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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti

Characteristics of Garhwali Short Stories by Bhagwati Prasad Joshi 'Himwantwasi '

                                                   Bhishma Kukreti

[Notes on Characteristics of Fiction, Tales by regional short story writers; Characteristics of Fiction, Characteristics of Fiction, Tales by Garhwali short story writers; Characteristics of Fiction, Tales by Uttarakhandi regional short story writers; Characteristics of Fiction, Tales by Mid Himalayan regional short story writers; Characteristics of Fiction, Tales by Himalayan regional short story writers; Characteristics of Fiction, Tales by North Indian regional short story writers; Characteristics of Fiction, Tales by Indian regional short story writers; Characteristics of Fiction, Tales by SAARC Countries regional short story writers; Characteristics of Fiction, Tales by South Asian regional short story writers; Characteristics of Fiction, Tales by Asian regional short story writers]
[कथाकार की कहानियों कि विशेषताए; गढ़वाली कथाकार की कहानियों कि विशेषताए; उत्तराखंडी कथाकार की कहानियों कि विशेषताए; मध्य हिमालयी कथाकार की कहानियों कि विशेषताए; हिमालयी कथाकार की कहानियों कि विशेषताए; उत्तर भारतीय क्षेत्रीय भाषा के कथाकार की कहानियों कि विशेषताए; भारतीय क्षेत्रीय भाषा के कथाकार की कहानियों कि विशेषताए; सार्क देशीय क्षेत्रीय भाषा के कथाकार की कहानियों कि विशेषताए; दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय भाषा के कथाकार की कहानियों कि विशेषताए; एशियाई क्षेत्रीय भाषा के कथाकार की कहानियों कि विशेषताए लेखमाला ]


                       Bhagwati Prasad Joshi 'Himwantwasi' has a prominent place in Garhwali short story world. Joshi has specific style in Garhwali short story world.  Joshi was born in Joshiyana village, Parsundakhal, Pauri Garhwal in 1927. Joshi started his literature career as Hindi writer and he created Hindi Garhwali stories with vigor. Bhagwati Prasad wrote more than fifteen stories in Garhwali published in various periodicals.  'Dhanga ki Atmkatha' story collection book was published in 1988 just after his death.
    The plots of stories of Joshi are simple from the daily life but the way he narrates the situation the simple situation becomes interesting.  Joshi is an expert in narrating subject with phrases and the symbols make the stories more readable. Joshi uses known and new phrases for creating humor and satire. Dabral states that for Joshi the satire is not the style but a concept of looking at life that makes the story realistic as per time, place and class. The stories are with full of spirituality, philosophy and realism. Even the imaginative characters seem as if they are true from this earth.
                  Joshi is master of creating and developing his main characters. The characters in the stories of Bhagwati Prasad are energetic and nearer to the life. The readers get images of real life from the characters and characterization.  One example of characterization is from 'Head master Hirdairam'-
प्राइमरी पाठशाला हैड़ाखाळ, जख हेडमास्टर हृदय राम हरबोला, एक शरीर त एक आत्मा, छडि सा छड़ छड़ा, झुंगरण्या जून्गा, तण्या सांखा अर हर बखत चढ़याँ (आधी ढ़ ) आंखां. जनु परुशराम का कंधा मा फरसा. तन्नी हृदयराम जी क हाथ मा डंडा, स्यू अछू खासू नौ, बच्चू ण बिगाड़ी कि करी डे , निरदैराम बमबोला. पर डौर इतनी कि जु वै सडक पर निकळ दा ट बच्चा उड़्यार मा छिप्दा, गौं गाल़ो मा दिखेंदा त गुठ्यारु मा लुक दां, अखळा चखळी मा इना कि जानू बाग़ पड़ी गे हो बखरौं मां, इन लगी जांदी बग्बौला, बचणा कु क्वी ठौर नि छयो . स्कूल आवा त डंडा. डंडा कु वो डंडा नि बोली कि शुद्ध संस्कृत मा बोल्दा छया -दंडिका .पर नौ बद्लिक क्या हूंद/ जानू नागनाथ तन्नि सांपनाथ, जानू डंडा तन्नी दंडिका.

  The language and style of the stories of 'Himwantwasi' is his own. Joshi is a specialist of making words as his slaves. The language is lucid, memorable, with full of phrases and proverbs.  Joshi sees the situation from newer angle.  The timing and order of events are consistent in his tries.  The dialogues are from daily life and accelerate the speed of story. 
   The story writer creates mood as per the need of story and that helps the readers in making images.
   Dr. Nand Kishor Dhoundiyal states that Bhagwati Prasad is the 'Premchand (a greatest Hindi fiction writer) of Garhwali story world.

Reference-
1-Anil Dabral, 2007, Garhwali Gady Parampara
2- Shailvani, 2011 Kotdwara (Short stories by Joshi were republished in this newsletter)
3- Nand Kishor Dhoundiyal 2011, Garhwal ki Divangat Vibhutiyan, part 2

Copyright@ Bhishma Kukreti, 3/7/2012

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Bhishma Kukreti

डाक्टरों  उवाच

(गढ़वाली कविता )

कवि - डा.नरेंद्र गौनियाल




सुणो भाई-बंधो तुम मेरी बता.
लिक्विड-टिंचरी से तोड़ो नाता.

शराब पीकी जु घूमणा रंदीन.
दुनिया की गाळी खाणा रंदीन

ठर्रा कु पाणि अब छोडि दीण.
कच्ची शराब कभी नि पीण.

शराब एक मीठू जहर.
बर्बाद ह्वैगीं गांव-शहर.

नि पीणी भैजी कभी शराब
दशा नि होलि तब खराब.

बर्बाद सब घर शराब काद.
जुत्ता बि कबी शराबी खांद.

आंखि लाल लदोड़ी थुमार.
अकल मा माटु कनु यू प्वाड.

बच्चों की हालत बिगड़ी जांदा.
खाणा कु बिचारा कुछ नि पांदा

खुद त रोज पीणा रंदिन.
नांगा-भूखा नौन्याळ रंदीन.

रात-दिन जु बि  पीणा रंदीन.
अपणि घरवळी थिचणा रंदीन

मदमस्त ह्वैकी बुद्धि कु नाश.
भलु मन्खी क्वी नि आन्दु पास.

थूका-थुकी सब कर्द समाज.
छोडो शराब बचाओ लाज.

नशा करणु नि हूंदू भलु.
मद्यनिषेध कसिकै ह्वालु.
       डॉ नरेन्द्र गौनियाल..सर्वाधिकार सुरक्षित.....


Bhishma Kukreti

*******बंदरी ******एक गढ़वाली ननि कथा.******



कथाकार- डा. नरेंद्र गौनियाल




ब्वे-बाप बचपन मा ही स्वर्गवासी ह्वैगे छ्या.अब त उंकी अन्द्वार बि बिसरि गे.हम  छवटा-छवटा सि इस्कूल जान्द दा सदनि बंदरी तै सड़क का किनर गोर-बखरा चरांद द्यखदा छ्या.ऊ तब बि आण-जाण वलों अर इसक्वल्या छोरों मा बीड़ी मंगदु छौ.पुराणा,थेकल्यां लारा,मैल से चिपक्याँ लटुला अर बारा सींकों कु एक टुट्यू  छतल़ू बस यी छै वैकी पछ्याण. 
           काका-काकीन अपणा नौनौं तै त इस्कूल भेजी पण बंदरी तै ग्वैर बनै दे..द्वी यकुळी रुखु-सुखु एक गफ्फा का बदल ऊ दिन भर काम-काज मा जुट्यों रैंदु.राति ऊ छनुड़ा मा ही से जांदू अर सुबेर गोर-भैंसों कु मोल सोरी कै थुपड़ी लगान्दु..घौर मा ऐकि लखड़ू-पतड़ू,खैड-कत्यार सोरणु,नवाल़ा बिटि तीन-चार कसेरा पाणि ल्याणु,इनि कतगे छवटा-म्वटा काम करदू छौ. ग्वर म्यलाक से पैली भैंसों तै पाणि देकी मारा मारि मा द्वी-चार गफ्फा भात सळकैकि कांधी मा कुल्याड़ी अर कमर मा ज्यूड़ी लसगे कि गोर-बखरों तै मेली कै डांड ल्ह़ी जांदू.बस वैकी रोज कि य ही दिनचर्या छै.
            इस्कूल भले ऊ कबी नि जै सको,पण इस्कूल जान्द बगत सदनि इस्क्वल्या छोरों तै द्य्ख्दु छौ.इस्कूल जाणे-आणे टैम पर ऊ गोर-बखरों तै सड़क का नजीक ले आन्दु छौ.इसक्वल्यूं अर आंदा-जांदा लोगोँ से ऊ रोज बीड़ी मंग्दु छौ.द्वी बीड़ी मांगी कै ऊ एक तै कंदूड मा लगे दींदु अर हैंका तै जलाणो माचिश बी मंग्दु छायो.बीड़ी सुल्गैकी ऊ मुंड हलैकी मुल-मुल हैन्सदु.बीड़ी का दगड़ द्वी-तीन तिल्ली बी मंग्दु छौ.बाद मा कैइ  चिफल़ा ढुंगा पर कोरि कै बीड़ी जलांदु छौ.
            पौड़ी बिटि डीएम् साब धुमाकोट-नैनीडांडा  का दौरा पर अयाँ छया.ऊ धुमाकोट तहसील बिटि जीप-गाड़ी से अदालीखाल पी डब्ल्यू डी  बंगला मा जाणा छया.संगल्या खाळी का समणी बंदरी तै जीप औंद दिखे.वैते बड़ी देर बिटि बीड़ी कि तलप लगीं छै.पैली द्वी-तीन पैदल जाण वलोंन वैतई बीड़ी नि दे.एक ठ्यल्ला बि गै,वैन बीड़ी त नि दे पण काल़ू धुंवा वैका समणि छोडि कै घ्वां चलिगे.
             बंदरी तै जनि जीप औंद दिखे,वैकी तलप और बढ़ी गे.वैन सड़क मा खड़ू ह्वैकी दूर बिटि ही हाथ हिलाणु शुरू करी दे..वैन सोचि कि कखि यू बि खसगी नि जा.डरैबरन दूर बिटि ही खूब हौरन बजाई ,पण बंदरी टस से मस नि ह्वै..ऊ गाड़ी रुकाणो हाथ हिलाणु रहे.डीएम् साबन सोचि कि क्वी जादा परेशान होलू..ऊंन डरेबर तै रुकणो इशारा करी.गाड़ी रोकी कै साबन पूछी--क्या बात है ?कोई परेशानी है.?.बंदरी न मुल-मुल हंसी कै बोली--कुछ न यार ..एक बीड़ी पिलाई दे.
              डीएम्  साब वैकी पूरी बात त नि समझा पण जाणि गईं कि यू बीड़ी मांगणु.ऊंन अपणो अर्दली तै इशारा करी.डरेबर ब्वल्द ,''चलते हैं सर,कुछ नहीं है.ऐसे ही पागल आदमी है.''.बंदरी न फिर बोलि-दे-दे यार दे दे.,क्य बिगड़णु तब....डी एम् साब का ब्वलण पर अर्दलीन  सिगरेट कि डब्बी निकाळी अर द्वी बत्ती दे देनी..बंदरीन एक सिगरेट अपणा कन्दूड़ मा लगे अर हैंकि गिच्चा मा लगे कि बोलि--सल़े डब्बा बि त होलू.? अर्दलीन  लैटर  निकाळी कै सिगरेट जलै दे..डरेबरन गाड़ी start करी दे..बंदरी सिगरेट कि कश मरदू ,मुल-मुल हैन्सदु तब तक हाथ हिलांदु रहे,जब तक गाड़ी ढैया का पली तरफ नि चलिगे.


           डॉ नरेन्द्र गौनियाल   ....सर्वाधिकार सुरक्षित . 

--

Bhishma Kukreti

*********आक्रोश*********एक गढ़वाली कविता.



कवि -  डॉ नरेन्द्र गौनियाल




पहाड़ अर पहाड़ी
द्वीइ हूणा छन नांगा
डाळी कटे
मन्खी भागा
पहाड़ नांगा

जगा-जगा मा
दारू कि
सरकारी दुकनि
दिन-रात पींदा
लटगिंदा-फर्किन्दा
बबडान्दा
हुयाँ रंदीन जांगा
पहाड़ी नांगा

व्यवस्था !
टक लगे सूण!!
ईं चिमुडतीं गिच्ची
अर अधपेट पुटग्यूंन
क्य कन्न हमन
सि दारू पेकि ?

आज
हमते चएंद
पुरू अनाज
सि सोमरस
त्वैते ही बिराज

तेरि बराबरी 
हमन क्य कन्न
त्यारा छन 
सि लग्यां ग्यल्का
अर हमारा सुक्सा

तेरि गाड़ी
हमरि नाड़ी
त्यारा हाथ
हमरि गैळी
तेरि जान 
हमारो जंजाळ
तेरि मौत
हमरि मुक्ति
त्यारो भोग
हमारो भाग
हमारो जोग
तेरि जुग्ति

त्वे खुणि
बिजुली-पाणि सब्बि धाणि
हम खुणि सिर्फ
गाणि ही गाणि

हमारा हाथों से लम्बा छन
त्यारा कळदार
तौंकी पकड़ जादा मजबूत च
हमरि मुठ्यों कि पकड़ से

तेरि तिकड़म
कैरि जान्द काम तमाम
अर चूंदा-चूंदा सुकि जांद
हमरि सुकीं हडग्यूं कु
अस्यो-पस्यो

पण देख !
अब हमरि
आंखि खुलि गैनी
अब हम चेति गयां
अब हम
लूछि सक्दन
अपणु गफ्फा
अपणु नफ्फ़ा..


  डॉ नरेन्द्र गौनियाल ..सर्वाधिकार सुरक्षित
Garhwali Song/garhwali Poems

Bhishma Kukreti

Putra janm par Namkaran: A Garhwali Drama about Son bias and bias against Daughter

(Review of a Garhwali drama 'Putra janm par Namkaran' (1997) written by Om Prakash Semwal)

                                          Bhishma Kukreti
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     The bias for having son and bias against daughter is universal phenomenon. That is the reason that there are following proverbs and sayings in various societies –
She is true wife who has born a son (Manusmiriti)
'Abu-banat (an Arabic insult)
Raising a daughter means you are watering neighbor's garden (A Punjabi proverbs) 
With one son you have progeny; with ten daughters you don't have anything (Vietnamese saying) 
The birth of a son is welcomed with shouts of joys and firecrackers but when a girl is born neighbors say nothing (a Chinese proverb)
  Even after gaining praiseworthy literacy in Garhwal, the society is son bias and against daughter's birth. Playwright Om Prakash Semwal lives in rural Garhwal and has true knowledge of social behavior in the region.
  Om Prakash Semwal wrote and staged a play 'Putra janm par Namkaran' about son bias and bias against daughter's birth in a school of Chamoli Garhwal in December 1997.
  Everybody related to Gumanu as his family, his in laws, his friends and relatives are frustrated about the births of his daughters. Nobody celebrates the daughter's birth joy. However, this time wife of Gumanu delivers a male child and there is tremendous joys and celebration at the time of naming ceremony of the boy child. Om Prakash Semwal attacks on the society's bias for son and bias against daughter heavily at the end of the drama.
  Initially the dram is realistic and the later stage of the dram is of Parsi theatre style.
The drama is aimed to youth of Garhwal, is successful in showing gender discrimination in the society and a strong message against gender discrimination.   
The dram is successful in making social debate about son bias and bias against daughter

Copyright@ Bhishma Kukreti, 4/7/2012                 
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Bhishma Kukreti

Hantya Jagar: A Garhwali Folk Ritual for calling the unsatisfied soul of ancestors

                                       Bhishma Kukreti

[Notes on Folk Ritual for calling the unsatisfied soul of ancestors/Forefathers; Garhwali Folk Ritual for calling the unsatisfied soul of ancestors/Forefathers; Kumauni Folk Ritual for calling the unsatisfied soul of ancestors/Forefathers; Uttarakhandi Folk Ritual for calling the unsatisfied soul of ancestors/Forefathers; Mid Himalayan Folk Ritual for calling the unsatisfied soul of ancestors/Forefathers; Himalayan Folk Ritual for calling the unsatisfied soul of ancestors/Forefathers; North Indian Folk Ritual for calling the unsatisfied soul of ancestors/Forefathers; Indian Folk Ritual for calling the unsatisfied soul of ancestors/Forefathers; Asian Folk Ritual for calling the unsatisfied soul of ancestors/Forefathers]

'Hantya' means the unfulfilled desire of deceased one. Many times, the future teller speaks that there is 'Hantya' problem for the bad days of a family or families the family perform the 'Hantya' Ghadela ritual. The jagri (Ghadela performer) first sings the following songs before the stories of Hantya Jagar. In the initiating chants the Jagri calls the souls of deceased died by accidents or with unusual death.  Jagri and his assistant play the Daunru and bronze plate.                           
              हंत्या जागर का प्रथम भाग


मृत पितर अथवा पुरखों की लालसा को गढवाली-कुमाउनी में हंत्या कहते हैं


ओ ध्यान जागि जा
ओ ध्यान जागि जा
गाड का बग्यां को ध्यान जागि जा
ओ ध्यान जागि जा
भेळ का लमड्याञ को ध्यान जागि जा
ओ ध्यान जागि जा
डाळ का लमड्याञ को ध्यान जागि जा
फांस खैकि मरयाँ को ध्यान जगी जा
ओ ध्यान जागि जा
जंगळ मा बागक खयां को ध्यान जागि जा
ओ ध्यान जागि जा
घात प्रतिघात का मोर्याँ को ध्यान जागि जा
आतुर्दी मा मरयाँ को ध्यान जागि जा
भूत देवता परमेश्वर महाराज
हरि का हरिद्वार जाग -- धौळी देवप्रयाग जाग
जै रण का मोर्याँ तै रण का ध्यान जाग ..

  After the above initiating chant the Jagri tells the Jgari /stories of Dashrath-Shravan Kumar, Mordhwaj or Abhimanyu.
In all the stories, the last stage of Jagar is of pathos rapture and creates a tragedy among the listeners and dancers

Reference-
Dr Anil Dabral

Copyright@ Bhishma Kukreti.4/7/2012 
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Bhishma Kukreti

चबोड़ इ चबोड़ मा



                              पौड़ी म पाणि टापि टापि


                                          भीष्म कुकरेती



           मै पता नि लग बल पौड़ी मा पाणि अ इथगा टापि हुईं  च. सुबेर बिटेन अपण पाँच रिसेतेदारू पौण बणिक  बि पता नि चौल कि  पौड़ी निपाणि  डाँडो ह्व़े ग्याई.

सुबेर जब बस अड्डा बिटेन उकाळ चौढ़ी पस्बोला जी इ ड़्यार ग्यों त ऊन म्यार स्वागत  डब्बा बन्द मौसम्बी रस से कार इनी भुला प्रेम सिंग क इख मेरो स्वागत मिल्क डेयरी चोकलेट से ह्व़े.  यार पन्ना क इख आदिर खातिर मा बि डब्बा बन्द नारंगी रस थौ. मीन बि सोची याल छौ कि मुंबई जैक अपण स्टैण्डर्ड  बढाण  पोडल  अर पौणु  स्वागत पाणि से ना  फ्रूट जूस से करण पोडल. मीन लंच अपण स्याळो स्याळअ  स्याळ (त रिश्ता मा स्याळ इ ह्व़े कि ना !) क इख खाई अर मी पौड़ी क स्टैण्डर्ड मा इथगा परिवर्तन देखिक चकरे ग्यों.प्रथम स्वागत बि बियर से अर आन्द दै बि बियर !  इख मुंबई मा बि म्यार दगड्या  छन पण इथगा बियर पिलंदर  क्वी नी च . खाणो मा भुन्यु मटन अर बिरयानी , दही अर पाणि जगा बियर अर हथ धूणो केवल बनि बनि क नेपकिन अर तौलिया. मी तै शरम लग कि मी मुंबई मा रैक अबि तलक गढ़वळि इ रै ग्यों अर म्यार स्याळो स्याळअ स्याळ गढवाळ क पौड़ी मा बि जर्मनी से अग्वाड़ी बढ़ी गे. हमर इख उ उथगा बड़ो  मौडर्न माने जांद  जु जथगा खुले आम शराब परोसद. इख त म्यार म्यार स्याळो स्याळअ स्याळ क बेटी बियर बोतल खोलिक मै तै सर्व करणि छे. या इ त अल्ट्रा मौडर्न  कल्चरो  निसाणि च.

  उ त स्याम दै पता चौल कि फ्रूट जूस दीण या पाणि जगा बियर सर्व करण क्वी हौर कारणो से छौ. मौडर्निटी से दूरौ सम्बन्ध नि छौ.

स्याम दै वीरेन्द्र पंवारौ किताब 'बीं' प्रकाशन क खुसि मा एक पार्टी छे त उख पता चौल कि अचाणचक पौड़ी वाल इथगा अल्ट्रा मॉडर्न ह्व़े गेन.हिन्दुस्तान मा पार्टी माने दारु  -सारु , शराब -उराब. बगैर शराबौ खाणक पीणक तै पार्टी ना जीमण बोले जांद . चूंकि इख शराब उराब बि छे त या पार्टी छे.

स्वागत भाषण नरेंद्र कठैत जीक का जिम्मा छौ त ऊन स्वागत भाषण कि जगा पौड़ी म्युनिस्पल कोर्पोरेसन कमिसनरो  SMS पौड़ीक सुणाइ कि मानसूनौ देर से आण से पौड़ी मा अगला दस दिन  तलक पाणि नि आलो.  एक व्यंगकार जैन पाणी पर खंडकाव्य लेखी हो त वैक मुखन याँ से बढिया स्वागत भाषण ह्वेई नि सकद.

मीन पूछ बल वीरेंद्र जी कख छन त बताये गे कि बस आण इ वाळ छन .

दारु क टेबल मा दारु अर बियर बोतल अर गिलास धर्याँ छा.

मिन बार टेंडर कुणि ब्वाल," रम विद वाटर !"

बार टेंडर न अळग छत जिना नजर घुमै दे.

मीन दुबर ब्वाल," चलो रम नि ह्वाओ त व्हिस्की विद वाटर"

बार टेंडर अब तौळ दिखण मिसे गे.मीन ब्वाल," चलो व्हिस्की नी च त जिन पाणि दगड "

बार टेंडर भ्युं बैठी गे अर इथगा मा बी. मोहन नेगी जी दौड़ी दौड़ी क सि ऐन , बियर गिलासुन्द भौर अर फिर पीण दै ऊन ब्वाल,," कुकरेती जी ! यार क्या करणा छंवां. शराब कु मजा त कोकटेल मा इ हूंद."

मि घंघणे ग्यों बस बेसुध हूण बाकी थौ.जु बी. मोहन नेगी जी शराब त छ्वाड़ो कोक पेप्सी बि नि चखदन वो बियर पीणा छन !

म्यार पुछण से पैलि नेगी जीन बोली," कुकरेती जी आप व्हिस्की, रम , जिन जु ब्वालो ओ पी सकदन पण आप तै व्हिस्की मा पाणी जगा बियर मिलाण  पोडल. आप नीट बि पे सकदन . बट नो वाटर प्लीज! इख पाणि अकाळ पड्यु च "

औ म्यार भुभरड़ ! त या बात च . पौड़ी मा पाणि टापि टापि च अर मी समजणो छौ कि पौड़ी वळा अल्ट्रा मौडर्न  ह्व़े गेन .

मीन ब्वाल,' व्हिस्की विद स्टोंग बियर" अर म्यार  इन बुलण छौ कि बैरा क मुख पर पाणी ऐ गे. वैन व्हिस्की विद स्ट्रौंग बियर तैयार कार.

मीन बी.मोहन  जी तै पूछ, "भै !भुला वीरेंद्र कख च"

नेगी जीन उत्तर दे, " बस आण इ वाळ छन '

मी गिलास लेकी पौणु खबर सार पुछणो हौल मा घुमण मिसे ग्यों .

उख एक एक्स-मिलिटरी क कप्तान साब बि छ्या ऊन बोली," भै ! यू पौड़ी त जैसलमेर अर बाड़मेर से बि फंड ह्व़े गे. वन्स अपौन ए टाइम आइ वज पोस्टेड इन जैसलमेर ...."  मै तै बळु से क्वी लगाव नी च त मि दुसर पौणो ध्वार् चलि ग्यों ।

गणेश गणी जी बुलणा छ्या," मी त रोज सुबेर उठिक मोटर साइकल से श्रीनगर जान्दो उख अलकनंदा मा नयान्दो अर अपण परिवारों बान एक कन्टर पाणी लेक ऐ जान्दो . काम चली जान्दो"

गणेश जी से इ पता चौल बल पौड़ी मा वाटर टैंकर लाण पर बैन (मनाही)  लग्युं च. वाटर टैंकर आन्द अर लोग बाग़  तलवार, कुलाड़ी, दाथड़ी  लेकी पाणी लुठणो ऐ जान्दन. जैमा जथगा बड़ा हथियार वी पाणी लूठिक ली जांद

मीन गणेश गणी जी तै पूछ बल वीरेंद्र जी कख छन त ऊंको बि उत्तर छौ बल --पंवार जी बस आण इ वाळ छन

एल.एम् कोठियाल जी त्रिभुवन उनियाल जी तै  पौड़ी क इतिहास सुणाणा छ्या बल पौड़ी कि स्थापना सन १८४० क करीब ह्व़े अर तै दिन बिटेन इ पौड़ी मा पाणि  कमी महसूस ह्व़े गे छौ

पौड़ी  इतिहास सुणण वाळ गढ़वाली व्यंग्यकार त्रिभुवन उनियाल जीन   कोठियाल जी मा अपण दुखड़ा सुणाइ,"  यार आप त जाणदा छन.  हम बगैर नौकरों रै इ नि सकदां  अर नौकर पाणि चोरी गीजि गेन. बस अब हमन नौकर रखण बन्द कौरी आलिन.ड़्यार बिटेन बौ तै बि भटे सकदा छा पण एक मनिखौ  कुण एक्स्ट्रा पाणि  इंतजाम कु कारो . बस अच्काल मै तै इ रसोई, बणाण पड़द"

खबर सार का विमल नेगी जीन जोरै धाई लगाई," अबि अबि पौड़ी क डी.एम को SMS आइ कि क्वी बि अखबार पौड़ी इ ना गढ़वाल मा पाणि कमी बारा मा क्वी खबर नि छपी सकदो . अर मीन आजि 'खबर सार ' को ताजा अंक  छपाई अर पौड़ी मा पाणि त्राहिमाम पर इ सरा अखबार केन्द्रित छौ." अर फिर विमल नेगी जी अखाबार इ पड़ण  लगी गेन

सौब विमल जी छोडि बार टेबलों तरफ आइ गेन.

मीन उखम डा. विनय डबराल जी तै पूछ , यार जैकी पार्टी छे उ घराती कख च भै?"

विनय डबराल जीन त जबाब नि दे किलैकी  ऊंक मूक पुटुक टंगड़ी  कबाब छौ

त इतिहासकार डा. यशवंत कटोच जीन  मी तै चखणा (मंचिंग)  ब्वालो या डिन्नर टेबलों तरफ लिजांद लिजांद बताई बल बस वीरेन्द्र जी आण इ वाळ छन.

डिन्नर टेबल की जुमेवारी श्रीनगर बटे अयाँ संदीप रावत जी की छे. डिनर टेबल मा सौब खाणा  सूखो छौ जन कि बनि बनि क वेज-नोन वेज तंदूरी कबाब, तंदूरी मुर्गा, भुनी मुंगरी आदि  आदि.एक बि रसा वळो साग नि छौ. सौब सूखो चखणा  या  खाणो मजा लीणा छ्या अर पाणी जगा बियर घटकाणा छ्या. हथ पुंजणो खूब नेपकिन छ्या.

पौड़ी नगर का इतिहासकार कोठियाल जी  न  सांख्यकी क  पोथी से बताई बल आज  नेपकिन की खपत या  'पर कैपिटा कंजम्पसन' का मामला मा दुनिया मा पौड़ी शहर सबसे अळग च.  अमेरीकी कम्पनी देहरादून या उधम सिंग नगर मा फक्ट्री डाळण वाळ च .

घन्ना भाई जी न बथाई  बल यि नेपकिन कम्पनी वळा पाइलेट बाबा से यग्य कराणा छन कि इना मानसून नि आओ.

इथगा मा घ्याळ ह्वाई कि वीरेन्द्र जी ऐ गेन ! वीरेन्द्र जी ऐ गेन !

मीन द्वार ज़िना  द्याख कि वीरेन्द्र पंवार जी अर अर नरेंद्र सिंग नेगी जी भितर आणा छ्या.

वीरेन्द्र जीक हथुं  मा एक द्वी लीटर की परोठी छे. नरेंद्र सिंग नेगी जीक हथ मा एक प्लास्टिकौ थैला छौ.

वीरेन्द्र जीन परोठी वाइन  टेबल मा धार , नेगी जीन प्लास्टिकऐ  थैली बिटेन द्वी औंस का कप गाडिक टेबल मा धार . फिर वीरेन्द्र जीन  सबी पौणु तैं जुगराज रयाँ ब्वाल याने थैंक्स ब्वाल.

अब विमल नेगी जी न ब्वाल बल वीरेन्द्र जी तै आण मा अबेर इलै ह्वाई कि पंवार जी पौड़ी शहर से तौळ पौड़ी गाँ मा नेगी जीक दगड पाणी मांगणो जयां छ्या. सरा गाँ से  पाणीक एकी परोठी जमा ह्व़े

कार्यकर्म मा 'बीं' पर क्वी बि बात नि ह्व़े हाँ पौड़ी मा पाणी टापि टापि पर इ बात ह्वेन 

आन्द दै डा. यशवंत कटोच जी न हरेक तैं 'बीं' किताब पकड़ाई अर नरेंद्र सिंग नेगी जी  परोठी से दु दु चमच पाणि गाडिक कप मा डाळणा छ्या अर पंवार जी हरेक तै पाणि क कप पकड़ाणा छ्या. सौब खुसी से पाणी तै चरणामृत जन पीणा छ्या.

दुसर दिन दैनिक जागरण की हेड लाइन छे ---  जहां पानी की इतनी किल्लत है वहां वीरेन्द्र पंवार जी द्वारा सार्वजनिक स्थान में पानी बाँटना एक अपराधिक  कार्य माना जाएगा  और शासन  को वीरेन्द्र पंवार के विरुद्ध कठोर कदम उठाने चाहिए.


नॉट- लिख्वार दगड्यो नाम नामो कुणि दियुं च निथर यि  लोग इथगा दारु पिलै सकदन क्या?


Copyright@ Bhishma Kukreti 5/7/2012

Bhishma Kukreti

                      Sab: A Garhwali Story about Pride Love for Native Place and Progeny

                        (Review of Garhwali Story Collection 'Gari' by Durga Prasad Ghildiyal)


                                              Bhishma Kukreti

[Notes on Stories of Pride, Love for Native Place and Progeny; Garhwali Stories of Pride, Love for Native Place and Progeny; Uttarakhandi Stories of Pride, Love for Native Place and Progeny; Mid Himalayan Stories of Pride, Love for Native Place and Progeny; Himalayan Stories of Pride, Love for Native Place and Progeny; North Indian Stories of Pride, Love for Native Place and Progeny; Indian Stories of Pride, Love for Native Place and Progeny; Indian subcontinent Stories of Pride, Love for Native Place and Progeny; SAARC Countries Stories of Pride, Love for Native Place and Progeny; South Asian Stories of Pride, Love for Native Place and Progeny; Asian Stories of Pride, Love for Native Place and Progeny]
[आत्मसम्मान , निज भूमि प्रेम; वात्सल्य पूर्ण कथाये -कहानियां;आत्मसम्मान , निज भूमि प्रेम; वात्सल्य पूर्ण गढ़वाली कथाये -कहानियां;आत्मसम्मान , निज भूमि प्रेम; वात्सल्य पूर्ण उत्तराखंडी कथाये -कहानियां;आत्मसम्मान , निज भूमि प्रेम; वात्सल्य पूर्ण मध्य हिमालयी कथाये -कहानियां;आत्मसम्मान , निज भूमि प्रेम; वात्सल्य पूर्ण हिमालयी कथाये -कहानियां;आत्मसम्मान , निज भूमि प्रेम; वात्सल्य पूर्ण उत्तर भारतीय कथाये -कहानियां;आत्मसम्मान , निज भूमि प्रेम; वात्सल्य पूर्ण भारतीय कथाये -कहानियां;आत्मसम्मान , निज भूमि प्रेम; वात्सल्य पूर्ण दक्षिण एशियाई कथाये -कहानियां;आत्मसम्मान , निज भूमि प्रेम; वात्सल्य पूर्ण एशियाई कथाये -कहानियां लेखमाला ]

    'Gari' is first Garhwali story collection by prominent Garhwali fiction writer Durga Prasad Ghildiyal (Padalyun, P.G.1923-2002) who published three Garhwali story collections. Ghildiyal published forty Garhwali stories.
                'Sab' is one of the most discusses stories of 'Gari'. The daughter of a school teacher was ignored by her parents. In retaliation, she aspired for her son becoming 'Sab' or big man. Her son becomes an officer (Sab). However, the son does not care about her mother and his native place.
The central theme of 'Sab' is pride by a daughter ignored by parents, love for own mother land and progeny. The story blends philosophy, spirituality and materialism together with outstanding class for which Ghildiyal is famous.
Reference-
Abodh Bandhu Bahuguna, Gad Myateki Ganga
Dr Anil Dabral, 2007 Garhwali Gady Parampara
Bhagwati Prasad Nautiyal, articles on Durga Prasad Ghildiyal l in Chitthi Patri
Dr. Nand Kishor Dhoundiyal, Garhwal Ki Divangat Vibhutiyan


Copyright@ Bhishma Kukreti 5/7/2012
Notes on Stories of Pride, Love for Native Place and Progeny; Garhwali Stories of Pride, Love for Native Place and Progeny; Uttarakhandi Stories of Pride, Love for Native Place and Progeny; Mid Himalayan Stories of Pride, Love for Native Place and Progeny; Himalayan Stories of Pride, Love for Native Place and Progeny; North Indian Stories of Pride, Love for Native Place and Progeny; Indian Stories of Pride, Love for Native Place and Progeny; Indian subcontinent Stories of Pride, Love for Native Place and Progeny; SAARC Countries Stories of Pride, Love for Native Place and Progeny; South Asian Stories of Pride, Love for Native Place and Progeny; Asian Stories of Pride, Love for Native Place and Progeny to be continued....
आत्मसम्मान , निज भूमि प्रेम; वात्सल्य पूर्ण कथाये -कहानियां;आत्मसम्मान , निज भूमि प्रेम; वात्सल्य पूर्ण गढ़वाली कथाये -कहानियां;आत्मसम्मान , निज भूमि प्रेम; वात्सल्य पूर्ण उत्तराखंडी कथाये -कहानियां;आत्मसम्मान , निज भूमि प्रेम; वात्सल्य पूर्ण मध्य हिमालयी कथाये -कहानियां;आत्मसम्मान , निज भूमि प्रेम; वात्सल्य पूर्ण हिमालयी कथाये -कहानियां;आत्मसम्मान , निज भूमि प्रेम; वात्सल्य पूर्ण उत्तर भारतीय कथाये -कहानियां;आत्मसम्मान , निज भूमि प्रेम; वात्सल्य पूर्ण भारतीय कथाये -कहानियां;आत्मसम्मान , निज भूमि प्रेम; वात्सल्य पूर्ण दक्षिण एशियाई कथाये -कहानियां;आत्मसम्मान , निज भूमि प्रेम; वात्सल्य पूर्ण एशियाई कथाये -कहानियां लेखमाला जारी .....

Bhishma Kukreti

*********पिठाई*********एक गढ़वाली कथा.



                    कथाकार - डा. नरेंद्र गौनियाल 



[गढवाली लघु कथा, उत्तराखंडी लघु कथा , मध्य हिमालयी भाषाई लघु कथा, हिमालयी भाषाई लघु कथा, उत्तर भारतीय क्षेत्रीय भाषाई लघु कथा,भारतीय क्षेत्रीय भाषाई लघु कथा,भारतीय उप माहाद्वीप की क्षेत्रीय भाषाई लघु कथासार्क देशीय क्षेत्रीय भाषाई लघु कथा;दक्षिण क्षेत्रीय भाषाई लघु कथा;क्षेत्रीय भाषाई लघु कथा लेखमाला]




बरखा नि ह्वैत गौं वलों कि सगोड़ी सुकि कै तड़म लगीगे.गौं का लोग रोज कूली कु पाणि पैटाणो जएँ,पाणि लेकी ऐं,पण कुछ देर मा ही पाणि अपणा आप बंद ह्वै जाव.शुरू मा कुछ पता नि चली,पण बाद मा असलियत कु पता चलि गे.रौखड़ मा धर्यूं पाणि कु पन्दाल़ो जब भुयां कट्यों मिलि त लोगोँ तै शंका ह्वैगे कि क्वी ये काम तै जाणि -बुझि कै कनूं.
           एक दिन जब गौं का लोग पन्दाल़ो बणेकि पाणि पैटाणो गैनी त नंदू मथि अपणा घौर बिटि गाळी देण बैठ.वैन बोली -''यख बिटि फुंड चलि जाव, निथर मिन तुम घंट्याणा छौ. तब जैला ल्वे चट्दा-चट्दा.'' वैन गौं वलोँ तै गाळी बि दे.वैकी गाळी -ढाळी सूणि कै लोगोँ तै गुस्सा ऐगे.कुछ  वैतई पटगाणो बि गैनी ,पण वो अपणा भितर चलि गे.गौं वल़ा पाणि पैटेकि ले ऐनी.राति फिर पाणि बंद ह्वैगे.नंदून फिर पंदाल़ो काटी कै कूल तोड़ी दे.
           गौं वलोँन प्रधान जी का घौर मीटिंग करे अर पटवारी जी तै खबर देकी धुमाकोट तहसील मा रिपोर्ट करी दे.एक कॉपी डीएम् तै बि भेजी दे. हैंका दिन पटवारीजीन ऐकि पैली खाणु-पीणु करी अर तब गौं वलोँ दगड़ जैकि कूल कु निरीक्षण करे.नंदू तै बुलाई कि खूब हडकाई..द्वी-चार चटग बि लगैनी.अर बोली ''ये सूणि ले तू ! आज बिटि पाणि पर ना छड़े..दुबारा पाणि तोड़ील़ू त हथकड़ी लगैकी लैंसडौन भेजी द्योंलू''.नंदुन बोली-''न . न .साब ! मि त कुछ बि नि करदू.यूं लोगोँन  पाणि लिजैकि कि मेरो घास लतोड़ी दे.पाणि पर क्वी ग्वैर छेडदा होला''.फिर लोग पाणि पैटे कि ऐगेनी.पटवारीजी तै गौं मा च्या पिलैकी जांद दा पिठे लगैकी भेजी दे.
          सबी लोग निश्फिकर ह्वैगे छ्या कि पाणि अब बंद नि होलू.द्वी-तीन दिन तक पाणि ठीक ऐ.पण तीसरा दिन फिर चुकापट .द्वी-तीन नौना पाणि ठीक करणो गैनी त नंदून मथि बिटि गालि देकी घंट्याणु शुरू करी दे.नौना दौड़ी कै वापस ऐनी अर बताई कि पाणि फिर तोड़ी यालि.अर नंदू घंट्याणो बि ऐ.गौं वलोंन एक आदिम पटवारी कि चौकी मा भेजी.पटवारीजी चौकी मा नि मिला.पण पता चलि कि द्वी दिन पैली नंदू बि चौकी मा आयूं छौ.
           दरअसल यू पाणि एक छोया बिटि नंदू कि सिमर्य पुन्गडी ह्वैकी आन्दु छौ.नंदू का बुबाजी का टैम से  ही ये पाणि तै लमधार का लोग पीणा   का दगड़ गोर-भैंसों तै पिलाणो अर सगोड़ी-पतोडीयों मा चरणों काम ल्यान्दा छाया.नंदू पैली त कुछ नि ब्वल्दु छौ,पण हर्बी लमधर्यों का  सगोडा -पतड़ा देखि कै वैकु मन फुके गे.वैकी कूड़ी का मैला तरफ कोनाकोट का लोगोँन बि वैते फुल्से  दे कि त्यारा पाणि से बन्या छन यू लमधर्य फुन्यनात.कबी त्वेकू बि भेज्दीन मूल़ा कि जैडी,प्याजों का घिन्डका,आलू का बियाँ ,गोभी का फूल.नंदू कु बि ख्वपडा घूमी गे.
            नंदू कि कूड़ी लमधार अर कोनाकोट का बीच मा यकुलो धार मा छै.कोनाकोट वालों का दगड़ वैका झगडा रैंदा छाया जबकि लम्धार वालों दगड़ भलि पटदी छै.कोनाकोट वलोंन  चाल खेली कि लम्धर्यों का दगड़ वैका झगडा कन कै करे जएँ.बस नंदू ऊंका बखाण  मा ऐगे.गौं वाला जनि फिर पाणि पैटाणो गयीं,ऊ सरी कुतमदरी दगड़ ऐकि गाळी देण बैठगे अर घंटी चुटाण लगी गे.चार-पांच लोग मथि वैका घार गैनी पण तब तक वैन भितर जैकि द्वार ढकी दे.अपणी कज्यणि तै ऐथर करी दे.भितर बिटि बोले,,''अपणी ब्वे का मैसो..आवो त सै तुम.जणेका कि मुंडली गण्डकी द्यून्लू .कुलाड़ू देखि लियां हाँ.'' गौं वालों सोची कि कखी कुछ बात नि बिगड़ी जाव,ये वास्त ऊ वापिस ऐगेनी.
           दुबारा डीएम् का पास रिपोर्ट करेगे. अबरी दा कानूनगो अर पटवारी द्वीई ऐनी.नंदू जंगल भाजी गे.कानूनगो साबन बोली कि पटवारी जी तुम वैते सम्झैकी  मामलो ठीक करी दियां .झगडा बढाणु ठीक नि छा.गाँव वलोंन  ऊंतई बि खिलाई -पिलाई कि जांद दा पिठाई लगाई.ऊंका जाणा का बाद पटवरीजिन बोली, ''अब एन नि मणि त समझो कि जेल कि ही हवा खालु.''.जांद बगत फिर पटवारी जी तै पिठे लगान पड़ी.
           दिन बितदा गैनी पण पाणि कु मामलू नि सुलझू.अर्जी-पुर्जा चलना रैनी.एक दिन फिर पटवारी ऐगे.गौं वाला अब त परेशान ह्वैगे छाया.परधान सदानन्द जी अर दाना-दीवना सब्योंन एक जुट ह्वै कि बोलि,''पटवरीजी  पैली तुमन बोलि छौ कि दुबारा पाणि तोडालो त वैते जेल भेजि द्योंलू.अब क्य ह्वै ?'' पटवरीजीन बोलि,''देखो भै ऊ अपणी पुन्गड़ी बिटि नि आणि दींदु त हम बि क्य कैरि सकदा.''वैनत सर्या गौं पर फौजदारी केस करी यालि छौ.मिन वैतई समझाई कि चुप करे.निथर तुम सरि गौं का ही जु रैंदा तब जेल.''परधानजिन बोली कि बिन मर्यां -त्वडयाँ   केकु फौजदारी केस ..?पटवरिन अपणी घुमौदार मूंछ मलासी अर बोली,''अरे साब परधान जी ! वैका घर जांठा-बलिंडा लेकि त गया छन लोग.ह्वै सकद द्वी-चार धड़क लगे बि होलि..ऊ त इनु बि बुनूं छौ कि वैकी कज्यणि पर भी छेड़खानी करे.गुलोबंद अर कंदुडा का मुंदडा बि ली गैनी.''परधानजीन बोली,''पटवारी जी यू सब झूठ च.तुम इनु किलै बुना छौ.?.  गौं वलोंन बोली  कि पटवारी जी यू क्य लगणा छौ तुम, कंडली कु सि पात ..द्वी तरफ.?.पटवरिन  बोली,''देखो.,''जतगा दा तुम लोगोँन पिठाई लगाई,मिन तुमर तरफ बोलि,पण जब नंदू बि हौरि जादा पिठे लगे दींद त मि वैका  तरफ आंखि नि बूजि सकदु.'' पिठाई कु कमाल अर पटवारी कि बेशर्मी देखि कै गौं वला हक्चक रैगैनी.अबरी दा पिठाई नि लगाई..पटवारी पिछ्नैं ह्यर्दा-ह्यर्दा अपणी चौकी तरफ चलिगे..हैंका दिन पता चलि कि पटवारी कि बदली ह्वैगे.अर एक मैना बाद ही नौकरी से सस्बैंड ह्वैगे.कुछ दिन बाद ही गौं मा पानी का नल ऐगेनी.अब कूल का पाणी कि जरूरत बि नि रै.झगड़ा खुद ख़तम ह्वैगे.
                                डॉ नरेन्द्र गौनियाल..सर्वाधिकार सुरक्षित......   


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Bhishma Kukreti

******बिष्ट बूबाजी******एक गढ़वाली कथा



कथाकार- डा. नरेंद्र गौनियाल




काफलागैरी पिर्मू का ब्यो का दिन हम लोग न्यूतेर मा जाणा छाया.उकाळी का बाटा का बाद सड़क मा पहुँची के थ्वडी देर सुस्ताण बैठि गयाँ.सड़क का किनर पर एक अंग्रेजी अखबार कु टुकड़ा छौ. बिष्ट बूबाजीन भुयां बिटि अखबार कु पन्ना उठे कि द्वी हाथों मा पकड़ी अर दड़ा-दड पढ़न लगी गईं.मि हक्चक ऊंतई देख्दू रै गयूं.जु मन्खी अपणु नौं हिंदी मा बि बड़ी मुश्किल से लिखी सकदा छाया ,ऊ फ़टाफ़ट अंग्रेजी .....? मेरी त खोपड़ी चकरे गे.मिन समझी कि बूबाजी पर क्वी द्यब्ता य भूत ऐगे.मि पुछ्नु कि बूबाजी क्य ह्वै तुमते ? अर बूबाजी मुल-मुल हैंसदा अख़बार पढ़द रयान.बाद मा बताई कि अंग्रेज साब का दगडी सीखी थोड़ी-भौत.उन बूबाजी निरट अनपढ़ छाया.
           बहुमुखी प्रतिभा का धनी बिष्ट बूबाजी जमणधार गौं अर नजीक सर्या मुल्क का गार्जियन छाया.गौं कु गरीब-अमीर सब ऊंकु तै एक समान छौ.हर मवासा का दुःख-सुख मा ऊ शामिल हूंदा.सदाबहार मुल-मुल हैंसी का दगड ऊ लोगोँ कु बि खूब मनोरंजन करदा छाया.हाजिर जबाबी मा ऊंकु क्वी जबाब नि छौ.क्वीई बनावटीपन बि ना.अकबर का दरबार मा बीरबल का जनि ऊ सरि गौं-मुल्क मा मनोरंजन अर बुद्धि-विवेक कु खज्यनु छाया.दुःख-सुख,खैरि-बिपदा,ब्यो-बरात,पूजा-पाती हर मौका पर ऊंकु अलग ढंग छौ.उंकी छवीं सूणि कि लोग अपनों बड़ो से बड़ो दुःख बि बिसरि जांद छा.
          कुछ लोग समाज मा कब्बि-कब्बि इन बि पैदा ह्वै जन्दीन जु अपणा आप मा एक मिशाल बणी जन्दीन.इनि एक महान विभूति छाया गुजडू पट्टी का जमणधार गौं मा स्व० श्री खुशाल सिंह बिष्ट जि .अजी साब क्य बोलि सक्दान ..पण  समझो गजब कि पर्सनालिटी.हमन त ऊंका फुल्यां जूंगा अर अध् फुल्यों बर्मंड ही देखि.अपणा बचपन से लेकि ऊंका आखिरी दिनों तक हमन ऊंतई एक जनु ही देखि.
            गौं का हरेक परिवार दगड़ ऊंको निकट सम्बन्ध छौ.हर ब्यो-पगिन मा भण्डार (स्टोर) कि ड्यूटी उंकी ही रैंदी छै.हैंका का सुख से सुखी अर दुःख से दुखी होण वल़ो इनु इन्सान मिन हैंकु क्वी नि देखि.कैकि चीज पर क्वी निंगा ना. खाण -पीण मा भौत मितव्ययिता रखदा छाया. द्वी घुसळी सुबेर कल्यो का टैम पर अर द्वी राति खाणा का बगत.हौरि खाणो  जिद्द कन पर बोल्दा छा कि बुढ़ापा मा मशीनरी कमजोर पड़ी जांद.तुम लोग जवान छा,लक्कड़-पत्थर सब हजम कैरि सकदा.
            तब हमर गौं मा स्यारा(धान कि रोपणी ) मिलि जुली के लगदा छाया.बूबाजी सेरा लगाण वलोँ का वास्त रोटी,साग,परसाद बणान्दा छा.मर्द लोग पाटा सांदा अर ब्यटुला धान लगन्दा छाया.बूबा जि कि ड्यूटी,च्या पिलाने अर खाणु खिलाने रैंदी छै.सेरों मा इनु आनंद आन्दु छौ कि क्य बुन तब.(अब त सेरी-घेरी सब बांजी पड़ी गैनी.)
        बूबाजी समय का बड़ा पाबन्द छाया.सबेर जल्दी उठ्णु अर राति जल्दी से जाणु.खाली कबी नि रैंदा छाया. बैठि बैठि कै बि कुछ न कुछ करणु उंकी आदत छै.चौक मा बैठ्याँ जब लोग छवीं -बत्त लगान्दा,तब बि ऊ दगड़ मा थाड़ मा जम्यूं घास-पात चुंडदा छाया.खेती का काम तै ऊ बोल्दा छा कि यू कृषि कु पेपर छा सबसे बड़ो अर सबसे कठिन.पण छा यू कम्पलसरी...नौकरी-चाकरी,व्यापार,काम-धंधा सब कृषि का समणि कुछ नि छन.रुपया-पैसा त कुछ बि करि कै कमाए सकेंद पण बिन खेती का सब कुछ बेकार च.अगर खेती नि होलि त अनाज पैदा नि होलू.तब सरि दुन्या क्य खाली.?मंखिं त सदनि अन्न ही खाण.रुप्या खैकी पुट्गी नि भोरे सकेंदी.
             भारी ग़मगीन वातावरण तै बि ऊ अपणि स्वाभाविक हास्य वृति से हल्कू-फुल्कू बणे दीन्दा छा.गौं मा जब क्वी बुड्या -बुढडी  सख्त बीमार हून्दो त बूबाजी बोल्दा छा कि ,''टिकट त कटिण वलो च पण अबी जब तक सीट खाली नि हून्दी,तब तक कुछ नि हूंदू.जब ओर्डर ऐ जालो,तब अफु ही सटगंद बिन बतयाँ.ऊ बोल्दा छा कि ब्यटाओ ..मुर्दा का दगड बि आज तक क्वी नि गै.अर सदनी भूकी बि क्वी नि रहे.यू माया जाल इनु छा कि मुर्दा फुकी के कुछ देर मा ही मन्खी फिर काम-धंधा पर लगी जांद.
             अपणा आखिरी टैम पर जब बूबा जि बीमार ह्वैनी त ऊं खबर भेजि कि मै तै देखि जा.मि द्वी अनार कि बीं अर कुछ दवे ल्हेकी  घार गयूं.मिन बोलि कि बूबाजी तुम भौत कमजोर ह्वै गयां.तुमते इलाज का वास्त दिल्ली भेजि द्यून्ला.वख तुमरो नौनु,ब्वारि,नाती तुमरि देखभाल कारला.इलाज बि ठीक ह्वै जालो...बूबाजीण मेरो हाथ पकड़ी अर बोले,''बेटा मिन  अब कखि नि जानू.अब आखरी टैम ऐगे.जिंदगी भर ईं कूड़ी  मा रयूं.तुम सब्बि गौं वालो दगड़ जिंदगी बताई.तुम सब लोग म्यारा अपणा छा.सारा गौं अर मुल्क मेरो अपनों छा.मि दिल्ली चलि जौंलू त तुमन एकन बि मिताई लखड़ो नि दे सकणु.मेरी कुटमदरी वलों का भाग पर मेरी सेवा कनि होलि त ऊ मीम आला.जिंदगी कु दुःख-सुख मिन तुमारा दगड यख देखि त सिर्फ म्वार्ने खातिर दिल्ली किलै जौं.अप णा उद्गार व्यक्त करि कै ऊंको हस भोरी कै ऐगे.उंकी आन्ख्यूं मा मिन पैली बार आंसू कि धार देखि.मेरो मन बि दुखी ह्वैगे..मेरा बि आंसू टपगण लगी गईं. बूबाजिन बोलि,''बेटा मैते देखि गे तू.अब दवे कि जरूरत नि छा.बस जैदिन चलि जौंलू,जरूर एक लखड़ो धरनों ऐ जै. ऊंको प्यार,विश्वास अर इच्छा शक्ति देखि कै मि सन्न रै गयूं.बूबा जि का दगड उंकी घरवाली बि छै.बाद मा ऊंको नौनु,ब्वारी,नाती बि ऐगेनी.
             एक दिन ऊ ईं दुन्य छोडि कै चलि गईं.सरि गौं का लोग शोक मा डूबी गईं.देवलगढ़ नदी का श्मशान घाट पर  ऊंको अंतिम संस्कार ह्वै.मि बि लखड़ो दीणो गयूं.बूबा जि कि चिता धू-धू करि जळी गे.उंकी याद हमरि जिकुड़ी मा बसीं रैगे.ऊंका बिचार,संस्कार,प्यार-प्रेम सदनि याद आन्द..
            डॉ नरेन्द्र गौनियाल.. सर्वाधिकार सुरक्षित ...