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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti

Vinod Balodi: First Leading Male Character of First Garhwali Feature Film

Review of Development of Garhwali-Kumauni (Uttarakhandi) Films, Music Albums, Documentary films -22
                                                Bhishma Kukreti
[Notes on first leading male character of first regional language feature film; Leading Male Character of First Garhwali Feature Film; Leading Male Character of First Uttarakhandi Feature Film; first leading male character of first Mid Himalayan regional language feature film; first leading male character of first Himalayan regional language feature film; first leading male character of first North Indian regional language feature film; first leading male character of first Indian regional language feature film; first leading male character of first Asian regional language feature film; first leading male character of first Oriental regional language feature film]

   Much is talked about 'Jagwal' the first Garhwali feature film released in 1983. However, less is known to public about the character artists of 'Jagwal' baring Parashar Gaud.
  There were two male leading characters in 'Jagwal the first Garhwali movie played by Parashar Gaur and Vinod Balodi. Vinod Balodi played the young Doctor Ajay in 'Jagwal' the first regional Mid Himalayan feature film. Ajay plays role of doctor who helps Prashar Gaur's character in first Uttarakhandi feature film.
   Vinod Balodi belongs to Manjeli (Banelsyun, Pauri Garhwal) born in Mumbai on 20/71969. Vinod was active in Garhwali and Hindi theatre in his pre graduation time and in Wilson College. Vinod Balodi was still active in Hindi theatre in Mumbai.
   Vinod remembers that filming of Jagwal was exciting, happy experience and with some pain too. Local people provided their best cooperation in shooting of 'Jagwal' a historical first feature film of Garhwal, Kumaun and Himachal Himalayan region. The talk with Vinod reveals that the first Garhwali film crew was expecting no infrastructure for shooting in Buvakahl, Pauri and Shringar regions of Garhwal. However, there were no faculties available at that time for good staying, properties, transportation and even torch-batteries in the cited area. 
           Since, Vinod understood from first experience with Garhwali feature film that commercially an artist can't survive on Garhwali filmdom he choose government service and was also involve in theatre in Mumbai.
  Vinod is still ambitious to do performance in other film.
  Vinod Balodi will always be remembered as leading male character of first Garhwali feature film 'Jagwal' along with another leading male character Parashar Gaur.

Based on telephonic talk with Vinod Balodi, 09820116099
Reference: Bhishma Kukreti, 2013, उत्तराखंडी फिल्मों का संक्षिप्त इतिहास

Copyright@   Bhishma Kukreti 16/3/2013

Review of Garhwali and Kumauni Films, music albums, documentary films (Uttarakhandi) to be continued...23
Notes on first leading male character of first regional language feature film; Leading Male Character of First Garhwali Feature Film; Leading Male Character of First Uttarakhandi Feature Film; first leading male character of first Mid Himalayan regional language feature film; first leading male character of first Himalayan regional language feature film; first leading male character of first North Indian regional language feature film; first leading male character of first Indian regional language feature film; first leading male character of first Asian regional language feature film; first leading male character of first Oriental regional language feature film to be continued...


Bhishma Kukreti

गढ़वाली हास्य-व्यंग्य

सौज सौजम मजाक-मसखरी 

हौंस इ हौंस मा, चबोड़ इ चबोड़ मा



                         चलो गढ़वाळौ  इतिहास पर  किताब लिखे जावो 



                                           चबोड़्या-चखन्यौर्या: भीष्म कुकरेती



(s =आधी अ )



घरवळि बुलण बिस्याइ," बल ह्यां ! तुम बि एक किताब छपवावो" 

" किताब छपाण  क्वी मजाक च ?" मीन पूछ ना बथाइ

घरवळिन बोलि " तुम से भलो तो वी ठीक छौ"

"कु ?" मीन पूछ

"जु तुम से  पैल मि पर लाइन मारदो छौ" वींन तून (ताना ) दींद बोलि 

मीन बोलि," ह्यां पण किताब लिखणो बाण क्वी विषय बि त हूण चयेंद कि ना?"

वींन ब्वाल," विषय कुण ले क्या उत्तराखंड को इतिहास पर किताब छापि ल्यावो।"

" पण मि त दर्जा आठम इतिहास माँ फेल ह्वे छौ पण गणितम जादा नम्बर आण से कम्पार्टमेंटमा पास हों।" मीन बथै

" ओहो !पैल  पैल   फेल तो तुम मि तैं पटाण मा, लाइन मारण मा बि ह्वे छा।" घरवळिन चिरड़ाइ

मीन जबाब दे," ह्यां पैल पैल  मि त्वेकुण अपण बुद्धि से  प्रेम पत्र लिखुद छौ  पण पैथर मीन प्रसिद्ध शायरों शेर नकल कौरिक त्वै कुण प्रेम पत्र भेजिन त तू गर्र पटी गे।"

  पत्नी को जबाब थौ,"  त इनि गढ़वाळो  इतिहासौ किताब बि  नकल करिक  छ्पै ल्यावो।"

मीन विरोध करण चाइ," पण ."

"पण उण कुछ ना तुम पंडित हरी कृष्ण रतूड़ी क 'गढवाल का इतिहास' किताब लावो अर  शब्दों हेर फेर करिक 'उत्तराखंड का इतिहास' किताब छपवावो" पत्नीन  राय दे।

मीन बोलि," पण रतूड़ी जीन तो सौ साल पैल या गढ़वाल का इतिहास की किताब लेखि छे तो तब बिटेन गढ़वाळो  कथगा ही नई खोज  ह्वे होलि।"

वींन बोलि," खोज  ह्वे बि होलि त तुम तै क्या? तुम पंडित रतूड़ी की किताब की नकल करिक किताब छपवावो। अचकाल  बगैर खोज से इतिहास पर किताब या लेख छपवाणो रिवाज चलणु च"

मीन बोल," न्है भै इतिहास पर किताब लिखण मतबल नकल करिक मि इतिहासौ दगड़ मजाक नि कौरि सकुद।"

घरवळिन सलाह दे," त तुम इन कारो 'गढ़वाल की लोक संस्कृति' पर किताब छपवावो।"

मीन जबाब मा पूछ ब्वाल," संस्कृतिमा कम से कम चौसठ कला  हूंदन अर पिछ्ला चालीस साल से गढ़वाल नि ग्यों तो गढवाल की संस्कृति पर किताब कन कौरिक लिखलु ?"

पत्नी को जबाब छौ," तुमर दिमाग खराब हुयुं च लोग लोक गीतुं अर नाचुं अलावा हौर बातों तै संस्कृति का प्रतीक नि मानदन ना ही समजदन।"

मीन जाणन चाहि," पण मि तैं लोक गीत अर लोक नृत्यों क्वी ज्ञान नि च तो कन करिक लोक गीत अर लोक नृत्य पर किताब लिखलु?"

वींको उत्तर छौ," बस या तो गोविन्द चातक की किताब की नकल या डा शिवा नन्द नौटियाल की किताब की नकल कारो अर 'उत्तराखंड की लोक संस्कृति' नाम से किताब छपवावो।"

मीन शंस्य की दृष्टि से दिखद ब्वाल," पण इन कनै बगैर ज्ञान को ?"

वींन ब्वाल,"  दुसरो पिस्युं तै ही त दुबर  पिसणों नाम आज खोज च। ह्यां लोग बाग़ बगैर खोज कर्यां चातक जी अर नौटियाल जीक किताबों नकल से पीएचडी ही ना डीलिट पाणा छन तो तुम इन नि करि सकदवां?"

मीन ना नकार करदो बोलि,"  नै नै में से गीतुं पर काम नि ह्वे सकुद।"

घरवळिन हैंकि सलाह दे," तो तुम इन कारो गढ़वाली साहित्य को इतिहास की किताब हिंदी मा छापो।"

मीन ब्वाल," मि तै गढ़वाली साहित्यौ अता पता नी च अर तू बुलणी छे बल  गढ़वाली साहित्य को इतिहास की किताब हिंदी मा छापो।"

घरवळिन बोलि," करण कुछ नी च अबोध बंधू बहुगुणा  कृत  'शैलवाणी' अर 'गाड मटे की गंगा ' की नकल हिंदी मा कौरिक अपण नाम से किताब छपवावो अर गढ़वाली साहित्य का प्रसिद्ध इतिहासकार बणी जावो ."

मीन बोल ," पण यो तो साहित्य अर इतिहास को दगड़ अन्याय च बगैर खोज का साहित्यिक इतिहास लिखण तो गुनाह ही होलु।"

घरवळिन जबाब दे," मौलिक खोज करिक इतिहास लिखण इतिहास की बात ह्वे गे अचकाल तो हूँ बहू नकल कॉरिक लिखणो खुणी इतिहास लिखण बुल्दन।"

अर    सरस्वती समान घरवळि क ठेललम ठेल रूपी कृपा से मेरि  'गढ़वाली भाषा साहित्य का इतिहास' प्रकाशित ह्वे गे अर पर्स्युं मुख्यमंत्री जी क हाथों से  किताबौ विमोचन होलु आप बि समारोह मा आमंत्रित छन       



  Copyright @ Bhishma Kukreti 17  /3/2013

       

Bhishma Kukreti

स्पेनी  सिनेमा  हौलिवुड के मकड़ जाल से  लगातार मुक्त होता आया है   



                                   (गढ़वाली कुमाउनी  फिल्म विकास पर  विचार विमर्श )



                                           भीष्म कुकरेती





                   आज जब भी मैं किसी गढ़वाली -कुमाउंनी फिल्म हस्ती से क्षेत्रीय  फिल्म विकास पर बात करता हूँ तो अधिसंख्य हस्तियाँ राज्य सरकार की अवहेलना की ही बात करते हैं। उनकी बातों में दम अवश्य है लेकिन कोई भी हस्ती  राज्य सरकार और प्राइवेट सहभागिता से कुमाउंनी -गढ़वाली फिल्मों को अंतर्राष्ट्रीय पहचान देनी वाली किसी भी सटीक रणनिति पर बहस करने को तैयार नही दिखता है।

         वास्तव में इसका मुख्य कारण है कि मय प्रवासी समाज हमारा समाज अच्छी फिल्मों का चाह तो रखता है किन्तु उस समाज ने कभी भी  फीचर फिल्मों,वीसीडी फिल्मों,लघु फिल्मों, ऐल्बमों, डाक्यूमेंट्री फिल्मों से समाज को दूरगामी फायदों, गढ़वाली-कुमाउंनी फिल्म उद्यम की समस्याओं, गढ़वाली-कुमाउंनी फिल्म उद्योग के विकास को गम्भीरता पूर्वक लिया ही नहीं। छिट  पुट प्रयासों जैसे यंग उत्तराखंड दिल्ली  का सिने  अवार्ड;  विचार मंच मुंबई का पारेश्वर गौड़ को पुरुस्कृत , करना, देहरादून में गढ़वाल सभा द्वारा फिल्म सम्बधित फिल्म प्रोग्रैम को छोड़ कर   मैंने कोई समाचार नही पढ़ा कि किसी सामाजिक संस्था ने  गढ़वाली-कुमाउंनी फिल्म उद्यम विकास  पर गम्भीरता पूर्वक  लिया हो। सरकार के कानो में जूं नही रेंगती के समर्थकों को समझना चाहिए कि पहले व्यक्ति, सामजिक सरोकारी  विचारकों, समाज की कानो में जूं रेंगना जरूरी है कि सरकारी अधिकारी व राजनीतिग्य   गढ़वाली-कुमाउंनी फिल्म उद्यम विकास को गम्भीरता पूर्वक लें।

               केवल  गढ़वाली-कुमाउंनी फिल्म उद्यम ही समस्या ग्रस्त नही है अपितु मैथली,मेघालयी, नागालैंड , हरयाणवी, राजस्थानी, मालवी , छतीस गढ़ी आदि भाषाई फ़िल्में भी उन्ही समस्याओं से जूझ रही हैं जिस तरह  गढ़वाली-कुमाउंनी फ़िल्में जूझ रही हैं। सभी उपरोक्त भाषाओं की फ़िल्में वास्तव में हिंदी फिल्मों की छाया के नीचे जकड़ी हैं और बौलिवुड की जकड़ इतनी खतरनाक है कि भोजपुरी फिल्मे जो एक धनवान फिल्म उद्योग में गिना जाता है वह भी हिंदी फिल्मों की कार्बनकॉपी ही सिद्ध हो रही हैं। 

        ऐसा नही है कि भारत में ही  स्थानीय भाषाएँ फिल्म विधा में बड़ी भाषाई फिल्म उद्योग के कारण समस्याएं झेल रही हैं अपितु अंतर्राष्ट्रीय पटल में भी ऐसा सिनेमा के शुरुवाती दिनों से होता आ रहा है।

           गढ़वाली -कुमाउंनी फिल्मों के सन्दर्भ में गढ़वाली -कुमाउंनी समाज और गढ़वाली -कुमाउंनी फिल्म कर्मियों -रचनाधर्मियों को वैचारिक स्तर पर स्पेनी  फिल्म उद्यम विकास की कथा को समझना आवश्यक है। 

        स्पेनी भाषी केवल स्पेन में ही नही हैं किन्तु स्पेन,क्यूबा अमेरिका अर्जेंटाइना स्विट्जर लैंड , चिली, और कई लैटिन अमेरिकी देशों में रहते हैं .इसलिए स्पेनी फिल्मों को बैलियों (डाइलेकट्स ),  भौगोलिक, आर्थिक, राजनैतिक, सामजिक , सांस्कृतिक वैविध्य के कारण कई चुनौतियों का सामना अपने जन्म से ही करना पड़ा है। किन्तु स्पेनी फिल्मों  ने हर चुनौती का सामना कर अपना एक अलग  साम्राज्य स्थापित किया।   

      सन 1910 से जब हौलिवुड में चलचित्र बनने लगे तो अमेरिकी फिल्म उद्योग साड़ी दुनिया पर हावी रहा और देखा जाय तो आज भी हौलिवुड फिल्म जगत का बादशाह है। शुरुवाती दिनों से ही दुसरे देशों में हौलिवुड के प्रभाव को दुसरे देशों के रचनाधर्मी प्रशंसा , डर, इर्ष्या के भावों से देखते थे और आज भी दुसरे देशों के रचनाधर्मियों में हौलिवुड की दबंगता के प्रति प्रशंसा, डर और जलन का असीम भाव प्रचुर मात्रा में मिलता है। जब हौलिवुड चलचित्र स्टूडियो फिल्मों में ध्वनि लाये तो कुछ समय तक विदेसी भाषाओं के रचयिताओं को समझ ही नही आया कि अंग्रेजी का पर्यार्य क्या है। भाषा युक्त ध्वनि का बजार उछाल ले रहा था और ध्वनियुक्त भाषाई कला अन्य देशों की स्थानीय भाषाओं को बड़े पैमाने पर चुनौती दे रही थी। मार्केटिंग रणनीति के हिसाब से हौलिउड फायदे की जगह खड़ा था।       हौलिउड चल-ध्वनि-युक्त फ़िल्में सभी जगह संस्कृतियों और अन्य कई परम्पराओं को भी चुनौती दे रहा था। जहां चलचित्रों में ध्वनि आने से हौलिउड की परम सत्ता में और भी इजाफा हुआ। लेकिन ध्वनि के साथ साथ हौलिउड को सन  1929 से  एक नई प्रतियोगिता से भी सामना करना पड़ा जैसे जर्मनी भाषाई फिल्मों से। सन  1930  में दुनिया व अमेरिका में एक बहस शुरू हुयी कि क्या हौलिउड की अंग्रेजी फ़िल्में स्थानीय भाषायी फिल्मों को शिकस्त देने में कामयाब होंगी? दुनिया खासकर यूरोप में स्थानीय भाषाओं की पत्रिकाएँ और समाज में भी बहस छिड़ गयी थी कि क्या स्थानीय भाषाई फ़िल्में  संसाधन युक्त हौलिउड अंग्रेजी की फिल्मों को कमाई और कला में चुनौती दे सकती हैं? इसी समय 1920 यूरोप के फिल्मकारों और विचारकों ने हौलिउड विरुद्ध 'द फिल्म यूरोप'   नाम से 'स्थानीय फिल्म आन्दोलन भी छिड़ चुका था।  'द फिल्म यूरोप' आन्दोलन से यूरोप के फिल्म निर्माताओं को एक अभिनव ऊर्जा मिली और जब फिल्मों में ध्वनि का प्रवेश हुआ तो उन्होंने ध्वनि (स्थानीय  भाषा ) में कई ऐसे प्रयोग किये जिसे मार्केटिंग भाषा में ' निश प्रोडक्ट ' का निर्माण  शुरू किया जो फिल्म मार्केटिंग इतिहास में कई बार उद्घृत किया जाता है कि किस तरह समाज और रचनाधर्मी व्यापारियों के सहायता से वैश्विक प्रतियोगिता को चुनौती दे सकने में सफल  हो सकते हैं। अमेरिकन' हौलिउड फिल्म उद्योग अंग्रेजी भाषाई फिल्मों में सब  टाइटल देकर और फिर डबिंग से स्थानीय भाषाओं की फिल्मों के लिए रोड़ा बना था। हौलिउड फिल्मो में हर युग में  भभ्य निर्माण  हौलिउड का सशक्त और पैना  हथियार रहा है और  'द फिल्म यूरोप' आन्दोलन के वक्त  भी  हौलिउड फ़िल्में स्थानीय भाषाई फिल्मों के मुकाबले अधिक भभ्य  होती थीं।  1939 के करीब  हौलिउड निर्माता समझ गये कि स्पेनिश दर्शक  अमेरिका में बनी अंग्रेजी फिल्मों के डबिंग वर्जन के मुकाबले निखालिस स्पेनिश भाषाई फिल्मों को तबज्जो देते हैं। और हौलिउड के निर्माता निखालिस स्पेनिश फिल्म निर्माण में ही नही उतरे अपितु उन्होंने स्पेन , लैटिन अमेरिका और स्पेनिश बहुल दर्शको वाले क्षेत्रों में वितरण व्यवस्था सुदृढ़ की। स्पेनिश भाषाई भावना इतनी  इतनी प्रबल थी कि  हौलिउड निर्माताओं को स्पेनिश फिल्म  निर्माताओं के साथ सह निर्माण करने को भी बाध्य किया। स्पेनिश भाषाई भावना ने धीरे  धीरे स्पेनिश भाषाई रचनाधर्मियों-कलाकारों -कर्मियों  का हौलिउड में प्रवेश भी दिलाया और एक स्पेनिश फिल्म उद्यम को बढावा भी दिलवाया। समाज, विचारक, व्यापारियों और रचनाधर्मियों के एक जुट  होने से ही स्पेनिश फिल्म उद्योग की सुदृढ़ नींव डाली।

                   हौलिउड की अंग्रेजी फिल्मों ने जब अन्य देशों संस्कृति और परम्पराओं पर प्रबल प्रभाव डालना शुरू किया तो स्पेनिश भाषाई सामजिक सरोकारियों  के मध्य  (अलग लग देस के निवासी) भी अपसंस्कृति की बहस शुरू हुयी। अमेरिकी फिल्मों में अप संस्कृति या परम्परा तोडू विषयों ने अमेरिका में बहस सालों से चल हे रही थी। हौलिउड की स्पेनिश भाषाई डब्ड या निखालिस स्पेनी भाषाई फिल्मों  में  स्पेनी भाषा और अलग अलग देशों में अलग अलग संस्कृति, रीती -रिवाजों,  व पर्म्पाराओं के टूटन की भी बहस चलीं। एक बहस अभी भी होती है कि क्या कोई स्पेनी फिल्म अलग अलग देशों में बसे स्पेनी  भाषाई लोगों का प्रतिनिधित्व कर  पायेगी ? 

                            गढ़वाली -कुमाउंनी फिल्मों में भी इसी तरह कुछ अलग ढंग से प्रश्न किया जाता है कि क्या मुंबई, दिल्ली, कनाडा, न्युजीलैंड  में रह रहे प्रवासी रचनाधर्मी जिन्होंने  कई सालों से  पहाड़ नही देखे क्या गढवाली -कुमाउंनी  संकृति, समाज , सामयिकता को दशाने में सफल हो सकते हैं?   स्पेनी भाषाई फिल्मों में एक बहस और चली कि  एक फिल्म की स्पेनी भाषा अलग अलग देशों में बोली  जाने   वाली अलग 'बोली' (डाइलेक्ट ) वाले दर्शकों को कैसे संतोष देगी? स्पेनी भाषा कई देशों व क्षेत्रों की राष्ट्रीय भाषा है  जिसके और ऐसे में फिल्मों में मानकीकृत स्पेनी भाषा की बहस अभी भी खत्म नही हुयी। स्पेनी भाषाई फिल्मों  बाबत राष्ट्रीय पहचान, राष्ट्रीय गर्व व क्षेत्रीय संस्कृति में वैविध्य  की बहस आज भी विचारकों, फिल्मकारों, सामजिक शास्त्रियों के मध्य बंद नही हुयी। राष्ट्रीय पहचान, राष्ट्रीय गर्व व क्षेत्रीय संस्कृति स्पेनी फिल्मकारों के लिए सदा ही चुनौती रही है।  स्पेनी फिल्म लाइन में यह स्पेनी फिल्मकार है, वह क्युबियन  स्पेनी फिल्मकार है,  अर्जेटाइनी स्पेनी ,  वो  मैक्षिकन स्पेनी, हिस्पेनिक (अमेरिकी स्पेनी ), लैटिनो फिल्मकार आदि जुमले आज भी प्रसिद्ध हैं। हाँ स्पेनी फिल्म  अलग अलग  डाइलेक्ट  बोलने वाले स्पेनियों के मध्य एक स्वयं-समझो वाली मनोवृति भी लाये।     

         प्रथम गढ़वाली फिल्म 'जग्वाळ' के निर्माता पाराशर गौड़ अपने अनुभव से बताते हैं कि  'जग्वाळ' में असवालस्यूं व बणेलस्यूं  या कहें  चौंदकोटी बोली का ही बाहुल्य है। पौड़ी गढ़वाल में जब फिल्म देखी  गयी तो भाषाई बात दर्शकों ने नही खा। किन्तु चमोली गढ़वाल रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी में दर्शकों ने पराशर जी को पूछा कि इस फिल्म में किस 'देस' की भाषा है। कुमाऊं में तो 'जग्वाळ' के  दर्शक थियटर से जल्दी बाहर आ गये। 'सिपाही' फिल्म कुमाउंनी व गढ़वाली मिश्रित 'ढबाड़ी' भाषा की फिल्म है किन्तु भाषाई दृष्टि से फिल्म को अस्वीकृति ही मिली है। सामने तो नही किन्तु अपरोक्ष रूप से गढ़वाली फिल्कारों ने मानकीकृत गढ़वाली का ना होना (जो सबको शीघ्र समझ में आ सके ) गढवाली फिल्मों के लिए एक चुनौती है और फिर हिंदी युक्त गढवाली ही सहज विकल्प गढवाली फिल्कारों के लिए है।   

    अलग अलग देशों में स्पेनी फिल्म निर्माण के कारण  स्पेनी फिल्मों में स्वदेसी राष्ट्रीय पहचान और क्षेत्रीय गर्व वाली स्थानीय स्पेनी फिल्मों का  भी  वर्चस्व रहा है।  शुरू से ही स्पेनी फ़िल्में कला फिल्मों , ब्लॉकबस्टर फिल्मों, सामयिक फिल्मों, क्षेत्रीय अभिलाषा-इच्छाए सम्भावनाएं युक्त फिल्म बनती रही जो हौलिउड को चुनौती देती आ रही हैं और हर बार हौलिउड की छाया से निकलने में सफल भी हुयी हैं और अन्तराष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान के अलावा अपना सशक्त बजार बनाने में भी कामयाब हुयी हैं। स्पेनी फिल्मों के बनने में राजनीतिक स्थितियों की रोकथाम  व  प्रदर्शन में  अलग अलग देशों में राजनैतिक व सेंसर अवरोधों ने भी रोड़े अटकाएं  है किन्तु समय व स्पेनी भावना ने अवरोधों को दूर किया। किस तरह स्पेनी फिल्मों ने चुनौतियों का सामना कर  समाधान ढूंढा उसका  उदाहरण है विसेंटे अरांदा , जौम बलागुएरो, जौन अन्तानिओ, लुइस ग्रेसिया बर्लांगा ,   लुइस बर्नुइल,मारिओ कैमस, सेगुन्दो डि कुमौन, इसाबेल कोइक्जेट, विक्टर ऐरिस, राफेल गिल , जोस लुइस, गुएरिन,अलेक्ष डि ला इग्लेसिया, जुआन जोस बिगास लुना,जुलिओ मेडेम, बनितो पेरोजो,पियर पार्टेबेला , फ्लोरियन रे,कैरिओस साउरा,अल्बर्ट सेरा आदि फिल्मकारों की फ़िल्में हैं कि किस तरह हौलिउड के जाल से बाहर आया जा सकता है। 

  एल सेक्षिटो , ला अल्डिया माल्डिटा, लास हर्ड्स टियेरा सिन पान, इलोइसा इस्ता डेबाजो दे उन अलमेंद्रो, ला तोरे दी लॉस सिएट जोरोबाडोस, एल इस्प्वायर सिएरा दी तेरउअल, विदा इन सोम्ब्रास,ला कोरोना नेग्रा, बेइनवेनिडो मिस्टर  मार्शल,मुरते दे उन सिक्लेस्टा, ट्रीप्तिको एलिमेंटल दि इस्पाना, ला वेंगाजा, विरिदियाना, एल वरदुगो, एल एक्स्ट्रानो विआजे,ला तिया तुला , नुएव कार्टास अ बरता, ला काजा, दांते नो युनिकामेन्ते सेव्रो, अमा लुर,  नौकतर्नो, सेक्स्पिरियन्स , लॉस देसाफ्लोज, दितिराम्बो,आऊम, वैम्पाइर,कान्सिओन्स पारा देस्पुज दे उना गुएरा,लेजोस दे लोस आरबोल्स, अना य लॉस लोबोस,इल स्प्रिन्तु दे ला कोल्मेना, एल आर्बेरे दे गुर्मिका,बिलबाओ, एल कोराजोन देल बोस्क,एल क्रिमेन दे सुएनका,दिमोनिओस इन ऍफ़ जार्डिन, लॉस मोटिवो दे बर्टा,एल बौस्क ऐनिमादो, आतामे, वाकास,   ट्रेन दे सम्ब्रास,अलुम्ब्रामेंतो, अल सिएलो गिरा,हेबल कौन इला, ऑनर दे कावालेरिया, एल ब्राऊ ब्लाऊ, एल कांट डेल्स ओसेल्स, एल सोमनी, ऐता,काराक्रेमादा, फिनिस्तेरी आदि फिल्मों का ब्यौरा बताता है की , खानी फिल्मांकन, निर्देशन, संगीत आदि के हिसाब से स्प्नेइ फ़िल्में हौलिवुड़ से लोहा लेती आ रही हैं और हर चुनौती को खत्म कर नई प्रतियोगिता के लिए तैयार हुयी। 

     स्पेनी भाषाई फ़िल्में जन्म से ही कई बार संक्रमण काल से गुजरी किन्तु फिल्मकारों, समाज के सदस्यों  के जजबों ने हर बार मुश्किलों पर रोक लगाई।         



Copyright@ Bhishma Kukreti 17 /3/2013

Bhishma Kukreti

गढ़वाली हास्य-व्यंग्य

सौज सौजम मजाक-मसखरी 

हौंस इ हौंस मा, चबोड़ इ चबोड़ मा


                            संस्कृति रक्षा 



                              चबोड़्या - चखन्यौर्या: भीष्म कुकरेती

(s = आधी अ )



-हे नागराजा , हे नर्सिंग ! मेरी पहाड़ी संस्कृति तैं बचाओ।हे देवी !

-हे घंडियाळ! हे ग्विल्ल , मिथाळ! मेरी गढ़वाली सभ्यता तैं समाळ यिं तैं मोरण से बचावो!

- हे दिवताओ ! म्यरा रीति रिवाजों तैं बचाओं।

- हां ! हां !मी ई ग्यों, बोल बोल क्या क्या बचाण ?

- हे मेरि ब्वे! तू कु  छे अर  तू इथगा अट्टाहासी हंसी किलै हंसणु छे?

- मि तेरि पुराणि संस्कृति , सभ्यता अर रीति रिवाजौ चिन्ह छौं , प्रतीक छौं।

-पण हे माराज तू इथगा जोर से किलै हंसणु छे? इख मुंबई मा जोर से हंसण वाळ तैं असभ्य अर अनकल्चर्ड माने जांद अर तेरि हंसी की आवाज कखि पड़ोसीक ड़्यार पौंछि गे तो वो पुलिसम शिकैत करि द्यालो . फिर पुलिस को लफड़ा ...

-ह़ा हा! संस्कृति बचाणों प्रार्थना करणु छे अर निश्छल हंसी से डरणि छे?

-  महाराज ! इथगा जोर अर निश्छल तरां से  तो मि लाफिंग क्लब मा बि नि हौंस सकदो। हंसी पर कंट्रोल ही तो आज सिविलाइज्ड लोगुं निसाणी च।

-अरे माराज मुंबई की बात तो जाणि द्यायो परसि पुण मि अपण गां जसपुर गे छयो अर मि कें पुराणि बात याद करिक जोर जोर से हौंस तो लोगुंन समज बल मि छळे ग्यों अर मीमा रखवळि करणों जागरि बुलाये गे। उख बि जोर से हंसण जंगली लोगुं निसाणि ह्वे गे।

-हा हा ! अपण आंतरिक , स्वाभाविक भावुं तैं त तू प्रकट करण से लाचार छे अर फिर बि सभ्यता बचाणो बात करणु छे?

- हाँ माराज हम बुद्धिजीवी, सामाजिक चिंतक, सोसल एक्टिविस्ट  अपणि सभ्यता -संस्कृति बचाणो बात नि करला तो गढ़वाली संस्कृति भेळ जोग ह्वे जालि! रसातल चलि जालि !

-हे मेरी ब्वे! भट्युड़ टूटि  गेन, हे मेरि ब्वे!

- ओहो ओहो ! स्या  क्वा च, इंक शरीर पर पस्यौ (पसीना ) इ पस्यौ च, सरा सरैल से दुर्गन्ध आणि च   अर इथगा  जोर से किलै रुणि च स्या ?

- अरे मि तेरि कृषि परिश्रम संस्कृति को प्रतीक छौं।

-पैल तों तू इथगा जोर से रूण बंद कौर। इथगा जोर से तो इख क्या गाउं मा बि क्वी जवान नौनु मोरण पर बि नि रोंदु।फिर पड़ोसीक इख त्यार रुणो आवाज ग्यायि ना कि पुलिस कम्पलेंट। 

-  अरे तू स्वाभाविक ढंग से रोइ  नि सकदी अर फिर संस्कृति बचाणों ध्येय करणु छे?

- हे मेरि ब्वे तैंकि सरैल की दुर्गन्ध से मेरी सांस बंद होणि च। ह्यां सया इथगा गंध सौराण वाळ क्वा च?

- हां हां ! स्या  सौ साल पैलाकि तुमारि कृषी मा परिश्रम, परिश्रमी कृषि से बगदो पसीना अर शरीर से पसीना की गंध की बचीं खुचीं निसाणि च। वाह जब तू बुद्धिजीवी!  यीं परिश्रम की गंध तै नि सहन करि सकणु छे तो त्वै तैं  संस्कृति बचाणों बात करदि शरम , ल्याज  नि औन्दि?

-  ह्वी , ह्वी बल क्या बुलणु छे?

-अरे ! अरे इ तीन चार नंगी जनानी मेरि मोरि (खिड़की) मा क्या करणा छन। हे नंगी औरतो ! तुम म्यार ड़्यार बिटेन भागो। तुम म्यार इख इनि रैल्या त न्यूडिटी फैलाणों जुरम मा पुलिस मै तैं जेल भेजि देलि।

-वो बुद्धिजीवी, सोसल ऐक्टिविस्ट सि तेरि पड़ दादा की पड़ दादि। पड़ नानि अर बूढ़ ददी छन।

-  माराज !  पण म्यार पड़  ददा की पड़  दादि , पड़ नानि पूरी की पूरी नंगी किलै? बस यूंक सरैल पर सिरफ गंदो, चिरीं -फटीं  लंगोट ही च?

- हा हा ! संस्कृति की बात करण वाळ बुद्धिजीवी! त्वै तैं पता नी च बल वस्त्र अर कपड़ा पैरणो ढंग बि संस्कृति की निसाणि होंदी तो ईं संस्कृति से तू किलै डरणु छे ?

-माराज आज आदि वासी बि लंगोट नि पैरदन। तो फिर ..?

-तो तू इन बि जाणदि कि  सौएक साल पैलि गढ़वाली समाज बि तो आदिवासी जन ही रै होला कि ना?

- अरे अरे यो को च अर आजीब सि बोली मा, अजीब भौण मा गीत गाणु च। ना ही भाषा समज मा आणि च अर ना ही पता चलणु च कि ये गीतौ भौण कै मुलकौक च?

-हा हा ! यू लोक गीत तीन सौ साल पैलि गढवाल का हरेक गां मा बडो चाव से  गाये जांदो छौ अर यो गिताड़ तुमारो ही जसपुर को लोकगीतकार च अर तीन सौ साल पैल तुमर गां मा यींयिं   भौणम गीत गये जांद छ्या।

-पण ना ही गीत का बोल मेरि समज आणा छन अर ना ही भौण समाज मा आणि च।

-   हां हे बुद्धिजीवी बोल! तू कैं  संस्कृति , कैं सभ्यता  बचाण?

-माराज मि घंघतोळ माँ ऐ ग्यों। मेरि समाज मा इ नि आणु कि संस्कृति अर सभ्यता को क्या रूप  होंद?

-किलैकि तू संस्कृति या सभ्यता तैं  तालाब को ठेर्युं  पाणि समजदो जब कि संस्कृति या सभ्यता बगदी नदी च।

-  ये टोनी का डैडी जी ये टोनी का डैडी जी ! बीजो . पता च आज तुमन एक समारोह मा 'मरती गढ़वाली संस्कृति कैसी बचाए जाय' पर भाषण दीणो जाण।

-ये मेरी ब्वे ! तो यु एक सुपिन छौ। एक ड्रीम छौ।  डौली  डार्लिंग !  आज इटालियन ब्रेकफास्ट बणा भै !   

       

                           





Copyright @ Bhishma Kukreti   18 /3/  /2013

Bhishma Kukreti

Puran Chandra Balodi one of a Character artists of Firs Garhwali Movie

Review of Development of Garhwali-Kumauni (Uttarakhandi) Films, Music Albums, Documentary films -24
                                                Bhishma Kukreti
                 
         The first in any creation force people to talk about those who were involved in its creation. When there would be talk about 'Jagwal' the first Garhwali language feature film /movie, the involvement of Puran Chandra Balodi alias PC would also be there.
Puran Chandra Balodi is one of respectful and renowned name in Garhwali-Kumauni social circle in Mumbai. As social worker he was connected with the activities of Garhwal Bhratri Mandal (a seventy five years old social organization) Mumbai and headed the organizations for many years.  Puran Chandra Balodi never acted in any drama but he always supported the Garhwali theatre and cultural aspects in Mumbai.  Puran Chand Balodi is well known in Mumbai for his help to Garhwalis in getting suitable jobs when there was scarcity of jobs. Puran Chand Balodi was born o in 1942 in village Manjeri, Banelsyun, Pauri Garhwal. He served as General Manager, director in many corporate houses till he retired.
   Puran Chandra Balodi acted in 'Jagwal' as judge.
           However, Balodi will be remembered for helping Parashar Gaud in overcoming many legal hassles. Puran Chandra Balodi and his team members as Raman Kukreti, Geeta ram Bhatt, Rup Singh Rawat, Rajendra Sharma, Sain Singh Rawat helped the producer Parashar Gaud  not only  popularizing  first Garhwali film 'Jagwal' but also helped the producer in releasing it in Mumbai too.   
Reference: Bhishma Kukreti, 2013, उत्तराखंडी फिल्मों का संक्षिप्त इतिहास

Copyright@   Bhishma Kukreti 16/3/2013

Review of Garhwali and Kumauni Films, music albums, documentary films (Uttarakhandi) to be continued...25


Bhishma Kukreti

गढ़वाली हास्य-व्यंग्य

सौज सौजम मजाक-मसखरी 

हौंस इ हौंस मा, चबोड़ इ चबोड़ मा



                                             खेल कमेंट्री 



                                   चबोड़्या - चखन्यौर्या: भीष्म कुकरेती
(s = आधी अ )



- हां  हां! आवा भीष्म जी ! आवा मि 'बासी-तिबासी खबर चैनेल कु टैलेंट हंटर छौं।

-नमस्कार हंटर जी !

-नमस्कार जी !

-ब्वाला  हंटर जी आपन  मि तै   किलै याद कार।. म्यार क्वी इंटरव्यू लीणाइ?

- अरे भै गढ़वाली साहित्यकारों को इंटरव्यू गढ़वाली पत्रिकाओं मा क्वी नि पढ़दो त टी वी चैनलों मा  क्वी क्या तुमर इंटरव्यू द्याखल। हमर काम  टीआरपी  बढ़ाणो च  भै कम कराणों नी च।

-हंटर जी फिर ब्वालो

-हम तैं अपण चैनलों बान  स्पेसिअयल स्पोर्ट्स कमेंटेटर चयाणु च। जु हमर ऐंकरों दगड कमेंट्री दे साको, खासकर क्रिकेट की छ्वीं लगै साको ।

-  त आप तैं  खिलाड़ी दगड बात करण चयेंद।   

-   हां पण अजकाल जरा दिखणेरूं (दर्शक ) पसंद ही बदल गे अब दिखणेरुं तैं नीरस स्पोर्ट्स टीका -टिपणी ना रौंसदार ,  रस्याण वळ, मसालेदार , स्पोर्ट्स कमेंट्स मा मजा आंद।

-  पर मि तैं इक टंगड्या खेल कु अलावा कै बि खेलौ ज्ञान नी च।

-हाँ हमन पता लगाइ आल कि तुम तै कै बि खेलो क्वी ज्ञान नी च। अरे भै ज्ञान तो हमारा ऐंकरों तैं क्रिकेट का बि नी च पण द्याख च कन  वो लोग अनुभवी खिलाड्युं से बढ़िया खेल की चीर फाड़ करदन।

-पण कुछ तो खेलो ज्ञान ?

-नै नै ! हमर विशेष खेल कमेंटेटर तै खेल ना अलंकारों ज्ञान जरूरी च।

-जी ?

- जी हां! आप  तैं मसालेदार कमेंट्री दीण जां मा उपमा अलंकार की झड़ी लगीं ह्वावो जन कि महेंद्र सिंह धोनी की धकधकाती कैप्टेंसी वळि  आग मा माइकेल क्लार्क धूं धूं कर भष्म ह्वे ग्यायि।

-पण ..

-जख शिखर धवन का चौका ऑस्ट्रेलियाइ खिलाड्युं  जिकुड़ी पर बरछी का घाव पैदा करणा छया उख मुरली विजय की रनिंग द विकेट रामबांस का कांड जन पुड़णा छया।

-ओहो ..

-  आश्विन एक बाढ़ को नाम च जैन ऑस्ट्रेलियाइ कूड़ इन ध्वस्त कौरिन जन बुल्यां क्वी रागस तुर्क्यडुं मकान खुटन ध्वस्त करणु ह्वावो  ।

- उं उं ..

-विनय कुमार एक उगता लाल सूरज च तो सिड्डल एक अछल्यांद काळो सूरज।

-ह्यां ..

- रवीन्द्र जडेजा कु जबर्दस्त जलवा अर जटासुरी जलजला कु  समणि ऑस्ट्रेलियाइ  टीम जमींदस्त ह्वे गे। ऑस्ट्रेलियाइ खिलाड्युंकुण  जडेजा जंगम रागस को नाम च। ओझा एक दुर्दांत राक्षस की तरह ऑस्ट्रेलियाइ टीम को तहस  नहस कर रहा था। जिस तरह एक खटिक बड़ी क्रूरता से मुर्गी की गर्दन  काटता है उसी तरह इशांत शर्मा विरोधियों की विकेट उखाड़ रहा था

-खेल माँ इन शब्द ?

-भीषम जी आज या ही मांग च। खेल का बारीक पहलू छोड़िक शब्दों को जाल से दर्शकों तै भ्रमित , चकित करणों नाम ही आक स्पोर्ट्स जौर्नालिज्म च।

-पण ..

-ज्वा टीम जीती जावो वीं तैं पांडव बणावो अर ज्वा टीम कार जावो वीं टीम तै कौरव घोषित करिक रसातल तलक पौंचे द्यावो। फिर जन आज शिखर धवनन सैकड़ा लगाइ तो वीरेन्द्र सहवाग तै क्रिकेट से सन्यास लीणो आदेस जन खुंकार भाषा इस्तेमाल कारो। 

-पण आज ज्वा टीम जितणि ह्वावो अर परस्युं हारि जावो तो?

-  तो टीमौ कप्तान तै खेल को खलनायक घोषित करी द्यावो . कप्तान तै अर जौन कुछ नि कार वूं तैं  सन्यास  दिलाणो आदेस जन सलाह भारतीय  क्रिकेट बोर्ड तै द्यावो। हरण वाळ टीम तै चीर हरण  या बलात्कार जन अपराध का दोषी साबित कारो। इन लगण चयांद कि यूँ खिलाडियूं से बड़ो धोखेबाज  क्वी नी च, दगाबाज क्वी नी च। यूं खिलाड्युं पर देशद्रोही की भगार लगावो अर दर्शकों मन मा टीम का हरेक खिलाड़ी प्रति घृणा पैदा करण वाळ माहोल पैदा कारो। युद्ध  की भाषाक  इस्तेमाल ही आज खेल पत्रकारिता की असली पछ्याणक ह्वे ग्याइ।   

-  पण यो अचाणचको बदलाव किलै आयि?

-भै उन तो हम बहुत दिनों से खेल भावनाओं ऐसी तैसी करणाइ छया पण अब स्टार क्रिकेट चैनेल  मा  कमेंटेटर नवजोत सिद्धू की अलंकृत भाषा प्रयोग से हम समाचार चैनलों पर दबाब बढ़ी गे कि टीआरपी  बढ़ाणो बान जथगा जोर से ह्वावो उथगा जोर से खेल अर खेल भावना की हत्या करे जावो।

-  वोह तो या बात च?

-जी तो आप कब बिटेन  हमर चैनेल ज्वाइन करणा छंवा?

-जी ब्याळि बिटेन छै टीवी चैनेल का टैलेंट हंटरुं  से मेरि मुलाक़ात ह्वे तो मि सोच समझिक जबाब देलु।

-ओके! आई शेल वेट फॉर युअर पोजिटिव रिप्लाइ ।

         

         



Copyright @ Bhishma Kukreti   19  /3/  /2013

Bhishma Kukreti

Chhwata Gor Thobdu Chatan: Satire on Government Ignoring Small and Local Language News papers
Critical review of Garhwali satirical prose- 135
Critical Review of Garhwali Satire written by Prakash Mani Dhashmana -12
'Chhwata Gor Thobdu Chatan''(Rant Raibar 11/3/2013) by Prakash Mani Dhashmana 
                       Review by Bhishma Kukreti
[Notes on Satire on Government Ignoring Small and Local Language News papers; Garhwali Satire on Government Ignoring Small and Local Language News papers; Uttarakhandi Satire on Government Ignoring Small and Local Language News papers; Mid Himalayan Satire on Government Ignoring Small and Local Language News papers; Himalayan Satire on Government Ignoring Small and Local Language News papers; North Indian regional language Satire on Government Ignoring Small and Local Language News papers; Indian regional language Satire on Government Ignoring Small and Local Language News papers; South Asian regional language Satire on Government Ignoring Small and Local Language News papers; Asian regional language Satire on Government Ignoring Small and Local Language News papers; Oriental regional language Satire on Government Ignoring Small and Local Language News papers]
                    'Chhwata Gor Thobdu Chatan''a Garhwali satire by Prakash Dhashmana criticizes the indifferent policy or no policy for small newspapers/magazines. Dhashmana blames the uncaring strategy of government, politicians and bureaucracy for development of local language journalism and literature. The Garhwali satirical columnist Prakash Dhashmana charges the ignoring attitude of government, chief minister for not helping local language journalism and literature in his satirical column 'Chakdait Uvach (The cunning man's words).
  The satire starts as if Dhashmana narrating a story or memory but slowly the narration starts analyzing the total unsympathetic plan, apathetic guiding principle, unconcerned guidelines, unmoved procedure by government, chief minister, politicians, government officers for local language literature and journalism.
The satire blames that the big papers are getting big pie from the government aids for improving journalism but not the small newspapers those are in need more.
The style is in story telling form and analyzing the facts resulting total loss of humor and making sharp statement. The language is from Salani dialects.
  The satire impresses the readers to make pressure on politicians and bureaucrats to make a plan for local language development.
Copyright@ Bhishma Kukreti 19/3/2013
Critical review of Garhwali satirical prose to be ...136
Critical Review of Garhwali Satire written by Prakash Mani Dhashmana to be...13
Notes on Satire on Government Ignoring Small and Local Language News papers; Garhwali Satire on Government Ignoring Small and Local Language News papers; Uttarakhandi Satire on Government Ignoring Small and Local Language News papers; Mid Himalayan Satire on Government Ignoring Small and Local Language News papers; Himalayan Satire on Government Ignoring Small and Local Language News papers; North Indian regional language Satire on Government Ignoring Small and Local Language News papers; Indian regional language Satire on Government Ignoring Small and Local Language News papers; South Asian regional language Satire on Government Ignoring Small and Local Language News papers; Asian regional language Satire on Government Ignoring Small and Local Language News papers; Oriental regional language Satire on Government Ignoring Small and Local Language News papers to be continued....

Bhishma Kukreti

गढ़वाली हास्य-व्यंग्य

सौज सौजम मजाक-मसखरी 

हौंस इ हौंस मा, चबोड़ इ चबोड़ मा





                                कुछ काम  में से नि हूणन 


                                   चबोड़्या - चखन्यौर्या: भीष्म कुकरेती
(s = आधी अ )



आज मी सुचणु छू बल में से क्या क्या काम नि ह्वे सकदन त लग भौत सा काज छन जो में से नि हवे सकदन।

अब जन कि घरवळि ब्यौवक दिन बिटेन स्याणी-गाणि सक बल मि लौ बाणिक मनिख ह्वे जौं पण मै नि लगद इन ह्वालो।

अब जन कि मि कथगा बि  पुठ्या जोर (प्रयत्न ) लगौल  मीन अपण कमरा साफ़ नि रखण अर जब तलक में पर ताकत रालि तब तलक कमरा मा कखि किताब फुळी रालि तो कखि कागज़ पतर इना उना फुऴयां ही राला।

अब जन कि मि रात कथगा बि सौं घटुल मीन सुबर क्या दिन तलक बि अपुण डिसाण -ढिकाण नि बिटांण होस्टल की आदत च कि सात आठ दिनों मा जब किरम्वळ तड़कावन या धूळ-मट्टी-गार बिनावन तबि डिसाण -ढिकाण झाड़न अर वां से पैल दिखण बि नी च कि गद्दा अर खंतुड़ पर क्या क्या भंगुल जमणु च।

अब जन कि सरकार कथगा बि सिगरेटों दाम बढ़ालि मीन सरकार को फिस्कल डेफिसिट कम  करणों बान  सिगरेट पीणु रौन अर सिगरेट पीण नि छुड़ण।

अब जन कि  म्यार द्वी  नौन अर ब्वारि कथगा बि नाराज होला मीन शराब पीण नि छुड़ण। जब मीन शराब पीण शुरू कौरि छे तो ये सोचिक पीण शुरू करी छे कि यांसे रचनाधर्मिता मा उछाला आलो अर आज तक शराब से  क्वी भलो क्रिएटिव खयाल  नि ऐन पण मीन शराब पीण नि छुड़ण। अजकाल जब पैसों तंगी ह्वे जान्दि तों मि तैं  देसी दारु मा बि मजा आंदो।

ब्वे आज बि सुबेर सुबेर  सुबर फड्यान्दि च बल दांत मजा दांत मजा पण मजाल च मि  कबि नक्वळ (नास्ता ) करण से पैल  दांत मजौं धौं। मैं  नि लगद मि कबि नक्वळ से पैल दांत मंजौल धौं!

मै नि लगुद कि मि स्लेका का कपड़ा पैरूल जब जवानि मा छोरि पटाणो ढंग  का कपड़ा नि पैरिन तो बुढ़ापा मा क्या मि बुड्ढी घोड़ी लाल लगाम जन सलीकादार कपड़ा पैरुल धौं!

मि तैं नि लगुद कि मि कुत्ता या बिरळ पाळलु , या चखुलों तै पिंजड़ा मा पाळलु या माछों तैं फिश बौक्ष माँ धरिक लेख लिखुल। माछों  जगा गदन , तालाव , नदी या स्मोदर मा इ ठीक च।

मि तैं नि लगद मि कै पहाड़ी जगाम  रिटायरमेंट जीवन बितौलु। अचकाल पहाड़ों मा जन कि मसूरी , भीमताल ,नैनीताल मा जमीन मंहगी ह्वे ग्यायि अर मीन जब जवानि मा पैसा जमा नि कार तो अब बुड्यांद दें लौटरी मिलण से रै। लौटरी खुलि बि सकद च जब मि लौटरी टिकेट खरीदलो। चाहे कुछ बि ह्वे जालो मीन लौटरी टिकेट नि खरीदण अर सरकारी जुआ तैं परिश्रय नि दीण। मतलब मेरो अग्वाडि की जिन्दगी मुंबई मा कटेली।

मि तै नि मि लगद बल मि गढ़वाळी मा लिखण छुड़ुल हालांकि हिंदी मा लिखण सौंग च अर गढ़वाळी मा लिखण से पैल हिंदी मा सुचण पोड़द अर फिर हिंदी मा सुच्यां को अनुवाद गढ़वाळि मा करण पोड़द।

अब जन कि मैं नि लगद बल मि फेस बुक मा सुबर गुड मॉर्निंग अर स्याम दें गुड नाईट पोस्ट करुल।

मै नि लगुद बल मि फेस बुक मा लोगुं फोटो शेयर करलु।

मै नि लगुद बल मि गूगल सर्च बिटेन कॉपी पेस्ट करिक फेस बुक मा पोस्ट करुल।

हाँ भोळ म्यार मन बदली गे त मि नि बोलि सकुद कि जु मि आज नि कौर सकुद भोळ नि कौर सकुद किलैकि अपण मनै करण मेरो नागरिक अधिकार च जन कि अपण फैदा बान विदेश नीति तैं खपचाण करुणानिधि क मौलिक अधिकार च।             

                                             



Copyright @ Bhishma Kukreti   20 /3/2013

Bhishma Kukreti

 गढ़वाली -कुमाउनी फिल्मों के बहाने स्लोवाकियायी  फिल्मों की बातें



                              (गढ़वाली कुमाउनी  फिल्म विकास पर  विचार विमर्श )


                                           भीष्म कुकरेती



              कुमाउंनी-गढ़वाली फिल्मों की समया यह रही है कि इस उद्यम पर  वैचारिक, सामजिक , राजकीय, स्तर पर  गंभीरता पूर्वक और  दिशा निर्देशन हेतु कभी खुली  बहसें हुयी ही नही। यही कारण है कि जब मैंने विश्व  सिनेमा की बात रखी तो कुछ मित्रों ने पूछा   

कि कहाँ गढवाली -कुमाउंनी फ़िल्में और कहाँ विश्व सिनेमा ? जब कि विश्व साहित्य के अनुपात में बंगाली साहित्य छोटा ही था किन्तु रवीन्द्र नाथ टैगोर व सत्यजीत रे ने बंगाली भाषा को विश्व पटल पर रख दिया था। मेरा मानना है कि यद्यपि कुमाउंनी-गढ़वाली फिल्मकार विश्व स्तर की फ़िल्में ना भी बना सकें किन्तु उन्हें विश्व सिनेमा पर विचार विमर्श करते रहना चाहिए।

             स्लोवेकिया और कुमाउंनी -गढ़वाली फिल्मों की तुलना आसानी से नही की जा सकती क्योंकि कुमाऊं और गढ़वाल एवं  स्लोवेकिया के सामाजिक , , राजनैतिक आर्थिक परिवेश में जमीन आसमान का अंतर है किन्तु भासा के बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से दोनों भाषाई फिल्मों की तुलना की जा सकती है।

        चेक रिपब्लिक का पुराना  भूभाग की  स्लोवाकिया भाषा के बोलने वाले केवल पचास लाख तक हैं किन्तु स्लोवाकिया फिल्मों का एक विशेष स्थान विश्व सिनेमा में है। यूरोपीय शैली में होने के बावजूद स्लोवाकियी फिल्मों में अपना सामाजिक , भौगोलिक प्रकृति, ग्रामीण परिवेश, लोक संस्कृति और लोक मेलों की पूरी झलक मिलती है जो स्लोवेकियायि फिल्मों को अन्य यूरोपीय फिल्मों से अलग करती हैं। समानांतर  फिल्मों भी स्लोवाकिया की भौगोलिक प्रकृति, परम्पराएं, लोक धर्म मिलता है जैसे -ओबरेजी स्तारेहो स्वेता ( 1972)  तो पॉपुलर या हिट फिल्म जैसे त्रिसिक्रोकना विसेला (1983 ). अब तक करीब तीन सौ पचास फीचर फ़िल्में बन चुकी हैं और इतिहास, सामजिक सामयिक विन्यास अधिक मिलता है किन्तु हास्य , बाल , वैज्ञानिक, साहसिक विषयी फ़िल्में भी बनी हैं।  कम्युनिस्ट प्रोपेगेंडा भी फिल्मों में रहा है।

स्लोवाकिया राजनैतिक उथल पुथल से भरा भूभाग  रहा है और फिल्मों में शासकीय प्रभाव अवश्य रहा है और कई अच्छी  फ़िल्में भी बनी हैं। स्लोवाकियायी भाषाई फिल्म जानोसिल्क (1921) दुनिया के दसवीं फीचर फिल्म है। इस फिल्म के बाद स्लोवाकियायी फिल्मों को सिनेमा हाल ना मिलने की समस्या से जूझना पड़ा। विश्व सिनेमा ने स्लोवाकियायी फिल्मों को सन 1933 से पहचानना किया जब इस साल वेनिस फिल्म फेस्टिवल में कारोल पलिका की 'जेम स्पीवा' फिल्म प्रदर्शित हुयी। इसी तरह सन 1935 में मार्टिन फ्रिक की 'जानोसिल्क' के नाम से ही फिल्म अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित हुयी।

अमेरिकी या नया बाहरी सहयोग से जब भी कोई कम्पनी  फिल्म बनाने के लिए उतरी वह फिल्म प्रदर्शन के बाद व्यापारिक नुक्सान के कारण बंद होती गयीं हाँ डौक्युमेंट्री फ़िल्में बनती गयीं।

स्लोवाकिया फिल्मों के निर्माण में शासकीय संसाधनो का योगदान रहा है   

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान व बाद में जब स्लोवाकिया कम्युनिस्ट शासन के तहत हुआ तो सन 1950 तक स्लोवाकियायी फ़िल्में ना के बराबर निर्मित हुईं। सन 1945  से सन 1989 तक स्लोवाकिया चेक या रूस की कम्युनिस्ट पार्टियों शासन तहत ही रहा । ईदस दौरान फिल्म कर्मी पूरी तरह सरकारी कर्मचारी ही रहे।

कुछ फिल्मों का विवरण देना वश्यक है जैसे-

सन साथ से शतर तक स्लोवाकिया भाषा में अधिक फिल्मों का निर्माण हुआ

सन 1962 की स्टेफान निर्देशित फिल्म सन इन नेस्ट एक ,प्रयोगधर्मी  असलियत के नजदीक  और कई परम्पराओं को तोड़ने वाली फिल्म थी .

जान कादर और इल्मार क्रोस की सन 1965 में प्रदर्शित द्वितीय विश्व युद्ध की राजनीति को दर्शाती फिल्म 'द शौप ओन में स्ट्रीट ' को ओस्कार पुरुष्कार मिला।

जुराज जाकुविसको की फिल्म डिजर्टर्स एंड  पिल्ग्रिम्स सन 1968 में प्रदर्शित हुयी। 

बर्ड्स औरफ्न्स ऐंड फूल  (1969)एक पॉपुलर फिल्म थी किन्तु सोवियत  अतिकर्मण के कारण यह फिल्म दर्शकों तक नही पंहुच पायी।



अलियान रॉब ग्रिलियत की फिल्म ईडन ऐंड आफ्टर (1970  ) प्रदर्शित हुयी

दुसान हानक निर्देशित 'पिक्चर ऑफ ओल्ड वर्ल्ड'  (1972) फिल्म  की यूरोपीय समीक्षकों ने प्रशंसा की।

दुसान हानक निर्देशित रोजी ड्रीम (1977) एक काव्यात्मक फिल्म मानी जाती है।

दुसान हानक  की 'आई लव यु लव '(1980) मजदूरों की परेशानियों व गरमा गरम  सीनों के लिए याद की जाती है इस फिल्म पर कम्युनिस्ट शासन की गाज भी पड़ी।

मार्टिन होली की 'नाईट राइडर्स' (1981) में प्रदर्शित हुयी।

  स्टेफेन उहार निर्देशित  'शी  ग्रेज्ड हॉर्सेज ओन कंक्रीट'  (1982) एक औरत के संघर्ष कथा है।

जुराज जाकुबिस्को निर्देशित 'अ थौजेंड यियर ओल्ड बी' (1983)   फिल्म सन 1800 से 1900 एक किसान परिवार की तीन पीढ़ियों की कहानी कहती है और शहर व ग्रामीण परिवेश  अंतर  बताने में भी कामयाब हुयी । इस फिल्म को वेनिस फिल्म फेस्टिवल में पुरुष्कार भी मिला।


जुराज जाकुबिस्को निर्देशित ' आई एम सिटिंग ओन अ ब्रांच  ऐंड आई एम फाइन (1989) प्रदर्शित हुयी

.

स्वतन्त्रता की बाद दुसान हानक की 'पेपर हेड्स' (1995 ); मार्टिन सुलिक की द गार्डन  ( 1995);  जुराज जाकुबिस्को की 'बाथोरी '( 2008); जुराज लिहोत्स्की की 'ब्लाइंड लव्स ( 2008); ब्लादिमोर बालको की ओल एट पीस (2009) ; रिवर्स ऑफ बेबिलोन आदि फिल्मों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया।

कई राजनैतिक उथल पुथल व कम संख्या के दर्शकों के बाद भी तीन सौ से अधिक स्लोवाकियायी फ़िल्में बनी और कई कामयाब फ़िल्में भी बनी . यह बात सत्य है कि सरकारी अनुदान से ही फिल्मों का निर्माण सम्भव हुआ। स्लोवाकियायी फिल्मों के विषय बहुआयामी व इस क्षेत्र की विशेस्ताएं व सामयिकता दर्शाने में भी सफल रही हैं।

     

  सन्दर्भ -मार्टिन वोत्रुबा , 2005 हिस्टोरिकल एंड नेशनल बैक ग्राउंड ऑफ स्लोवैक फिल्ममेकिंग




Copyright@ Bhishma Kukreti 20 /3/2013

Bhishma Kukreti

Ghabda na ham Bhejna Chhan: Satire on Opportunism after separate State Uttarakhand Creation

Critical review of Garhwali satirical prose- 136
Critical Review of Garhwali Satirical prose written by Pritam Apachhyan -1
Review of Satirical article 'Ghabda na ham Bhejna Chhan '  (Chithi Patri January 2002)by Pritam Apachhyan
                                             Review by Bhishma Kukreti

[Notes on Satire on Opportunism after separate state Uttarakhand Creation; Garhwali Satire on Opportunism after separate state Uttarakhand Creation; Uttarakhandi Satire on Opportunism after separate state Uttarakhand Creation; Mid Himalayan Satire on Opportunism after separate state Uttarakhand Creation; Himalayan Satire on Opportunism after separate state Uttarakhand Creation; North Indian regional language Satire on Opportunism after separate state Uttarakhand Creation; Indian regional language Satire on Opportunism after separate state Uttarakhand Creation; Asian regional language Satire on Opportunism after separate state Uttarakhand Creation; Oriental regional language Satire on Opportunism after separate state Uttarakhand Creation]

           Pritam Apachhyan is famous poet of Garhwali language of this time. Very few know that Pritam also writes satirical articles in Garhwali.
               Before separate Uttarakhand state was created, satirist and cartoonist of Garhwali used to criticize Uttar Pradesh politicians and bureaucrats for ignoring the development of hills of Uttarakhand. 
               The people feel that they are now deceived after Uttarakhand sate creation.  Pritam Apachhyan criticizes the opportunists those are taking benefits of Uttarakhand sate creation and the rural people are deprived of planned benefits from newly created separate state. 
              The subject take by satirist is still relevant and people of Hills still feel deceived. The language is humorous and sharp as well. The uses of phrases by Pritam are brilliant and show his depth of language knowledge.
The present satire is one of the brilliant best satire articles of Garhwali prose in terms of balance humor, phrases and sharpness.

Copyright@ Bhishma Kukreti 20/3/2013
Critical review of Garhwali satirical prose to be ...137
Critical Review of Garhwali Satirical prose written by Pritam Apachhyan to be -2
Review of Satirical articles published in Chithi Patri by Pritam Apachhyan to be continued...

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