीक्षा को धुरंदरो कु ध्यान जागि जा

ओउम गुरु का आदेस . समीक्षा को धुरंदरो कु ध्यान जागि जा

काव्य समीक्षा को ध्यान जाग

गद्य समीक्षा को ध्यान जाग

सबि ब्यूँतों की समीक्षा को ध्यान जाग

भौणेर - समीक्षा को धुरंदरो कु ध्यान जागि जा

भगवती प्रसाद नौटियाल कु पौन ( झिन्ग्रांद , झिन्ग्रांद ,) यो ठीक नि ह्व़े मीन माफ़ नि करण . या त क्वी समीक्षा नि ह्वेई

भौणेर - या त क्वी समीक्षा नि ह्वेई

नरेंद्र कठैत  कु पौन - हाँ यू ठीक नि ह्वेइ

हरीश  जुयाल कु पौन - हाँ या त क्वी बात नि ह्वेई

भगवती प्रसाद कु पौन ( झिन्ग्रांद , झिन्ग्रांद ,) हाँ यो ठीक नि ह्वेई. जिकुडि जळि गे 

भौणेर - कौन देस से आई . जटा फिर्काई . गाज्न्तो बाज्न्तो कौन कौन देस से आई

भगवती प्रसाद कु पौन ( झिन्ग्रांद , झिन्ग्रांद ,)- मै भगवती प्रसाद नौटियाल छुं.

भजन सिंग सिंग - सांत माराज , सात माराज . अपणी लाळसा ब्वालो माराज

भगवती प्रसाद कु पौन ( झिन्ग्रांद , झिन्ग्रांद ,)- ये भीष्म कुकरेती न मै आलोचक कि तलवार से घैल करी.

गोविन्द चातक - गुरु जी , आलोचना  तलवार बौणिक घैल करदी इ च. आपन बि कबि आलोचना की तलवार  से कतल्यो त करी होली कि ना.

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार. आलोचना की तलवार से कतल्यो कार

हरीस जुयाल - अरे गौणि गाणिक त एकाद भूमिका लिख्वार छ्या एकी त समालोचक छ्या नौटियाल जी . फिर  कुकरेती जी तै नौटियाल जी तै इन नि छिंडारण   चयाणु छौ.

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार

नरेंद्र कठैत - कुकरेती जीन भौत इ अशिष्ट काम करी

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार, भौत इ अशिष्ट काम करी

नरेंद्र कठैत -  भीष्म कुकरेती न आलोचना मा गाळी गलोज करी

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार, गाळी गलोज करी

नरेंद्र कठैत - भीष्म कुकरेती न बोलि बल  हिंदी प्रयोग ठीक नी च पण अफु बि लेखुं मा हिंदी-अंग्रेजी  का प्रयोग करी.

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार,अफु बि लेखुं मा हिंदी का प्रयोग करी.

सबि - जावा क्वी भीष्म कुकरेती तै बुलाओ

भीष्म कुकरेती को आण -

प्रथम नाम ल्योलू मि सरस्वती कु

प्रथम नाम ल्योलू मि हास्य दिवता प्रथम कु

प्रथम नाम ल्युलू मि पंचनाम दिव्तौं कु

प्रथम नाम ल्योलू साहित्यिक गुरु अर्जुन सिंग गुसाईं को

जौन मि तै कथा लिखणो उकसाई

भौणेर -कथा लिखणो उकसाई

प्रथम नाम ल्योलू मि गुरु रमा प्रसाद घिल्डियाल पहाड़ी कु  जौन मै गढ़वळि मा लिखणो उकसाई

भौणेर -गढ़वळि मा लिखणो उकसाई

सदा नन्द कुकरेती - अ  रिश्ता मा तुम म्यरा ददा जी पण उमर मा मी तुमारो ददा . तुम पर  भगार च बल तुमन  आलोचना मा  बिचकीं  भाषा ,अशिष्ट भाषा इस्तेमाल कार

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार, बिचकीं भाषा ब्वाल

भीष्म कुकरेती - जी, मीन  बिचक्याँ शब्द इस्तेमाल करीन

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार, बिचकीं भाषा ब्वाल

भीष्म कुकरेती - जरा तुम सौब इन बताओं बल सम्भोग, राति शब्द शालीन छन

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार, बिचकीं भाषा ब्वाल

सौब  - हाँ शालीन छन . नाट्य शाश्त्र का शब्द छन

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार, बिचकीं भाषा ब्वाल

भीष्म कुकरेती - त हे म्यरा गुरु जन जु मि यूँ शब्दों गढवळि मा अनुबाद करलु त क्या होलु ?

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार, बिचकीं भाषा ब्वाल

सौब- द्याखो जी साहित्य अर रोजमरा कि भाषा मा यो त दिखण इ पोडल कि अनुदित शब्द असभ्य नि ह्व़े जावन

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार, बिचकीं भाषा ब्वाल

भीष्म कुकरेती - वाह ! आर्य संस्कृति से उपज्यां  संस्कृत का शब्द सभ्य अर द्रविड़ सभ्यता से लियां शब्द असभ्य ?

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार, बिचकीं भाषा ब्वाल

सौब- देस, काल अर वर्ण को ख़याल त करणि पोडल

भीष्म कुकरेती - ठीक च जु तुम सब्यूँ कि या इ राय च त सुधार करे जालो

अबोध बंधु बहुगुणा --  तुम हिंदी शब्दों विरोधी छंवां अर हिंदी , अंग्रेजी शब्दों इस्तेमाल करदवां ?

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार, हौरू  तै अड़ाण अर अफु सियूँ रौण

भीष्म कुकरेती - मी बीडी सिगरेट पींदु त क्या बीडी सिगरेट का विरोध करण बुरु  च क्या ?

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार, हौरू तै अड़ाण अर अफु सियूँ रौण

सौब - पर ...

भीष्म कुकरेती - बस यो इ हाल छन. 'पर' पर' ... कबि त स्वीकार कारो कि हिंदी गढवळि तै मारी देली. . मी अफु पर बि भगार लगान्दु. मीन 'हिंदी का वासराय' लेख मा अफु तै बि 'खत्युं बीज' ब्वाल

नरेंद्र कठैत - यू सौब झूट च भीष्म कुकरेती जी न इन कवी लेख नि ल्याख.

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार, हौरू तै अड़ाण अर अफु सियूँ रौण

भीष्म कुकरेती - जु तुमन यू लेख नि बांच त यांक मतलब यो नी च कि यू लेख छपी नी च

नरेंद्र कठैत - यू सौब झूट च

सौब - कठैत जी ! यदि आपन क्वी लेख नि बांच त यांको यू अर्थ नि होंद कि हौरू न ल्याख इ नी च.

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै सिखाणो बान कंडाळी न  चुटी .

भौणेर - मीन नि बांच त यांको अर्थ नी होंद कि हौरून ल्याख इ नी च.

तारा दत्त गैरोला- भीष्म जी ! घपरोळ से क्या फैदा ?

भौणेर -अपड़ो न अपड़ो तै मार,

भीष्म कुकरेती - जी यू त क्वी बि 'कौंळी किरण' बांची ल्याओ फिर जाणै जै सक्यांद कि घपरोळया लेखुं से क्या फैदा होंद!

भजन सिंग सिंग - पण घपरोळ शब्द म लडै कि गंद आन्द 

भीष्म कुकरेती - जी ठीक च. आज से इन कॉलम का नाम होलु 'घचकाण'

नरेंद्र कठैत - पण इन बहस इ ठीक नी च

पार्थ सारथी डबराल- साहित्य मा सम्वाद जरूरी च

भौणेर -साहित्य मा सम्वाद जरूरी च

श्याम चंद नेगी - बहस से साहित्य का बनि बनि जरूरी बातों पर साहित्यकारों ध्यान जांद.

गणेश प्रसाद बहुगुणा 'शाश्त्री' - बहस से इन बात भैर आन्दन जु इतिहास से लुक्याँ रौंदन

भौणेर -साहित्य मा सम्वाद जरूरी च

अबोध बंधु बहुगुणा  - त हे मेरा दिवतौं अब सौब मानि जाओ . सांत ह्व़े जाओ

केशव अनुरागी - मी केशव अनुरागी जरा बडै कु ताल बजांदु त सौब नाचो

झेई - - - झे-  - - - , ता - - - - ता -

ता ता , झेई - - - त्रिणता , झे,  तागता

झगेक, झेई .......

ब्रह्मा नन्द थपलियाल - मि ब्रह्मा नन्द थपलियाल  ढोल सागर कु एक छंद गौलु   अर फिर आजक पूजै संपन माने जावो

अरे गुनि जन शब्द ईश्वर रूप च

शब्द कि सुरति शाखा

शब्द का मुख विचार शब्द का ज्ञान आँखा

यो शब्द बजाई , हृदया जाई बैठाई 

(नाम काल्पनिक माने जावन )

Copyright@ Bhishma Kukreti , 13/7/2012

Bhishma Kukreti

           Importance of place 'Satpuli' in Garhwali Folk Songs 
                                              Or
                     Sense of Place in Garhwali Folk Songs -Part- 1

                                    Bhishma Kukreti
[Notes on Importance of a Place or sense of place in Folk Song; Importance of a Place in Garhwali Folk Songs; Importance of a Place or sense of place in Kumauni Folk Songs; Importance of a Place or sense of place in Uttarakhandi Folk Songs; Importance of a Place or sense of place in Mid Himalayan Folk Songs; Importance of a Place or sense of place in Himalayan Folk Songs; Importance of a Place or sense of place in North Indian Folk Songs; Importance of a Place or sense of place in Indian Folk Songs; Importance of a Place or sense of place in Indian sub continent Folk Songs; Importance of a Place or sense of place in SAARC Countries Folk Songs; Importance of a Place or sense of place in South Asian Folk Songs; Importance of a Place or sense of place in Asian Folk Songs]
             It is universal truth that the folk songs provide sense of place.
There many places in most of the community those are mentioned   in various folk songs. For example, there are Garhwali folk songs those mentions names of places such as Binsar or Satpuli. There are Kumauni folk songs wherein Nainital or Haldwaani places are mentioned.
Tota Ram Dhoundiyal offers a couple of Folk songs where Satpuli name is mentioned.
  Satpuli is at the bank of Nayar river and on the Pauri-Gumkhal road.
  The following Garhwali folk songs provide sense of place and importance of place in folk song.
सतपुळि को सैण मेरि बौ सरैला
[एक गढवाली लोक गीत ]

बौ ए . नि जाणो नि जाणो
मेरि बौ सरैला , ए बौ सरैला
ए खाई जाला क्याळा
ए सतपुळि उर्युं च बौ ए
पंचमी कु म्याळा मेरि बौ सरैला
ए लूण भोरि दूण, भोरि दूण
ए सतपुळि नि जाण बौ ए
झगड़ान हूण ,मेरि बौ सरैला
ए ढीबरा का छौना , ए छौना
ए सतपुळि अयाँन बौ ए
तारा दत्ता का नौना
मेरि बौ सरैला
ए बौ हारा जौ का झीस , बौ ए झीस
ए सतपुळि अयूं च बौ ए
त्यार द्यूर 'हरीश' , मेरि बौ सरैला
ए दूदा कि कटोरि , ए बौ कटोरि
ए सतपुळि ऐ गेन बौ ए
कानूं गो, पट्वरि , मेरि बौ सरैला
ए खाई जाली लौकि , बै ए लौकि
ए त्यारा बाना द्याख बौ ए
लैंसडौना चौकि मेरि बौ सरैला
बौ ए . नि जाणो नि जाणो , मेरि बौ सरैला

Curtsey, Tota Ram Dhoundiyal, Satpwli Dhangi' Dhad, June 1990
Copyright Bhishma Kukreti 13/7/2012
Notes on Importance of a Place or sense of place in Folk Song; Importance of a Place in Garhwali Folk Songs; Importance of a Place or sense of place in Kumauni Folk Songs; Importance of a Place or sense of place in Uttarakhandi Folk Songs; Importance of a Place or sense of place in Mid Himalayan Folk Songs; Importance of a Place or sense of place in Himalayan Folk Songs; Importance of a Place or sense of place in North Indian Folk Songs; Importance of a Place or sense of place in Indian Folk Songs; Importance of a Place or sense of place in Indian sub continent Folk Songs; Importance of a Place or sense of place in SAARC Countries Folk Songs; Importance of a Place or sense of place in South Asian Folk Songs; Importance of a Place or sense of place in Asian Folk Songs to be continued ..

Bhishma Kukreti

Dunya Bachan: Garhwali poem Calling 'Save the Earth '

दुन्या बचाण त...

कवि- मदन डुकलाण

दुन्या बचाण त
बचै का राखा
लासौं मा खून
पांसौं मा दूध
अगास मा सूरज
बादळु मा जून
दुन्या बचाण त
बचै कि राखा
गौं - गुठ्यार
बार त्यौहार
अपनों ऐना
अपनों अन्द्वार (अन्वार )
दुन्या बचाण त
बचै कि राखा
मन मा माया
पित्रु की छाया
रौल्युं मा छ्वाया
चुल्लों मा आग
बणु मा बाग़
दुन्या बचाण त
बचै कि राखा
हिमालय मा ह्यूं
मंदिरों मा द्यूं
माणि मा घ्यू
जिकुड़ी मा ज्यू
दुन्या बचाण त
बचै कि राखा
आंख्युं मा आंसू
मन मा सान्सू
कोखी कि बेटी
ब्व़े कि बोली
सर्वाधिकार , मदन डुकलाण
The earth would be saved
When in body the blood is saved
When in nipple milk is saved
When in sky the sun is saved
When in cloud the moon is saved
The earth would be saved
When in village, courtyard is saved
When in country the festivals are saved
When our own mirror is saved
When our own face is saved
The earth would be saved
When in mind, the love is saved
When in small valleys, the springs are saved
When the fire is saved
When in jungle, tiger is saved
The earth would be saved
When in Himalaya, the snow is saved
When in temples, earthen lamp is saved
When in pot, ghee is saved
When in eyes, tear is saved
When in uterus, girl child is saved
When in society, mother tongue is saved

Copyright@ Madan Duklan  13/7/2012

Bhishma Kukreti

Hankar: Story Portraying Bitterness in Relationship
(Review of Garhwali Story Collection 'Mwari' by Durga Prasad Ghildiyal)
                              Bhishma Kukreti
There was good relation between families of Subedar Dan Sing and Mother of Chandru. The time comes that both families do not see eye to eye. The talking terms ends between the two families due to confusion. Due to pride, the terms do not alter. However, one day comes when Subedar realizes that arrogance is not the way of life.
  The story portrays way of agriculture life in village and searches the reasons for bitterness in smooth relationships. 
      Durga Prasad searches the small types of reasoning aspects of life in the story.
Reference-
1-Abodh Bandhu Bahuguna, Gad Myateki Ganga
2-Dr Anil Dabral, 2007 Garhwali Gady Parampara
3-Bhagwati Prasad Nautiyal, articles on Durga Prasad Ghildiyal l in Chitthi Patri
4-Dr. Nand Kishor Dhoundiyal, Garhwal Ki Divangat Vibhutiyan

Copyright@ Bhishma Kukreti, 14/7/2012

Bhishma Kukreti

गढवाली -हास्य व्यंग्य साहित्य

                              प्रजातंत्र का रागस


                               भीष्म कुकरेती

      [गढवाली व्यंग्य, गढ़वाली हास्य साहित्य, गढवाली गद्य, गढ़वाली साहित्य, गढ़वाली भाषा, गढ़वाली रचनाये, लेखमाला] 

     

   कुज्याण !   कुज्याण ! रावण राज तै किलै दानव राज बुले जांद धौं . कुज्याण ! कुज्याण ! दुर्योधनो कुणि रागस किलै बुल्दन धौं !

रावण न त सीता क अपहरण  बि इलै कार बल लक्ष्मण न वैकी बैणि क नाक काटी. महाभारत मा दुर्योधन पर पांडव विरोधी हूणो भौत सा भगार छन पण कखि बि दुर्योधन तै इन नि बताये गे बल दुर्योधन (पांड छोड़िक ) लोक   न्याय विरोधी रै या वैन जनता कु नुकसान करी. जु वाल्मिकी या व्यास जी आज रामायण या महाभारत रचदा त रावण अर दुर्योधन दिवतौं  श्रेणी मा आंदा.

         अब प्रजातंत्र का खुले आम मखौल त द्याखो - जाय ललिता , लालू प्रसाद यादव जन नेता भ्रष्टाचार विरोधी  अभियान का रथी सारथी बण्या छन. काणा बस ड्राइवर बण्या छन.

   जु अभियोग का कारण जेल मा छया वो उत्तर प्रदेश का जेल मंत्री बण्या छन अर जेल मा क्या क्या सुविधा हूण चएंद पर जन अभियान चलाणा छन.

जौं तै गढवाल कुमाऊं क भूगोल अर संस्कृति कु आता पता मालूम नि छयो वो उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बण्या छन अर अफु तै बंगाली बथाणा छन. बाप कमाई खाणा छन.

  जु राजभवन मा कुकर्मो वजै से भैर ह्वेन वो मुख्यमंत्री तै आशीर्वाद दीणा छन . जौन मुख  लुकाण छौ वो पधान बण्या छन

   जौं तै राज धर्म की रक्षा करण छे वो प्रधान मंत्री कुर्शी पाणो धमध्याट करणा छन. स्याळ बाग चिनखौं जग्वाळि  बखान करणा छन.

    ममता बनर्जी  सरीखा नेत्याण बंगाल विकास को रूण  रोणा  छन  अर आधुनिक विकास स्रोत्र पर कुलाड़ी चलाणि छन . जै फौंटि मा बैठया छन वै इ  फौंटि  काटणा  छन.

भारत का महान अंतर राष्ट्रीय प्रसिद्ध अर्थ शास्त्री गरीबो कुण बुलणा छन छबीस  रूप्या ध्याड़ी से काम  चलाओ अर अफु सरकारी  खर्च पर छतीस लाखौ बाथरूम बणाणा छन. ये भाई त्यार बांठ  आल  बासी तिबासी सुक्यूँ एक रुटळ ,  अर म्यार बांठ आला  म्वाटो म्वाटो घीयो भर्याँ स्वाळ.

  जु कबि वकालत करद दै झूट तै सच अर सच तै झूट सिद्ध करी दीन्दा छा वु अब मानव संसाधन का पधान बौणि  मानवीय आचरण सुदानो  बान  नियम बणाणा छन.  चचराट को गोल्ड मेडलिस्ट , सींद दै बि बड़बड़ाट  करण वाळ मौनव्रत सिखाणो स्कूलौ हेड मास्टर बण्यु च .

अच्काल नेता भ्रष्टाचार मा पकड्यान्दन, थ्वड़ा देरौ कुण जेलौ हवा खान्दन अर जब जेल बिटेन ड़्यार औंदन त यूंक स्वागत इन होंद जन बुल्यां यूंन   वर्ल्ड कप जीति ह्वाओ या मगल ग्रह मा भारतौ तिरंगा  फैराइ ह्वालो. यांकी बुल्दन बल बेशरमौ जीब  काटो त जीब  हाथेक हौर बढ़ी जांदि .

जौंन इस्कूलम मास्टरों तै पीट वूंक आज कथगा इ कॉलेज  खुल्यां छन. अजाण  सिलेबस बणाणा छन

बीड़ी- सिगरेट बणाण वळा कैन्सर बचाओ आन्दोलन का धड्वे बण्या छन. डा  बि  मि द्योलू  अर अस्पताल बि मि इ ख़ुलुलु .

जौंन धनुष बाण नि देखी वो आर्चरी फेड्रेसन का महंत बण्या छन. बैरा व्योईस डिटेक्टिव (अवाज पछ्यण)  संस्थान का अध्यक्ष  बण्या छन.

जौन राजनीति क खेल  छोड़िक जिन्दगी मा गुल्लि डंडा बि नि खेल वो इंटरनेशनल  क्रिकेट बोर्ड का मुखिया बण्या छन. अर कपिल देव , वेंगसरकर जन लोग ऊंका हुक्का भरणा छन.

जौं तै कौम वेल्थ गेम मा भ्रष्टाचार का गुनाह मा जेल मा हूण चयेणु छौ. लन्दन औलेम्पिक मा वूंको स्वागत की तैयारी चलणि च. यी लोक त प्रजातंत्र अर पूजनीय न्यापालिका तै चुसणा दिखाणा छन

मी अबि बि नि समजी सौकू कि यूँ प्रजातंतरौ रागसूं कुण राम कख ह्र्ची गे. या इन त नी च बल नंग देखिक भगवान बि डरद. या कळजुग मा राम जनम ल़ीण से डरणा छन ?

या राम न जनम त ले ले होलु पण क्वी विश्वामित्र पैदा नि ह्व़े होलु !

Copyright@ Bhishma Kukreti 14/7/2012

गढवाली व्यंग्य, गढ़वाली हास्य साहित्य, गढवाली गद्य, गढ़वाली साहित्य, गढ़वाली भाषा, गढ़वाली रचनाये, लेखमाला जारी ....
:) ;)

Bhishma Kukreti

उखैक   फिकर- एक गढ़वाली कविता



कवि - डी. डी. सुंदरियाल

इन त नी च कि
वूं थे वखे फिकर नी च

नेतओं कि फिकर च
कै गोऊँ कथ्गा बामण
कथ्गा जजमान
कति भोट म्यारा कति भोट  त्यारा

चुनओ जित्णइ फिकर
भाषण पर भाषण
ससतू करी द्यूंला राशण
अंधेरा रौलों, कूणा-कुमचेर
बिजली का खम्बा-तार पोंछये दिउंला
(उज्यले गारंटी हमारी नी च )

जीप घुमइकी, धुलु उड़े कि
सट्गि गईं डेरादून( लखनों) दिल्ली
पाँच साल माँ एक सवाल पुछी
वो भी बंगालै जूट इंडस्ट्री बारा
लाटु गम्फू काका न पूछि
"ब्यटा, गढ़वाला नक्शा म कखम च बंगाल"
अरे काका के कु गढ़वाल , के कु बंगाल,
नेताजी का ह्वै गिनी पूरा पाँच साल
ये गवैइ कि रीत ही ई च
इन त नी च कि
वूं थे वखे फिकर नी च
Copyright@ D.D Sundariyal, Chandigarh


Bhishma Kukreti

Swag-Bhag: Life is greater than Material
(Review of Garhwali Story Collection 'Mwari(1986) by Durga Prasad Ghildiyal)
                                  Bhishma Kukreti

             The famous flood of Satpuli is one of the greatest recent disasters of Garhwal. Tens of buses fled along with drivers and others.
There is folk song about flood of river Near at Satpuli.
Satpuli moter baugin khaas
Darshanu was one of the bus drivers whose bus was standing at Satpuli bus stand. Garhwal union declared that Darshanu is no more. His younger brother Kamlu finds Darshanu. They come to home. Darshanu's wife asks Kamlu," Did you bring some thing for me?"
Another person answers," Your Swag-bhag(your husband)."
There are other incidents in the story as the reason of migration etc. The story is very interesting. The story telling style of Ghildiyal is effective.
Reference-
1-Abodh Bandhu Bahuguna, Gad Myateki Ganga
2-Dr Anil Dabral, 2007 Garhwali Gady Parampara
3-Bhagwati Prasad Nautiyal, articles on Durga Prasad Ghildiyal l in Chitthi Patri
4-Dr. Nand Kishor Dhoundiyal, Garhwal Ki Divangat Vibhutiyan
Copyright@ Bhishma Kukreti, 15/7/2012

Bhishma Kukreti

बिन कांडों का नि खिल्दा गुलाब****** गढ़वाली कविता



                 कवि नरेंद्र गौनियाल

बिन कांडों का नि खिल्दा गुलाब,मि जणदु छौं.
पण अपणा नसीब मा फूल ना,सिर्फ कांडा छन.

सुपिना त सुपिना ही च,असलियत से दूर.
ऊ नि आंदा असल मा त,स्वीणों मा सही.

वक्त की रफ़्तार तै,समझणु च जरूरी.
यु कमवख्त वक्त,कैका बाना रुक्दू नी.

कब तक रैलि इनि दूर,अन्ध्यरा का सहारा.
उज्यल़ा मा त मि दगड़ी रौंलू,छैल बणिकी.

कुछ बुना कि सजा,इन ना दे तू चुप रैकि.
सजा जु बि दीणे तिन,दे दे तू चट बोलिकि.

चुप रैकि बि सब कुछ,बोलि जन्दिन आंखि.
दिल कि बात दिल मा,दिखै जन्दिन आंखि.

आंखि चिट गुलाब सि,जनि कि धूल जईं होलि.
सच किलै नि बुन अपणी त, निंद ही हर्चि गे.

उंकी याद कबि दिल मा चुभदी,कबि कुतग्यळी लगान्द.
वक्त-बे वक्त इनि कबि रुवांदी च,त कबि ख़ित्त हसांद.

डॉ नरेन्द्र गौनियाल..सर्वाधिकार सुरक्षित.
Modern Garhwali Literature Series

Bhishma Kukreti

वो बात अलग च -एक लघु गढवाली कथा



कथा - पूरण पंत पथिक



[आधुनिक गढवाली कहानियों का  के सौ साल की यात्रा,  गढवाली कथाएँ, गढ़वाली कहानियाँ , गढवाली कथाओं के सौ साल लेखमाला]



-- डागटर  साब नमस्कार

-- नमस्ते

-कनै बटि सिद्धांत ?

- यूनिवर्सिटी बटि

--आपन त गढवळि भाषा  पर डागटरी  करी छै

- हाँ

--अच्गाल क्या कन्ना छन आप?

-पढ़ाणु छौं

--क्या गढवळि ?

-- न न जि ना

--किलै ?

-- गढवळि बि क्वी पढाणै चीज च

--पण आपन त गढवळि भाषा पर डागटरी  ...

-- वो  s s हो s s . वो बात त अलग च   



सर्वाधिकार - पूरण पंत पथिक

साभार- चिट्ठी --अंक तीन १९८९

आधुनिक गढवाली कहानियों की सौ साल की यात्रा ,   गढवाली कथाएँ, गढ़वाली कहानियाँ , गढवाली कथाओं के सौ साल लेखमाला जारी ...

Bhishma Kukreti

Garhwali modern story/Fiction
       Ghuar vasa: Garhwali Story about Returning Garhwal for a Cause
(Review of Garhwali Story collection 'Mwari' (1986) by Durga Prasad Ghildiyal)

                           Bhishma Kukreti
[Hundred years of modern fiction/story; hundred years of Garhwali story/Fiction; Hundred years of Uttarakhandi regional language's modern fiction/story; Hundred years of Mid Himalayan regional language's modern fiction/story; Hundred years of Himalayan regional language's modern fiction/story; Hundred years of North Indian regional language's modern fiction/story; Hundred years of Indian regional language's modern fiction/story; Hundred years of South Asian  regional language's modern fiction/story; Hundred years of Asian regional language's modern fiction/story]
             Hukam Singh comes back to his ancestral village from Delhi after retirement. The ancestral house was in very bad shape- with full of plants and shrubs. Hukam Singh repairs the ruined hose and invites villagers to celebrate home coming ceremony. When Hukam Singh did not repair the hose the villagers used to talk in sarcastic language. Now when the hose is perfect with urban facilities the villagers stile talk behind him sarcastically.
         It was very pleasing shock to the villagers when Hukam Sing tells the secret of his repairing old ancestral house.

Reference-
1-Abodh Bandhu Bahuguna, Gad Myateki Ganga
2-Dr Anil Dabral, 2007 Garhwali Gady Parampara
3-Bhagwati Prasad Nautiyal, articles on Durga Prasad Ghildiyal l in Chitthi Patri
4-Dr. Nand Kishor Dhoundiyal, Garhwal Ki Divangat Vibhutiyan
Copyright@ Bhishma Kukreti, 15/7/2012
Hundred years of modern fiction/story; hundred years of Garhwali story/Fiction; Hundred years of Uttarakhandi regional language's modern fiction/story; Hundred years of Mid Himalayan regional language's modern fiction/story; Hundred years of Himalayan regional language's modern fiction/story; Hundred years of North Indian regional language's modern fiction/story; Hundred years of Indian regional language's modern fiction/story; Hundred years of South Asian  regional language's modern fiction/story; Hundred years of Asian regional language's modern fiction/story to be continued..