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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti

गढवाली  कवि श्री  प्रभात सेमवाल  जी  दगडभीष्म कुकरेतीअ    छ्वीं

भीष्म कुकरेती - सेमवाल जी यू त पता च बल आप गढवळि मा कविता करदन । जरा अपण बारा  म कुछ ब्योरा देला त मेहरबानी ह्वेलि

प्रभात सेमवाल- कुकरेती जी सिमानी .


भीष्म कुकरेती - आप साहित्यौ दुनिया मा कनै ऐन?

प्रभात सेमवाल- साहित्यौ दुनिया मा आणा कु खास कारण म्यारा बचपन कु वातावरण छ .


भी.कु- वा क्या मनोविज्ञान छौ कि आप साहित्यौ  तरफ ढळकेन ?

प्रभात सेमवाल- म्यारा हिसाब सि कैतेन अपणा मन की बात बिगाण कु सबसि भल्लू तरीका कविता छ अर यही वजह छ म्यारू साहित्यो तरफ जाणक मन करदू .


भी.कु. आपौ  साहित्य मा आणो पैथर आपौ बाळोपनs     कथगा हाथ च ?

प्रभात सेमवाल- बहुत बडू हाथ छ .


भी.कु- बाळपन मा क्या वातवरण छौ जु सै त च आप तै साहित्य मा लै ?

प्रभात सेमवाल- म्यारा दादा जी श्री विष्णु प्रसाद सेमवाल ( भिर्गु ) कवि छ मै अक्सर दादा जी

तेन कविता लेखद देखदु रै . दादा जी अपणी कविता तेन फियर काना कु काम कभारि-कभारि मैतेन देन्दा था तबरी बिटी मैतेन साहित्य मा रूचि होण लगि .


   भी.कु. कुछ घटना जु आप तै लगद की य़ी आप तै साहित्य मा लैन !


प्रभात सेमवाल-जी एक घटना छ म्यारू २००६ का बाद कविता लिखणु लगभग बंद ह्वेगी थो येकु  खास  कारण म्यारू जापान ओणु थो .जब मै जापान  आई त जापान  सी विल्कुल अजाण थो मैतेन जब भी समय मिलदु थो मै वैतें जापानी सिखण मा लगान्दु थो अर कविता सी दूर होंदी गै.यत्गा दूर ह्वेगी थो की ४ साल तक एक भि कविता नि लिखी .२१-०६ -२०१०  ४ बजिक ३० मिनट पर म्यार  गैल एक बड़ी रोड दुर्घटना ह्व़े ,खैर जापान मा होणु सी बची त ग्याई पर म्यार घो मोळण मा लगभग डेड साल लगि ये बिच ४ महिना अस्पताल अर १ साल कुछ मैना घर पर बेड रेस्ट  रै दूर मुल्क होणा सि अधिक तर यकुली रै हालंकि म्यार दोस्तों

मैतेन यनु अहसास नि होण दिनी की मै बिराणा मुल्क मा छों जों दोस्तों कु मै जीवन मा रिणी रोलु फिर भि जापान जन देश मा कैका दगड़ा हर बक्त रणु बहुत मुस्किल छ जै वजह सि मै यकुली ह्व़े जांदू थो वे बक्त फिर म्यार मन कु कबि जागी अर मैन ४ साल बाद आपु पर ही एक कविता लिखि -

           हे मेरा मन मैसी बैर ना कर ,
     की जिंदगी तें  भूली जों यन अंधेर ना कर ,,
           कभि  भि  कैकी हेंसी तें  लुचिक,
     मेरा जीवन की रातो मा कभि  सबेर ना कर ,,
        अर यकुली निछों मै यों रातो मा ,
तुमारी खुद मेरा गैल छ रैबार बेजण मा देर ना कर ,,               

                    यही घटना छ जिन मैतेन फिर साहित्य मा ओणक मजबूर करी .


भी.कु. - क्या दरजा पांच तलक s  किताबुं हथ बि च ?


प्रभात सेमवाल- दरजा ५ तक मै साहित्य सि अजाण थो .


भी.कु. दर्जा छै अर दर्जा बारा तलक की शिक्षा, स्कूल, कौलेज का वातावरण को आपौ  साहित्य पर क्या प्रभाव च ?

प्रभात सेमवाल- अनुकूल वातावरण होणा सि भल्लू प्रभाव पड़ी .


भी.कु.- ये बगत आपन शिक्षा  से भैराक कु कु  पत्रिका, समाचार किताब पढीन जु आपक साहित्य मा काम ऐन ?

प्रभात सेमवाल-  किताब अर पत्रिका त नि पढ़ी पर जब भि समय मिलदु इंटरनेट पर  साहित्य

सि जुड़ीं हर बात देखदु अर पडदु जू म्यार काम भी एजान्दी .


  भी.कु- बाळापन से लेकी अर आपकी पैलि रचना छपण तक कौं कौं साहित्यकारुं रचना आप तै प्रभावित करदी गेन?


प्रभात सेमवाल-म्यारी पहली रचना छपण सि पहली नरेन्द्र सिंह नेगी ,अर विष्णु प्रसाद सेमवाल जी कु बडू हाथ छ मै यों सि प्रभावित छोन.


भी.कु. आपक न्याड़ ध्वार, परिवार,का कुकु  लोग छन जौंक आप तै परोक्ष अर अपरोक्ष  रूप मा  आप तै साहित्यकार बणान मा हाथ च ?

प्रभात सेमवाल- म्यार दादा जी


भी.कु- आप तै साहित्यकार बणान मा शिक्षकों कथगा मिळवाग च ?

प्रभात सेमवाल-क्वी खास त नि पर फिर भी बहुत छ .


भी .कु. ख़ास दगड्यों क्या हाथ च /

प्रभात सेमवाल- बहुत बडू हाथ छ .


भी.कु. कौं साहित्यकारून /सम्पादकु न व्यक्तिगत रूप से आप तै उकसाई की आप साहित्य मा आओ

प्रभात सेमवाल- विष्णु प्रसाद सेमवाल ,


भी.कु. साहित्य मा आणों परांत कु कु लोग छन जौन आपौ साहित्य तै निखारण मा मदद दे ?

प्रभात सेमवाल- म्यारा सब्बि दगड्यों ,


Bhishma Kukreti

*********घुघूती का आंसू *********एक गढवाली कथा



कथाकार - डॉ नरेन्द्र गौनियाल

हमर घर का नजदीक एक भ्यूंळ कि डालि छै.वैमा घुघुतु अर घुघूतीन एक घोंसला बणायु छौ,पण कैते बि भनक नि लगी.हम लोग घर का चौक मा झुल्ला कु गिन्दू ख्यल्दा छाया.एक दिन ख्यलंद दा गिन्दू डाळमा अटगी गे.रामू डाळ मा गे अर वैन गिन्दू निकाळी दे,पण इतना मा वैकि नजर एक दुफौन्क्य भौंटु पर पड़ी,जैम घुघूतकु घोसला बन्यूं छौ.घोसला मा चार अंडू छाया.ऊ जनि घोसला का नजदीक गे,घुघुतु अर घुघूती डाळी का टुख ऐकि गुटुर-गुटुर कन लगी गीं.
         रामू भुयां ऐ अर वैन सबि छोरी-छोरों तै बताए दे.तब एक-एक कैकि सबि डाळमा गैनीं अर अंडू द्यखण लगिगीं. क्वी-क्वी हथल्य़ाणा बि रईं..वैदिन खेलिकी सबि रुमुकीदा अपणा घर चलिगीं..हैंका दिन ऐतवार छौ.सबि ख्यलणा कु जल्दी ऐगीं.घोसला मा अंडू द्यखणे रौंस लगीं रैंदी छै.झाबर सिंह बि डाळमा गै.वैन द्वी अंडू हाथ मा पकड़ी,पण एक हाथ बिटि छूटिगे अर भुयां पड़ीकै फूटिगे.दग्ड़योंन बोलि कि क्य कैरि तिन यु.वैन बोलि कि मिन जाणि-बुझिकी नि फोड़ी.तुम कैमा नि बोल्यां.पल्य़ा ख्वाळ बोडी मा बि ना अर म्यारा ब्वे-बाब मा बि ना.
          लोक परम्परा मा चखुलों का प्रति विशेष प्यार-प्रेम,दया,अहिंसा कु भाव रैंदु छौ.सब बड़ा इनि समझांदा छाया कि घुघूता,घिनुड़ा,सटुला य  कैबि चखुला का अंडू नि फ्वड़न चएंद.जु फ्वड़दू च,वैकि आंखि फुटि जन्दिन.झाबर सिंह कि जिकुड़ी मा बि धमाक लगीगे कि कनि गलती ह्वैगे.मेरि मांजी उर्ख्यल़ा मा धान कुटणी छै.रोज कुटंद दा चखुला चौंलों का बियां टिपनौ ऐ जांदा छाया.आज बि घुघुतों कु घुर-घुराट अर घिनुड़ों कु चिंचाट हुयों छौ,पण एक घुघूती छ्वाड पर चुप, उदास सि बैठीं छै.वींकी आंख्यों अंसधरी लगीं छै.
           ब्यखुन्द दा मांजीन खांद दा पूछी,''ये तुम छोरी-छोरा चखुलों का घोसला मा छेड़खानी त नि करदा.'' मिन बोलि ,''ना मि त नि करदू,पण भ्यूंल़ा डाल मा घुघता कु घोल च.वैमा पैलि चार अन्डू छाया,ब्याळी झबरू से एक फुटिगे,अब तीन रैगीं''.मांजिन  बोलि कि,''ओहो ! तबी त मि स्वचनूँ छौ कि एक घुघूती चुप किलै बैठीं छै अर वींका आंख्यों मा अंसधरी बि अईं छै.''
             हैंका दिन जनि ब्यखुन्या छोरी-छोरा ख्यलणकु ऐनी,मांजी चट्ट एक कंडाळी कि मोटी ढींग लेकि ऐगे अर बोलि कि,''आज बिटि यख मा ख्यलना कु नि अयाँ.कैन बि घुघूती का घोल पर छेड़खानी करि त कंडाळी कि ढींग देखि लियां तब. कंडळी देखि कै सबि भाजि गीं.हैंका दिन बिटि वखमा क्वी बि ख्यलना कु नि आया. ना ही घोसला पर छेड़खानी करि.कुछ दिनों मा ही अण्डों से फतेला ह्वैगीं अर बाद मा बड़ा ह्वैकी फुर्र्र उडी गीं.

       डॉ नरेन्द्र गौनियाल..सर्वाधिकार सुरक्षित


Bhishma Kukreti

गढवाली -हास्य व्यंग्य साहित्य



                                  तैकि रांड ह्व़े जैन



                              चबोड्या-     भीष्म कुकरेती



[गढवाली हास्य साहित्य , गढ़वाली व्यंग्य साहित्य लेखमाला]

 

- ये भूलि ह्यां जु कुल्याणो बड़ो हौज बणणु छौ स्यू बणण बन्द ह्व़े ग्याई,  ...

--किलै ए दीदि ?

- भ्रष्टाचार को अन्याव लगी गे. आनाळ ( बिलम्ब) को रोग लगी गे

- तै भ्रष्टाचार की औताळि खाण लैक क्वी नी रैन

-तै  भ्रष्टाचार  पर बुरळ  (चींटी ) पोड़ी जैन 

-तैको  जड़ नाश ह्व़े जैन .

--ये जी ! जु गौंकु  बाटो छौ वु बौगि गे

- कन ये ब्वारी! इन त कबि नि ह्व़े थौ.

- भ्रष्टाचार को घूणन अर धिवड़न  बाटो कुरेदि दे

- सचो ब्रह्म होलू त बांज पोड़ी जैन तै भ्रष्टाचार क  साखि

- ए पैणु  ह्वाई त ह्वाई , हैंको पैण लैक नि राओ स्यू भ्रष्टाचार

-तै  भ्रष्टाचार कि रांड ह्व़े जैन

--भिलन्कार पड़ी जैन तै भ्रष्टाचार को  चौक-कूड़  मा

- ए बौ आज बि पाणि पेक सीण पोड़ल. आज बि राशन दुकान मा सड्यू  इ सै ग्यूं नि आई .   

-ह्यां स्यू दुकानदार द्वी मैना बिटेन किलै  बौगाणु  च बल राशन आज आलो,  आज आलो..

- बौ ए ! भ्रष्टाचार को बिजोग पोड़ी गे .भ्रष्टाचार से पब्लिक डिस्ट्रिब्युसन   सिस्टमौ अन्खर पंखर (अंग ) भंग ह्व़े गेन .

- तै भ्रष्टाचार का  खुट मुख सौड़ी जैन

- तै भ्रष्टाचार ऐ लद्वडि डाळ लगी जैन

-- कोढ़ी ह्व़े जैन स्यू भ्रष्टाचार

-लुच्या ऐ जैन तै भ्रष्टाचार पर

-भगन्दर ह्व़े जैन तै भ्रष्टाचार पर

--मुक दिखाण लैक नि राओ स्यू भ्रष्टाचार

- ए अनुसूचित जाति अर बी.पी ओ तहत कूड़ो कुण मिलण छौ बीस हजार तू लेकी ऐ गौण गाणि क  पांच हजार

- हाँ ए ब्व़े ! देहरादून बिटेन चली त छया पूरो बीस हजार पण जिला, तहसील , ब्लौक , ग्राम  प्रधान  का चौकुंद आन्द आन्द चळि गेन  बीस हजार अर हमर बांठो आई बस पांच हजार

- तै भ्रष्टाचार ऐ  कूड़ी खंद्वार ह्व़े जैन

-तै भ्रष्टाचार कि  मवासी कु रगड़ ह्व़े जैन

- ए बरसक  सौण मा बैगी जैन तै भ्रस्टाचारै  कूड़ी-पुंगड़ी

- ऐंसू बग्वाळ खयाल त खयाल  पण तै भ्रष्टाचार का स्व़ार भार - अनाचार , अत्याचार नि खैन पैन बार त्योवारूं स्वाळ , भूड़ी , पकोड़ी अर लगड़ी

- ये निर्भागी तू ऐंसू पास नि ह्व़े ? तू त बुलणो छौ बल फस किलास ऐली !

- गणितौ मास्टर बुल्दो छौ - म्यार इख प्राइवेट  टयूसन म आ.

-साईंसौ   मास्टर बुल्दो छौ घीयक घंटी ला

-प्रिंसिपल बुल्दो छौ बल म्यरा स्याळौ   कोचिंग क्लास मा जा

-- निफटाळि लगी जैन तै भ्रष्टाचार को बुबा लालच -लोभ को

-- द्वढकि  लगी जैन तै भ्रष्टाचार की ब्वे- इच्छा की, चाहत की

-- ये खड़ी फसल मा आग कैन लगाई

-- बड़ो भाई  न खड़ी फसल पर आग लगाई

--खज्यात ऐ जैन भ्रष्टाचार  को सगो भाई जळतमारी को , इर्ष्या को नाश ह्व़े जैन.

- निबौड़ू ह्वाओ यू भ्रष्टाचार,

--ताखिम तड़म  लगी जैन - अफखवा विरती जु पैदा करदो भ्रष्टाचार

-ये किलै नि चौल दाखिल खारिज ?

--पटवारी बुलणो च लाओ नै किस्मौ दूण दैज

-- किलै नि कवी  खड्यानु वीं भावना तै जु मांगदि  बनि बनि भौणि  दूण दैज

- ये म्यरो लाटा ! अस्पताल बिटेन नि लै तू दवाई ?

-- सरकारी डाक्टर बुलणो - म्यरो प्राइवेट क्लिनिक बिटेन ली जाओ खूब दवाई

--कुछ त स्वाचो इन किलै ह्वाई

- कुछ त कारो बल फिर भ्रष्टाचार  की नि ह्वाओ घर -बौड़ाइ

-- बैठ बैठिक कुछ नि  होण जब तलक करील्या ना भ्रष्टाचार की ठुकाई, पिटाई

--  सोच सोचिक कतै कुछ  नि होण जब तलक करील्या ना भ्रष्टाचार की थिंचाई

--निंद भजाओ   , बिज़ी जाओ अर करो तै भ्रष्टाचार की खड्डाउन्द  दबाई

- तै भ्रष्टाचार की डांडी सजाओ

--तै भ्रष्टाचार की चिता जळाओ

--तै भ्रष्टाचार तै इन मड़घट मा जळाओ , इथगा जळाओ

-- बल भ्रष्टाचार दुबर  जनम लीण लैक रै इ नि जाओ



Copyright@ Bhishma Kukreti , 16/7/2012

-गढवाली हास्य साहित्य , गढ़वाली व्यंग्य साहित्य लेखमाला जारी ...




Bhishma Kukreti

प्रसिद्ध गढवाली कवि नेत्र सिंह असवाल कि कुछ गढवाली गजल

मुखै  ऐथर सौ चरेतर करदीं लोग   

पीठ पीछ सर्र , भूलि जैन्दि  लोग I

**

गाळि  दियांला , नुँना कि म्वरदा 

फिर भी रोज नई, गाळि दिंदि लोग I

***

ऊंस चट्याँन , तीस नि जांदी

तीस बढ़ाणौ   , ऊंस पिंदी लोग

**

म्वरणु भजुणु  अब आम बात छ

बस गीत मुंड हलैअ , मिसांड रंदी लोग I

**

उज्याड़ बाड़ खांद , चुप द्यखदा रंदी लोग   

निगुसें का ढांगा थैं , कच्यांद  रंदी  लोग

**

सर्वाधिकार नेत्र सिंह असवाल, नई दिल्ली

Bhishma Kukreti

सतपुळि बजार क्यों आंदि Satpuli in Garhwali Folk Songs - 2

सतपुळि बजार क्यों आंदि

मेरि ब्वारी गौमती या ?मेरि ब्वारी गौमती या ?

सतपुळि बजारै आन्दु

मी तुमारा  बान या, मी तुमारा बान या

काटी च जमणि ये ब्वारि , काटी च जमणि ये ब्वारि 

मी तै नि मिलणो ए ब्वारि ,

सबुकी समणि , या सतपुळि

तमाखू का कोया ए जिवरो, तमाखू का कोया ए जिवरो,

डौर छाई तुमतै त पैलि

केकु ज्वाड़  माया या

सतपुळि बजार क्यों आंदि

बामणु कि पोथी ए ब्वारि , बामणु कि पोथी ए ब्वारि ,

भली बिराज दींदि  ए ब्वारि

तेरी काळि धोति या

सतपुळि बजार क्यों आंदि

स्वैरि जाली सौँळि जिवरो ,  स्वैरि जाली सौँळि जिवरो ,

कन बिराज दींदि जिवरो ,

बुलबुलूं कि कौंळ या

सतपुळि बजार क्यों आंदि

मेरि ब्वारी गौमती या ?मेरि ब्वारी गौमती या ?



  Curtsey _ Shri Totaram dhoundiyal Dhad magazine june 1990

Bhishma Kukreti

Garhwali Theatre in Garhwali Chandigarh

             

Presented by Sri D. D Sundariyal

गढ़ कला संगम चंडीगढ़ की पहली प्रस्तुति  "जौंल बुरांश " एक इनी प्रेम कथा

छाई जो ब्राह्मण लड़की और ठाकुर लड़का का भावनात्मक रिश्तों अर   सामाजिक

कानून वपारिवारिक बंधनो का ताना बाना माँ दुखांत नाटक का रूप म सन 1980 म

गढ़वाली समाज क घोर विरोध व वाद विवाद क बाबजूद  मंचित होई। नायक विजय तथा

नायिका रूपा (सते राम जुयाल व कलावती जुयाल) सामाजिक व पारिवारिक

प्रताड़ना से त्रस्त हवइकी फांस खणों विवश हुँदैन पर वीं जगा फर द्वी

बुरांश की डाली जामनि  जो सदनी फुली ही रैनी और गाँव व समाज थाई

प्रेमियों कु बलिदान याद दिलाणु राई।डी0 डी0 सुंदरियाल "शैलज" की कथा,

पटकथा व निर्देशन म प्रस्तुति गीत, संगीत व मनोरंजन की दृष्टि से दर्शक

कु  पसंद आई पर अंतरजातीय प्रेम कथा वै समयानुसार लोगु ते ज्यादा ठीक नि

लगी।

1979-80 का दोरान संगम द्वारा तीन प्रस्तुति "जौल-बुरांश" का अलावा देनी।

"घूंघटों" (ले 0 एन0 डी0 लखेड़ा), व ओंसी-कु चाँद" " खंद्वार" (ले0 डी डी

सुंदरियाल), तीनी नाटकू निर्देशन चंडी भट्ट भारती न करि।  "घूंघटों" शराब

क दुष्परिणाम से बर्बाद परिवार की कथा छ त ओंसी-कु चाँद अनाथ बालिका पर

अत्याचार (चाची द्वारा) पर आधारित घटनाओ कु विवरण कार्ड। ठाकुर सिंह

नेगी, स्व सुशीला नेगी , कलावती जुयाल, सुशीला सुंदरियाल, ड़ी

ड़ीसुंदरियाल, चंडी भट्ट भर्ती, सते राम जुयाल, एन ड़ी लखेरा  आदि कलाकरों

ने इन नाटकों में भूमिकाएँ निभाई। पलायन  समस्या पर आधारित खंद्वार नाटक

बहुत प्रसिद्ध हुआ एक गरीब किसान जो सड़क गैंग  में काम करने को मजबूर था

और जिसने बेटे को कृषि वैज्ञानिक बनाकर नए भविष के सपने देखे थे ॥टूट कर

बिखर गया जब बेटा परदेश नौकरी गया, अपनी बीबी को भी ले गया। उसकी माँ गम

में मर गयी और बूढ़ा हताश होकर अपने बेटे को श्राप दे गया। "अरे भाई...

अगर कूड़ि पुंगड़ी बांज नि रखणआइ त   क्वी अपना नौनयालु ते एसकोल नि

भेजयान....." संवाद भीतर तक चिरा लगाई दिन्द। गरीब मंगतु मजदूर क रूप माँ

स्व0 देवी परसद अंथ्वाल जी कु प्रकृतिक व सजीव अभिनया कई बर्षू तक लोग

याद करना रैनी। भट्ट कु हास्य अभिनय (कल्या) नाटक की जान छाई। यूं सभी

नाटकू माँ नरेंद्र सिंह नेगी जी व अन्य प्रसिद्ध लोक गीत कु सफल  प्रयोग

भी करे ग्याई। (जारी.....)

गढ़ कला संगम की नाट्य यात्रा-3



सन 1981 में "दानु देवता बुढु केदार" (ले0 डी डी सुंदरियाल "शैलज"

निर्दे0 चंडी भट्ट भारती) नई और पुरानी पीढ़ी के आचार विचारों की टकराहट

दिखाता है। गाँव के जाने माने प्रभावशाली व आदरणीय पंडित  गजा धर जोशी (

ओं0पी0 धस्माना) जब बूढ़े असहाय होकर अफसर बेटे (विमल नेथानी) व देसी बहू

(कांति नेथनी) के पास परदेश आते हैं तो ग्राम्य और शहरी जीवन के रहन सहन,

मर्यादा व परम्पराओं की उलझनों में सभी पात्र  उलझते चले जाते हैं जिससे

कभी हास्यमय तो कभी कारुणिक स्तिथियाँ पैदा होती हैं। दोनों पीढ़ियों में

कड़ी का काम करते घरेलू नौकर (चंडी भट्ट) और पप्पू (गजाधर का पोता)

प;अरिवार में समंजस्य बनाने का प्रयत्न करते रहते हैं। अंत में हताश,

निराश बूढ़ा समझोता कर वापस अपने गाँव चला जाता है। सम्पूर्ण नाटकीय

हलचलों वाला यह नाटक दर्शकोन्ने पसंद किया।



1981 से 1983 तक संगम ने तैड़ि-तीलोगी लोक कथा पर आधारित  ऐतिहासिक प्रेम

कहानी "धोलि-का-आंसु" का 5-6 बार चंडीगढ़, पानीपत, लूधियाना आदि शहरोंमें

मंचन किया। ब्रिटिश गढ़वाल व राजशाही टिहरी गढ़वाल के दो बड़े घरानों की

रंजिश पर आधारित दुखांत प्रेम कहानी को दर्शकों का पूरा प्यार मिला।

इस नाटक के गीत संगीत की लोकप्रियता से लोगों ने इसे फिल्मबनाने के लिए

भी प्रेरित किया पर फ़ाइनेंस के अभाव में प्रोजेक्ट फ़ाइल हो गया। जसवंत

रावत और उर्मिला रावत के रूम में एक नई जोड़ी रंगमंच पर इस नाटक आई।

"धोलि-का- आंसु" नाटक चंडीगढ़ व अन्य शहरॉ में कई बार मंचित हुआ था ।

मुरली धर -कुसुम नवनी (जो बाद में सोकार सिंह रावत द्वारा निर्मित फिल्म

"रामी बौराणी" में चर्चित रहे) पहली बार नायक नायिका के रूप में इस नाटक

में लाये गए थे। पहली बार गढ़वाली नाटकों में हारमोनियम तबला के अलावा

अन्य संगीत वाद्य यंत्रों, सिंथसाइजर, सितार , वाइलीन, मेंडोलिन आदि  का

प्रगोग किया गया। संगीत शास्त्री एन0 एस0 राठोर के निर्देशन में , मोहन

ठाकुर( तबला) , प्रकाश नेपाली, जीणू राम (बांसुरी), आदि कलाकारों को

संगम ने मंच प्रदान किया और सभी लोग 1996 तक संगम के सभी कार्यक्रमों के

हिस्सा बने रहे।



अस्सी के दशक में संगम ने जो अन्य नाटक मंचित किए उनमे "जगवाल", " आस

निरास" ,( ले0 एन0 डी0 लखेड़ा ) " रत्ब्योणा, "  " सर्ग दीदा पाणि-

पाणि.." . तीलु रौतेली" (ले डी0 डी0 सुंदरियाल शैलज) नए थे। पुराने

नाटकों को अन्य शहरों में मंचित किया गया ।



" जगवाल" अंधविश्वास में फंसे परिवार को चालाक तंत्रिकों द्वारा लूटे

जाने की कहानी है जिसमें डी डी सुंदरियाल द्वारा अंधे बाबा तांत्रिक की

भूमिका काफी सराही गई। आस निरास में टूटते सन्यूक्त परिवारों व असहाय

बूढ़े लोगों की उपेक्षा को दर्शाता है। सुनीता जुयाल एवं परमानंद जुयाल के

रूप  में नए कलाकार इस नाटक में मंच पर आए। "रत्ब्योणा" विधवा विवाह की

वकालत करता है जिसमे ओ पी धसमाना द्वारा लँगड़े फोजी का अभिनया आज भी

लोगों के जेहन में याद है।  इसी नाटक में संतोष रावत ने विधवा की मुख्य

भूमिका निभाई थी। "सरग दीदा पाणि-पाणि" पंचायत और ग्राम विकास समिति  से

लेकर  ऊपर तक फैले  भ्रष्टाचार, पढे लिखे  युवकों की बेरोजगारी, शराब

माफिया की गुंडागर्दी, राजनीतिक पतन को दिखाता है। इन सभी नाटकों को चंडी

भट्ट भारती द्वारा निर्देशित किया गया और अपने  हास्य अभिनय की छाप भी इन

नाटकों में दर्शकों के दिल में छोड़ने में कामयाब रहे ।   (जारी...)

To be continued.....

Garhwali, Uttarakhandi, Theatre, Stage Plays, Dramas

Bhishma Kukreti

Kya Gori Kya Saunli (1975): portraying female characteristics Satirical means

(Review of Satirical Articles of Prolific Garhwali Satirists)

                              Bhishma Kukreti
[Notes on Satirical Articles; Garhwali Satirical Articles; Uttarakhandi Satirical Articles; Mid Himalayan regional language Satirical Articles; Himalayan regional language Satirical Articles; North Indian regional language Satirical Articles; Indian regional language Satirical Articles; South Asian regional language Satirical Articles; Asian regional language Satirical Articles]

                The original Garhwali modern prose literature started from 1912- 1913. Bhakt Prahlad by Bhavani Datt Thapliyal is first Garhwali drama and 'Garhwali That' by Sada Nand Kukreti is first modern Garhwali short story.  Both the pieces of Garhwali prose literature are satirical literature.
                Abodh Bandhu Bandhu Bahguna did not mention any word Vyangatmak Nibandh or lekh in Gad Myateki Ganga (a brief history of Garhwali prose, 1975).
However, by various means, the article 'Kya Gori Kya Saunli 'of Dr. Govind Chatak published in Gad Myateki Ganga (1975, page   65) is satirical article. The writer describes various characters of females differently with humorous ways.
  Dr Chatak uses Garhwali proverbs with intense affectivity as
बात या च कि घर से बड़ी घरवाळी .
**मन लग्यो गधी से त परी को क्या काम? मन कि रोटी छ, खुसी को सौदा. उनो त जवानी मा मेंडुकि सुन्दर दिखेंदी पण उथा पाणी मा रण पर मेंडुकि गोरी नि बौणि पौन्दी ,
** दुनिया मा गोरी जनान्यों तै खूब माणदि
**
चा दिवराण हो चा जिठाण -कु कै से काम छ? तु डंडा त मै तिरसूल
**
कखी नाक कखी नथुली
  The phrases create laughter and irony too.
  The article is serious and has sharp satire too.

Copyright@ Bhishma Kukreti , 16/7/2012
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Bhishma Kukreti

तु सतपुळि केकु ऐ  छै प्रतिमा --सतपुली लोक गीत माला - ३

(इन्टरनेट प्रस्तुति - भीष्म कुकरेती )



तु सतपुळि केकु ऐ छै स्याळी प्रतिमा ?

मि नाक कि नथुलि गड़ाणु

ऐ छौ जीजा ' हरसिंगा'

वै सुनार उखि बुलौलु

त्वेखुणि  नथुलि गडौलु

घर जा स्याळी प्रतिमा

घर जा स्याळी प्रतिमा

त्वे बगैर मन णि मंद

अब जम्मा मी घर नि जांदु

मान जीजा' हरसिंगा '


मि नाक कि नथुलि गड़ाणु

ऐ छौ जीजा ' हरसिंगा'

तु सतपुळि केकु ऐ छै स्याळी प्रतिमा ?

तु सबकी समणि आँदी ,

इन्नि बात मी नि सुवांदी

घर जा स्याळी प्रतिमा

तेरी याद जब मी आन्द 

अफ्वी मी थै खेंचि लांद 

मिन क्या  कन त्वी बतौ

मी गळा कि हंसुळि गड़ाणु

ऐ छौ जीजा ' हरसिंगा'

तु सतपुळि केकु ऐ छै स्याळी प्रतिमा ?

छ्क्वे ह्वेग्युं मि बदनाम

सर्या दुन्या मा मेरि हाम 

घर जा स्याळी प्रतिमा

पैलू मीकु माया ज्वड़दि

फिर दुन्या से केकु डरदि   

बोल जीजा हरसिंगा

मेरि बौ मारली मै घर जा स्याळी प्रतिमा

तेरी दीदि  ह्व़े मेरि बौ स्याळी प्रतिमा

मि अफुखुणि साड़ी मूल्याणु ऐ छौ जिजा

हरसिंगा

तु सतपुळि केकु ऐ छै स्याळी प्रतिमा ?

आभार- तोताराम ढौंडियाल, धाद, जून १९९०

Bhishma Kukreti

Udghatan: Story about village Development by Cooperation

(Review of Garhwali Story Collection 'Mwari (1986) by Durga Prasad Ghildiyal)

                                        Bhishma Kukreti
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   Every time, in every era, there are different aspirations for the society. After independent, there were fewer schools in Garhwal. There was social aspiration that boys get education and get employment in plains.
     Mwari is about education awareness and building schools in village through cooperation. The brighter part of the story is that the new generation understands the importance of succession for taking social works.
Reference-
1-Abodh Bandhu Bahuguna, Gad Myateki Ganga
2-Dr Anil Dabral, 2007 Garhwali Gady Parampara
3-Bhagwati Prasad Nautiyal, articles on Durga Prasad Ghildiyal l in Chitthi Patri
4-Dr. Nand Kishor Dhoundiyal, Garhwal Ki Divangat Vibhutiyan
Copyright@ Bhishma Kukreti, 15/7/2012
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Bhishma Kukreti

गढवाली -हास्य व्यंग्य साहित्य



                  भगत  सिंग  पैदा  हूण  चयेंद   


               चबोड्या - भीष्म कुकरेती


-- बल भुला परिवार की आन शान कि बात च .मुन्डीत  को नाम की बात च . सिंयीं भयात तै बिजण चएंद.  हम तै कुछ करण चयेंद .

--हाँ भैजी आप सै बुलणा छन, हम तै कुछ करण चयेंद .

--जा अपण नौन्याळु तै उख भेज जां से दुसर मुन्डीत का लोग हमर कूल नि त्वाड़ण . हमम एका हूण चएंद.

- भैजी अपण नौनु तै बि भ्याजो.

-- अरे त्वे पता i  च बल मीन अपण  नौन्याळ  गंगा जी का जौ तरां पाळिन .  इन मा कन कैक ऊं तैं दंगा फसाद मा भेजुं ? भै हमारि भयात मा इथगा नौन्याळ छन ऊं तै जाण चएंद.

--भगत सिंग सौब तै चयाणा छन पण अपुण इख ना, पडोसी क ड़्यार !

--- भाईओ ! म्यार नाम   क्या  बुन्या  क्या  कन्या  च अर  सामाजिक कार्यकर्ता छौं. मी ये बड़ो मच से आप सौबसे प्रार्थना करदो बल हम सौब तै अपण बच्चों दगड गढवळि मा बचळयाँण चयांद .

--क्या कन्या   भैजि ! तुम अपण नौन्याळो दगड गढवळि मा किलै नि बचळयांदा?

---अरे दिमाग खराब हुयुं च म्यरो ! म्यार नौनो गढवळी बुलण से अंग्रेजी अर हिंदी खराब नि ह्व़े जालि !

--भगत सिंग सौब तै चयाणा छन पण अपुण इख ना, पडोसी क ड़्यार !

-- मि  फुन्द्यानाथ आप सौब प्रवासी  भाईयों  से प्रार्थना करदो कि हम सौब तै साल  भर  मा अपण  गा  गढ़वाळ जाण चएंद अर उख अपण कूड़ो रख रखाव को पूरो इंतजाम करण चएंद   

--फुन्द्यानाथ भैजी ! गाँ मा आपक कूड खंद्वार ह्व़े ग्याइ  ? वै तै छाणा किलै नि छंवां  ?

--दिमाग  खराब हुयुं च म्यार ? जथगा  पैसा मा मि गौं को कूड छाण या चिणण मा लगौल उथगा पैसा मा त ड्यारा दूण  मा  छ्वटि कोठी लगि जालि.

--भगत सिंग सौब तै चयाणा छन पण अपुण इख ना, पडोसी क ड़्यार !

- भाइयो मि अफलातून  विचारक बुल्दु  बल  गढ़वळि संस्कृति बचाणो एक तरीका च बल हम तै  परदेस मा बार त्यौहारों दिन गढ़वळि खाण पीण बणाण  चएंद जां से बच्चों तै हमारि संस्कृति से परिचय हून्दो राउ.

--अरे अफलातून जी ! क्या बात आज मकरैणि दिन आपक इख पिजा अर चाइनीज चिकन नोड्यूल बण्या छन ?

--हाँ ! मेरो सरो परिवार मोडर्न विचारोंक जि च .

--भगत सिंग सौब तै चयाणा छन पण अपुण इख ना, पडोसी क ड़्यार !

-- मि महान गढ़वळि कवि धुन्धलो  आप सबि साहित्यकारों तै धाद दीन्दो  कि हम साहित्यकारों तै न्यूतो गढ़वळि भाषा म छपण चयेंद.

--अरे धुन्धलो जी ! बधाई हो आपक नौनो ब्यौ च . पण न्यूतो पत्र त हिंदी मा च

--हाँ यार म्यार द्वी चार कवि मित्र हिंदी का छन त ऊंक बान न्यूतो कार्ड हिंदी मा इ छपाण पोड़.

--भगत सिंग सौब तै चयाणा छन पण अपुण इख ना, पडोसी क ड़्यार !

- मि स्यूंसाट  जी छौं अर मेरी राय च कि हम तै अपणि गढ़वळि संस्कृति क दर्शन हौरी लोगूँ तै बि कराण चएंद . जन कि ब्यौ काज मा गढ़वळि गाणा लगाण चएंद जां से दुसर कौम का पौणु  तै  पता लग जाओ कि हमारि संस्कृति क्या च .

-- आपक नौनो ब्यौवक  बधाई हो स्यूंसाट जी. इ क्या वेस्टर्न म्यूजिक को गाणा?

--हाँ जी. म्यार सबि बौस ब्यौ मा अयाँ छन त ऊं तै त  दिखाण इ पोड़ल कि म्यार समाज मोडर्न च

--भगत सिंग सौब तै चयाणा छन पण अपुण इख ना, पडोसी क ड़्यार !

- आण वाळ भगत सिंगों स्वागत च म्यार इख ना,  पडोसी क इख.


Copyright@ Bhishma Kukreti 17/7/2012