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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti

हिंदी की सड़क छाप फिल्मों की नकल ने गढ़वाली -कुमाउनी फिल्मों को लहूलुहान किया -नरेंद्र सिंह नेगी



                                                प्रस्तुति -भीष्म कुकरेती







[गढ़वाली -कुमाउनी फिल्म-वीसीडी ऐलबम उद्यम के बारे में मै कई दिनों से गढ़वाली -कुमाउनी फिल्मकारों से लगातार बात कर रहा हूँ। इसी क्रम में आज हिमालय क्षेत्र के महान गायक, गीतकार, फिल्म-ऐलबम संगीत निर्देशक श्री नरेंद्र सिंह जी से फोन पर गढ़वाली -कुमाउनी उद्यम पर लम्बी बातचीत हुयी। बातचीत गढ़वाली में ही हुयी ]





भीष्म कुकरेती - नेगी जी नमस्कार आज पौड़ी में या कहीं और ?

नरेंद्र सिंह नेगी - नमस्कार जी कुकरेती जी। आज मैं  अभी एक समारोह हेतु श्रीनगर आया हूँ। कहिये।



भीष्म कुकरेती - नेगी जी ! गढ़वाली -कुमाउनी फिल्म उद्योग पर बातचीत करनी थी। समय हो तो ..

नरेंद्र सिंह नेगी - हाँ कहिये ! वैसे गढ़वाली फिल्मे कुमांउनी फिल्मों के मुकाबले अधिक बनी हैं। जब कि कुमाऊं में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के राजनेता, वैज्ञानिक, सैनिक अधिकारी, ,संगीतकार चित्रकार , साहित्यकार, कलाकार हुए हैं किन्तु यह एक बिडम्बना ही है कि कुमाउनी फिल्मे ना तो उस स्तर की बनी और ना ही संख्या की दृष्टि से समुचित फ़िल्में बनीं।



भीष्म कुकरेती - गढ़वाली व कुमांउनी फिल्मो का स्तर कैसा रहा है?

नरेंद्र सिंह नेगी -देखा जाय तो अमूनन स्तर स्तरहीन ही रहा है। हिंदी के कबाडनुमा फिल्मों की नकल रही है गढ़वाली व कुमांउनी फ़िल्में। असल में उत्तराखंडी फिल्म उद्योग में सांस्कृतिक और सामजिक स्तर के  अनुभवी लोग आये ही नही। जब आप क्षेत्रीय फिल्म या ऐलबम बनाते हैं तो  पहली मांग होती है कि वह क्षेत्रीय सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक वस्तुस्थिति को दिखाये। किन्तु शुरू से ही गढ़वाली -कुमांउनी फ़िल्में या तो भावनात्मक दबाब या रचनाकारों का हिंदी फिल्म उद्योग में आने के लिए बनायी गयीं और यही कारण है कि कुमांउनी-गढ़वाली फिल्मों ने वैचारिक  स्तर व कथ्यात्मक स्तर पर कोई विशेष क्या कोई छाप छोड़ी ही नही। असल में हिंदी की सडक छाप फिल्मों की भोंडी नकल ने कुमांउनी -गढ़वाली फिल्मो को लहूलुहान किया।

भीष्म कुकरेती - आप क्यों हिंदी फिल्मो पर जोर दे रहे हैं?

नरेंद्र सिंह नेगी- कुकरेती जी !  हिंदी फिल्मों में कमोवेश हिंदी भाषा भारतीय है पर कोई भी हिंदी फिल्म हिन्दुस्तान की संस्कृति और समाज का प्रतिनिधित्व नही करती और जब हम डी ग्रेड हिंदी फिल्मों की भोंडी नकल करेंगे तो हमें कबाड़ ही मिलेगा कि नही?


भीष्म कुकरेती -हाँ यह बात तो सत्य है कि अधिसंख्य हिंदी फ़िल्में पलायनवादी याने एक अलग किस्म के समाज को दिखलाती आती रही हैं।

नरेंद्र सिंह नेगी- और जब गढवाली -कुमांउनी रचनाकार एक काल्पनिक समाज की प्रतिनिधि हिंदी फिल्मो की उल -जलूल नकल पर फिल्म बनाएगा तो विचारों के स्तर पर बेकार ही फ़िल्में बनेंगी।आप ही ने एक उदाहरण दिया था की 'कभी सुख कभी दुःख ' फिल्म में गढ़वाली गावों में डाकू घोड़े में चढ़कर डाका डाल  रहे है.. अभी एक गढ़वाली डीवीडी फिल्म रिलीज हुयी  जिसमे गढवाल के गाँव में खलनायक की टीम  दुकानदारों से हफ्ता वसूली कर रही है। अब एक बात बताइये ! गढ़वाल या कुमाऊं के गावों में आज भी शाहूकारी व दुकानदारी के अति विशिष्ठ सामजिक नियम हैं और दुकानदार समाज का उसी तरह का सदस्य है जिस तरह एक लोहार या पंडित। और यदि कोई दुकानदारों से हफ्तावसूली करे तो क्या गाँव वाले हिंदी फिल्मों की तरह चुप बैठ सकते हैं?मैदानी और पहाड़ों में सामाजिक व मानसिक दोहन (एक्सप्लवाइटेसन)  बिलकुल  अलग अलग किस्म के हैं।फिर इस तरह की बेहूदगी गढ़वाली -कुमांउनी फिल्मों में दिखाई जायेगी तो ऐसी फ़िल्में ना तो वैचारिक दृष्टि से ना ही उद्योग की दृष्टि  से दर्शकों को लुभा पाएगी। प्यार के मामले में भी सम्वेदनशीलता की जगह  फूहड़ता ... इश्क को फिल्मों में रूमानियत की जगह अजीब और अनदेखा नाटकीयता से फिल्माया जाता है।


भीष्म कुकरेती - कई लोगों ने मुझसे बात की कि यदि गढवाली -कुमांउनी फिल्मों को पटरी पर लाना है तो उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर की वैचारिक फ़िल्में बनानी पड़ेंगी।

नरेंद्र सिंह नेगी- जी हाँ मै भी इसी विचार का समर्थक हूँ कि जब तलक कुमांउनी-गढवाली फिल्मों में सत्यजीत रे सरीखे समाज और संस्कृति से जुड़े संवेदनशील रचनाकार नहीं आयेंगे तब तक इसी तरह की हिंदी नुमा क्षेत्रीय भाषाओं में बनेंगी। सत्यजीत रे ने बंगाली फिल्मों को बंगाली बाणी दी। मै एक उदाहरण देना चाहूँगा कि किस तरह हमारे क्षेत्रीय फिल्म रचनाकार  हिंदी फिल्मों के मानसिक गुलाम हैं। मैंने एक गढवाली फिल्म में म्यूजिक व बैक ग्राउंड म्यूजिक दिया। लड़ाई के एक दृश्य में मैंने डौंर-थाली से  डौंड्या नर्सिंग नृत्य संगीत शैली में बैक ग्राउंड म्यूजिक दिया। सारे दिन भर मुंबई के एक स्टूडियो में मैंने यह म्यूजिक रिकॉर्ड किया। पर जब मैंने फिल्म देखी तो वह बैक ग्राउंड म्यूजिक गायब था व हिंदी फिल्मों के स्टौक म्यूजिक का  ढिसूं -ढिसूं म्यूजिक डाला गया था।       


भीष्म कुकरेती - आखिर क्या कारण है कि गढ़वाली-कुमांउनी फ़िल्मी रचनाकार  हिंदी फिल्मों के नकल कर रहे हैं।

नरेंद्र सिंह नेगी- प्रथम कारण,  तो गढ़वालियों और कुमांउनी फिल्म रचनाकारों व समाज  दोनों को काल्पनिक हिंदी फिल्मों का वातावरण मिलता है तो हर क्षेत्रीय फिल्म रचनाकार इस हिंदी फिल्म के तिलस्म को तोड़ पाने में असमर्थ ही है।







भीष्म कुकरेती -इस समस्या का  निदान ?

नरेंद्र सिंह नेगी- जब तक कुमांउनी -गढ़वाली फिल्म उद्यम में संस्कृति व समाज को पहचानने वाले सम्वेदनशील कथाकार, पटकथाकार व फिल्म शिल्पी एक साथ नही प्रवेश करेंगे तो विचारों की दृष्टि से गढ़वाली-कुमांउनी फिल्म व ऐल्बम इसी तरह की काल्पनिक ही होंगी। फिल्म कई कलाओं व तकनीक का अनोखा संगम है अत: सम्वेदनशील रचनाकारों की टीम  ही विचारों की दृष्टि से इस खालीपन को दूर कर सकते हैं। 

भीष्म कुकरेती- नेगी जी आजकल गढ़वाली -कुमाउनी फिल्म-ऐलबम उद्योग का क्या हाल है?


नरेंद्र सिंह नेगी -कुकरेती जी बहुत ही बुरा हाल है। नई टेक्नौलौजी याने इंटरनेट और डीवीडी से पेन ड्राइव पर डाउन लोडिंग से गढ़वाली -कुमाउनी फिल्म-ऐलबम उद्योग ठप्प ही पड़ गया है।

भीष्म कुकरेती- अच्छा इतना बुरा हाल है?

नरेंद्र सिंह नेगी - अजी ! इतना बुरा हाल है कि कई म्यूजिक कम्पनियों ने म्यूजिक उद्योग बंद कर तम्बाकू -गुटका पौच बेचने का धंधा शुरू कर दिया है

भीष्म कुकरेती - क्या कह रहे हैं आप ?


नरेंद्र सिंह नेगी -हाँ जब क्षेत्रीय म्यूजिक से मुनाफ़ा ही नही होगा तो म्यूजिक कम्पनियां दूसरा धंधा शुरू करेगे ही कि नहीं?

भीष्म कुकरेती -पर कॉपी राईट के नियम तो हैं ?


नरेंद्र सिंह नेगी - भीषम जी ! नियम तो हैं पर न्यायिक प्रक्रिया इतनी जटिल और लम्बी है कि कोई भी उद्योगपति न्यायालयों के झंझटों में नही पड़ना चाहता।

भीष्म कुकरेती - फिर कुछ ना कुछ समाधान तो ढूंढना ही होगा।


नरेंद्र सिंह नेगी - अभी तो फिल्म कर्मियों को नई तकनीक द्वारा असम्वैधानिक तरीकों से नकल का कोई तोड़ नही मिल रहा है

भीष्म कुकरेती - आपका मतलब है अब म्यूजिक कम्पनियां गढ़वाली -कुमाउनी फिल्म -ऐलबम निर्माण कर ही नहीं पाएंगी?


नरेंद्र सिंह नेगी - नही टी सीरीज जैसी बड़ी कम्पनियों के लिए तो अभी भी यह बजार मुनाफ़ा दे सकता है क्योंकि उन्हें वितरण के लिए केवल गढ़वाली -कुमाउनी फिल्म -ऐलबमों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। फिर कुछ छोटी याने आज आयि कल गयी कम्पनियां मर मर कर इस उद्योग को चलाती रहेंगी।

भीष्म कुकरेती -मतलब ब्यापार की दृष्टि से आज का गढ़वाली -कुमाउनी फिल्म -ऐलबम निर्माण घाटे का सौदा है।


नरेंद्र सिंह नेगी - आज की स्थिति से तो यही लगता है।

भीष्म कुकरेती - नेगी जी ! मै सोच रहा था कि नई तकनीक से क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मो को फायदा होगा किन्तु ...


नरेंद्र सिंह नेगी -देखिये इंटरनेट और डाउन लोडिंग तकनीक से क्षेत्रीय भाषाई म्यूजिक या फ़िल्में दूर दूर भारत के शहरों में व विदेशों में बसे प्रवासियों को सुलभ हो गईं । यह एक बहुत फायदा भाषा को हुआ किन्तु इससे फिल्म और म्यूजिक ऐलबम निर्माण तो ठप्प हो गया कि नहीं? जब उत्पादन का निर्माण ही नही होगा तो फिर भविष्य में बिखरे उत्तराखंडियों को कहाँ से फिल्म दर्शन व संगीत उपलब्ध होगा?

भीष्म कुकरेती - मतलब सामजिक जुम्मेवारी  यह है कि उत्तराखंडी लोग स्वयं ही अनुशासित हो कापीराईट का उल्लंघन ना करें और नकली डीवीडी ना खरीदें


नरेंद्र सिंह नेगी - आदर्शात्मक हिसाब से सही है किन्तु ...

भीष्म कुकरेती - इसका अर्थ हुआ कि राज्य सरकार को कुछ करना चाहिए?


नरेंद्र सिंह नेगी -किस सरकार की बात कर रहे हैं आप ? जिस राज्य के एक मुख्यमंत्री संस्कृत को राज भाषा घोषित करें और दूसरे मुख्यमंत्री उर्दू को राजभाषा घोषित करें पर दोनों राष्ट्रीय दलों के मुख्यमंत्रियों को लोक भाषाओं की कतई चिंता ना हो उस राज्य में आप क्षेत्रीय भाषाई फिल्म -ऐल्बम उद्योग की सरकारी सहयोग-प्रोत्साहन की कैसे आशा कर सकते हैं ? हाँ कोई फिल्म अकादमी बने तो ...

भीष्म कुकरेती- तो वहां समाज सरकार पर दबाब क्यों नही बनाता।


नरेंद्र सिंह नेगी -आप सरीखे सम्वेदनशील  लोग इधर उधर बिखरे हैं। मै या अन्य रचनाकार सभाओं में फिल्म उद्योग को सरकारी संरक्षण , प्रोत्साहन की बात अवश्य करते हैं किन्तु हमारी राजनैतिक जमात सोयी नजर आती है।

भीष्म कुकरेती- पर कुछ ना कुछ उपाय तो अवश्य करने होंगे


नरेंद्र सिंह नेगी -हाँ ! फिल्म रचनाकार , कलाकार, समाज व सरकार सभी इस दिशा में एकी सोच से  काम करें तो यह उद्योग बच  सकता है।

भीष्म कुकरेती -जी धन्यवाद।  मुझसे बात करने के लिए   मै आपका आभारी हूँ





Copyright@ Bhishma Kukreti 11/3/2013

Bhishma Kukreti

गढ़वाली हास्य-व्यंग्य

सौज सौजम मजाक-मसखरी 

हौंस इ हौंस मा, चबोड़ इ चबोड़ मा



                                                     गढ़वळि  संस्कृति दर्शन



                                                       चबोड़्या-चखन्यौर्या: भीष्म कुकरेती
(s =आधी अ )   



मास्टर जी - तो बच्चो! अपण स्कूलों नाम बथावो!

स्कुल्या- सर ! हमर स्कूलों नाम न्यू  व्हार्टनी स्कूल, न्यू जर्सी ,  यूनाइटेड स्टेट्स औफ़ अमेरिका च।

मास्टर जी - भलो भलो ! तो बथावो आज क्या दिन च?

स्कुल्या- आज शुकार  च 

मास्टर जी- अर शुकारो कुण दुफरा  परांत हम लोग क्या करदां?

स्कुल्या- आज हम एकैक कौरिक अपण नेटिव प्लेस याने पैत्रिक अर मात्रि भूमि  का बाराम एक हैंको तैं बथौंदा।

मास्टर जी - किलै?

स्कुल्या -जां से हम तैं दुन्या का भौं भौं जगाक भूगोल अर संस्कृतिs बारम सही जानकारी मिल जावो।

मस्टर जी-  भलो ! भलो !  हाँ तो आज अपण मात्रि  भूमि  को बारामा बथाणो कैकि पांति (बारी ) च ?

एक स्कुल्या  - जी मेरो।

मास्टर जी - तेरो नाम क्या च।

स्कुल्या - जी  रितेश गढ़वाली।

सबि स्कुल्या - तैकुण  प्यार से हम तै   रीठु बुल्दां

मास्टर जी - तो रीठू ! तेरी मातृभूमि नाम क्या च?

रीठु - जी गढ़वाल, हिमालय , इंडिया

मास्टर जी -तो बथा तुमर इख  क्या क्या हूंद।

रीठु- जी हमर इख कुछ नी हूंद बस  हिसर, काफळ , किनगोड़ा, बेडू , तिमल, बंजण . बंजणो ठंडो ठंडो पाणि, क्या-कुंळै बग्वान।

मास्टर जी - दैट्स इंट्रेस्टिंग। अग्वाड़ी

  रीठु -फ्युंळि बि होंद  पर या जवान होणि रौन्दि होणि रौन्दि ।   

मास्टर जी- अच्छा ! फ्युंळि जवान बि होंदी

रीठु - जी अर फिर वा कै जवान छ्वारा दगड़ , प्यार करदी अर द्वी आड़ा तिरछा कुज्याण कै भौणम पहाड़ोम गाड गदनोम   नाचणी रौन्दि।उख हरेक को काम प्रेम करण च अर पहाड़ोंम नाचण -गाण इ च।

मास्टर जी - जरा गढ़वाळs   सोसल लाइफ़  का बाराम बथादी

रीठु- जी उख  सौब पलायन का रूण रूंदन अर काम क्वी नि करदो।कबि कबि क्वी जनानी पाणी बंठा उठैक लान्दि 

मास्टर जी -दैट्स इंट्रेस्टिंग। हौर!

  रीठु - उख डाकु घवाड़ाम बैठिक डाका डाऴदन अर पुलिस त ना पर फ्युंळि प्रेमी डाकुओं नाश करदो।

मास्टर जी - वोह ! उख अर डाकु ?

रीठु - जी हाँ वो लोग पहाड़ी रास्तों पर घवाड़ा इन भगांदन जन मेरो बुबा जी इख मर्सडीज भगांदन।

मास्टर जी - सोसाइटी बाराम कुछ हौरि जानकारी?

रीठु -जी उख  गढ़वालम लोगुं तैं हंसाणो बान  भौं अलग इ जात होंदि।

  मास्टर जी - अच्छा ! 

रीठु - हाँ जी यी लोग उल जलूल हरकत कौरिक . दारु पेकि, कैकि चोरि कौरिक लोगुं तै हंसाणो कोशिस करदन पण लोग छन कि हंसदी नि छन।

मास्टर जी - या क्वा जात च?

  रीठु - जी क्वी यूं तैं  कॉमेडियन बुल्दो त क्वी हास्य कलाकार।

मास्टर जी - अच्छा ! उख समाज मा शान्ति ही रौन्दि बुरा लोग नि होंदन?

रीठु -जी हमर गढ़वालमा गब्बर सिंग, लाला, मोगेम्बो, मोना  डार्लिंग को बौस जन बुरा लोग समाज का बुरा लोग होंदन यी लोग भौत इ बुरा होंदन।

मास्टर जी - अर तुमर गढवाल की संस्कृति?

रीठु - जी ब्वाल च कि ना बेबगत गाणा गाण अर कैं बि भौणम नचण।

मास्टर जी - रीतेस अलाइस रीठु ! तू कबि गढ़वाल बि गे , कबि पहाड़ बि गे?

रीठु - ना मास्टर  जी! मि कबि गढ़वाल नि ग्यों। हां अपुण ब्वे बुबों दगड़ हिमाचल प्रदेश,  कश्मीर , ऊटी जन पहाड़ी जगों मा जरूर ग्यों।

मास्टर जी- तेरा  पैरेंट्स त्वै तैं गढ़वाल किलै नि लीगेन?

रीठु - जी म्यार बुबा जी बुल्दन बल म्यार  ददा जी भौत साल पैल दिल्ली ऐ छया अर म्यार बुबा जीन गाँव कबि नि देखि। बुबा जी बुल्दन बल उख हमर गां मा हमर पैत्रिक कूड़ खंद्वार  ह्वे गे होला त उख जैक क्या करण?

मास्टर जी -रितेस गढ़वाली ! त्वे तैं गढ़वाल की या जानकारी  कखन मील ?

रीठु - जी  गढ़वाली फिल्म अर गढ़वाली म्यूजिक ऐल्बमुं से मि तैं गढ़वाल का बाराम या जानकारी मील।

मास्टर जी -बच्चो तुमन रितेस गढ़वाली की बातों क्या अर्थ निकाळ?

एक बच्चा - कि रीठु तैं अपण नेटिव प्लेस का बारम कुछ नि पता।

दुसर बच्चा- कि  रीठुन जो बि ब्वाल वो सब झूट च कोइ बि फिल्मों से अपण समाज, संस्कृति का बाराम सही जानकारी हासिल नि कौर सकुद।

मास्टर जी - अर अपण संस्कृति कु बाराम ज्ञान कु दे सकुद?

सबि बच्चा- संस्कृति ज्ञान दीणै जुमेवारी पेरेंट्स की होंदी ना कि फिल्मों की ।   

     




Copyright @ Bhishma Kukreti 12 /3/2013


Bhishma Kukreti

मूर्धन्य हास्य कलाकार घन्ना भाई: एक अतृप्त कलाकार



                                             प्रस्तुति : भीष्म कुकरेती 



               घन्ना भाई का नाम गढ़वाली सांस्कृतिक कार्यक्रमों व गढवाली फिल्मों में एक जाना पहचाना नाम है। घन्ना भाई अब गढवाली फिल्मों व ऐलबमों में भी जाना पहचाना नाम ह। 4/8/1953 को गंग्वाड़ा गाँव (पट्टी-गग्वाड़स्यूं, पौड़ी गढ़वाल) में जन्मे घन्ना भाई ने 1970  से स्टेज पर काम करना शुरू कर दिया था और दर्शकों को उनकी कॉमेडी पसंद आने लगी थी।  फिर 1980 से श्री नरेंद्र सिंह नेगी के संग जुड़ने के बाद तो घन्ना भाई गढवाली स्टेज के बताक बादशाह बन गये। आज भी गढवाली स्टेज को घन्ना भाई का हास्य में कोई विकल्प नही मिल पाया है। घन्ना भाई ने बीजेपी के टिकट पर   विधान सभा चुनाव लड़ा  किन्तु चुनाव में हार गये। हाँ एक बात आज भी गौरतलब  है कि लोगों यह पता है कि घन्ना भाई चुनाव हारे किन्तु उनके खिलाफ कौन चुनाव जीते  वह बहुसंख्यकों को नही पता।



      मेरी आज घन्ना भाई से फोन पर लम्बी बात हुयी जिसे मै साक्षात्कार रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ। बातचीत गढ़वाली में ही हुयी।




भीष्म कुकरेती- घन्ना भाई नमस्कार ! मै मुंबई से भीष्म कुकरेती बोल रहा हूँ और लेखक भी हूँ।

घन्ना भाई- नमस्कार नमस्कार। भै मैंने आपके लेख  लेख पढ़े हैं।

भीष्म कुकरेती- घन्ना भाई मै आज केवल गढ़वाली गढवाली फिल्मों और ऐल्ब्मों के बारे में बातचीत करनी है जो इंटरनेट में छपेगी।

घन्ना भाई- दा बवालों ! बड़ी बात! कहिये क्या बात करना चाहते हैं।


भीष्म कुकरेती- आपने कई ऑडियो केसेट भी निकाले हैं जिसमे आपकी  हास्य कला का अछा उभार है।

घन्ना भाई-याद ना दिलाओं उस बक्त की। केसेट का जमाना याने गढवाली संगीत और मिनी ऑडियो ड्रामाओं के लिए स्वर्ण युग।


भीष्म कुकरेती- जी आपने किन किन गढ़वाली-कुमांउनी फिल्मो-ऐल्बमों  में काम किया?   

घन्ना भाई- घरजवैं, कौथिग, बेटी ब्वारी, बंटवारु, ब्वारी हो इनि, सतमंगऴया, औंसी की रात, जीतु  बगड्वाळ,चक्रचाळ जैसी  फीचर फिल्मों में  काम किया।           


भीष्म कुकरेती- और डीवीडी फ़िल्में

घन्ना भाई- घन्ना भाई एम् बी बी एस ' घन्ना भाई चालबाज, 'घन्ना गिरगिट अर यमराज, भग्यान  बेटी, भजराम  हवलदार,  अबेर  आदि जैसी कई डीवीडी फिल्मों में बतौर हास्य कलाकार काम किया। 


भीष्म कुकरेती- फिर अलबमों का क्या हाल रहे?

घन्ना भाई-  दसियों गढ़वाली ऐल्बमों में कॉमेडी की।


भीष्म कुकरेती- आपने दर्द या मृत्यु पर कॉमेडी की है?

घन्ना भाई- मैंने मृत्यु आधारित हास -परिहास विषय पर शायद काम नही किया किन्तु मृत्यु पर भी दर्शक कैसे हंसते हैं की याद मुझे है।


भीष्म कुकरेती- यह कौन सा सिक्वेंस था कि ब्लैक कॉमेडी  पैदा हो गयी?

घन्ना भाई- मेरे पिता  जी की मृत्यु पर मैंने मुंडन किया हुआ था और उसी दौरान मुझे स्टेज पर कलाकारी करनी पड़ी। खल्वाट मुंड लिए मै जैसे ही स्टेज पर आया कि दर्शक हंसने लगे। जब उद्घोषक ने दुखदायी सूचना दर्शकों को दी कि  चूंकि मेरे पिताजी का देहांत हुआ है और घन्ना भाई को मुंडन करना पड़ा तो दर्शक और जोर से हंसने लगे।


भीष्म कुकरेती- क्या दर्शक इतने असम्वेदनशील होते हैं?

घन्ना भाई-नही वे मेरे प्रति सम्वेदनशील ही थे कि  मेरे दुःख से भी वो हंसना चाहते थे। हास्य कलाकार जब नामी कलाकार हो जाय तो दर्शक उसके हर मूवमेंट पर हंसना नही भूलते।


भीष्म कुकरेती- आपने किसी जाति  पर आक्षेप से हंसी पैदा की है? जैसे मुझे  याद है कि आपने एक नेपाली कुली  के किरदार की नकल स्टेज पर की थी।

घन्ना भाई-नहीं किसी जाति  पर आक्षेप याने रेसिज्म विषय पर मैंने कभी भी कॉमेडी नही की। जहां तक नेपाली करेक्टर की नकल का सवाल है वह दो भाषाओं गढ़वाली और नेपाली  बोलने के अंतर से उत्पन की गयी कॉमेडी थी।   


भीष्म कुकरेती- अवगुणों की खिल्ली उड़ाती कॉमेडी की?

घन्ना भाई- हाँ !स्टेज पर और कई फिल्मों-एल्बमों में कंजूस , पियक्कड़ प्रवृति के अवगुणों से उत्पन  हास्य में मै  साझीदार रहा हूँ।


भीष्म कुकरेती- कभी कभी कलाकार को स्क्रिप्ट की जगह स्वयं ही हास्य पैदा करने के लिए इम्प्रोवाइज या सुधार करना पड़ता है

घन्ना भाई- यह तो रोजमर्रा का काम है। स्टेज और फिल्मों -ऐलबमों में अक्सर ऐसा होता है कि मुझे स्वयं ही सम्वाद और अदायगी में तुरंत बदलाव करना ही पड़ता है।


भीष्म कुकरेती- आपने किन किन फिल्मों -एल्बमों में व्यंग्यात्मक हास्य या वैकल्पिक हास्य पैदा किया है।

घन्ना भाई-वैसे तो हरेक हास्य रचना में दर्द व व्यंग्य छुपा ही रहता है किन्तु भग्यान  बेटी, अबेर में  व्यंग्य कोटि का हास्य है।


भीष्म कुकरेती- शारीरिक मूवमेंट गति या शरीर के अंगो से  से उत्पन हास्य के बारे में बताईये

घन्ना भाई- तकरीबन हरेक फिल्मों व ऐल्बमों में मेरे शरीर की गति व अंगो को अजीव तरह से गति देने से भी मैंने हास्य पैदा किया है।


भीष्म कुकरेती- उल जलूल परिस्थिति या परिधान से जन्मित हास्य भी आपने दिया है?

घन्ना भाई- हाँ ऊलजलूल हरकतें तो हास्य पैदा करती ही हैं तो स्टेज व फिल्मों में ऐसे किरदार निभाने ही पड़ते हैं। ऊलजलूल परिधान का एक उदाहरण 'बेटी ब्वारी' का है जिसमे मैं बुर्या (जुट का बड़ा बैग ) फना रहता हूँ।


भीष्म कुकरेती- कभी कभी कलाकार भावहीन होकर सम्वाद बोलता है और इसी भावहीन व संवाद अदायगी से हास्य उत्पन होता है।

घन्ना भाई- जैसे श्री सुरेन्द्र शर्मा कविता पाठ करते समय भावहीन चेहरा दिखाते है।


भीष्म कुकरेती- हाँ जी! अपने ऐसा किरदार किया है कि किरदार भावहीन हो किन्तु सम्वाद और भावहीनता हास्य पैदा करे।

घन्ना भाई-फिल्मों में तो नहीं किन्तु स्टेज में कभी कभी प्रयोग अवश्य किया है।


भीष्म कुकरेती- सामयिक घटनाओं पर फिल्मों या ऐल्बमों में हास्य पैदा किया है क्या?

घन्ना भाई- हाँ श्री नरेन्द्र सिंह नेगी जी के कई ऐलबमों में सामयिक विषयों पर मेरे किरदार ने हास्य और व्यंग्य दोनों पैदा किये है।


भीष्म कुकरेती- शब्द जाल या अलंकृत भाषा से भी हास्य पैदा किया जाता है।

घन्ना भाई- वैसे अभी तक मुझे मेरे सम्वादों से संतोष नही मिला।


भीष्म कुकरेती- किसी की बेज्जती से भी हास्य पैदा किया जाता है।

घन्ना भाई-जी हाँ स्टेज में और कई फिल्मों में मेरा किरदार किसी अन्य किरदार की बेज्जती करता है या कोई और किरदार मेरे किरदार की खिल्ली उडाता है तो हास्य पैदा हुआ है। दर्वड्या डीवीडी फिल्म में यह सब आपको मिलेगा। 


भीष्म कुकरेती- पैरोडी के बारे में

घन्ना भाई-यह तो स्टेज और कई फिल्मों में हुआ है।


भीष्म कुकरेती- चापलूसी से भी हास्य पैदा किया जाता है।

घन्ना भाई-जी हाँ ! .बथौं' फिल्म में आपको चापलूसी से पैदा किया गया हास्य मिल जाएगा। घन्ना भाई के सिक्वेल्सों  में भी कई जगह चापलूसी से मैंने हास्य पैदा किया है।   


भीष्म कुकरेती- कभी कभी टैक्नोलोजी या किसी अपरिचित कार्य से भी  हास्य पैदा किया जाता है।

घन्ना भाई-हाँ दोएक फिल्मों में जैसे  मैं खाना बनाना नही जानता फिर जब खाना बनाता हूँ तो किस प्रकार मुझे उलझने होती हैं से भी हास्य पैदा किया है। 


भीष्म कुकरेती- संगीत से भी हास्य पैदा किया जाता है।

घन्ना भाई-जी ! मेरे किरदार के कार्योकलापों  में बैक ग्राउंड म्यूजिक इस तरह दिया जाता है की हास्य भाव को बल मिले।


भीष्म कुकरेती- घन्ना भाई कभी कभी दृष्य  याने विजुअल्स ही हास्य पैदा क्र देते हैं।

घन्ना भाई-भीष्म जी ! गढ़वाली फिल्मों में मुझे ऐसे दृश्य याद  नही हैं। मै  तो फिल्मों में निर्देशक का शत प्रतिशत गुलाम होता हूँ। जो डाइरेक्टर कहता है मै अभिनय कर देता हूँ।


भीष्म कुकरेती- कभी कभी किसी वास्तु के पुनर्निर्माण में गलतियाँ दिखा कर भी हास्य पैदा किया जाता है, जैसे कोई चीज टूट जाय और उसे जोड़ना हो या ताजमहल को दुबारा बनाना जैसी घटनाओं से भी हास्य पैदा होता है। जैसे हिंदी में एक फिल्म बनी जिसमे फेक यूनिवर्सिटी बनाई जाती है और फिर हास्य व्यंग्य पैदा होता है।

घन्ना भाई-दा बवालों! ऐसे सोच के लेखक गढ़वाली फिल्म संसार में कहाँ हैं?


भीष्म कुकरेती- जी हमने हास्य के तकरीबन हरेक विधाओं पर बात की और यह साबित हुआ कि आपने हास्य की सभी विधाओं के किरदार निभाएं है। यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे आपसे बात करनी का मौक़ा मिला।   

घन्ना भाई- दा ब्वालो! मुझे भी आपसे बात करने में आनन्द आया।


भीष्म कुकरेती- गढ़वाली फिल्मों का भविष्य क्या है ?

घन्ना भाई-अन्धकार, जब तक पाइरेसी और मुफ्त में डाउनलोडिंग बंद नही होगी गढ़वाली फिल्मों और ऐल्बमों का भविष्य है ही नही 


भीष्म कुकरेती- परिवार के बारे में भी बताइये

घन्ना भाई- पत्नी बीमार रहती है और घरेलू कार्य जैसे भोजन बनाना आदि का काम स्वयम मुझे करना पड़  रहा है। दो लडके इंजिनियर हैं और नौकरी करते हैं . मै  कभी देहरादून या पौड़ी रहता हूँ। 


भीष्म कुकरेती- क्या आप अपने हास्य कलाकारी काम से संतुष्ट हैं ?

घन्ना भाई-दा ब्वालो! मै  बहुत ही अतृप्त कलाकार हूँ अभी भी मै ऐसा  किरदार करना चाहता हूँ कि जो हास्य में अमर किरदार  बन जाय।


भीष्म कुकरेती- कोई ख़ास विषय पर  आप फिल्म बनाना चाहेंगे?

घन्ना भाई- जी मेरा सपना है कि मै ऐसी फिल्म में काम करूँ जिसमे मेरा  किरदार शराब के नशे का गढ़वाल से जड़ नाश कर  देता है। फिल्म को देखकर लोग पूरी तरह शराब पीना छोड़ दें।


भीष्म कुकरेती- घन्ना भाई आपने मुझसे इतनी देर तक बात की मै आपका आभारी हूँ

घन्ना भाई-  धन्यवाद कुकरेती जी  , फोन करदा रयां



Copyright@ Bhishma Kukreti 12/3/2013

Bhishma Kukreti

Ravi Bhatt: A Cinema Photographer Ambitious for Taking Garhwali -Kumauni Films on International Cinema Map 


Review of Development of Garhwali-Kumauni (Uttarakhandi) Films, Music Albums, Documentary films -17

                                                Bhishma Kukreti

[Notes on Regional language Film Cinema photographers; Hindi Film Cinema photographers; Garhwali Regional language Film Cinema photographers; Kumauni Regional language Film Cinema photographers; Uttarakhandi Regional language Film Cinema photographers; Mid Himalayan Regional language Film Cinema photographers; Himalayan Regional language Film Cinema photographers; Punjabi Regional language Film Cinema photographers; North Indian Regional language Film Cinema photographers; Indian Regional language Film Cinema photographers; SAARC Countries Regional language Film Cinema photographers; Asian Regional language Film Cinema photographers; Oriental Regional language Film Cinema photographers]

                It is no surprise that effective and memorable film requires a good camera work but audience randomly know about cameraman. Most of the successful, unforgettable movies have excellent camerawork.
   Ravi Bhatt is one of the brilliant Cinema Photographer of Garhwali-Kumauni film world (Hillywood). Born on 12/7/1971 in Prem Nagar, Rudraprayag Garhwal, Ravi Bhatt came to Delhi in search of job after passing his Intermediate degree. He got job in Radha Entertainment Company (Punjab) an Audio Cassette company, where he learnt camera operation.
               Ravi Bhatt as cameraman worked in different fields of cinematography.
           Roadies (UTVbindass0 and Little Master Chef of Star Plus (Colosceum Pro. House Mumbai) are two profile shoot in the name of Ravi Bhatt as cameraman.
Ravi Bhatt was Cinema Photographer for a reality show called Mission Army for Geography channel.
                 The Cinema Photographer Ravi Bhatt also did shoot corporate films for Hevels, Microtack and Agrotak. 
        There was applaud appreciation for the work of Ravi Bhatt as cinema photographer in TV channel programs as  Apni Boli Apna Desh (ATN);Mele Punjab De (Lashkara);Ek Mulakat ( Lashkara);Akhara  ( channel Punjab).
  The famous regional film Cinema Photographer Ravi Bhatt has credentials in films as Majboor (Hindi, directed by- Gajender Malik);Ek Suhagan(Hindi, director- Shejad Akhtar); Kafan (Hindi, director- Gajender Malik); Tuti Churiyan (Hindi, director-Gajender Malik);Sikh Shahidi (Punjabi, director- Ranjit Singh);Rehat Payari Mujko (Punjabi, director, Tejender Sachdeva);Lungi Bau (Punjabi, director- Tejender Sachdeve).
          As a Cinema Photographer, Ravi Bhatt did shoot more than 55 Garhwali-Kumauni music albums and around 40 Punjabi music albums.
  The public and critics appreciated the work of Cinema photographer Ravi Bhatt for his camera work in Garhwali DVD films as Bakivat (directed by Devender Mundepi); Maya Ka Sauder (directed by Virender Sajwan);Fayouli Jawan Vahegi  (directed by Mahesh Prakash);Prem (directed by  Mahesh Prakash);Sankalp (directed by Mahesh Prakash);Main Sunder Shaon (directed by Mahesh Prakash);Teru Meru Saath (directed by Mahesh Prakash);Bhagirathi (directed by Mahesh Prakash); Sanchi Maya (directed by  Mahesh Prakash); Meru Jayo (directed by Ashok Chauhan); Meru Suhag(directed by  Anil Bisht); Janam Bhumi  (directed by Virender Sajwan);Shyam Dhalni Cha (directed by Kanta Prasad).;Ullar (directed by B.S Rawat).
             The cinema photographer Ravi Bhatt says that since there are no faculties available for cinema photography for Garhwali –Kumauni films in hills of Uttarakhand as trolley, rail or crane etc, the cameraman has to apply many tricks, methods and experiments to get the real effects as per film need or director's need.
              Ravi Bhatt has ambition to take Garhwali-Kumauni films name from cinema photography angle to International film map. Ravi says that the camera can show best of Himalayan beauty and culture together for International audience as American Beauty, Memories of Geisha,The Godfather, Morte a Venezia, Barry Lyndon, Ben Hur,Wo HuCang Long, Shindler's List, ShichininNo Samurai .


[Based on telephonic talk with film, music album –Cameraman Ravi Bhatt,HE-306 , phase -5
Mohali, (Punjab), 09815411831, ravibhatt71@gmail.com,)


Reference: Bhishma Kukreti, 2013, उत्तराखंडी फिल्मों का संक्षिप्त इतिहास

Copyright@   Bhishma Kukreti 13/3/2013

Review of Garhwali and Kumauni Films, music albums, documentary films (Uttarakhandi) to be continued...18
Notes on Regional language Film Cinema photographers; Hindi Film Cinema photographers; Garhwali Regional language Film Cinema photographers; Kumauni Regional language Film Cinema photographers; Uttarakhandi Regional language Film Cinema photographers; Mid Himalayan Regional language Film Cinema photographers; Himalayan Regional language Film Cinema photographers; Punjabi Regional language Film Cinema photographers; North Indian Regional language Film Cinema photographers; Indian Regional language Film Cinema photographers; SAARC Countries Regional language Film Cinema photographers; Asian Regional language Film Cinema photographers; Oriental Regional language Film Cinema photographers to be continued...

Bhishma Kukreti

Mahesh Prakash Directed highest numbers of Garhwali –Kumauni Films

Review of Development of Garhwali-Kumauni (Uttarakhandi) Films, Music Albums, Documentary films -18

                                                Bhishma Kukreti

[Notes on film director directed highest numbers of regional language films; film director directed highest numbers of Garhwali language films; film director directed highest numbers of Uttarakhandi regional language films; film director directed highest numbers of Mid Himalayan regional language films; film director directed highest numbers of Himalayan regional language films; film director directed highest numbers of North Indian regional language films; film director directed highest numbers of Indian  regional language films; film director directed highest numbers of South Asian regional language films; Asian film director directed highest numbers of regional language films;  film director directed highest numbers of Oriental  regional language films]
   
         Mahesh Prakash is the film activist that directed highest numbers of Garhwali VCD film.  It is because his hard work in drama/theatre that made him famous Garhwali VCD film director.
            Mahesh Prakash was born on 6/4/1966 in Bhitkot village, Syunsi-Baijron, Dhoundiyalsyun, Pauri Garhwal. Mahesh Prakash who directed highest numbers of Garhwali VCD films is Art Graduate from Delhi University.
   At the age of twelve, Mahesh Prakash started performing in stage plays/drama. Mahesh Prakash acted in Hindi plays Khilone Sans ke,  Pahle aur Abhi, Kalakanta aur Kalakar, Jareena, Ek Foll ek Kuta, Bhagwan dekhta Raha, Maharaja sheikh Chilli, Ladli, Parat Dar Parat, Sabak. Mahesh Prakash directed Hindi stage play Maharaja Sheikh Chilli.
  Mahesh Prakash was always connected to Garhwali theatre of Delhi and acted in Garhwali stage plays as Abhagi Kamla, Ghat, Khichdi Khayin Khushi, Jua, Hari Hindwan, Mangtu Bualya and Adalat. Mahesh Prakash directed Garhwali stage play Mangtu Baulya (written by Swaroop Dhaundiyal) too.
   Mahesh Prakash acted in Hindi television films as Pyara Bachpan, Chitthi Ayi hai, Heera for Doordarshan.
  Mahesh Prakash produced and directed regional television serials for Doordarshan as Hamari baten Apki Yaden (100 episods), Khel khel me jito.   
     Mahesh Prakash directed highest numbers of Garhwali VCD films as:
Mi Sundar Chaun a Garhwali film that talks about the real beauty is on characters of human being than physical beauty.
Garhwali film 'Fyunli Javan hwe ge discusses the problems of mass human migration from hills of Garhwal. Tero Mero Sath Garhwali film provides alternate to settle in rural Garhwali youth by migrated Garhwalis (re-migration from plains to rural Garhwal).
Garhwali film Meri Pyari Bhauji is about sacrifice of two women.
The film makers on most of Indian languages made film on subject of Devdas as the story shows romance and love from different angle. Mahesh Prakash also made Garhwali film Prem on the subject of Devdas.
Garhwali film Adalat is adaption of Garhwali drama written by Swarup Dhundiyal.
Dukh ka Knad Suckh ka Fool a Garhwali film discusses about the ups and downs of life.
Garhwali film 'Byakhuni Jhanjh is about the social problem of alcoholism in rural Garhwal.
Ek Ma ki Beti a Garhwali film is about the love and many situations of woman in the human life. 
Mahesh Prakash also acted in Garhwali films as Jaunlya Bhai, Pardes.
    Mahesh Prakash is worried about decline in business of Garhwali-Kumauni film (Hillywood) industry. Mahesh blames for this worsening position of Garhwali-Kumauni film business to bad quality film making by many film makers, piracy at all levels, easy down loading technology. Mahesh urges state government to take many steps to protect Hillywood or Garhwali –Kumauni film industry. Mahess argues that the Garhwali-Kumauni film activists are divided and this is also one cause for diminishing position of Garhwali-Kumauni film industry.                   
[Based on telephonic talk with Garhwali-Kumauni film director Mahesh Prakash, Delhi, 09811953305. taniyfilms@yahoo.co.in )


Reference: Bhishma Kukreti, 2013, उत्तराखंडी फिल्मों का संक्षिप्त इतिहास

Copyright@   Bhishma Kukreti 13/3/2013

Review of Garhwali and Kumauni Films, music albums, documentary films (Uttarakhandi) to be continued...19
Notes on film director directed highest numbers of regional language films; film director directed highest numbers of Garhwali language films; film director directed highest numbers of Uttarakhandi regional language films; film director directed highest numbers of Mid Himalayan regional language films; film director directed highest numbers of Himalayan regional language films; film director directed highest numbers of North Indian regional language films; film director directed highest numbers of Indian  regional language films; film director directed highest numbers of South Asian regional language films; Asian film director directed highest numbers of regional language films;  film director directed highest numbers of Oriental  regional language films to be continued...



Bhishma Kukreti

उत्तराखंड फिल्म पत्रकारिता संस्कृति की आवश्यकता -मदन डुकलाण 



                                                  प्रस्तुति: भीष्म कुकरेती


[ गढ़वाली -कुमांउनी फिल्म समीक्षा ने अभी कोई विशेष रूप अख्तियार नही की। इसी विषय पर गढ़वाली ,साहित्यकार  सम्पादक , नाट्य कर्मी, गढ़वाली फिल्म -ऐल्बम कर्मी श्री मदन डुकलाण से फोन पर बातचीत हुयी। जिसका साक्षात्कार के रूप में रूपांतर किया गया है ]


भीष्म कुकरेती- गढ़वाली फिल्म पत्रकारिता के बारे में आपका क्या ख़याल है।

मदन डुकलाण - जी जब प्रोफेस्नालिज्म के हिसाब से गढ़वाली -कुमाउनी फिल्म निर्माण  ही नही हो पाया तो गढ़वाली -फिल्म पत्रकारिता में भी कोई काम नही हुआ


भीष्म कुकरेती- पर समाचार पत्रों में गढ़वाली -कुमाउनी फिल्मों के बारे में समाचार , विश्लेष्ण तो छपता ही है

मदन डुकलाण - कुकरेती जी ! अधिकतर सूचना या विश्लेषण फिल्मकारों द्वारा पत्रकारों को पकड़ाया गया विषय होता है जो आप पढ़ते हैं।

भीष्म कुकरेती- आप गढ़वाली फ़िल्मी पत्रकारिता की कितनी आवश्यकता समझते हैं?
मदन डुकलाण -गढ़वाली -कुमाउनी फिल्मों के लिए विशेष पत्रकारिता  की  आवश्यकता अधिक है।  गढ़वाली-कुमाउनी फिल्म उद्योग को बचाने और इसे प्रोफेसनल बनाने के लिए  गढवाली-कुमाउनी फिल्म जौर्नेलिज्म की अति आवश्यकता है।

भीष्म कुकरेती-  आधारभूत फिल्म विश्लेषण पर ही बात की जाय  कि किस तरह एक फिल्म का विश्लेषण किया जाना चाहिए
मदन डुकलाण -सर्व प्रथम तो पहले ही खंड में फिल्म के वारे में एक पंक्ति में विश्लेषक की राय या विचार इंगित हो जाना चाहिए

भीष्म कुकरेती- जी हाँ ! फिल्म समालोचना का यह प्रथम आवश्यकता भी है। इसके बाद ?
मदन डुकलाण -सारे आलेख में समालोचनात्मक रुख होना ही चाहिए

भीष्म कुकरेती- जी और ..
मदन डुकलाण -पत्रकार विश्लेषक को फिल्म के सकारत्मक व नकारात्मक पक्षों को पाठकों के सामने रखना चाहिए

भीष्म कुकरेती-पाठकों के सामने क्या क्या लाना आवश्यक है ?

मदन डुकलाण -तुलनात्मक रुख फिल्म समालोचना हेतु एक आवश्यक शर्त है कि पाठक  के सामने फिल्म को किसी अन्य फिल्म या विज्ञ विषय के साथ जोड़ा जाय या फिल्म की तुलना की जाय जिससे पाठक फिल्म समालोचना के साथ ताद्यात्म बना सके।


भीष्म कुकरेती- जी हाँ तुलनात्मक रुख की उतनी ही आवश्यकता है जितनी फिल्म के बारे में राय। फिल्म  विश्लेषक को कथा के बारे में कितना बताना जरूरी है ?

मदन डुकलाण -फिल्म विश्लेषक को कथा की सूचना देनी जरूरी है किन्तु अधिक भी नही और जो सीक्रेट/गोपनीय पक्ष  हों उन्हें ना बताकर उन गोपनीय बातों के प्रति पाठक का आकर्षण पैदा कराना चाहिए।


भीष्म कुकरेती-जी !

मदन डुकलाण - फिर टैलेंट, प्रतिभा, कौशल,  को समुचित या अनुपातिक प्रतिष्ठा , प्रशंसा या देनी चाहिए।


भीष्म कुकरेती- जी हाँ प्रतिभा के बारे में ही फिल्म विश्लेषण का एक मुख्य कार्य है

मदन डुकलाण -विश्लेषण बातचीत विधि में हो तो सर्वोत्तम


भीष्म कुकरेती-हाँ बातचीत विधि पाठकों को आकर्षित करती है और बातचीत की स्टाइल पाठकों की मनोवृति के हिसाब से ही होनी चाहिए

मदन डुकलाण - समीक्षक को फिल्म या ऐल्बम को शब्दों द्वारा  फिल्म-एल्बम के वातावरण को पुनर्जीवित करना ही सही समीक्षा की निशानी है


भीष्म कुकरेती-जी! पाठकों को कुछ ना कुछ आभास हो जाना चाहिए की फिल्म या एल्बम का वातावरण कैसा है।

मदन डुकलाण -समीक्षक को अपने विचार नही थोपने चाहिए।

भीष्म कुकरेती-  आपका अर्थ है कि फिल्म समीक्षा के वक्त समीक्षक को किसी वाद को आधार बनाकर समीक्षा नही करनी चाहये।

मदन डुकलाण -इमानदारी तो समीक्षा में हो किन्तु तुच्छता  नही होनी चाहिए


भीष्म कुकरेती-हाँ यह बात भी फिल्म समीक्षा के लिए आवश्यक आयाम है।

मदन डुकलाण -फिल्म समीक्षक को ध्यान रखना चाहिए कि अपने पाठकों और स्मीक्षेतित फिल्म के प्रति बराबर उत्तरदायी है


भीष्म कुकरेती-हाँ समीक्षक कई उत्तरदायित्व सम्भालता है। 

मदन डुकलाण - समीक्षा संक्षिप्त पर व्यापक प्रभाव देयी होनी ही चाहिए

भीष्म कुकरेती-जी

मदन डुकलाण -समीक्षा किसी को अनावश्यक प्रभाव डालनी वाली न हो याने विद्वतादर्शी न हो


भीष्म कुकरेती-गढ़वाली -कुमाउनी फिल्मों के समीक्षक का  अन्य  भाषाओं जैसे हिंदी फिल्म समीक्षा से अधिक उत्तरदायित्व है इस पर आपका क्या कहना है?

मदन डुकलाण -क्षेत्रीय फ़िल्में या नाटक हमेशा एक ना एक संक्रमण काल से गुजरते रहते हैं अत: क्षेत्रीय कला समीक्षक उस कला को पाठकों, दर्शकों की रूचि बनाये रखने का उत्तरदायित्व भी निभाता है।

भीष्म कुकरेती- इसी लिए आप कहते हैं कि  गढ़वाली -कुमांउनी फिल्म व अलबमों के लिए एक विशेष फिल्म समीक्षा संस्कृति आवश्यक है

मदन डुकलाण- जी हाँ गढ़वाली -कुमांउनी फिल्म-ऐल्बम समीक्षा की विशेष संस्कृति आवश्यक है।


Copyright@ Bhishma Kukreti 14/3/2013

Bhishma Kukreti

गढ़वाली हास्य-व्यंग्य

सौज सौजम मजाक-मसखरी 

हौंस इ हौंस मा, चबोड़ इ चबोड़ मा





                               आवा खनु खरपट से गढ़वळि  फिलम  बणौला





                                                 चबोड़्या-चखन्यौर्या: भीष्म कुकरेती
(s =आधी अ )





फिलम बणन्देर ( निर्माता )- ओहो  भीषम जी! नमस्कार, नमस्कार 

भीषम - जी नमस्कार

फिलम बणन्देर- सौरी हाँ ! जरा देर ह्वे गे। आप तै मेरि जग्वाळ करदा परेशानी ह्वे।

भीषम - जी जादा ना  तीनेक घंटा से मि इन्तजार ...

फिलम बणन्देर- वु क्या च फिलम निर्माता चाहे हिंदी को ह्वावो या गढ़वळि  का हो वो अळजाट मा इ रौंद। 

भीषम - जी क्वी बात नी च ...

फिलम बणन्देर-अब आप इखम  आवा तो मतलब आप म्यार दगड़  जुड़ी गेवां तो आप से क्या लुकाण। एक गढ़वळि बिल्डर च अब मातबर ह्वै ग्यायि त वै तै समाजम नाम चयाणु च, त मीन पटै आल अर वो मेरि फिलम माँ पैसा लगाला। अब म्यार बि क्या जाणु च वूं तैं असोसिएट प्रोड्यूसर बणाण मा। फिलम चलि तो नफा मा मेरि भागिदारी निथर नुक्सान असोसिएट प्रोड्यूसरौ।       
भीषम - जी

फिलम बणन्देर-मीन तुमर बारम मा सूण बल तुम गढवाळीम कथा लिखदा अर तुम सणि गढ़वाळो रीति रिवाजों ज्ञान बि च।       
भीषम - जी थ्वड़ा भौत ..

फिलम बणन्देर-भै मि त  गढ़वळि लोक संस्कृति, गढ़वळि  रीति रिवाजूं  प्रेमी छौं अर मेरि  फिल्मोंमा जन कि 'मोबाइल बांद', 'घुंघरा स्याळी  अर छुमा बौ,  'आ स्याळी  सतपुळी म्याळा आ'  सब्युं माँ लोक गीत अर लोक संगीत च।   
भीषम -जी में से क्या उम्मीद च।

फिलम बणन्देर-उम्मीद क्या च? एक निर्माता को चाहिए एक धाँसू स्टोरी। सि यि जु बैठ्याँ छन मेरि फिल्मों का अजय  जी गीतकार छन अर विजय जी संगीतकार छन 
भीषम -जी

फिलम बणन्देर-बॉस तुम एक धाँसू कथा लेखि लया। 
भीषम -कथा को विषय ?

फिलम बणन्देर- वी! जु होंद च। कथा मा सस्पेंसक बान गांमा   द्वीएक हत्या जरूरी छन   
भीषम -औ !त आप सस्पेंस वाळि फिलम बणाण चाणा छन ? 

फिलम बणन्देर-ना ना फिलम त गढ़वळि लोक संस्कृति, गढ़वळि रीति रिवाजूं  पर आधारित हूण चयेंद पण जरा दर्शकों रूचि बि दिखण पोड़द कि ना?   
भीषम -औ !

फिलम बणन्देर-हां जरा यीं फिलम मा गां का चारेक  खलनायक  जरुर हूण चयेंदन
भीषम -जी ?

फिलम बणन्देर-हाँ एक त कन्हैया लाल जन गौं को शाहूकार जरुरी च जैमा  सरा गां वळु पुंगड़ पटळ गिरवी ह्वावन अर वैकि बुरी नजर हीरोइन अर हीरोइन की विधवा भाभी पर ह्वावो     
भीषम -जी ?

फिलम बणन्देर-दुसर खलनायक गौं को डाकु ह्वावो ये खलनायकम आठ दस डाकु अर घवाड़ा हूण चयेंदन जो रातमा गां मा  घ्वाड़ों मा बैठिक डाका दाल्दन। यु खलनायक जरा गब्बर सिंग से बडो क्रूर हूण चयेन्द हां?     
भीषम -जी पहाड़ी गां मा घुडैत डाकु ? 

फिलम बणन्देर-हाँ दर्शकों मजा  को तो ख्याल रखण  पड़दो कि ना?
भीषम - वो !

फिलम बणन्देर-तिसरो खलनायक मोगेम्बो जन हूण चयेन्द जैको खुफिया अड्डा जो माणा गां को  पैथर  ह्वावो।
भीषम -माणा गां?

फिलम बणन्देर-भई गढ़वळि फिलम च तो बद्रीनाथ अर माणा  का सीन आला तो फिलमम गढ़वळि संस्कृति बि आलि कि ना?     
भीषम -अच्छा !

फिलम बणन्देर-हां, चौथो खलनायक जुवाघर अर  कैबरे होटल को मालिक ह्वालो। ये तै अग्निपथ को संजय दत्त जन दिखाण हां   
भीषम -त यिं फिलम मा हीरो हीरोइन नि ह्वेलि?

फिलम बणन्देर-वाह किलै ना! दबंग याने सलमान खान स्टाइल को हीरो ह्वालु, वैकि ब्वै होलि जैं पर डाकु बलात्कार कारल , बैणि ह्वेलि जैं पर गौं को शाहुकार बलात्कार करदो, विधवा भाभी होलि जैं पर मोगेम्बो का चार गुर्गा चल्दि बस मा सामूहिक बलात्कार करदन  जन कुछ दिन पैलि दिल्लीमा ह्वे छौ         
भीषम -तीन बलात्कार ?

फिलम बणन्देर-नै नै ! चौथु बि च वो आखरि च हीरोइन  हिसर गाडणि च चरि खलनायक वींक दगड़ बलात्कार करणे कोशिस करदन ,फट्यां चिर्यां झुल्लों मा   हीरोइन भगदि भगदि ग्युं क खेत माँ आन्दि उख गिवड़म  खलनायक वीं का सबि झुल्ला फाड़ी दीन्दन वा दौड़दि  दौड़दि रूपणि कुणि तयार धानो खेत मा आंदी तो लत पथ नंगी  हीरोइन क़ा दगड़ जनि सबि खलनायक बलात्कार करण इ चंदन की दबंग हीरो आंदो अर चर्युं तैं खतम करदो।           
भीषम -मतलब बलात्कार की कोशिस तीन मैना जेठ से सौण   तक ?

फिलम बणन्देर- अरे भै अचकाल जनता बलात्कार विषय पर बड़ी चर्चा करणी च तो कथा मा सामयिकता बि आण चएंद कि ना? अरे  सामयिकता से याद आयि कि फिलम मा भ्रष्टाचार बि होण चयेंद त तुम इन कारो पंचो खलनायक पटवारी तै बणावो अर वो हीरोइन की बैणि से बलात्कार करदो ज्वा आत्महत्या करी लॆन्दि अर हीरोइन वै पटवारी से बदला लीन्दी।
भीषम - पांच बलात्कारों क बीच मा गढ़वळि  संस्कृति अर रीति रिवाज दिखाणै जगा कखम बचीं च? 

फिलम बणन्देर- भौत जगा च। हीरो हीरोइन का दडुयेट डांस  अर सौंगमा गढ़वळि संस्कृति अर रीति रिवाज का कपड़ा आला, पैथर बैकग्राउंडम पहाड़ ह्वाला, मोगेम्बो बद्रीनाथ को भक्त दिखाए जालो। फिर द्वीएक सामुहिक नाच चौंफळा -थड्या नाच गान का होला. अर ज्वा हीरोइन कि बैणि आत्महत्या करदि , वींक हंत्या आण पर हंत्या को घड्यळ होलु।           


भीषम - अब जब कथा आपन तैयार करि इ याल तो मेरि कखम जरूरत च?

फिलम बणन्देर-तुम तै यिं कथा मा कुछ नयापन लाण। द्वी चार लोग बुलणा छा कि तुम नयो किस्मो कथा  लिखदा तो ..   
भीषम -जी एक बात बथौं ?

फिलम बणन्देर-हां ! बथाओ   
भीषम - मोळ का लड्डुओं पर सोना अर चांदी का वर्क लगाण से मोळ का लड्डू मोतीचूर का लड्डू नि ह्वे सकदन?

फिलम बणन्देर- भीषम जी!  आम आदम्युं लैक  फिलम अर चिलम पीणों ढर्रा को अपणों नियम हून्दन वो एकी डगर से चलदन अर इलै हम इन ही फिलम बणौदा। प्रेमचन्द बि बौलीवुड मा ऐ छया क्या ह्वाइ?     
भीषम - ठीक च जन तुम बोल्दा मि ऊनि कथा लेखि देलु

फिलम बणन्देर- हाँ अब ठीक च। तो पर्स्युं तलक कथा लेखिक लै  अंयां हां



  Copyright @ Bhishma Kukreti 14 /3/2013 

Bhishma Kukreti

गढ़वाली हास्य-व्यंग्य

सौज सौजम मजाक-मसखरी 

हौंस इ हौंस मा, चबोड़ इ चबोड़ मा



                            अपराध्युं  संसद मा भाषा चिंतन

                                 



                                 चबोड़्या-चखन्यौर्या: भीष्म कुकरेती
(s =आधी अ )



टिक्कु उस्तरा-वो हम सब्युं सभापति ! साले अपण ददि मैस ! जरा देख तो सै बल यि कथगा इ अपराधी भाइ  लोग  अपणि दुधबोलि छोड़िक सभ्य भाषा मा हमारी उच्च संसद मा  बात करणा छन।

पपु चकु - हां ! वो हरामी सभापति ! कुछ दिनों से हम लबाड़ो संसद मा मि  दिखणु छौं बल हमारी प्यारी गंदी भाषा की जगा कुछ लोग भद्र भाषाम बड़बड़ान्दन। एक त हम क्रिमिनल कम्युनिटी का लोक यीं भद्र भाषा तै बिंगदा बि नि छा अर बिंगण-समजण मा आयि बि तो यूं भद्र बोल सुणिक पांच दिन तलक मेरो ल्वैखतरी याने खून खराबा करणों ज्यु इ नि बुल्यांदो। देख बै सभापति ए. के. फोर्टी सेवन अर अपण बैणि मैसु जनरल सेक्रेटरी लौन्चर ! जू तुमन अपराध्युं संसदम गंदी गाऴयुं जगा पंडितो, पादर्युं अर मौलव्युं जन इज्जतदार भाषा तै इज्जत दीण तो मि अर म्यार दगड्या गढ़वाली - कुमाउन्यूं तरां रोज नै नै संस्था बणै द्योला या महत्वाकांक्षी  नेतौं तरां नयो गुंडा संसद   खड़ा कौर दयोला हां।

शम्मो  द कैट - हाँ उस्ताद। हमारि गुंडों , डाकुं , माफियों संसदम  इज्जतदार भाषा प्रयोग से भैर हमारि इमेज खराब होणि च। पत्रकार लिखणा छन बल माफिया गैंग का सदस्य , गुंडा, लबाड, टेरिरिस्ट  लुटेरा अर डाकु सभ्य हूणा छंवां। हमारि छवि हूण चयेणि छे निर्दयी, असभ्य, क्रूर अर अपराध्युं संसद या संसद से  भैर कुछ सफेद पोश अपराध्युं द्वारा  सभ्य भाषा इस्तेमाल को  कारण हमारी खुन्कार इमेजम  भयंकर कमी आणि च।

दुर्जन दि छोटा घोड़ा-वो सभापति स्या  शम्मो बदकार सही बुलणि च बल हमारी इज्जतदार जवान बुलण से लोग हम तैं नेतौं या पुलिस ऑफिसरों नौकर समजण मिसे गेन , जो हमारि कौम का वास्ता ठीक नी च। अफार  परसि मि एक बिल्डरम हफ्ता वसूलि कुण जयुं छौ त मेखुण बुलणु बल क्यों बे कुत्ते ! बड़ी हड्डी माग रहा है। ये तो बता किस नेता या पुलिस ऑफिसर का पालतू कुत्ता है? हमारी भाषा का वजै से लोग हम तैं राजनीतिग्युं या पुलिस का आदिम समजणा छन। एक नियम बणाये जावो बल जो भि हमारि संसद या भैर  इज्जतदार जुबान को इस्तेमाल कारल या कारलि वै तै लबाड़ों जमात से बेदखल करे जावो। बुजुर्ग लुटेरा सिंग तू बोल जुबान की क्या अहमियत होन्दि?

लुटेरा सिंग बुड्या -अरे अपराध्युं संसदम अब त मेरि हालत बि लाल कृष्ण अडवानी जन ह्वे गे। उख अडवानी की  बात वैकि पार्टी वळा इ नि सुणदन अर इख तुम अधबुडेड़ अर जवान  अपराधी मेरि बात टक्क लगैक नि सुणदा।

सभापति ए. के. फोर्टी सेवन - वै सबी गुंडा -लबाड लोग ! तुम तै बिंगण -समजण चयेंद बल हमारि संसद  क्वी इन्डियन पार्लियामेंट नी  च जख प्रजातन्त्री धर्म चलदो। तो सालो ! म्यरो ऑर्डर सूणों! जो बि बुजर्ग लुटेरा सिंह की बात टक्क लगैक नि सूणल वै तै ए. के. फोर्टी सेवन से भूने जालो। बोल बै बुड्या लुटेरा सिंग।

लुटेरा सिंग- अब लगणु च बल हमर संसद अनुशासित अपराध्युं संसद च ना कि राजनैतिक लोगुं बैठक।  हाँ तो हरामियो की औलादों सूणों ! लुक्खो ! अपराध्युं तै भाषा- प्रयोग पर ध्यान दीण जरूरी च। हमारो बुलण बैठण से लोगुं तैं लगण चयेंद कि हम अपराधी छंवां। हमर बदजवान से लोगुं पिशाब चूण चयेंद। हमारि भाषा हमारो चरित्र बथांदो इलै हम तै गंदी गाळी इस्तेमाल करण इ चयांद जां से जनता मा डौर-भौ  पैदा ह्वावो। हम गुंडों की अलग भाषा हूण चयेंद जां से ह्म साफ़ साफ़ पछेणे जंवां। चापलूसी, दिखलौटि,  दिखावटी, क्या बुन्या-क्या कन्या भाषा,दुमुख्या-दुअर्थि , धोखादिंदेरि भाषा नेताओं, अधिकार्युं  अर पुलिस वाळु  पर ही जंचदी ना की हम खुंखार अपराध्युं पर। हम अपराध्युं तैं गाळी -गलौज, गंदी पण सीधि भाषा ही इस्तेमाल करण चयेंद। अर मेरि सलाह च बल जादा अखबार अर टीवी नि द्याखो खासकर नेताओं की दोगली भाषा वळ भाषण कतै नि द्याखो। अबि स्यु   हरामी, बिलंच,  खतराओन का ख़िलाड़ी सट्टा  किंग विदेस ह्वेक आयि जरा विक जिबाड़ो से सूणों बल भाषा का कारण विदेशों मा इन्डियन क्रिमिनल कम्युनिटी कथगा बेज्जती हूणि च। 

जनरल सेक्रेटरी लौन्चर - बोल बै कुत्ता तेरी क्या रिपोर्ट च।

सट्टा किंग -  सालो ! भड़वो ! तुम तै पता च जुगाड़ से मि  सरकारी डेलिगेसन का सदस्य बौणि विदेस जान्दो उख  विदेसों मा हम अपराध्युं द्वारा सभी भाषा इस्तेमाल की  विदेसी अपराधी मजाक उड़ान्दन अर व्यंग्य कौरिक बुल्दन बल इण्डिया मा अपराधी नेताओं की सकासौरि याने नकल करणा छन।

रांडो दलाल - हरामियो !  या बात सै च पूर्वी यूरोप का रंडीयो दलाल में तै फोन पर चिरड़ान्द छन बल हम भारतीय अपराधी अब नेताओं की सभ्य जुवान बुलण गीजि गेवां।

ड्रग ट्रेडर्स - हाँ अब त विदेशों मा  सभ्य भाषा को  इस्तेमाल से  इन्डियन क्रिमिनलों इमेज भौत खराब  हूणि च।

हफ्ता वसूली सरदार - अरे विदेशों बात क्या करणा छंवां इख इंडिया मा भाषा का कारण ही लोग अब हम तै हिराकत की नजर से दिखदन। कुछ करण चयेंद। हम सणि बिंगण चयेंद कि  गंदी भाषा अर दुष्कर्म को आपस माँ एक रिश्ता होंद।

जनरल सेक्रेटरी लौन्चर -ओ दो बाप की औलाद कुत्र्या  दोगला ! तुझे इस विषय में खोजबीन करने को कहा  था।

कुत्र्या दोगला- ऐ लौन्चर ! मै सरकारी आयोगौ  अध्यक्ष नि छौं कि अपण फैदा बान आयोग को समौ बढ़वाणों बान अपण फ़ाइनल रिपोर्ट देरी से दींदन। मेरि खोज को नतीजा च चूंकि अब इन्डियन क्रिमिनलों मा राजनैतिक नेता, सामाजिक नेता, अधिकारी, सफेदपोश जन लोग  घुसि गेन अर वो लोग हम अपराध्युं  भाषाई संस्कृति बिगाड़ना छन। अर या समस्या इनि बेइलाज च जन उत्तराखंडम पलायन समस्या बेइलाज च।     

सभापति ए. के. फोर्टी सेवन -चलो बै भाषा भूसा की बात छ्वाड़ो। धंधा की बात शुरू करदां। पैलो ऐजेंडा च उत्तराखंड का पहाड़ोंम अपराध कनकैक फैलाए जावो। दुसर ऐजेंडा च उत्तराखंड मा धार्मिक स्थलोंम माफियागिरी फैलाणों क्या करे जावो।                                   

                                                   

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Copyright @ Bhishma Kukreti 15 /3/2013

Bhishma Kukreti

गढ़वाली-कुमाउंनी फिल्मों के लिए विश्व सिनेमा  की प्रासंगिकता



                                              भीष्म कुकरेती



[उत्तराखंड फिल्म विकास विचार विमर्श; हिलिवुड फिल्म विकास विचार विमर्श;  गढ़वाली फिल्म विकास विचार विमर्श; कुमाउंनी फिल्म विकास विचार विमर्श; मध्य हिमालयी फिल्म विकास विचार विमर्श; हिमालयी फिल्म विकास विचार विमर्श; उत्तर भारतीय क्षेत्रीय भाषाई फिल्म विकास विचार विमर्श;  भारतीय क्षेत्रीय भाषाई फिल्म विकास विचार विमर्श; दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय भाषाई फिल्म विकास विचार विमर्श; एशियाई क्षेत्रीय भाषाई फिल्म विकास विचार विमर्श; पूर्वी महाद्वीपीयक्षेत्रीय भाषाई फिल्म विकास विचार विमर्श लेखमाला -21वां भाग ]



             प्रसिद्ध डौक्युमेंट्री रचनाधर्मी पॉल रोथा का  सन 1930 में खा कथां आज भी तर्कसंगत है कि सिनेमा कला और व्यापार के मध्य एक अनिर्णय भरा समीकरण है।सिनेमा कला विषयी कमाऊ व्यापार है जिसने विश्व की प्रत्येक संस्कृति और समाज को प्रभावित किया है। गढवाली -कुमांउनी फिल्मो का  दुर्भाग्य है कि इन भाषाओं की फिल्मों ने ना ही क्षेत्रीय कला विकास किया और ना ही धन कमवाया। विश्लेषकों का मानना है कि एक कारण यह भी है  कुमाउंनी गढ़वाली फिल्मो के अधिकतर कारिंदों को विश्व सिनेमा का ज्ञान ही नही है।

            कुमाउंनी -गढ़वाली फिल्मों में निर्माण , निर्देशन, छायांकन, संगीत , सम्पादन क्षेत्र में आने के लिए अधिक से अधिक अंतर्राष्ट्रीय क्लासिक फिल्मों को देखना नही भूलना नही चाहिए।

अ स्टार इज बौर्न (नि -विलियम वेलमैन   1937) फिल्म स्टारडम का अभिमान, असफलता की खीज, फिल्म उद्यम का ग्लैमर  दिखाने में सफलतम फिल्मों में गिनी जाती है।

द लेडी वैनिसेज (1938 ) डेढ़ घंटे की अल्फ्रेड हिचकौक निर्देशित फिल्म अपनी कथा और फिल्म से दर्शकों को बाँधने के लिए प्रसिद्ध है।

गौन विद विंड (नि- विक्टर फ्लेमिंग 1939) फिल्म क्लासिक फिल्मो में मानी जाती है।

  द विजार्ड ऑफ ओज  (नि- विक्टर फ्लेमिंग 1939) पारिवारिक सम्बन्धो को दर्शाने वाली फिल्म आज भी प्रसांगिक

द ग्रेट डिक्टेटर (नि-चार्ली चेपलिन 1940 ) विषय की सर्वश्रेष्ठ व्यंग्यात्मक फिल्मों में से एक फिल्म में गिनी जाती है।

सिटिजन कान -( नि- ओर्सन वेल्स ,1941 ) फिल्म कथा बुनावट , पटकथा और अभिनय के लए आज भी समालोचकों को भाति है

कासाब्लांका (नि- विक्टर फ्लेमिंग 1942 ) सिनेमा  कला और अभिनय के लिए याद की जाती है

ब्रीफ इनकाउंटर (नि-डेविड लीन, 1945) -फिल्म प्रेम, प्रेम व्याख्या, वैवाहिक सम्बन्धो की नई तरह से खोज तो करती ही साथ में दर्शकों के मध्य एक रहस्य बनाने  में भी सफल है।

द सेवन यियर इच ( बिली वाइल्डर , 1955) मस्ती , हास्य, अभिनय, नाटकीयता , जीवंत रोमांस और मजे के लिए यह फिल्म याद की जाती है।

द मैन हू न्यू टू मच (नि-अल्फ्रेड हिचकौक ,1956,) फिल्म सस्पेंस और अभिनय के लिए जानी जाती है।

नाईट टु रिमेम्बर (नि-रॉय बेकर 1958) का    टिटेनिक जल-जहाज की दुर्घटना का करुणात्मक काव्यात्मक फिमांकन दर्शनीय है

वर्टिगो (नि- अल्फ्रेड हिचकौक 1958) रहस्य और पटकथा के लिए प्रशंसित होती है

बेन हूर (1959)- विलियम वाइलर निर्देशित बेन हूर फिल्म अपनी भव्यता और भावनाओं को दर्शाने, पटकथा, एक्टिंग के लिए जानी जाती है। 

नार्थ बाई नार्थवेस्ट (नि- अल्फ्रेड हिचकॉक, 1959 ) रहस्य, डिजाइन , अभिनय, पुष्ट सम्पादन , छायांकान , नाटकीयता के लिए फिल्म उम्दा फिल्म मानी जाती है

वेस्ट साइड स्टोरी (नि-जीरों रौबिन्स और रॉबर्ट वाइज, 1961 )-रोमांटिक संगीत से ओत प्रोत फिल्म सौ श्रेष्ठ फिल्मों में से एक श्रेष्ठ फिल मानी जाती है।

ब्रेक फास्ट ऐट टिफनीज ( नि-ब्लैक इड्वार्ड्स 1961) फिल्म रोमांटिक हास्य फिल्मो में से एक उम्दा चलचित्र माना जाता है

टु  किल अ मॉकिंगबर्ड (नि-रॉबर्ट मुलिगन , 1962) नाटकीयता ,  रहस्य केअलावा  ग्रेगरी पैक की स्टाइलिश अभिनय के लिए फिल्म आज भी देखि जाती है।

लौरेंस ऑफ अरेबिया (नि- डेविड लीन 1962)- किस तरह एक महाकाव्य को भव्यता से फिल्माया जा सकने के लिए इस फिल्म की आज भी मांग है।

क्लेओपेट्रा (  1963 जोसेफ मानकिविज द्वारा निर्देशित ) फिल्म ऐहासिक महाकव्य के कालखंडो को केवल तीन घंटो में कुशलता पूर्वक दर्शाने में सफल रही है और पटकथा व छायांकन के लिए बहुत ही उम्दा फिल्म है।

फ्रॉम रसिया विद लव ( नि- तिरेंस यंग 1963 ) फिल्म जेम्स बौंड सीरीज में सबसे उम्दा फिल्म मानी जाती है

माई मेरी पौपिन्स (नि -रॉबर्ट स्टीवेन्सन 1964) फिल्म संगीत , प्यार के आंतरिक पहलुओं को दर्शाने के लिए आज भी प्रशंसा पात्र है
फेयर लेडी (नि जॉर्ज कुकोर  1964 ) रोमांस, चित्रांकन व संगीत को काव्य रूप में दर्शाती यह फिल्म आम निर्देशकों के लिए सपना है।

गोल्डफिंगर ( नि - जी . हेमिल्टन  1964 ) जेम्स बौंड सीरीज की  श्रेष्ठ फिल्मों में से एक फिल्म

साउंड ऑफ म्यूजिक (नि -रॉबर्ट वाइज 1965) फिल्म रोमांस, संगीत, पहाड़ों के भव्य सीन फिमाकन के लिए स्मरणीय है।

  2001: स्पेस ओडिसी   ( स्टेनली कुब्रिक 1968) फिल्म  वैज्ञानिक फैन्तासी फिल्मों में श्रेष्ठ फिल्म मानी जाती है।

गौड़ फादर (नि- फ्रांसिस फोर्ड कपोला  1972  ) माफिया कार्यशैली , क्रूरता , मानवीय पहलू , छायांकन , निर्देशन , सम्पादन , अभिनय के लिए आज भी भीड़ जुटाती है। 

टैक्सी ड्राइवर (नि-मार्टिन स्कोर्सेस, 1976) फिल्म एक मनोवैज्ञानिक व थ्रिलर फिल्म है और कलात्मक फिल्म साँस्कृतिक मूल्यों, मानवीयता की खोज करने वाली फिल्म है।     

  डियर हंटर ( नि-माइकेल सिमेनो ,1978) युद्ध विभिसका दर्शाती फिल्म अपनी  नाटकीयता के लिए जानी जाती है।



गढ़वाली -कुमाउनी फिल्मकारों को याद रखना चाहिए कि फिल्म कला , तकनीक और  व्यापार का अनोखा संगम है और उन्हें  कलात्मक फिल्मों का  ज्ञान भी आवश्यक है।

विंग्स ऑफ डिजायर ( नि - विम वेंडर ); द क्रेन्स आर फ़्लाइंग (नि-मिखेल कालातोजोव ) , थ्री  कलर्स रेड (नि-क्रेजीस्टोव केस्लोव्सकी ); इरेजर हेड (डेविड लिंच ); लघु फिल्म मेशेज ऑफ  आफ्टरनून (नि- माया डेरिन, अलेक्जेंडर हामिद ); युद्ध विरोधी फिल्म हिरोशिमा मौन अमौर (नि-अलैन रेस्नाइस ); द इडियट्स  ; अ डायरी फॉर ताईमाथी ; द बैटल शिप पोटमकिन  , नेबर्स ; ग्लास ; वाइल्ड स्त्राबेरिज ; लेस कैरिबिनियर्स ;   मेट्रोपोलिस (फ्रित्ज लैंग ); द पैसन ऑफ जून औफ़ आर्क ; मदर एंड सन (नि-अलेक्जेंडर सोकुरोव ); मौथलाईट (नि- स्टैन  ब्रखेज ); सौंग  ऑफ सीलोन ; ला स्ट्रादा (फेड्रीको फेलिनी ) कलात्मक फ़िल्में  बताती हैं कि किस तरह कहानी को सेलुलाइड में तराशी जाती हैं।

  छायांकन मोवियों को नया आयाम देता है। गढ़वाली -कुमाउंनी फिल्मकारों को क्षेत्रीय  फिल्मों को पुनर्जीवित करने के लिए फिल्माकन की गुणवत्ता  बढ़ानी आवश्यक है और पाथेर पंचाली, ब्लो  अप ,   रियर विंडो, बौर्न इन्टु ब्रदर्स , ली जेटी ; तेन स्पोटिंग,बाराका, साल्वेडौर जैसी फिल्म अवश्य देखनी चाहिए की किस तरह फोटोग्रैफी ने फिल्मों को कव्यात्मक व्याख्या प्रदान की।  यदि गढ़वाली -कुमाउनी फिल्मों को एक पहचान देनी है तो  फिल्मकारों को इन फिल्मों जैसी फिल्म देखना  चाहिए .     


     

  विश्लेषकों का मानना है  कि गढ़वाली -कुमाउनी फिल्मकार पटकथा पर उतना परिश्रम नहीं करते जितना क्षेत्रीय फिल्मो (जंहा संसाधन का सूखा है) के लिए आवश्यक है और इसका कारण है कि गढ़वाली -कुमाउनी फिल्मों के पटकथाकारों को अन्तराष्ट्रीय स्तर के फिल्मों की पटकथा लेखन का ज्ञान नही है कि किस तरह पटकथा स्तरहीन कथा को बढिया फिल्मों की सीढ़ी प्रदान कर सकती है। जे एंड साइलेंट बौब स्ट्राइक बैक; फोन बूथ; रिजरव्वाइर डॉग;  फोर  रूम्स ; पल्प फिक्सन ; ट्रू  रोमांस किल बिल ; डेथ प्रूफ ; नेचुरल बौर्न किल्लर्स ; फ्रॉम डस्क  टिल डाउन आदि फ़िल्में  गढ़वाली -कुमाउनी फिल्मकारों को प्रेरणा दे सकती हैं कि पटकथा का फिल्मों में क्या स्थान है।

    सम्पादन भी फिल्मों के लिये  एक आवश्यक तकनीक है और कुमाउंनी -गढ़वाली फिल्म सम्पादकों को राल्फ डावसन; डेनियल मैंडल; फ्रेडरिक नुस्टोदन; गेरी हैम्ब्लिंग; माइकेल कान सरीखे ख्याति प्राप्त फिल्म सम्पादकों के काम को समझना आवश्यक हो  जाता है। 

   क्षेत्रीय भाषाई सिनेमा की अपनी अहमियत है और क्षेत्रीय भाषाई फिल्मकारों को अपनी पहचान बनाने इ के लिए विश्व स्तरीय फिल्मों का तकनीकी स्तर पर ज्ञान आवश्यक है। तकनीक , कला और व्यापार ज्ञान प्रसिक्षण ,अनुभव,व अर्जित ज्ञान (फिल्म दर्शन )से आता है। 


Copyright@ Bhishma Kukreti 16/3/2013

उत्तराखंड फिल्म विकास विचार विमर्श; हिलिवुड फिल्म विकास विचार विमर्श; गढ़वाली फिल्म विकास विचार विमर्श; कुमाउंनी फिल्म विकास विचार विमर्श; मध्य हिमालयी फिल्म विकास विचार विमर्श; हिमालयी फिल्म विकास विचार विमर्श; उत्तर भारतीय क्षेत्रीय भाषाई फिल्म विकास विचार विमर्श; भारतीय क्षेत्रीय भाषाई फिल्म विकास विचार विमर्श; दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय भाषाई फिल्म विकास विचार विमर्श; एशियाई क्षेत्रीय भाषाई फिल्म विकास विचार विमर्श; पूर्वी महाद्वीपीयक्षेत्रीय भाषाई फिल्म विकास विचार विमर्श लेखमाला  21 वें भाग में जारी ...

Bhishma Kukreti

गढ़वाली हास्य-व्यंग्य

सौज सौजम मजाक-मसखरी 

हौंस इ हौंस मा, चबोड़ इ चबोड़ मा



                         फेस बुक का मनिख-मनख्यणि अर ऊंकी आदत


                               मूल चोरी - सुदर्शन रावत

                             अनुवाद याने दुसर चोर -भीष्म कुकरेती



1- फेस बुकौ कुखड़- यूंक काम कुछ नि होंद बस सुबर सुबर गुड मॉर्निंग लेखिक लोगुं तै बिजाऴदन। उन जु फेस बुक्या अबेर से बिज्दन वो दिनम बि गुड मॉर्निंग्यान्दन (गुड मोर्निंग लिख्दन )

2- स्यळो यार - यूं तैं फेसबुक सैलिब्रिटी बि बुल्दन अर जु बि नेट कु बाटम मिल्दन ऊं तै यि दगड़या बणै दींदन।

3- फेस बुकौ साधु - बस यूंम एकी काम च। इना उना बिटेन चुरयाँ भगवानो भजन या फोटो फेस बुकै दिवलि पर चिपकाणा रौंदन।

४ फेस  बुक चोर - यी लोग फट से दूसरों पोस्ट चोरी कैरिक अपण नाम से फेसबुक वाल पर चिपकै दीन्दन।

५- फेसबुकाक देवदास - हर बगत दुखि या दर्द वळ गीत कविता पोस्ट कौरिक यी हौरुं बि दुखी करदन।

६- फेस बुकौ खबर्या - इना उना बीतें चोरिक करिक ब्रेकिंग न्यूज देकि यि फेस बुक सदस्यों तै समाचार दीणा रौंदन
७-फेस बुक टीकाकार - यी अफिक कुछ पोस्ट नि करदन बस दूसरों हर पोस्ट पर टीका टिप्पणी करणम उस्ताद हून्दन।

७ फेस बुकाक कॉमेडियन- हंसोड्या टिप्पणी या जोक्स पोस्ट करणा रौंदन।

८- फेस बुक लाइकर- बस युंक काम लाइक पर क्लिक करणों हूंद अर गौ बुरी जो यून आज तलक क्वी पोस्ट बाँचि ह्वावो धौं!

९- फेसबुक कमेंटर - बस हरेक पोस्ट पर कमेन्ट दीण यी अपण धरम समजदन।

१ ० - फेस बुक विचारक -बस यूंक काम अच्छा विचारों तैं पोस्ट करणों हूंद।

११- जनम जाती कवि या कवित्र्याण - यूं तैं कविता छोडिक कुछ नि पसंद अर अपण ना तो दूसरों कविता पोस्ट करणा रौंदन।
१२ -टपोरी- यूंक काम छोरि पटाणो हूंद।

१३ - निंदक - बस यि पोस्ट की निंदा ही करणा रौंदन।

१४ - छुंयाळ/गपास्टी -बस फेस बुकम गैप मारणों अलावा यी कुछ नि करदन।

१५ - मंगत्या/भिकमंगा - यि फ्रेंड रिक्वैस्ट हि भिजणा रौंदन।

१६- खिलन्देर - बस फेस बुकम यि गेम्स खिलणा रौंदन।

१७ - फेस बुकौ बांदर- कमेंट्स माँ बस हां हूँ ही लिखदन।

१८ - बैक बेंचर - जन संसद या विधान सभा मा कथगा ही नेता बस संसद आंड छन पण पांच साल तलक कुछ नि बुल्दन ऊनि फेस बुक मा जादातर मेम्बर चुप करिक पोस्ट दिखदन अर कुछ नि करदन।

१९- लिंग बदलण वाळ ; इ दुसर लिंग से फेस बुक मा रौंदन।

१९- सिंवळण  वाळ - यूंक काम गुड नाईट पोस्ट करण हूंद जां से लोग टैम पर से जावन।

कापी राइट @ चोरिक माल च तुम बि डाका डाळिक अपण नाम से पोस्ट करो।