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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti

Dhauns: Garhwali Drama about Role of Parents in Children Education

(Review of a Garhwali Play 'Dhauns' (2002) by playwright Om Prakash Semwal)

                             Bhishma Kukreti

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[शिक्षा में अभिभावकों का योगदान सम्बन्धी नाटक; शिक्षा में अभिभावकों का योगदान सम्बन्धी गढ़वाली नाटक;शिक्षा में अभिभावकों का योगदान सम्बन्धी उत्तराखंडी नाटक; शिक्षा में अभिभावकों का योगदान सम्बन्धी मध्य हिमालयी नाटक;शिक्षा में अभिभावकों का योगदान सम्बन्धी हिमालयी नाटक;शिक्षा में अभिभावकों का योगदान सम्बन्धी उत्तर भारतीय नाटक;शिक्षा में अभिभावकों का योगदान सम्बन्धी भारतीय नाटक;शिक्षा में अभिभावकों का योगदान सम्बन्धी दक्षिण एशियाई नाटक;शिक्षा में अभिभावकों का योगदान सम्बन्धी एशियाई नाटकलेखमाला ]


         There have been scenes in many Hindi and other Indian language films wherein the parents of spoiled children harass the teachers who want students take right path and there should be restrictions or a system to bring the spoiled students on main stream.  There have been never ending discussions and debates at many forums about the problems of spoiled students and their problems against the role of parents in proper education of their children.
      Om Prakash Semwal wrote a Garhwali drama 'Dhauns' staged in Government Inter College, Chopta, North Garhwal in 2002. Sons of Gumanu and Rati don't take interest in study. Gumanu and Rati bribed head master of middle school for passing their sons. The principal of local Inter College resists admitting these spoiled students in the college. The local political leader comes to rescue the parents of spoiled students. One day, these two students indulged into theft and police has to take the stock.
          Semwal wrote the drama for teen age students and the simple language of drama fulfils the aim of playwright. The drama portrays that in education system, there is a specific role of parents and governing bodies of the school or college.  The drama leaves space for discussion on the subject of role of parents in providing better education for their children.

Copyright@ Bhishma Kukreti, 5/7/2012

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Bhishma Kukreti

Chhorichhapar:  Garhwali Story about Struggle by a Girl for Family 


(Review of Garhwali Story Collection 'Gari' (1981) by Durga Prasad Ghildiyal)


                                    Bhishma Kukreti   

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[ स्त्री संघर्ष की कथा कहानी;स्त्री संघर्ष की गढवाली कथा कहानी;स्त्री संघर्ष की उत्तराखंडी कथा कहानी;स्त्री संघर्ष की मध्य हिमालयी कथा कहानी;स्त्री संघर्ष की हिमालयी कथा कहानी;स्त्री संघर्ष की उत्तर भारतीय कथा कहानी;स्त्री संघर्ष की भारतीय कथा कहानी;स्त्री संघर्ष की सार्क देशीय कथा कहानी;स्त्री संघर्ष की एशियाई कथा कहानी लेखमाला ]


  Chhorichhapar is a specific word in Garhwali language. 'Chhora' or 'Chhori' means the child without parents or without father.  'Chhorichhapar' is the story of a mother of three daughters and eldest daughter. Her father left them for another woman. The eldest daughter and her mother struggle for the survival of family. After the death of mother, the eldest daughter takes all responsibilities for upbringing her two younger sisters.  At the end a moment comes in the life of eldest sister to choose between her responsibility and for her own life. The story has tragic emotion throughout. However, this continuous tragic emotion does not break the intensity of the story, and does not become hurdle for compelling situation for the readers. Durga Prasad Ghildiyal has the capacity for compelling the readers reading the story till end.
Reference-
1-Abodh Bandhu Bahuguna, Gad Myateki Ganga
2-Dr Anil Dabral, 2007 Garhwali Gady Parampara
3-Bhagwati Prasad Nautiyal, articles on Durga Prasad Ghildiyal l in Chitthi Patri
4-Dr. Nand Kishor Dhoundiyal, Garhwal Ki Divangat Vibhutiyan

Copyright@ Bhishma Kukreti, 6/7/2012

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Bhishma Kukreti

*********शहीद बीरू हवालदार********एक गढ़वाली कथा.



कथाकार- डा. नरेन्द्र गौनियाल 


वै दिन बीरू कु रेस्ट छौ.वैका दगडया कि डयूटी छै.राजौरी सेक्टर मा कुछ फौजी बौडर तक भ्यजणो गाड़ी लिजाणी छै.ड्यूटी वलो दग्डयन बोलि कि आज मेरि तब्यत कुछ ठीक नी.बीरून बोलि कि तू आराम कैर,मि चलि जौंलू.ऊ चट्ट तैयार ह्वैकी गाड़ी लेकि चलिगे.बौडर मा जनि गाड़ी अपणा ठिकाना पर पहुँचण वली छै,वाँ से पैली ही छोप मा बैठ्याँ दुश्मन कु फायर खुलिगे.हमारा फौजी भयोंन मोर्चा संभाली कै जबाबी फायरिंग करे.बीरून गाड़ी हैंका तरफ सुरक्षित जगा मा घुमाणे कोशिश करे पण एक गोली वैका बरमंड मा लगी गे.कुछ लोगोँन मोर्चा समालि अर कुछन बीरू तै अस्पताल पहुँचने कोशिश करे,पण बीरू तै इलाज कि जरूरत नि पड़ी.ऊ मुल्क का वास्त शहीद ह्वैगे.
         ''जतो नाम ततो गुण'',य कहावत अपणा मुल्क का बीर सपूत बीरून पूरी करे.मौत हो त इनि. दुःख का दगड़ गौरव.वियोग का दगड़ अमरत्व.कारगिल युद्ध का दौरान अपणु क्षेत्र कु यू पैलू बीर छौ जैन बीरगति प्राप्त करे.जनि यूनिट बिटि बीरू कि शहादत कि खबर लैंसडाउन पौंछि पूरी छावनी मा मातम छैगे.यख ही गढ़वाल राईफल मा बीरू भर्ती ह्वै छौ २० साल पैली.दुःख का दगड़ छावनी मा फौजी वैकी शहादत पर फख्र बि महसूस करना छाया.बीरू कु पार्थिव शरीर लैंसडाउन पहुँची, तब वख बिटि सैनिक सम्मान का साथ शवयात्रा शुरू ह्वैगे.
               पौड़ी जिला मा नैनीडांडा विकास क्षेत्र,गुजडू पट्टी मा बसोली गौं मा स्व० तेजराम सुन्द्रियाल जि कु ठुलू नौनु छौ बीरू.दर्जा पांच तक डूंगरी मा पढ़णा का बाद दस पास  इंटर कॉलेज अदालीखाल बिटि करे.मि बि फख्र करदू कि बीरू शहीद मेरो क्लास फैलो छायो.दर्जा छै बि टि दर्जा आठ तक हम नजदीक ही क्लास मा बैठ दा छाया.नौ मा सेक्सन बदली गे.दस पास करिकै बीरू गढ़वाल रायफल मा भर्ती ह्वैगे.जब बि कबी छुट्टी मा घौर आन्दु छौ,तब खूब छवीं लगान्दु छौ फौजी जीवन कि.२० साल नौकरी करना बाद रिटेर्मेंट कि तैयारी करीं छै.जेठ कु मैना ऊ छुट्टी आण वालो छौ,अचानचक कारगिल युद्ध शुरू ह्वैगे अर छुट्टी कैंसिल ह्वैकी ड्यूटी राजौरी सेक्टर मा लगीगे,जख ऊ शहीद ह्वैगे.
               शवयात्रा लैंसडाउन बिटि कोटद्वार,नजीबाबाद,धामपुर ह्वैकी जनि काशीपुर पौंछि,भीड़ और जादा बढ़दी गे.काशीपुर मा पूरो बाजार बंद ह्वैगे.हजारों-लाखों कि संख्या मा जनता फूल-माला लेकि  शहीद बीरू तै श्रद्धांजलि देणी छै.काशीपुर बिटि रामनगर तक घंटों लगी गईं.रामनगर मा  पूरी सड़क भीड़ से भारी गे.हजारों लोग शहीद का दर्शन का वास्त जमा ह्वैगेनी.प्रशासनिक अधिकारी,सामाजिक कार्यकर्त्ता,राज्य आन्दोलनकारी संगठन,,महिला,छात्र,शिक्षक,कर्मचारी,नाना-ठुला सब ऐगीन.फूल मालाओं कि ढेर.बीरू हवालदार जिंदाबाद,,..बीरू त्यारो यो बलिदान,सदनि रालो हमते ध्यान..ये तरह का नारों का दगड़ शवयात्रा डूंगरी-बसोली का तरफ चल पड़ी.
             क्षेत्र का सांसद,विधायक,मंत्री,डीएम्,एसडीएम्,ब्लॉक प्रमुख,हौरि सबी जनप्रतिनिधि,समाजसेवी शवयात्रा मा शामिल ह्वैगीं.राति ८ बाजी जनि शवयात्रा बसोली गौं मा पहुची त गौं बि छावनी का रूप मा ही बदली गे.गौं मा खड़ू हूणों जगा बि नि छै.लैंसडौन बिटि बीरू कि घरवाली अर नौनु-नौनि बि दगड़ी ऐगे छाया.घार मा ब्वे-बाप छाया.
            सुबेर स्थानीय श्मशान घाट सल्डमहांदेव तक तीन घंटा मा शवयात्रा पौंछि.ये इलाका का सबी बाजार,स्कूल बंद ह्वैगी.सुबेर बि टि ही शहीद तै आखरी बिदाई देनो भारी जनसमूह जमा ह्वैगे.फौजी भयों सैनिक सम्मान का दगड़ शहीद तै अंतिम सलामी दे.बीरू कु १२ साला नूनं अपनों शहीद बुबा कि चिता तै मुखाग्नि दे...नारा लग्न रैं.--जब तक सूरज चाँद रालो..बीरू तेरो नाम रालो.
           द्वी-चार दिनों तक अख़बारों मा बीरू ही रहे.शहीद का आश्रितों अर परिवार का वास्त,गौं का वास्त कई सरकारी घोषणा ह्वैगीं.कुछ पूरी ह्वैनी अर कुछ उन्नी रैगेनी..कुटमदरी का आंसू बि हर्बी सुखन लगी गी.अपणी शहादत से ठीक एक साल पैली बीरू अपनों एक शहीद फौजी चिनवा  ड़ी  को बीर सतपाल सिंह को पार्थिव शरीर लेकि खुद ऐ छायो.तब ऊ एक बात बोलि गे छयो कि,''देश का वास्त शहीद हूणों हरेक फौजी को कर्तब्य अर दिली इच्छा हूंद.,पण इनु गौरव हरेक तै नि मिलदु..आखिर बीरून अपणी शहादत कि कामना पूरी करे अर अपनों मुल्क,गौं,ब्वे-बाप सब्यूं कु नौं रोशन करे.



Copyright@ Dr. Narendra Gauniyal           

Bhishma Kukreti

इनै उनै बिटेन



                                 जिंदगी



                           भीष्म कुकरेती



जिन्दगी क मजा अर परिभाषा सब्यूँ कुणि बिगळि बिगळि हूंद। अब द्याखो ना डंडरियाल जी क बोल छन बल हम सब्यूँ क राजी खुसी चाँदवां पण अफु से कम. भाग जरूर होंद, निथर म्यार विरोधी कन कैक बड़ो साब बौण? भाग क इ बात छे कि इंद्र कुमार गुजराल जी अर देविगौड़ा जी भारतौ प्रधान मंत्री बौणिन . अब उन त हड़क सिंग जी बि यी बुलणा छन म्यार विरोधी कन कैक मुख्य मंत्री बणणा छन?. अफार स्यू मेहरबान सब्यु मा बुलणु रौंद बल ब्यौ बाद मी त भौत सुखी छौं वा अलग बात च कि वैकी कज्याणि रोज फोन पर अपण ब्व़े मा बुलण नि बिसरदि बल- ए ब्व़े ! ऊ इंजिनियर इ भलो छौ. अब सि कबि ना कबि विजय बहुगुणा जी न हरीश रावत जी खुण बुलणि च," म्यार मुख्यमंत्री पद तुमारा सहकार बगैर नि चौल सकुद बस आप इना पहाड़ आण बन्द करी द्याओ जु तुमारि हाथ मा छें च "

हम पड़ोसी से जादा भाग्यशाली होंदा पण फिर बि पडोसी से जळणा रौंदा.



जापानी कहावत च बल हरेक कुत्ता क दिन फिरदन . पण मीन कै बि लिंडर्या कुता तै मानेका गांधी क ड्रवाइंग रूम मा नि द्याख.

प्रेम चंद जी क बुलण छौ बल मेरी कथा पर आधारित फिलम देखिक मेरी वीं कथा क सही अंदाज नि लगि सकुद. त गुलशन नंदा जी बुल्दा छा कि मेरो उपन्यास से यि अंदाज नि लगाण चयेंद कि मेरी कथों पर शर्तिया बेकार फिल्म बौणलि. वैज्ञानिक बह्ग्वानो खुज त कौरि इ ल्याल पण इ खोज कबि नि कौर सकदन कि टेलीविजन सिरीयलुं कुण विज्ञापन जरूरी छन कि विग्यापनुं कुण सीरियल जरूरी छन.





तबै बात च जब वीरेंद्र पंवार सुखी छ्या याने कि अणव्यवा छ्या या ब्वालो अनमैर्रिड छ्या. वु एक नौनी दिखणा गेन नौनी क ब्व़ेन ना बोली दे कि वीरेंद्र पंवार भरीं जवानी मा दारु पींद. वीरेन्द्र पंवार न बि रैबार भेजि इ दे कि कै दिन मि दारु छोडि द्योलू पण तेरी बेटिक पक्वड़ सि नाक त उनि रालु क ना !



जैन बि ब्वाल ठीकि ब्वाल संस्कृति क्वी कम्यड़ नी च कि लाल रंग मिलाओ अर दिवाल लाल ह्व़े जालि. जैन बि ब्वाल सच इ ब्वाल बल हम लिविंग ऑफ़ स्टैण्डर्ड की लागत कीमत से परेशान रौंदवां पण फिर बि स्टैण्डर्ड बढ़ाणो कोशिश मा इ रौन्दां.

एक नेता न न्यायालय मा एक मेडिकल कम्पनी पर दावा कार अर ब्वाल बल जज साब बल मीन एंटी करप्सन कि कथगा इ गोळी खैन पण फिर बि म्यार रिशवत लीणो ढब ख़तम नि ह्व़े. मेडिकल कम्पनी क मालक जेल मा च.

आज बि बहस चलणि च कि मनोवैज्ञानिक बि भौत सा सवाल पुछ्दो अर सवाल पुछणो पैसा लींद अर अपण घरवळी बि सवाल पुछदि त वा पैसा किलै नि लींदि .



मनोविज्ञान पर बात आई त मर्फी नियम याद औंद बल क्वी ब्वालो कि अस्मान मा घणा खरबों गैणा छन अर हम मानि लीन्दा पण क्वी बवालों बल इन खुर्सी क रंग भूरिण च त हम दस दें खुर्सी तै दिखदा बल या बात सै च कि ना !.

इनाम या प्रसिद्धि वै तै नि मिलदि जु काम करद . अब द्याखो ना हौळ बल्द लगान्दन पण बुले जांद बल 'ये फलण न अन्क्वैक बाई'.



स्कूलम वैबरी भौत गुस्सा आन्द जब तुम तै मास्टर जी उ सवाल नि पुछदन जौंक उत्तर तुम जाणदा छंवां .मास्टर जी वी सवाल पुछदन जौंक जबाब तुम तै नि आंदो.

क्वी हर्चीं चीज जन कि चक्कू चौड़ तबी मिल्दि जब तुम बजार से हैंकि चीज याने कि हैंक चक्कू लै आओ.



सबि चान्दन कि म्यार गांवक भौत प्रगति ह्वाऊ पण क्वी नि चांदो कि या प्रगति म्यार पैसा या श्रमदान से ह्वाऊ बल्कण मा दुसरों पैसा या श्रमदान से ह्वाऊ.

जब क्वी तुम से धीरे हौळ लगान्द त उ सिमसुम या लाटो , कालु या मूर्ख होंद पण क्वी तुम से जरा बि तेज हौळ लगाओ त ओ बौळया होंद.



चबोड्या चखन्योरा लेख कण्डाळिअ झपांग जन हुन्दन दुयूं क मार से खून नि आन्द, बगैर ल्वैखतरी क ल्वैखतरी जन डाउ.



योग सिखाण वळु गुरु अर अच्कालो नेता मा यो फरक च बल योग गुरु आप तै चिंतामुक्त सिवाल्दु च.अच्कालो नेता चिंतामुक्त सियूँ आदिम तै बिजाळिक चिन्तायुक्त कौरी दींदु.   

Bhishma Kukreti

*********दिव्यदृष्टि *********एक गढ़वाली ननि कथा



                  कथाकार- डॉ नरेन्द्र गौनियाल



[गढ़वाली कथाएँ, आधनिक गढ़वाली कहानियाँ, उत्तर भारतीय भाषाई कथाये, उत्तराखंडी कहानियां , गढ़वाली लघु कथा, आधुनिक गढ़वाली लघु कथा   लेखमाला]


शिवरात्रि कु दिन.सुबेर बिटि ही शिवजी का मंदिर मा पूजा-पाती शुरू ह्वैगे.खूब भीड़-भाड़,चहल-पहल.दिन भर बर्त्वयों कु आणु-जाणु लग्यूं रहे.व्रत धारी शिवलिंग पर बेलपत्र,दूध,गंगाजल ,फूल-पाती चढाणा रहीं. हरिद्वार मा दिल्ली रोड पर छायो यू मंदिर शंकर आश्रम का भितर.कॉलेज टैम पर हम बि यखी रैंदा छाया एक कमरा लेकि.
           आज शिवरात्रि कि छुट्टी छै.मेरो बि व्रत लियों छौ. नहे -धुये कि मंदिर मा चलि गयूं, आश्रम का  भितर ही भजन-कीर्तन चलना छाया.दिन भर भीड़ रहे. देर राति  तक  कार्यक्रम चलनु रहे.ब्यखुनी का टैम पर एक कखि भैर बिटि अयाँ  स्वामीजिन  प्रवचन करे.ऊ आश्रम मा ही एक कमरा मा रैणा छया.स्वामीजिन  शिवजि कि महिमा कु वर्णन करते-करते दिव्य-दृष्टि पर बि प्रकाश डालि अर बोलि कि ,''आध्यात्मिक शक्ति अर योग साधना से प्रभु का साक्षात दर्शन ह्वै जन्दीन.कुण्डलिनी जागृत करि कै दिव्य-दृष्टि प्राप्त ह्वै सकद.ईश्वर कि य कृपा  म्यार ऊपर बि च''.
           सबि श्रोता स्वामीजी का प्रवचन सुणि कै खुश ह्वैगीं.देर राति तक प्रवचन चलना रहीं.आज आश्रम कु गेट बि खुला छोडि दिए गे.राति एक बजी करीब फलाहार कैरि हम त से गयां.भक्तजन बि अपणा घौर चलि गैनी.आश्रमवासी बि से गईं.सर्या दिन भर व्रत अर भजन-कीर्तन से थकान बि ह्वैगे छै..इनि नींद पड़ी कि सुबेर तब उठां जब आश्रम मा गबलाट ह्वै.
            उठी के पता चलि कि  आश्रम का भितर कुछ ब्रह्मचारियों कि चोरी ह्वैगे.एक बक्सा क्वी लीगे,जैम रूप्या,लारा-लत्ता रख्यां छाया .इना-फुना सब देखि पण कखि नि मिलु.ह्वै सकद क्वी भगत करि गे कमाल.राति गेट जु खुला छौ.आश्रम का भितर-भैर सब जगा देखि पण कख मिलणु छौ?तब एक आश्रमवासिंन बोलि कि भै जरा ब्यालि वल़ा स्वामी जि तै पुछला..ऊ जणदा छन.सब बताई द्याला कि कख च  अर कु लीगे.पहुन्च्याँ महात्मा छन.ब्रह्मचारी वै कमरा मा गैनी.हम लोग बि दगड़ मा चलि गयां.स्वामी जि अबी तक सियाँ छाया.द्वार खुला छाया. ऊंतई उठाळी.अर बोलि कि यख त एक बक्सा चोरी ह्वैगे.कुछ बताई द्या..कख होलू..कु लीगु होलू.? स्वामी जिन उठिकै आंखि मेंडी अर सिरवाणा मा नजर मारि त ऊंको एक भगोया झोला जैमाँ रुप्या,अर भागोया वस्त्र आदि छा ,सब गायब.कमरा भितर देखि ,पण नि मिलो. भैर ऐकि देखा त स्वामीजी का जुत्ता अर जुराब बि नि छाया...ब्रह्मचारियोंन  बोलि-स्वामीजी क्य ह्वै ?स्वामीजी कि हालत द्यखन लैक छै..ब्रह्मचारी अपणा कमरा मा चलि गईं अर स्वामी बिचारु कपाल पकड़ी कै पटखाट मा बैठिगे .
                 डॉ नरेन्द्र गौनियाल ..सर्वाधिकार सुरक्षित.



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Bhishma Kukreti

                                 व्यंग्य/चबोड्या साहित्य अर व्यंग्यकारों /चबोड्यौं मा हरीश जुयालै भूमिका अर जगा

                                                        भीष्म कुकरेती



जब मीन हरीश जुयालै चबोड्या/व्यंग्य कविता पोथी 'उकताट' की समीक्षा इन्टरनेट मा प्रकाशित कार त मि बी खौंळे ग्यों बल गूगल सर्च मा ये लेख तैं पैलो पन्ना अर पैलो जगा मील. अर अब तक नि बि होला त दस बारा हजार से बिंडी बंचनेरूं न या समीक्षा बांच.अन्तराष्ट्रीय बंचनेरूं ई- -रैबार आणा रौंदन बल हरीश जुयाल की कवितौं अनुबाद अंग्रेजी मा हूण चएंद जां से अंतरास्ट्रीय बंचनेर हरीश की कवितौं रौंस ल्यावन. मीन इन्टरनेट मा पांच सौ से बिंडी किताबुं समीक्षा छपै होली पण प्रतिक्रिया अर बंचनेरूं रौंस को हिसाब से 'उकताट' कविता खौळ कि समीक्षा उच्ची जगा मा च. समीक्षक समीक्षा तबि सवादी अर सही लेखी सकुद जब समीक्षीत साहित्य मा दम ह्वाऊ. कुसवोर्या, हीण, साधारण साहित्य की समीक्षा भली ह्वेई नि सकद. हरीश कि कवितौं मा दम छौ त मेरी समीक्षा मा बि दम आई. उच्चो साहित्य की समीक्षा करण मा बि रौंस आन्द. याच हरीश जुयाल की साहित्यिक तागत को एक नमूना.



                                        गढवाळी गद्य व्यंग्यकारूं सूत भेद अर हरीश जुयाल


यो एक संजोग नी च बल गढवाली गद्य की पवाण मा चाबोड्या ब्यूंत / व्यंगात्मक शैली को बड़ो हात च. गढवळि क पैलो स्वांग (भवानी दत्त थपलियालै -भक्त प्रहलाद, १९१३ ई. ) अर कथा (सदानंद कुकरेती क गढ़वाली ठाट, १९१३ई. ) द्वी चाबोड्या श्रेणी को साहित्य च.

निखालिस चबोड्या निबंध साहित्य की असली पवाण या पछ्याणक 'धाद ' हिलांस,' पराज' पत्रिकाओं अर पैथर 'गढ़ ऐना 'दैनिक से ही माने जालो. याने की गढवाली गद्यात्मक व्यंग्य साहित्य को उदय १९८७ को परांत इ माने जालो. यां से पैल गढवाली गद्यात्मक व्यंग्य साहित्य मा छिट-पुट इ काम ह्व़े . १९८७ से सन १९९९ तक भीष्म कुकरेती (गढ़ ऐना अर धाद), नवीन चन्द्र नौटियाल, नाथी चन्द्र, जगदीश बडोला, भगवती प्रसाद नौटियाल, पूरण पंत को नाम आन्द. ये समौ मा भीष्म कुकरेती क सात आठ सौ जादा व्यंग्य छपेन.नाथी चन्द्र क बारा मा नामी-गिरामी समीक्षक डा. अनिल डबराल बुल्दन बल नाथी चन्द्र की रचना साधारण अखबारी रचना छन; जगदीश बडोला क व्यंग्य एकाद गम्भीर व्यंग्य को नमूना च त एक रचना स्तरीय बि नी च. भीष्म कुकरेती क व्यंग्य रचना " च, छ, थौ " (धाद , जुलाई १९९०) क विरोध मा भ.प्र. नौटियाल न एक व्यंग्य ' पुरू दिदा ' (धाद , ओक्टोबर १९९०) छप पण विरोध की जगा नैतियाल को लेख भीष्म की इ तरफदारी इ लग (डा.अनिल डबराल, 2007).

सन २००० ई.से चिट्ठी पत्री पत्रिका, रंत रैबार सतवार्या (साप्ताहिक), खबर सार अखबार अर इन्टरनेट माध्यम आण से चबोड्या अडगै ( क्षेत्र) मा पूरन पन्त, पाराशर गौड, नरेन्द्र कठैत, त्रिभुवन उनियाल्, चकडैत (उत्तराखंड लाइव वळा), चकडैत(रन्त रैबार वळा-प्रकाश धष्माना ), प्रीतम अपछ्याण, प्रीतम सिंग नेगी, शैलेन्द्र भंडारी, लीला नन्द जोशी, हे.न. भट्ट, शशि भट्ट, संजय सुंदरियाल, आशीष सुंदरियाल आदि गद्य- चबोड्या ऐ गेन . या एक भली बात च.

                  जख तलक गढ़वळी क ख़ास चाबोड्या लिख्वारूं मा भीष्म कुकरेती क चबोड़ विषय अर ब्यूंत क हिसाब से चौतार्फ्या व विवध च. पण समीक्षकुं बुलण च बल भीष्म कुकरेती की एक खासियत च बल भीष्म कुकरेती का व्यंग्य /चबोड़ बणाण्क लगान्दन याने भीष्म कुकरेती का चाबोड्या लेख चर्चा पैदा करी ई दीन्दन ( डा. अनिल डबराल, २००७). अबोध बंधु बहुगुणा (कौंळी किरण २००० ई.) भीष्म कुकरेती तै सरोळया,खरोळया, खचान्ग लगौण्या, ठुणो उठोण्या, खीर मा लूण धुलोण्या, घपरोळया व्यंग्यकार माणदो अर हाँ अर हाँ मार्गदर्शक बि बथान्दो . जख तलक भीष्म कुकरेती को अपण बारा मा बुलण च बल हाँ " म्यरा चबोड्या लेख छ्वीं- चर्चा पैदा नि कौरन त मि तै मजा इ नि आन्द ). वीरेंद्र पंवार भीष्म कुकरेती तै गढ़वाळी व्यंग्य को भीष्म पितामह बुल्दो (बीं 2012) . औसतन भीष्म कु व्यंग्य मा हौंस उथगा नी च जथगा हरीश का व्यंग्यों मा मिलदी

 

पाराशर गौड़ की जथगा तारीफ़ करे जाओ ओ कम इ होलू. कनाडा मा रैक कुछ समौ पैल पाराशर गौड़ रोजाना या हर दुसर दिन एक गढवळि व्यंग्य इन्टरनेट मा छापान्दो छौ. संख्या मा पाराशर गौड़ का व्यंग्य तीन सौ से जादा छन. पाराशर गौड़ का द्वी किस्मौ व्यंग्य छन. एक छन जो गढ़वाल मा बचपन कि समळौण अर आज को गढ़वाळ मा जन्मी नवाड़ी संस्कृति क तुलनात्मक स्तरौ व्यंग्य. दुसर किसम च आज की घटनाओं से उपज्यां सरासरी मा लिख्यां व्यंग्य. पाराशर का पैलो किस्मो व्यंग्युं मा टीस/खुद जादा च.त दुसर किस्मौ व्यंग्य सौम्य बि छन त कटाण्ग बि लगान्दन. भासा मा असवाळस्यूं की बोलचाल कि भासा अबि बि च. जादातर व्यंग्य छ्वटा अर सौम्य छन.हरीश अर पाराशर की व्यंग्य शैली अर भाषा अलग अलग छन त तुलना करण ठीक नी च. नरेंद्र कठैत क बारा मा भगवती प्रसाद नौटियाल को ख्याल च बल नरेंद्र कठैत 'आदर्शवादी' व्यंग्यकार च त शिव सिंग निषंग को बुलण च बल कथित 'व्यास शैली' को लिख्वार च (कठैत की किताबुं भूमिका मा ). हरीश जुयाल का व्यंग्यों मा कठैत से हौंस भौति जादा च अर हरीश का व्यंग्यों मा कविताई बहाव च .

              पूरण पंत न भौत पैल गद्य व्यंग्य लिखण शुरू कौरी छौ पण कविता अर संपादन मा जादा व्यस्त होण से वैक यीं विधा मा ध्यान कम राई पण अबि अबि प्रकाशित व्यंग्य पोथी 'स्वस्ति श्री' बथान्दी बल पूरण पंत को ज़िकर कर्याँ बगैर गढ़वळी गद्य व्यंग्य साहित्य को ज़िकर ह्वेई नि सकद, पूरण पंत का व्यंग्य इनी छन - जन क्वी बुल्यां मर्खुड्या बल्द फ्वींफाट करदो, जन बुल्यां यी व्यंग्य /चबोड़ - उड़द डै अर बैठद दै गरुडों फड़फडाट करणा ह्वावन धौ, अर कखी कखी त करैं पंछी जन शाराप बि लगदन. पंत का व्यंग्य भिभरट्या छन, सिपड़ी तड़काँणो डा दीन्दन यि व्यंग्य. पूरण पंत अर हरीश जुयाल द्वी व्यंग्य काव्य का सूर्य छन पण जख तलक गद्यात्मक व्यंग्य सवाल च पंत का गद्य व्यंगों मा हरीश जुयाल से कम हौंस पाए गे. व्यंग्य का मामला मा पंत असला मा अबोध बंधु बहुगुणावादी व्यंग्यकार च जो विद्वता या इंटेकचुवलिटी पर विश्वास करदो त हरीश जुयाल व्यंग्य का मामला मा कन्हयालाल डंडरियालवादी च याने कि गद्यात्मक व्यंग्य मा इमोसन या भावनाओं को बहाव . पंत का गद्यात्मक व्यंग्य गद्य का जादा नजीक छन त हरीश जुयाल का गद्य व्यंग्य -कविता का छैल तौळ आणा आतुर रौंदन.पंत बुद्धि से व्यंग्य रचद दिख्यांद त हरीश जुयाल गद्य व्यंग्य बि जिकुड़ी /हृदय से रचद दिख्यांद. ब्यूंत अर व्यंग्य करणो ढौळ का मामला मा पूरण पंत अर हरीश जुयाल बिलकुल अलग अलग चंखों मा चढ़याँ लगदन. दुयुंक विशेषता या च दुयुंक साम्यता ह्वेई इ नि सकदी. या बात गढवळी व्यंग्य का वास्ता एक सकारात्मक  सैन/ संकेत च



                दुई 'चकडैत' सतवार्या अखब़ारूं कुणि लिखदन त यूँ दुयूं क व्यंग्युं मा निपट वर्तमान की घटनों विषय हूण  लाजमी च. प्रकाश मणि धष्माना (रंत रैबार को चकडैत ) क व्यंगों मा तर्कशाश्त्र को पूरो ध्यान रौंद अर याँ से यूँ व्यंग्युं मा हौंस कम होंद. हाँ विषय मा प्रकाश मणि धष्माना अग्वाड़ी ह्व़े जांद. प्रकाश मणि धष्माना क व्यंग्युं मा संपादकीय गंध बि मिल्दी. याने कि पाराशर गौड़ , प्रकाश धष्माना अर 'चंडीगढ़ का चकडैत का व्यंग्युं मा एक खासियत च की यी व्यंग्य सरासरी मा लिख्यां रौंदन.

                  त्रिभुवन उनियाल को खबर सारौ खाम (कौलम ) की छ्वीं समीक्षक कम इ लगांदन   यो त्रिभुवन उनियाल को दगड एक नाइंसाफी च. त्रिभुवन उनियाल न गढवळी व्यंग्य मा एक अलग शैली अपणायि.अर या शैली च द्वी मनिखुं मा बचळयातौ ब्यूंत . त्रिभुवन उनियाल क "हेलो! हेलो! परधानी बौ" ' कॉलम 'खबर सार' पन्द्रावारो अखबारों एक महत्वपूर्ण अर अभिन्न कॉलम च. डाईलौग /बचळयात  शैली मा त्रिभुवन उनियाल का व्यंग्य भौत इ सामयिक छन पण ऊं मा सरासरी मा रच्यां कमजोरी नि दिख्यांदी.

त्रिभुवन उनियाल अर हरीश जुयाल मा एक खासियत च अर वा खासियत च दुयुंक व्यंग्यों मा हौंस हौर व्यंग्यकारूं से जादा रौंद. पण इखम बि हरीश अर त्रिभुवन कि तुलना नि ह्व़े सकदी किलैकि दुयुंक शैली मा अपणी इ ख़ास विशेषता च. त्रिभुवन का व्यंग्य शैली बचळयातौ ब्यूंत च त हरीश को अलग ढौळ च.

एक सबसे बडी खासियत या विभिन्नता या च बल हरीश जुयाल ठेट गाँव मा रौंद अर असलियत का भौत इ नजीक च जब कि बकै व्यंग्यकार या त कस्बों मा रौंदन या मेट्रो मा. फिर चाहे कविता ह्वाओ या गद्य हरीश जुयालौ कवितों या गद्य मा लोक काव्य की ज्वा लौंस च वा हैंको कै बि व्यंग्यकार मा नी च.

                                                हरीश जुयालौ गद्य व्यग्य संसार


                     'ओम मही खाणम्' लेख मनिखों अफखवा प्रवृति अर प्रशासन, शिक्षा, अर प्रजातंतरौ पौ ( मास्टर , पटवार्युं, गर्म प्रधान ) क स्वार्थी भ्रष्ट तंत्र पर चमकताळ लगान्द.

'पर' लेख मनिखों भगार लगाणै आर चरित्र हनन करणो आधारभूत प्रकृति पर खैडौं कटाण्ग लगाण सफल च.

'बल' लेख बथान्द बल कविता सुंणदेर हरीश जुयाल तै किलै कवि समेलनो बादशाह बुल्दन. 'बल' मा हरीश न शब्दुं तै गुलाम बणैक बचनेरूं हंसाई बि च अर दगड मा हमारि पर्विर्ती पर चुनगी बि दे.अनुप्रास (अतिशयोक्ति, वृत्य, अन्त्यानुप्रश, पुनरूक्ति , पुनुर्क्ति आदि) अलंकार, उपमा अलंकार, मालोपमा, उत्प्रेक्षा, अर हौरी अलंकार दिखणो, अनुभव करणो अद्भुत नमूना च 'बल' लेख.

'अतिरिक्त योजना' गढवळयूँ पर मुठक्यूँ मार च. , समाज की ' भैर वळौ खुणि हम गौ अर भितर वळौ खुण खौ" जन प्रवृति तैं हरीश न चबोड्या थान्तो न इनी थंत्यायि /थींच जन बुल्यां उड़द-गैथ थंत्याणो ह्वाओ. ये लेख मा बि अनुप्रास अलंकार का कथगा उदहारण मिल्दन. इन लगद जन बुल्यां शब्द हरीश का ड़्यार नौकरी करणा ह्वावन धौं.

'कट्वरि सिस्टम' इन बथान्द बल राज क्वी बि ह्वाओ घूसखोरी होंदी च बस घूसखोरी अर घूस को रूप बदले जांद. संसार को गद्य मा उपमा अलंकार को विशिष्ठ नमूना च ''कट्वरि सिस्टम' अर दगड मा खिकताटि हंसी मोफत मा सुप्प भोरिक मिलदी .असलियत तै अलंकृत करण सिखण ह्वाओ त 'कट्वरि सिस्टम' बंचण जरूरी च.

'जुत्त' लेख समाज मा अंधविश्वास, एक हैको पर अविश्वास , प्रशासन, राजनीति तै जुत्तुंन खुले आम , बीच बाटो मा सब्युं समणि जुत्यांद. अर मजा क बात या च कि लोक सभा क घूसखोर सदस्य अर सज्जन सदस्य हरीश जुयाल को कुछ नि कौर सकदन किलैकि चबोड़ी जुत पर हौंस को पौलिश जि लगीं च. 'जुत्त' लेख व्यंग्य, चबोड़ , चखन्यौ रुपी हिसर का कांडों बीच हौंस रुपी हिसर का दाण जन छ .

आज 'पाणी' मनिखों बान एक गंभीर मुद्दा च अर इख पर हरीश जुयाल न गम्भीर चर्चा 'पाणी' लेख मा हंसी हंसी मा करी या च हरीश कि खूबी.

'मनख्यात' लेख प्रतीकात्मक ब्यूंत को एक बढिया उदाहरण च अर दगड मा कथनी (नेम प्लेट की लेखनी ) , सामजिक कामों मा बि सरकार पर निर्भरता , समाज मा अपणी भासौ प्रति उदासीनता , मनिख की निर्दयिपन पर घमकताळ च, लत्ती च, नंगो करणो एक नमूना च. अर लेख मा हौंस त व्यंग्य की असली दगड्याणि च

'कुकुर' असला मा नवाडी सौकारूं की पोल खुलद अर दगड मा हौंस का भूड़ा बि खलांद.

'जिलगंड भाई जिंदाबाद' आजौ अजू समाज अर आजै राजकरणि क दोगलापन पर मुंगरौ मार अर मजा या च बंचनेरूं क आंख्युं मा हौन्सन अन्सदरी बगणा रौंदन पण भितर जिकुड़ी मा दौन्कार पड़णि रौंद कि ये सड़यूँ समाज अर सड़ी राजकरणि को क्या करण ?

'घुती दा कि चिट्ठी रामप्यारी बौ खुणि ' अर 'रामप्यारी बौ कि घुती दा खुणि ' एक भाषाई प्रयोग च पण गढवळी साहित्य मा इन प्रयोग क्या करण्याइ जब गढ़वाली उनि बि गढवळी गद्यकार अपण गढवळी गद्य मा बीं बरोबर गढवळी प्रयोग करदन.

'ब्वाडा अर झुमैलो' लेख अन्तराष्ट्रीय राजनीति तै दर्शाण मा सफल हौंसण्या चबोड़ च अर सोटी/ चाबुक बि च .

'थकुला चोर ब्वारी को महात्म्य ' लेख मा हौंस व्यंग्य पर भारी च पर व्यंग्य मा कमी नि आँदी या इ त खूबी हरीश तैं हौर गढवळी व्यंग्यकारूं से विशिष्ठ बणान्द. ये लेख मा भौं भौं किस्मौ अलंकार दिखणो मिल्दन. गद्यकार को शब्द सामर्थ्य को एक नमूना च 'थकुला चोर ब्वारी को महात्म्य' लेख .

'गढवळी साहित्य पर ब्वाडा को इंटरव्यू ' साहित्यकारों खलड़ खैन्चद .

'ब्वाडा क सुपिन' , 'ब्वाडा क सामाजिक चिंतन', 'ब्वाडा क चिंतन' ब्वाडा क पुरुष दर्शन' अर ब्वाडा का लोकल रत्न ' लेखुं मा प्रयोग बि च, शब्दों जादूगिरी बि च अर व्यंग्य कि मार बि च. यूँ लेखुं मा हिंदी, अंगरेजी अर गढ़वळी शब्दुं क

बैठाव बिठाण मा हरीश जुयालन कथगा इ प्रयोग करीन .

                        भाषा पर पकड़ मा त हरीश जुयाल 'कुटज' दुनिया का कन कन व्यंग्यकारूं से अगनै च. शब्दुं से मारण, पिटण थिंचण अर हंसाण मा हरीश कि जथगा बि बडै करे जाव कमी इ च.

                      चबोड़ इ चबोड़ मा पाप अर पाप्युं तैं थप्पड़याण; निकज्ज, निर्लज्ज, मौकापरस्त , बिलंच अर भ्रष्ट राजकरणि वळु तै खुले आम जुत्याण; बेकार मा सरकारी खजाना से कमै करण वाळ नौकरशाही या मास्टर, अर ठेकेदारू तै बीच बजार मा नंगी करण; अळगसी , डरख्वा समाज पर फड्याण; धुर्यापन कि खिल्ली उड़ाण, सौज-सौज मा अड़ाण अर दगड मा हौंस कि छळाबळि करण वाळ हरीश जुयाल जौनाथान स्विफ्ट (१६६७-१७४५), मार्क ट्वैन (१८३५-१९१०), अरिस्तोफेंस (446- 386 B.C. ), हेनरी फील्डिंग (१७०७-१७५४) , डब्ल्यू. एस. गिल्बर्ट (१८३६-१९०१) , रे ब्रेडबरी, रोजर अबोट, जफर अब्बास, स्टीव बेल जन नामी गिरामी व्यंग्यकारूं दगड बैठण लैक च.

                     इख्मा क्वी द्वी राय नी च बल 'खुबसाट' चबोड्या खौळ (व्यंग्य संग्रह ) सरा व्यंग्य संसार को बान एक ख़ूबसूरत जेवर च. अर आस च बल अग्वाड़ी बि हरीश जुयाल 'कुटज' इनी चबोड्या खौळ दुनिया तै दीणु रालू

भीष्म कुकरेती
मुंबई ,

मई २०१२,





सूत भेद अधार (सन्दर्भ) -१- Bhishma Kukreti, Uktat: Satirical Poems by Harish Juyal, http://www.apnauttarakhand.com/uktat-poems-of-harish-juyal-book-review/

२-डा, अनिल डबराल , २००७, गढ़वाली गद्य परम्परा , इतिहास से वर्तमान, (पृ.४२१-४२६)

३- धाद, गढ़वाली ऐना , चिट्ठी पत्री, रंत रैबार , खबर सार, उत्तराखंड रिव्यू का अंक

Bhishma Kukreti

चबोड़ इ चबोड़ मा  गंभीर छ्वीं

                                    गढ़वळि संस्कृति क  खोज मा


                                                खुजनेर - भीष्म कुकरेती


   पता नि किलै  धौं  अच्काल जै पर बि द्याखो संस्कृति  खुज्याणो खजि लगीं च. मि खामखाँ इ अपण ड़्यार आ णु  थौ कि इ-उत्तराखंड पत्रिका क विपिन पंवार जीक फोन आई बल,"भैजी आप गाँ जाणा  छंवां  त जरा गढ़वळि संस्कृति क इंटरव्यू लेक ऐ जैन, अच्काल  गढ़वळि संस्कृति कि बड़ी भारी मांग च."

                जब बिटेन मीडिया वाळु न सूण कि मार्केटिंग कु  नियम च कि अपण ग्राहकुं तै वो इ द्याओ जु ऊं तै चयाणु ह्वाऊ त मीडिया वळा अपण बन्चनेरूं   भौत खयाल करण मिसे गेन। वो अलग बात च कि भारत वासी हिंसा ,  अनाचार, अत्याचार, भ्रष्टाचार से निजात चाणा छन अर अखबार या  टी.वी वळा यूँइ  खबरों ता जादा महत्व दीन्दन. 

        ग्राहक की मांग देखिक इ विपिन पंवार जीन बोली होलु कि गढ़वळि संस्कृति क इंटरव्यू ल्हेकी ऐ जयां. मीन बि स्वाच कि उनि बि मि खांमाखां गाँ जाणु   छौ त यीं बौ मा कुछ काम नी त स्या कलोड़ी  काँध  मलासणि च वळ हिसाब से मीन स्वाच कुछ ना से बढिया बेकार को इ सै कुछ त काम मील. चलो ए बाना गढ़वळि संस्कृति से बि मुलाकात ह्व़े जालि अर   म्यार टैम बि पास ह्व़े जालो.   

                      पण सबसे बड़ो सवाल यू छौ कि या गढ़वळि संस्कृति कख रौंदी अर या  होंदी कन च अर यींक रंग रूप क्या च !   

     जब मि छ्वटु थौ या जवानी मा गाँ मा रौऊ त में तै कबि बि खयाल नि आई कि मै तै गढ़वळि संस्कृति दगड मेलमुलाकत रखण चयांद कि कुज्याण  कब काम ऐ जाओ धौं !  ना ही हमन किताबु मा बांच कि गढ़वळि संस्कृति बि क्वी चीज  होंद. हम न त यू. पी बोर्ड क स्कूलूं  मा यि पौड़ कि हमारि संस्कृति माने अयोध्या या मथुरा अर बची ग्याई त इलाहाबाद अर वाराणसी. जब मुंबई मा औं त चालीस साल तलक नौकरी संस्कृति या मार्केटिंग संस्कृति दगड़  पलाबंद कार अर अब तक यूँ द्वी संस्कृत्यूँ छोड़िक कैं  हैकि दगड आँख उठै क बि नि द्याख. कबि इन बि  नि सूझि  कि एकाद चिट्ठी गढ़वळि संस्कृति कुणि भेजि द्यूं जां से कबि गाँ जाण ह्वाओ त गढ़वळि संस्कृति तै पछ्याणण मा दिक्कत नि ह्व्वाऊ. गढ़वळि संस्कृति कुणि चिट्ठी भेजणु रौंद त आज औसंद नि आणि छे. पण अब त संस्कृति  तै अफिक खुज्याण इ च .

        मि ब्यणस्यरिक मा बिजि  ग्यों बल सुबेर सुबेर संस्कृति दिखे जालि.   मि अन्ध्यर मा इ गाँ ज़िना ग्यों .  यू बगत जन्दुर पिसणो च त जनानी जंदुर पिसणा होला त सैत च गढ़वळि संस्कृति जंदरो ध्वार  मिल जालि. मि अपण दगड्या  सूनु  काक क  चौक मा ग्यों कि मै तैं ठोकर लगि  गे.  एक अवाज आई ,' हाँ ! हाँ ! लगा रै बुडडि तै ठोकर ! " हैं , इन आवाज त सूनु काक जंदरो छौ." मी टौर्च जळाइ देखिक खौंळे ग्यों सीडी क बगल मा तौळ एक जंदरौ तौळक  पाट भ्युं पड्यू  छौ. मीन पूछ,' हे जंदुर इखम क्या करणि छे?"

जंदर क तौळक पाटन कळकळि भौण  म जबाब दे ,"बुड्यान्द  दैक  दिन कटणु छौं"

"हैं ! पण यू बगत त चून-आटो पिसणो च?" मीन पूछ   

जंदरौ न जबाब दे, ' अरे लाटु अब नाज क्वी नि पिसद. अब त फ्लोर मिल या पिस्युं आटो जमानो च ." 

मीन दुखी ह्वेक अफु कुण ब्वाल," अब संस्कृति कख मीललि !"

जंदरौ तौळक पाट न बोलि," वींक ले क्या,  बदखोर ह्वेली डीजल  चक्यूँ ध्वार."

मि जाण बिस्यों त जंदरौ  पाट न बोलि, ' ह्यां जरा एक काम करि दे. म्यार बुड्या उख गुज्यर भेळुन्द पड्यू च . भौत बुरी हालत मा च. कथगा दै बुड्याक रैबार  ऐ ग्याई बल  आखिरैं मुख जातरा देखि ले.केदिन ले हम कन एक हैंकाक मीरि  बुकान्दा छ्या (मीरि  बुकाण- किस/चुम्मा  का प्रतीतात्मक शब्द है )." मै समज ग्यों कि जंदरौ तौळक पाट  मथ्यौ पाट तै मिलणो जाण चाणो च . लव, प्यार, माया सब्यूँ मा  जगा इकसनी होंद, चाहे जीव हो या निर्जीव!  मी तौळ क पाट तै कंधा मा उठैक  गुज्यर जिना ग्यों . बाट मा जंदरौ तौळक पाट न भौत सी कथा सुणैन.  गुज्यरो हालात पैलाक जनि इ  छे. हाँ ! पैल लोग रंगुड़ डाल्दा छ्या अब क्वी रंगुड़ नि डालदो. एक जुम्मेवार प्रवासी की असली भूमिका निभांद निभांद मीन वै जंदरौ तौळक पाट तै गुज्यर क भेळउन्द लमडै द्याई अर अब यि द्वी प्रेमी मीलि जाला अर एक हैंकाक मीरि त नि बुकाला पण एक हैंक तै दिखणा राला.  . अब यि जंदुर बि प्रागैतिहासिक काल की वस्तु ह्व़े जाला.

       अब मीन स्वाच की सुबेर हूण इ वाळ च  जनानी पींडौ तौल लेकि संन्यूँ  /छन्यूँ मा आणि ह्वेली . मै लग बल उख सन्यूँ मा गढ़वळि संस्कृति  क दर्शन ह्व़े इ जाला अर मि गढ़वळि संस्कृति क इंटरव्यू उखी छन्यूँ मा ले ल्योलु. अब चूंकि मेरो त सरा मुन्डीत  इ प्रवाशी ह्व़े ग्याई त हमारि गौशाला, सन्नी या छन्न्युं मा गढ़वळि संस्कृति त मिलण से राई. अर उन्नी बि गढ़वळि संस्कृति तै अपनाणो  काम हम प्रवास्युं थुका च गढ़वळि संस्कृति तै अपनाणों जुमेवारी  गढ़वाळ का बासिन्दौ कि ही हूण चयांद कि ना ? अरे हम प्रवासी गढ़वळि संस्कृति अपणावां कि भैर देसूं संस्कृति  अपणावां ! जख रौला उखाक इ संस्कृति अपनाण इ ठीक च कि ना?

  त मि दुसरो छन्न्युं मा  ग्यो. मि जब छ्वटु छौ त  ये बगत (घाम आणौ  टैम पर) गाँ से जादा चहल पहल सन्न्युं ज़िना होंद छौ. गोर भैर गाडो, मोंळ भैर गाडो, दुधाळ गौड्यू  तै पींड खलाओ, घास खलाओ . ये बगत संन्युं मा  भौत काम हूंद थौ.

मि एकाक सनि/छनि/गौसाला   मा ग्यों त उख सुंताळ लग्यु छौ. सन्नी चौक मा तछिल, कण्डाळि  अर लेंटीना  जम्यु छौ. सन्नि क नाम नि छौ  बस जंगळ इ जंगळ. फिर मी स्ब्युं सन्न्युं मा ग्यों  त सबि जगा इ हाल छौ. सब जगा जंगळ को माहौल. मी अपण सन्नि म ग्यों त मी बेसुध ह्व़े ग्यों .सन्नि गायब छे बस घास अर घास अर द्वी तीन गीन्ठी डाळ बि जम्याँ छ्या. जब सनी  इ जंगळ मा तब्दील ह्व़े गेन त उख संस्कृति ह्वेली ना. मि निरसे ग्यों.

इथगा मा म्यार बाडा क सनि  बिटेन धै आई., ह्यां जरा इना आवदी  "

मी अपण बाडा क छनि क चौक ज़िना ग्यों त उख भैंस बाँधणो कील मी तै भट्याणु छौ.  कील मा अब जान  त नि छे पण मीन पछ्याणि दे कि यू बड़ो प्रसिद्ध कील छौ. म्यार बूड दिदा न यि सालौ कील घौट  होलु पर अब भसभसो ह्व़े ग्या छौ.

मीन ब्वाल , 'कन छे  ये भैंसों कील ?"

कीलन जबाब दे, ' बस दिन बिताणो छौं. आज ना त भोळ . बस एक इ लाळसा बचीं च कि अपण ठाकूरो   (म्यार  बाडा क नौनु) क दर्शन कुरु द्यूं . पोर ऐ बि छ्या नागर्जा पुजणो पण इना नि ऐन . जरा रैबार दे देन कि जब तक उ नि आला मीन नि मरण. मोरी बि ग्याई त इखी रिटणु रौण. कखि हंत्या रूप मा ऐ ग्याई  त फिर तुम लोगुन हंत्या बि पुजण अर दगड मा  गाळि बि दीण" मी कीलो दगड भौत देर तक छ्वीं  लगाणु रौं. मीन कील तै भर्वस दिलाई कि दादा जरुर त्वे तै दिखणो आलु  .

मी तै संन्युं हालत से उथगा दुःख, निरासा नि ह्व़े जथगा दुःख यू ह्वाई कि मै तै गढ़वळि संस्कृति इख नि मील अर मी वींको इंटरव्यू नि ले साको.

अब घाम ऐ गये छ्याओ .

हैं ए म्यारो भूभरड़! तौळ संन्युं से एक रस्ता च . मीन द्याख कि गाँ वाळ परोठी, बोतल लेकी दौड़णा सि छ्या. झाड़ा फिराग जाणो बगत बि च. झाड़ा जाणो गुज्यर त हैकि दिसा मा च त फिर यि गौं का लोग इन किलै इक दगड़ी दौड़णा छन ? अर झाड़ा जाण दै परोठी त क्वी नि लिजांद भै !

मीन स्वाच कि जख यि गाँ वाळ जाणा छन वख जरुर गढ़वळि संस्कृति से भेंट ह्व़े जाली.



(गांका लोग कख अर किलै भागणा छया? क्या मै तै संस्कृति क दर्शन ह्व़ेन ? अर ह्वाई च त संस्कृति क्या ब्वाल ? यांक बान अगलो भाग )

Read second part----

Copyright@ Bhishma Kukreti , 7/7/2012

Bhishma Kukreti

Gaun ka Rista: A Garhwali Love Story with Difference

(Review of Garhwali Story collection 'Gari' (1981) by Durga Prasad Ghildiyal)

                                 Bhishma Kukreti

[Notes on Love Stories with Difference; Garhwali Love Stories with Difference; Uttarakhandi Love Stories with Difference; Mid Himalayan Love Stories with Difference; Himalayan Love Stories with Difference; north Indian Love Stories with Difference; Indian Love Stories with Difference; SAARC Countries Love Stories with Difference; South Asian Love Stories with Difference; Asian Love Stories with Difference]
[प्यार की कहानियाँ ; प्यार की आधुनिक गढ़वाली कहानियाँ ;प्यार की उत्तराखंडी कहानियाँ ;प्यार की मध्य हिमालयी कहानियाँ ;प्यार की हिमालयी कहानियाँ ;प्यार की उत्तर भारतीय कहानियाँ ;प्यार की भारतीय कहानियाँ ;प्यार की सार्क देशीय कहानियाँ ;प्यार की दक्षिण एशियाई कहानियाँ ;प्यार की एशियाई कहानियाँ लेखमाला] 

               Rukma and Raghuveer are from the same Garhwali village. The village is an average village- a small village. The untold and strict rule is that a girl is sister of a boy -never mind the different caste. The rules are created by society and the rules of our human body are created by god or nature. There is always attraction from a male body towards female body. Rukma and Raghuveer fell in love. However, the village rule won the battle between love and culture. The love between Rukma and Raghuveer finished when both marry to other mates.
    Now, both were parents of well grown children. Is it possible to create a new relationship between two old lovers? The story discusses the point of village rules and new changing aspects of society.
     A story writer foresees the future too. Durga Prasad brings the tedious subject of love between boy and girl of a same village before 1981. The story takes the readers finding differences among three generations. Reader is also tensed in finding the real solution to know the meaning of relationship- relationship of village norms and relationship by emotions. The story writer Ghildiyal expertly portrays romance, love and the meaning of love.  There is space for readers to think after finishing the story.
Reference-
1-Abodh Bandhu Bahuguna, Gad Myateki Ganga
2-Dr Anil Dabral, 2007 Garhwali Gady Parampara
3-Bhagwati Prasad Nautiyal, articles on Durga Prasad Ghildiyal l in Chitthi Patri
4-Dr. Nand Kishor Dhoundiyal, Garhwal Ki Divangat Vibhutiyan
Copyright@ Bhishma Kukreti, 7/7/2012
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Bhishma Kukreti


*********भूख (हल्कार)******** एक गढ़वाली कथा

कथा --डा. नरेंद्र गौनियाल





द्वीई झण चार बीसी से जादा ह्वैगे छा पण इना-फुना खूब चलदा-फिरदा छाया.नौना-ब्वारि अर नाती-नातिणो का दगड़ भलि कटिनी छै जिंदगी. एक दिन अचणचक राति मा मंगल सिंह कि जिकुड़ी सियाँ मा ही बुजि गे.राति बुढडी तै कुछ पता नि चलि.बुढयन राति पाणि तक नि मांगु.सुबेर जब ब्वारि च्या लेकिगै त ससुर जि पर बाच न सांस.बुढडी झंपा,नौनु उदेसिंह,नाती-नतीन सब्यों हलोळी पण कुछ बि ना.हड़क ना मड़क.उदेसिंहन चिम्चा से पाणि डाळी पर घुटेणा का बजाय भैर जिकुड़ीउन्द खतिगे.ये ब्वे ! क्य ह्वै त्यार बाबा तै ?इनु बोलि कै बूडन ह्यळी मरणि शुरू करि दीं.किलकारी मारि कै बोलि-ये बुड्या कनु गै तू,मीं छोडीकै....मिन कनकै रैण..मी बि लीजा अफु दगड़...ये ब्वे..ब्यालि राति त खिरबोजा सागा दगड़ी द्वी घुसळी खएं अर एक गिलास दूध बि पे.अर यू राति मा ही क्य ह्वै  ? ब्वारी,नाती-नातिन बि रूण लगी गईं.किलकिलाट  सूणि कै गौं का बैख-  जनाना सबि ऐगीं.सब यी छवीं लगाणा रैं कि स्वां चलि गे बिचारो.म्वरंद दा क्वी परेशानी नि ह्वै.
                 घाम आणा का बाद शैय्या तैयार ह्वैगे.मर्द लोग तिथाण मा चलि गईं बुड्या तै फुक्णो अर बेटुला ऊंका घार मा बैठ्याँ रैनी. दिन मा पड़ोस बिटि च्या बणी कि ऐ. सब्योंन पे पण बुढडीन नि पे.नाती-नातिनो तै पड़ोसियोंन ही रोटी-सब्जी खिलाई दे.शोक मनाणो तै अपणो घार मा कुछ नि बणायीं.इन मा कैकु ज्यू ब्वल्द अर कुछ रस्म-रिवाज बि द्यखण पडदीं.
                 ब्यखुनी चार बजि करीब रौल बिटि लोग वापस ऐनी. ब्वारिन ओबरा मा च्या बणे.च्या पीकी सब लोग हर्बी अपणा घौर चलि गैनी.राति कुछ लोग फिर ऐनी बैठणो.पड़ोस कि एक बेटुलिन रसोड़ा मा जैकि रोटी-साग बनै दे.नाती-नातिनो तै खिलाई कि वींन बोलि कि तुम लोग बि खै लिया.सब लोग बाद मा अपणा घौर सीणों चलि गिन.बाद मा उमेदु बि खैकी सेगे.
                ब्वारिन सासु तै बोलि कि रोटी बणी छन,खैल्या..बुढड़ीन बोलि कि ना. ना .मीं से त नि खयेणु,तू खैले.दिन भर का नि खयान भूख त लगीं छै पण...कुछ देर मा सासुन फिर ब्वारी तै बोलि कि तू खैले.मीखुणि च्या बणे दे.भूख-प्यास से बुढडी कु गिच्चू सुखणू छौ..ब्वारिन च्या बणेकी दे .अर फिर बोलि कि ..एक रोटी खैल्या च्या का ही दगड़. लदोड़ी मा हल्कार त  भौत हुईं छै पण...फिर बि बूडन बोलि कि  ना ना मीतै भूख नी..तू खैले . ब्वारिन बोलि कि तुम नि खांदा त मि बि नि खांदु..भुकी से जांदू.इन बोलि कि व अपणो कमरा मा ऐगे.कुछ देर  बाद रसोड़ा मा गै अर चार रोटी सल् कैकि टुप्प सेगे.हैंका भितर बूड तै निंद नि ऐ.राति भर उनि रै हरकणी-फरकणी.
          सुबेर ब्वारिन च्या बणाई.च्या का बाद कल्यो रोटी पकै.आलू कु साग बि दगड़ मा छौ.सासु तै देकी बोलि कि अब त खै ल्या तुम.सासुन बोलि कि क्य कन तब खाणु त च.,निथर तिन बि रैंण भुकी.बूडन चार रोटी उनि सळकै दीं बिन चपयाँ.कुटमदरिन बि कल्यो रोटी खै अर लगी गईं अपणा काम-धंधा पर.आखिर पेट कि भूख कैन सहे सक.जै दिन य भूख मिटि जाली,वै दिन दुन्य ख़तम ह्वै जाली.                     

Bhishma Kukreti

Chunav:  Garhwali Drama Portraying Malpractices in Election

(Review of Garhwali Stage Play 'Chunav' (2001) by Om Prakash Semwal)

                                  Bhishma Kukreti
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        Om Prakash Semwal wrote and staged a Garhwali drama 'Chunav' in G.I. College Chopta, Garhwal in 2001. The story deals with the theory of problem of 'power corrupts'.  Gram Pradhan take developmental works and enjoys the benefits of village developmental works along with his family members and his supporters.  A couple of aware people want to oust present Gram Pradhan and elect a honest person. However, the corrupt Pradhan and his supporters don't like the idea of some body is opposing them. There are scenes of social conflicts in the drama. At the time of election, present Gram Pradhan uses all sorts of malpractices. Now, the election machinery comes into action.
  The dram portrays the present crumbling   situation of country and the selfish interest and malpractices by leaders in power.

Copyright@ Bhishma Kukreti, 7/7/2012
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