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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti

                             मकान मालिक -किरायेदार संवाद

                             चबोड़्या -चखन्यौर्या -भीष्म कुकरेती


किरायेदार - मेरि तुमर विज्ञापन मा रूचि च जै मा तुमन अपण टू बेड रूम हाल किराया पर दीणो जिकर  कार।
मकान मालिक - अछा ! विज्ञापन मा रूचि च त विज्ञापनै कटिंग त तुमम होलि ना ?
किरायेदार -हाँ
मकान मालिक -त विज्ञापन द्याखो अर रूचि पूरि कर ल्यावो।
किरायेदार -नै नै मि तै टू बेड रूम हाल मा रूचि च।
मकान मालिक -ओ त इन ब्वालो कि तुम तैं टू बेड रूम हाल मा रूचि च  !
किरायेदार -हाँ मि तैं ....
मकान मालिक -एक बात बताओ उत्तरकाशी मा मकान बणाणो बैंक लोन नि मील जु मकान किराया पर चयाणु च।
किरायेदार -नै मेरि देहरादून मा बड़ी कोठी च।  मि सरकारी ट्रांसफर पर देहरादून अयुं छौं।
मकान मालिक -देखो ! जु तुम प्रोबेसन पर अंयाँ छा त डिपोजिट एक लाख रुपया , प्रमोसन पर अयाँ छा त डिपोजिट डेढ़ लाख रूप्या अर जु पनिशमेंट पर अयाँ छंवा त डिपोजिट अपराध का हिसाब से अलग अलग च।
किरायेदार -मि कार्यालय नौनी तैं छिड़णो अपराध मा पनिशमेंट पर अयुं छौं।
मकान मालिक -खाली नौनि छिड़णो कि बलात्कार करणो बि ?
किरायेदार -नै वीं छोरिन बलात्कार की कोशिस की शिकैत बि करि छे पण साबन बोलि कि इथगा कर्मचार्युं होंद बलात्कार की कोशिस नि ह्वे सकद त केस मा सिर्फ नौनि छिड़णो शिकैत दर्ज ह्वे।
मकान मालिक -नौनि तैं तंग करणों पनिशमेंट च त द्वी लाख डिपोजिट च।  बस द्वी लाख भरो  अर भोळ बिटेन ऐ जावो। 
किरायेदार -ठीक च जरा मि दिखण चांदो।
मकान मालिक -अरे मी पर भरवस नि च ?
किरायेदार -नै नै ! भर्वस त च पण मि दिखण चांदो कि रूम कन छन।
मकान मालिक -रूम कन छन।  मतबल ? हम पहाड़ी छंवां त रूम बि हमन ऊनि बणैन जन मैदानी हिस्सों मा बणदन।  हम अपण रीती रिवाज तुड़ण मा एक प्रतिशत की भी कमी नि करदा।   
किरायेदार -नै पर रूम मि तै पसंद बि आण चएंद।
मकान मालिक -आपकी पसंद क्या च ?
किरायेदार -जगा लम्बो -चौड़ याने स्पेसियस हूणि चएंद कि ना ?
मकान मालिक -तुम रूम क्रिकेट खिलणा लीणा छा कि रौणो लीणा छा ? टू बेड रूम हाल मा जथगा जगा होंदी  उथगा ही च। 
किरायेदार -अच्छा बेड रूम मा खिड़की बि च ?
मकान मालिक -नै ! मीन खिड़की इलै नि लगाइ कि क्वी किरायेदार कखि पड़ोस्यूं बेटी -ब्वार्युं पर नजर नि मार साक।
किरायेदार -क्या बेड रूम बगैर खिडक्युंक छन त मि   तैं इन रूम नि चयाणा छन।
मकान मालिक -मजाक करणु छौं।  हरेक रूम मा खिड़की छन।
किरायेदार -रूम कथगा बड़ा छन ?
मकान मालिक -एक रूम किचन से बडो च त बाथरूम किचन से छ्वटो च पण द्वी आदिम दगड़ी झुल्ला ध्वे सक्दन।
किरायेदार -अर रौणो कमरा ?
मकान मालिक -रौणों कमरा ? मतबल ?
किरायेदार -लिविंग रूम ?
मकान मालिक -अरे तुम चावो त बाथरूम मा बि रै सकदा।  मि तैं क्या च ?
किरायेदार -म्यार मतबल असली रूम ?
मकान मालिक -असली रूम ? सब असली सीमेंट -गारा से बण्या छन।
किरायेदार -म्यार मतबल च मुख्य बेड रूम कथगा बड़ो च /
मकान मालिक -मुख्य बेड रूम हैंको रूम , किचेन , बाथरूम अर हौल तैं हर समौ टच करणु रौंद याने छूणु  रौंद।
किरायेदार -अछा आस पड़ोस कन छन ?
मकान मालिक -उन त कुछ साल पैल जब इन्डियन कल्चर नि ऐ छौ त ठीकि छौ पण अब बदलाव ऐ ग्यायि।
किरायेदार -कन बदलाव ?
मकान मालिक -हर साल कथगा इ अपण किरायेदारो बेटी लेक भाग जांदन या किरायेदार कैकि बेटि ब्वारि लेकि भाग जांदन। अर जु भाग नि सकदन वूं माँ लडै -झगड़ा हूणु रौंद।  बकै तुम  पुलिस चौकी जैक पता लगै ल्यावो।
किरायेदार -नै नै ! मी तै यांसे क्वी फरक नि पड़दों कि कु कैकि बेटी भगांदु।
मकान मालिक -हां तुम तै क्या।  सरकार पर हि जब फरक नि पड़णु च त ....
किरायेदार -अच्छा कूड़ा उठाण वाळ रोज आंदन कि ना ?
मकान मालिक -सुणो ! सि गंगा जि इख बिटेन कथगा दूर च ?
किरायेदार -होलि क्वी बीसेक हाथ दूर !
मकान मालिक -त कचरा सीधा अफिक गंगा जी मा नि चुलै सकदा क्या ?जु कचरा उठाण वाळै जरूरत पोड़ल ?
किरायेदार -हाँ।  या मौलिक सोच त मेरो मगज मा आयि नि च कि पैल गंगा जी पाप धूंदी छे अर अब कचरा साफ़ करदी।
मकान मालिक - हाँ अब समझी गेवां ना कि ...
किरायेदार -ठीक च त मि भोळ बिटेन ऐ जौलु
मकान मालिक -मीन यु रूम सुबेरि किराया पर दे आल।
किरायेदार -अरे पर इथगा देर बिटेन तुमन बताइ इ नि कि तुमन रोम किराए पर दे आल
मकान मालिक -तुमन बि कख पूछ कि रूम खालि च कि ना? तुमन त शुरुवात  इ मा पूछ कि तुम तै रूम मा रूचि च।




Copyright@ Bhishma Kukreti  16 /9/2013



[गढ़वाली हास्य -व्यंग्य, सौज सौज मा मजाक मसखरी  दृष्टि से, हौंस,चबोड़,चखन्यौ, सौज सौज मा गंभीर चर्चा ,छ्वीं;- जसपुर निवासी  के  जाती असहिष्णुता सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ढांगू वाले के  पृथक वादी  मानसिकता सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;गंगासलाण  वाले के  भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; लैंसडाउन तहसील वाले के  धर्म सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;पौड़ी गढ़वाल वाले के वर्ग संघर्ष सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; उत्तराखंडी  के पर्यावरण संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;मध्य हिमालयी लेखक के विकास संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;उत्तरभारतीय लेखक के पलायन सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; मुंबई प्रवासी लेखक के सांस्कृतिक विषयों पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; महाराष्ट्रीय प्रवासी लेखक का सरकारी प्रशासन संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; भारतीय लेखक के राजनीति विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; सांस्कृतिक मुल्य ह्रास पर व्यंग्य , गरीबी समस्या पर व्यंग्य, आम आदमी की परेशानी विषय के व्यंग्य, जातीय  भेदभाव विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; एशियाई लेखक द्वारा सामाजिक  बिडम्बनाओं, पर्यावरण विषयों   पर  गढ़वाली हास्य व्यंग्य श्रृंखला जारी ...]

Bhishma Kukreti

List of Katyuri kings of Pali Pachhaun in Context Indian, Himalayan, and Kumaon Middle Age History

   (History of Kumaon from 1000-1790)

History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon, Haridwar) - Part 144


                                              By: Bhishma Kukreti

                                Pali Pachhaun Region

           Pali Pachhaun region of Kumaon is in between Katyur, Baramandal, Faldakot, Kota and Garhwal.
The hill ranges are Jaurasi, Drongiri, Manila, Nagarjun and Gujud Danda
The rivers in this region are Ramganga, Binau and Gagas.
The main centers are Ganai, Mansi, Bhikyasain.
The main temples of Pali Pachhaun region are Budha Kedar, Bibhandashwar, Thaneshwar, Chitreshwar of Shaivya cult;  Naryan, Nagarjun, Badrinath (1105 AD)of Vaishnav cult and Shitala, Vaishnavi, Durga, Maniladevi, Bhuvneshwari, Naithana and Agnidevi of Shakt sect.

    The following Katyuri kings are found in Pali Pachhaun list-
1-Asantidev
2-Basantidev
3-Gaurangdev
4-Siyamalldev
5-Fenavray
6-Keshavray
7-Ajabray
8-Gajbray

Gajb Ray had two sons. Pritamdev was younger one.
The son of Pritamdev was Dhamdev.
Initially, Dhmadev resided in Patlidun (Garhwal region). But later on his successors settled in Manasbhumi (Kumaon) in Chand dynasty period. The chronological name of successor of Dhamdev was  Bhavdev .
The elder son of Gajabray was Sujandev
Sarangdev was son of Sujandev. Veerandev was elder son of Sarangdev and younger son of Sarangdev was Bgadev.
Surdev was son; Bhavdev was grandson; grandsons were Palandev and Prit Gusain of Veerendev. Pithu Gusain had two sons Japu Gusain and Sarang Gusain.

The name of Sarangdev is carved in Tamadhaun devi temple inscription (1420).  His sons were Bhavan Singh (successors are Manral of Tamadhaun) and Dharmsingh (Manral of Kahedgaon).
The Chand kings neither destroyed Katyuris not provided chances to grow them. The Chand kings and families used get marry with daughters of Katyuris but never married their daughters with Katyuris.
Manural or Manral are Katyuri king successors or family successors and this caste people are now scattered in Almora district.

Copyright@ Bhishma Kukreti -bckukreti@gmail.com 16/9/2013
References-
Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas Bhag 10, Kumaon ka Itihas 1000-1790
Badri Datt Pande, 1937,Kumaon ka Itihas, Shri Almora Book Depo Almora
Devidas Kaysth, Itihas Kumaon Pradesh
Katyur ka Itihas, Pundit Ram Datt Tiwari
Oakley and Gairola, Himalayan Folklore
Atkinson, History of District Gazette
Menhadi Husain, Tuglak Dynasty
Malfujat- E Timuri
Tarikh -e-Mubarakshahi
Kumar Suresh Singh2005, People of India
Justin Marozzi, 2006, Tamerlane: Sword of Islam
Bakshsingh Nijar, 1968, Punjab under Sultans 1000-1526 
The Imperial Gazetteer of India, Volume 13 page 52 
Bhakt Darshan, Gadhwal ki Divangit Vibhutiyan

(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)
   
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand, India) to be continued... Part -145
History of Kumaon (1000-1790) to be continued....
Middle Himalayan, Indian Medieval Age History of Karvipur Katyuri to be continued...
  (Middle Himalayan, Indian Medieval Age History (740-1790 AD to be continued...)
Xx                       xxx
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Bhishma Kukreti

   दालों /दलहन का उत्तराखंड के परिपेक्ष  में इतिहास -भाग -1

                               History of Pulses Agriculture and food in Uttarakhand Part-1
                                      History Aspects of Chickpea in Uttarakhand

                                         उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास --12

                                        History of Gastronomy in Uttarakhand 12


                                      आलेख :  भीष्म कुकरेती


                        उत्तराखंड के परिपेक्ष  में चना दाल का भारत में इतिहास

           चना सात हजार साल पहले खाद्य उपयोग में आ  और भारत में मनुष्य छ हजार साल पहले चना प्रयोग करने लगे थे
   सुदर्शन शर्मा व नेने वेदों में व वेद भाष्यों में 'खलवा ' शब्द  को दाल  मानते हैं।  जिससे अंदाज लगाया जा सकता है कि मनुष्य 'दाल प्रयोग ' प्रागैतिहासिक काल से करता आ रहा है।
कौटिल्य (321 -296 BC ) ने 'कलय' शब्दों का प्रयोग किया है जो शायद चना दाल था क्योंकि कौटिल्य ने लिखा है कि 'कलय' भुनकर और  कई तरह से प्रयोग किया जाता है.कर्नाटक में चने को 'काडेल' और केरल में चना दल को 'काडाला ' कहा जता है।
बौद्ध साहित्य (400 BC ) में चना दाल को चणक कहा गया और सारे भारत में  चना शब्द प्रचलित हुआ।  केवल मराठी में चना को हराभरा कहा जाता है।  प्राचीन संस्कृत में चना को 'हरिमंथ' (हरि =घोड़ा , मन्थ =चबाना ) कहा गया है। वात्सायन के काम  सूत्र , चरक संहिता , मार्केंडेय पुराण , मत्स्य पुराण अदि में चना का विवरण मिलता है।
प्रागऐतिहासिक खुदाई में कालीबांगन (राजस्थान 3000 -2000 BC ) , बिहार (2000 -1200 BC ) , महाराष्ट्र (2000 -800 BC ) , पंजाब (2300 -1400 BC )और अंतरराजिखेड़ा  गंगा दोआब उत्तरप्रदेश (2000 BC ) चना के अवशेष मिले हैं। इससे पता लगता है कि चार हजार साल पहले उत्तराखंड के निवासियों को  अवश्य ही चना दाल का पता था.
                    चना की खेती (इतिहास )

कौटिल्य ने लिखा है कि दाल को दो तीन दिन पानी में भिगोकर बोना चाहिये।
कश्यप्याकृषिसूक्ति (800 AD ) में कहा गया है कि चना बिना सिंचाई के बोया जाता है। कश्यप ने कहा है कि चना की दो किस्मे -छोटा बीज और बड़ा बीज होता है। कश्यप बताते हैं कि एक महीने बाद निराई -गुड़ाई होनी चाहिए। इसी समय खाद भी डाली जानी चाहिए।
बारहवीं -तेरहवीं सदी में चना बीज को मनतता  पानी में 24 घंटे के लिए बोने पहले भिगोया जाता था। इसी समय फसल चक्र का भी प्रयोग का रिकॉर्ड मिलता है।
दारा सिकोह (1650 AD )बड़े चना बोता था.
काबुली चना का प्रथम बार रिकॉर्ड 'आईने अकबरी ,1590 ) में मिलता है।

                                 उत्तराखंड में चने की खेती

चूँकि चना की उत्पादक शीलता पहाड़ों में कम है तो चना सर्वदा मैदानों -तराई -भाबर में ही बोया जाता रहा है। या कह सकते हैं कि चना का इतिहास उत्तराखंड के मैदानी हिस्से का इतिहास है और बिजनोर, हरिद्वार , देहरादून , सहारनपुर में चने की खेती का इतिहास ही उत्तराखंड में चना का इतिहास माना जाना चाहिए ।
प्राचीन समय में चना घोड़ो और हाथियों को भी खिलाया जाता था और अज भी यही स्थिति कायम है

                              कृषि उत्पादन शीलता

अशोक काल के पश्चात् भारत में अन्वेषण पर लगाम लग गयी थी।  राजनैतिक अस्थिरता और जमीन पर हक को कोई विशेष नीति न होने से किसानो ने कृषि उत्पादनशीलता बढ़ाने का कम अशोक कल के बाद नहीं किया. यहाँ तक कि नहर आदि लाने में भी कृषक अधिक उद्यम नही करते थे। 

               अकबर के जमाने में चना का भाव
         आईने अकबरी (1590 AD ) में लिखा है कि काबुली चना देसी चना से दो गुना भाव में मिलता था। कबुली चना गेंहू से तेतीस प्रतिशत मंहगा था। चने का आटा और गेंहू आटा का भाव एक समान था।

                 चना के  भोज्य पदार्थ

    चरक संहिता और सुश्रवा संहिता व अन्य साहित्य से पता चलता है कि चना उबालकर , सत्तू , चने का आटा बनाकर , भूनकर , घोल बनाकर खाया जाता था. प्राचीन कल में पत्तों का प्रयोग साग के रूप में होता था और आज भी ।  भूने  चने पर्यटन में और युद्ध में सिपाहियों का एक  महत्वपूर्ण भोज्य पदार्थ था.     


                  आयुर्वेद में चना का चिकित्सा लाभ

चने की पत्तियों से अम्ल निकल कर आयुर्वेदिक दवाइयां बनती थीं (बाग़ भट्ट 800 AD ).
               

Reference-

Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts
Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
B.K G Rao, Development of Technologies During the  Iron Age in South India
V.D Mishra , 2006, Prelude Agriculture in North-Central India (Pragdhara ank 18)
Anup Mishra , Agriculture in Chalolithic Age in North-Central India
Mahabharata
All Vedas
Inquiry into the conditions of lower classes of population
Lallan Ji Gopal (Editor), 2008,  History of Agriculture in India -1200AD
K.K Nautiyal History of Agriculture in Garhwal , an article in History of Agriculture in India -1200AD
Steven A .Webber and Dorien Q. Fuller,  2006, Millets and Their Role in Early Agriculture. paper Presented in 'First Farmers in Global Prospective' , Lucknow 
Joshi A.B.1961, Sesamum, Indian central Oil Seeds Committee , Hyderabad
Drothea Bradigian, 2004, History and Lore of Sesame , Economic Botany vol. 58 Part-3
Chitranjan  Kole , 2007  ,  Oilseeds

Gopinath Mohanty et all, 2007, Tappasu Bhallika of Orissa : Their Historicity and Nativity
Y .L .Nene ,2006, Indian Pulses Through Millenia, Asian Agri-History, Vol.10,No.3 (179-200)


Copyright @ Bhishma  Kukreti  15 /9/2013

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Bhishma Kukreti

विकल्पमुखी सासु
                         चबोड़्या -चखन्यौर्या -भीष्म कुकरेती

सासु -ए  जवैं ! खाणक मा क्या खैल्या ? भात कि झंग्वर ?
जवैं -भात चौलल !
सासु -वो कन बिसरंत ह्वाइ ! घौरम चौंळ त कुट्यां इ नीन !
जवैं - ठीक च झंग्वर इ चल जाल !
सासु -बड़ दाणु  झंग्वर या छुट दाणु  झंग्वर बणाण ?
जवैं -बड़ दाणु  झंग्वर!
सासु -ये बुरळ पोड़ि गेन  यिं स्मृति पर ! झंग्वरक त एक बि दाणि नी च ड्यारम।  कौणि चौललि ?
जवैं -हाँ !
सासु -अछा कम पीलि कौणि या चिट्ट पीली कौणि ?
जवैं -कम पीलि कौणि?
सासु -गुरा लग जैन ये दिमाग पर कि मि भूलि ग्यों बल  हमर पुंगडुं मा त चिट्ट पीली कौणि ही होंदी।
जवैं -ठीक च चिट्ट पीली कौणि ही पकै ल्यावो।
सासु -अच्छा ! साग मा थिंच्युं साग कि बगैर थिंच्युं साग बणाण ?
जवैं -जन तुमर मरजी।
सासु -अच्छा ! तुम तै थिंच्वणि  मूळाक पसंद च कि अलुक ?
जवैं -अलुक थिंच्वणि।
सासु - फिर से भुल्मार ह्वे गै।  चार मैना ह्वे गेन मीन अलुक दाणि बि नि देख।
जवैं -त मूळाs   थिंच्वणि बणै ल्यावो
सासु -अच्छा मूळा  थिंच्वणि बणाण त मूळा घिंडक बड़ा हूण चएंदन कि मध्यम आकार का या छ्वटि घिंडकि ?
जवैं -बड़ा घिंडक।
सासु -पण ये मेरी स्मरण शक्ति तै क्या बिजोग पड़ी गे।  ये साल त बड़ा क्या !  मध्यम आकार का घिंडक बि नि ह्वेन !
जवैं -त छवटा घिंडकुं  थिंच्वणि बणै द्याओ।
सासु -अच्छा मूळा कौंळ (कौली - कच्चा ) हूण चएंदन कि कबास्यला  ?
जवैं -मूळा कौंळ हूण चएंद।
सासु - पण अबारि त पूषौ मैना च त खडर्यां  मूळान कबास्यला ही हूण। 
जवैं -ठीक च कबास्यला मूळा थिंच्वणि इ पकाओ।
सासु - अच्छा ! थिंच्वणि मा हौर  धणिया पतौं मसल डळण कि ना ?
जवैं -हाँ हौर  धणिया पतौं मसल डाळि द्यावो।
सासु -पण हौर  धणिया त ये बगत हूंदी नि छन।
जवैं -जु बि मसल च स्यु डाळि द्यावो।  दुफरा ढ़ळि  ग्यायि अबि तुमन यु निश्चय नि कार कि क्या खाणो बणाण !
(एक  घंटा बाद )
सासु -ये जंवै तुम तै त निंद आणि च ?
जवैं -हां !
सासु -या निंद पळेक (परिश्रम से  , थकावट से  )  च, आदतन निंद च या भूकन निंद आणि च।
जवैं -भूकान निंद आणि च 
सासु -अच्छा त तुम रुटि अर लूण  खै लेल्या ?
जवैं -हाँ
सासु -लूण मा मुर्या डळण कि ... ?
जवैं -कुछ नि बणावो।  मि अपण गां जाणु छौं बस !
सासु -कै रस्ता जैल्या ? सैणु रस्ता , जंगळ या धारो रस्ता ?
जवैं -मि कै बि रस्ता चलि जौल बस मि इख से भैर जाण चाणु छौं।
सासु -अच्छा सूणो इ जवैं ! तुमर ससुर जी तुमर ड्यार सुखी छन ? द्वी साल ह्वे गेन लड़की ड्यार पड़्या छन। 
जवैं -हाँ सुखी छन !
सासु -क्वी बेटिक इख सुखी बि रै सकुद ?
जवैं -मि अब इखम नि रै सकणु छौं।  मि  भागणु छौं
सासु -तुम कन भागिक जैल्या ? जन बाघ गौड़ि  पैथर भागद या जन गौड़ि बाघ से बचणो बान भागदि  ?
जवैं -जन एक जवैं विकल्पमुखी सासु से जान छुड़ै भागदु।
सासु - ए जवैं !  तुम त इन भागी गेवां जन बुल्यां चिमल्ठुं पेथण फुचि गे हों धौं।  जांद जांद इन बतैक जावो कि विकल्पमुखी सासु आकार  मा कान होंदी -लम्बी कि नाटि या मध्यम उंचाई की ?


Copyright@ Bhishma Kukreti  17 /9/2013



[गढ़वाली हास्य -व्यंग्य, सौज सौज मा मजाक मसखरी  दृष्टि से, हौंस,चबोड़,चखन्यौ, सौज सौज मा गंभीर चर्चा ,छ्वीं;- जसपुर निवासी  के  जाती असहिष्णुता सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ढांगू वाले के  पृथक वादी  मानसिकता सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;गंगासलाण  वाले के  भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; लैंसडाउन तहसील वाले के  धर्म सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;पौड़ी गढ़वाल वाले के वर्ग संघर्ष सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; उत्तराखंडी  के पर्यावरण संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;मध्य हिमालयी लेखक के विकास संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;उत्तरभारतीय लेखक के पलायन सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; मुंबई प्रवासी लेखक के सांस्कृतिक विषयों पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; महाराष्ट्रीय प्रवासी लेखक का सरकारी प्रशासन संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; भारतीय लेखक के राजनीति विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; सांस्कृतिक मुल्य ह्रास पर व्यंग्य , गरीबी समस्या पर व्यंग्य, आम आदमी की परेशानी विषय के व्यंग्य, जातीय  भेदभाव विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; एशियाई लेखक द्वारा सामाजिक  बिडम्बनाओं, पर्यावरण विषयों   पर  गढ़वाली हास्य व्यंग्य श्रृंखला जारी ...] 

Bhishma Kukreti

उत्तराखंड   में चना दाल  इतिहास

                                    दालों /दलहन का उत्तराखंड के परिपेक्ष  में इतिहास -भाग -1
                               History of Pulses Agriculture and food in Uttarakhand Part-1
                                      History Aspects of Chickpea in Uttarakhand
                                         उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास --12

                                        History of Gastronomy in Uttarakhand 12


                                      आलेख :  भीष्म कुकरेती


                        उत्तराखंड के परिपेक्ष  में चना दाल का भारत में इतिहास

           चना सात हजार साल पहले खाद्य उपयोग में आ  और भारत में मनुष्य छ हजार साल पहले चना प्रयोग करने लगे थे
   सुदर्शन शर्मा व नेने वेदों में व वेद भाष्यों में 'खलवा ' शब्द  को दाल  मानते हैं।  जिससे अंदाज लगाया जा सकता है कि मनुष्य 'दाल प्रयोग ' प्रागैतिहासिक काल से करता आ रहा है।
कौटिल्य (321 -296 BC ) ने 'कलय' शब्दों का प्रयोग किया है जो शायद चना दाल था क्योंकि कौटिल्य ने लिखा है कि 'कलय' भुनकर और  कई तरह से प्रयोग किया जाता है.कर्नाटक में चने को 'काडेल' और केरल में चना दल को 'काडाला ' कहा जता है।
बौद्ध साहित्य (400 BC ) में चना दाल को चणक कहा गया और सारे भारत में  चना शब्द प्रचलित हुआ।  केवल मराठी में चना को हराभरा कहा जाता है।  प्राचीन संस्कृत में चना को 'हरिमंथ' (हरि =घोड़ा , मन्थ =चबाना ) कहा गया है। वात्सायन के काम  सूत्र , चरक संहिता , मार्केंडेय पुराण , मत्स्य पुराण अदि में चना का विवरण मिलता है।
प्रागऐतिहासिक खुदाई में कालीबांगन (राजस्थान 3000 -2000 BC ) , बिहार (2000 -1200 BC ) , महाराष्ट्र (2000 -800 BC ) , पंजाब (2300 -1400 BC )और अंतरराजिखेड़ा  गंगा दोआब उत्तरप्रदेश (2000 BC ) चना के अवशेष मिले हैं। इससे पता लगता है कि चार हजार साल पहले उत्तराखंड के निवासियों को  अवश्य ही चना दाल का पता था.
                    चना की खेती (इतिहास )

कौटिल्य ने लिखा है कि दाल को दो तीन दिन पानी में भिगोकर बोना चाहिये।
कश्यप्याकृषिसूक्ति (800 AD ) में कहा गया है कि चना बिना सिंचाई के बोया जाता है। कश्यप ने कहा है कि चना की दो किस्मे -छोटा बीज और बड़ा बीज होता है। कश्यप बताते हैं कि एक महीने बाद निराई -गुड़ाई होनी चाहिए। इसी समय खाद भी डाली जानी चाहिए।
बारहवीं -तेरहवीं सदी में चना बीज को मनतता  पानी में 24 घंटे के लिए बोने पहले भिगोया जाता था। इसी समय फसल चक्र का भी प्रयोग का रिकॉर्ड मिलता है।
दारा सिकोह (1650 AD )बड़े चना बोता था.
काबुली चना का प्रथम बार रिकॉर्ड 'आईने अकबरी ,1590 ) में मिलता है।
                                 उत्तराखंड में चने की खेती

चूँकि चना की उत्पादक शीलता पहाड़ों में कम है तो चना सर्वदा मैदानों -तराई -भाबर में ही बोया जाता रहा है। या कह सकते हैं कि चना का इतिहास उत्तराखंड के मैदानी हिस्से का इतिहास है और बिजनोर, हरिद्वार , देहरादून , सहारनपुर में चने की खेती का इतिहास ही उत्तराखंड में चना का इतिहास माना जाना चाहिए ।
प्राचीन समय में चना घोड़ो और हाथियों को भी खिलाया जाता था और आज  भी यही स्थिति कायम है

                              कृषि उत्पादन शीलता

अशोक काल के पश्चात् भारत में अन्वेषण पर लगाम लग गयी थी।  राजनैतिक अस्थिरता और जमीन पर हक को कोई विशेष नीति न होने से किसानो ने कृषि उत्पादनशीलता बढ़ाने का कम अशोक कल के बाद नहीं किया. यहाँ तक कि नहर आदि लाने में भी कृषक अधिक उद्यम नही करते थे। 
               अकबर के जमाने में चना का भाव
         आईने अकबरी (1590 AD ) में लिखा है कि काबुली चना देसी चना से दो गुना भाव में मिलता था। कबुली चना गेंहू से तेतीस प्रतिशत मंहगा था। चने का आटा और गेंहू आटा का भाव एक समान था।
                 चना के  भोज्य पदार्थ

    चरक संहिता और सुश्रवा संहिता व अन्य साहित्य से पता चलता है कि चना उबालकर , सत्तू , चने का आटा बनाकर , भूनकर , घोल बनाकर खाया जाता था. प्राचीन कल में पत्तों का प्रयोग साग के रूप में होता था और आज भी ।  भूने  चने पर्यटन में और युद्ध में सिपाहियों का एक  महत्वपूर्ण भोज्य पदार्थ था.     


                  आयुर्वेद में चना का चिकित्सा लाभ

चने की पत्तियों से अम्ल निकल कर आयुर्वेदिक दवाइयां बनती थीं (बाग़ भट्ट 800 AD ).
                 भंडारीकरण

सुलतान काल (1206 -1555 AD ) में बर्तन या अन्य भंडार में चना , हाथी की हड्डी व अनार के पत्तों के साथ चना भंडारीकृत किया जाता था. संस्कृत व प्राचीन साहित्य में राख -तेल के साथ भंडारीकरण का जिक्र नही है।  भारत में राख -तेल का प्रयोग चौदहवीं सदी में प्रचलित था जो रोमन संस्कृति की देन है।


Reference-

Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts
Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
B.K G Rao, Development of Technologies During the  Iron Age in South India
V.D Mishra , 2006, Prelude Agriculture in North-Central India (Pragdhara ank 18)
Anup Mishra , Agriculture in Chalolithic Age in North-Central India
Mahabharata
All Vedas
Inquiry into the conditions of lower classes of population
Lallan Ji Gopal (Editor), 2008,  History of Agriculture in India -1200AD
K.K Nautiyal History of Agriculture in Garhwal , an article in History of Agriculture in India -1200AD
Steven A .Webber and Dorien Q. Fuller,  2006, Millets and Their Role in Early Agriculture. paper Presented in 'First Farmers in Global Prospective' , Lucknow 
Joshi A.B.1961, Sesamum, Indian central Oil Seeds Committee , Hyderabad
Drothea Bradigian, 2004, History and Lore of Sesame , Economic Botany vol. 58 Part-3
Chitranjan  Kole , 2007  ,  Oilseeds

Gopinath Mohanty et all, 2007, Tappasu Bhallika of Orissa : Their Historicity and Nativity
Y .L .Nene ,2006, Indian Pulses Through Millenia, Asian Agri-History, Vol.10,No.3 (179-200)

Copyright @ Bhishma  Kukreti  15 /9/2013

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Bhishma Kukreti

Katyuri were most Popular Indian Medieval, Himalayan Medieval, and Kumaoni Middle Age Kings
                                Or    
Popularity of Katyuri Kings in Indian Medieval, Himalayan Medieval, and Kumaoni Middle Age Period

   (History of Kumaon from 1000-1790)

History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon, Haridwar) - Part 145


                                              By: Bhishma Kukreti

                                      War with Tillu Rauteli
  The Garhwali folklore state that the heirs of Veerdev Katyuri of Bhikiyasain, or Pali Pachaun used to flanked and loot in eastern Garhwal. The Gdhpati of est Garhwal also used to lot in western Kumaon. Bindua Kaintura attacked or flanked on Chandkot. Two brothers –Bhagat and Partwa of Gurad village of Chaundkot fought with bravery with Vidva Kaintura. Vidua Kaintura had to flee. There were forty two (42) injuries on bodies of Bhagt and Partwa. The chieftains of Chandkot rewarded forty two villages to brave Bhagat and Partwa.
  Tillu Rauteli killed Vidua Kaintura in Takoli at Kanda festival time. There were battles between Kainturas (Katyuri chieftains) and Tillu Rauteli the daughter of Garhwal region. The battles took place in Sarainkhet and Khairagarh. Jeetu Kaintura was killed. Deceptively, Tillu Rauteli and her aid Shiv Pokhariyal were killed by Kainturas. Such battles were common in those times.


Popularity of Katyuri Kings in Indian Medieval, Himalayan Medieval, and Kumaoni Middle Age Period
  The Katyuri kings of Kumaoni (Himalayan, Indian) middle age were very popular. 
                    In fourteenth century, different Katyuri families were ruling independently in Doti (today's Nepal), Askot ,Pali  Pachaun and in different smaller regions. The folklores describe the Katyuri Thakurai (rule of chieftains) of Bairat, Lakhanpur, Ranchulihat, and Khimsarihat. There are tens of folklores available tilld ate in Doti-Nepal, Kumaon and Garhwal. Many Rajput families perform Ghadyal religious rituals of Kaintura (Katyur) in all the regions of old Uttarakhand. Dhamdev is family deity of many castes. Mostly, the folklores show Katyuri-Chand battles and in all the stories Katyuri king or chieftain wins.
  The folklores describe Katyuri kings as wealthy, industrious, prosperous, brave and unwinnable kings or chieftains. However, the same folklores describe Chand kings as cruel, angry, transgressing, improper conduct kings and cowered who run away from battles.
           The post Kartikeyapur Katyuri kings were having less resource but were people oriented and used to shelter to scholars, Brahmins, brave, craftsmen, and army men. Due to providing shelters to army men of different regions, Katyuri got set back as those army men establish their own rules too.

            The Katyuri kings and their elites built many temples, Dharmashala, or repair them. The Katyuri kings facilitated basic facilities to religious tourists of Uttarakhand.  Though, there was uncertainty in plains from Muslim kings and invaders and there was fear from Tibetan army or looters, the pilgrims used to visit Uttarakhand in mass because safety I Uttarakhand.  Piligrims used to visit Uttarakhand from Nepal, Himachal Pradesh, Pilibhit (Ruhelkhand, ) , Bijnor, Haridwar and Saharanpur.
         The post Kartikeyapur (Joshimath) Katyuri kings built famous temples as Baijnath, Dwarhat, Bageshwar, Jageshwar, Kattarmall, Rameshwar etc.
              The sculptures of Shiv, Lakshmi, devi, Vishnu, Durga, Garud, hanuman, Surya, Ganga Jamuna, show that the Katyuri kings were secular. The Buddhists and Jain were also safe in Katyuri kingdom. The Buddhists and Jain built their worshipping temples in Uttarakhand in Katyuri rule without any resistance.
Purushottam Singh was Buddhist and he built Gandhkuti in Bodhagya.
            Shiv worshipping among people was more common than other deity worshipping. Nath sect was also common in this period (1000-1490). Satynath sect of Nathapanth helped Panwar kingdom in Garhwal and Chand Kings in Kumaon.
  The Katyuri kings were tolerant to various religious faiths.
Many Kumaoni, Garhwali and Nepali families have their family deities of brave soldiers of Katyuri kings.
            The Katyuri kings were the popular most kings in the history of western Nepal (Doti), Kumaon, Garhwal and Haridwar.
Copyright@ Bhishma Kukreti -bckukreti@gmail.com 17/9/2013
References-
Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas Bhag 10, Kumaon ka Itihas 1000-1790
Badri Datt Pande, 1937, Kumaon ka Itihas, Shri Almora Book Depo Almora
Devidas Kaysth, Itihas Kumaon Pradesh
Katyur ka Itihas, Pundit Ram Datt Tiwari
Oakley and Gairola, Himalayan Folklore
Atkinson, History of District Gazette
Menhadi Husain, Tuglak Dynasty
Malfujat- E Timuri
Tarikh -e-Mubarakshahi
Kumar Suresh Singh2005, People of India
Justin Marozzi, 2006, Tamerlane: Sword of Islam
Bakshsingh Nijar, 1968, Punjab under Sultans 1000-1526 
The Imperial Gazetteer of India, Volume 13 page 52 
Bhakt Darshan, Gadhwal ki Divangit Vibhutiyan

(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)
   
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand, India) to be continued... Part -146
History of Kumaon (1000-1790) to be continued....
Middle Himalayan, Indian Medieval Age History of Karvipur Katyuri to be continued...
  (Middle Himalayan, Indian Medieval Age History (740-1790 AD to be continued...)
Xx                       xxx
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Bhishma Kukreti

  उत्तराखंड परिपेक्ष में तोर/तुअर/अरहर दाल का इतिहास

                           History Aspects of Pigeonpea (Cajanus cajan) Agriculture and Food in context Uttarakhand

                           
                                      दालों /दलहन का उत्तराखंड के परिपेक्ष  में इतिहास -भाग -2
                               History of Pulses Agriculture and food in Uttarakhand Part-2
                         

                                         उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास --13

                                        History of Gastronomy in Uttarakhand 13


                                      आलेख :  भीष्म कुकरेती

उत्तराखंड में पहाड़ों में पहाड़ी तोर /तुअर महत्वपूर्ण दाल है और उसी भांति भाभर , मैदानी उत्तराखंड में अरहर /तुअर का महत्व है।  पहड़ी तोर के दाने  छोटे होते हैं तो मैदानी तुअर के दाने बड़े होते हैं।  जहां तक दाल का प्रश्न है पहड़ी तुअर साबूत दाल भी खायी जाती है तो मैदानी तुअर को दलकर दाल बनाई जाती है।  दली दाल को सामन्य भाषा में पीली दाल भी कहते है।   पहाड़ों में तोर के कई व्यंजन बनते हैं जैसे -साबुत दाल , दळी दाळ , सूखे दानो को पीसकर बनी दाल, उबाले दानो को पीसकर बनी तरीदार तुराणि , उबाली तुअर के खाजा -बुखाणा (चबेना ), भरवीं रोटी व पूरी आदि ।
       उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति इस प्रकार है कि यहाँ भूस्खलन और बाढ़ों से बहाव एक आम घटना है अत;प्रागऐतिहासिक वस्तुएं कम ही मिली हैं।  अत: कृषि व खाद्य इतिहास के लिए हमे समकालीन मैदानी हिस्सों व भारत के इतिहास पर निर्भर करना पड़ता है । कौटिल्य के अर्थ शास्त्र में 'अधाकि ' शब्द नही मिलता किन्तु 'उदाड़ ' शब्द मिलता है।  उदार का अर्थ होता है लंबी फली और दाड़ /दार  का अर्थ होता है अलग करना।
तुअर दाल का जन्मस्थल पहले अफ्रिका माना जाता रहा है।  किन्तु अब यह सर्वमान्य है कि तुअर का जन्मस्थल पूर्वी भारत (ओडीशा ) है।  उत्तर पाषाण  कालीन अवशेषों के साथ ओडिशा में तुअर बीज (3400 -3000 BC ) मिले हैं (फुलर व हार्वे )।  इसके अतिरिक्त उत्तर पाषण  युग के   कर्नाटक व तुलजापुर गढ़ी  )1000 BC ) में भी तुअर के अवशेष मिले हैं।                   
             
             
                                संस्कृत में तुअर /तोर दाल का पुराना सन्दर्भ

चरक संहिता (300  BC ) और सुश्रुता संहिता (600 BC ) में एक शब्द है 'अधाकि ' जिसे कृषि इतिहासकार तुअर दाल कहते हैं।  अधाकि शब्द का सन्दर्भ बौद्ध एवं जैन साहित्य (200 BC -300 AD ) में भी मिलता है.

कांगले (1982 ) का कहना है कि कौटल्य ने तुअर के लिए उदारका /उदाड़का  शब्द प्रयोग किया है।
गढ़वाली में उदाड़ना का अर्थ  होता है दोनों को अलग करना।  यदि उदाड़ शब्द पाली का है तो यह शब्द नन्द कालीन या अशोक कालीन शब्द गढ़वाल में आया होगा. उस समय मकई और राजमा भारत में नही उगाई जाते थे तो उदाड़ क्रिया दालों के लिए ही उपयुक्त होती रही होंगी। फिर उड़द , मूंग को उदाड़ा नही जाता है , अपितु थींच कर /पीटकर दाने  अलग किये जाते हैं तो उदाड़ शब्द तोर दानों को   फली से अलग करने के लिए उत्तराखंड में प्रयोग होता रहा होगा।

झा (1999 ) का मानना  है कि अमरसिंह ने अमरकोश (200 BC ) में जिस शब्द अधाकि , काक्षी , और तुवरिका का प्रयोग किया है वे तुअर दाल के लिए प्रयोग हुए है।
संस्कृत में अधाकि शायद अर्ध शब्द से आया है जिसका अर्थ होता है आधा या आधे में अलग करना । मैदानों में साबुत तुअर दाल प्रयोग नही होती है अत अधाकि शब्द का का भ्रस्टीकरण हो कर अरहर हो गया हो गया होगा।
   तुअर शब्द भी अरहर दल के लिए प्रयुक्त एक सामन्य शब्द है।
संस्कृत में तुअर: और तुबर: का अर्थ होता है -कडुआ , कुछ कुछ रूखा, कसैला । कच्चे  तुअर दानो  का स्वाद भी कुछ रुखा होता है। अत  हैं कि तुबर शब्द से तुअर शब्द बना .
उत्तराखंड को छोड़ तुअर दाल को उत्तर भारत में अरहर के नाम से पुकारा जाता है।  महारास्ट्र , गुजरात व दक्षिण में इसे तुअर पुकारा जाता है।  उत्तराखंड में तोर के नाम से पुकारा  जाता   है। तमिल संगम साहित्य (100 BC -300 AD  ) में तुअर शब्द इस्तेमाल नही हुआ है।  जिसका अर्थ लगाया जाता है कि तमिलनाडु में तुअर दाल चौथी सदी के बाद ही प्रचलन में आई होगी. अकबर चूँकि पंजाबी शैली का भोजन प्रिय था तो आइने -अकबरी में तुअर दाल का जिक्र नही है।

उत्तराखंड में तुअर कब आई पर डा डबराल ने प्राचीन इतिहास की पुस्तकों में नही लिखा है। पहाड़ों में तुअर छोटे डेन वाली पैदा होती है।  अत  तुअर का आगमन या तो ओडिशा से या कर्नाटक से हुआ होगा. इसका अर्थ है कि तुअर यदि बौद्ध काल (नन्द , मौर्य ,अशोक ) के समय आया है तो ओड़िसा से आया होगा। कर्नाटक से तुअर दाल आने के सिद्धांत मानने में कठिनाई यह है कि कर्नाटक के साथ उत्तराखंड के साथ सीधा राजनैतिक संबंध नही रहा है।  जब कि उड़ीसा के साथ कनौज , पाल वंशजों के कारण संबंध रहा है।  कर्नाटक से तुअर आया है तो जब कोई व्यक्ति पर्यटन या बसने के लिए उत्तराखंड आया होगा तो वह अपने साथ तुअर भी लाया होगा और फिर धेरे धीरे तुअर के खेती शुरू हुयी होगी।  या उत्तरी भारत से तुअर का उत्तराखंड में आगमन हुआ और जलवायुकरण हुआ होगा तो बड़े तुअर के दाने छोटे होते गए होंगे।
             
                          कृषि इतिहास

  कौटिल्य ने तुअर या उदार /उदाड़ के बारे में लिखा है कि तुअर की वर्षाकाल के अंत   में होनी चाहिए। कश्यप (800 BC ) ने बड़े -छोटे दोनों आकार के तुअर का जिक्र किया है और बड़े दानो को पंक्ति में बोने की क्रिया समझाई है। कश्यप ने कहा है कि  यह तीन महीने की खेती वाली वनष्पति है।
राजा केलाड़ी बसवराजा के सिवतत्वरत्नाकर  (17 th सदी ) मे काली तुअर का सन्दर्भ मिलता है।
बुचनान (1807 ) ने दक्षिण भारत में तुअर खेती का ब्यौरा दिया है।
वाट (1889 ) ने मध्य भारत , महाराष्ट्र , ऊतरप्रदेश में तुअर खेती पर विस्तार से लिखा है। तुअर पर टिड्डी प्रकोप व किस तरह किसान टिड्डियों से फसल बचाते हैं विषय पर भी लिखा है।
वाट ने उत्तर प्रदेश में तुअर दाल की पैदावार 100 Kg -1480 Kg प्रति हेक्टेयर या औसतन  645 Kg /हेक्टेयर रिकॉर्ड किया है।

प्राचीन काल से ही भंडारीकरण के लिए राख , स्थानीय पत्तों व वर्तनो के अन्दर चारों  तरफ तेल लगाना रहा है।
                  उपयोग

तुअर से दो तीन प्रकार की दालें , भरवां रोटियां /पुरियां प्राचीन कल में भी प्रचलित थीं चबेना के रूप में तुअर को उबाला जाता था।  चरक ने लिखा है की तुअर से रक्त स्वच्छ होता है।





                                     References -

Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts
Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
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V.D Mishra , 2006, Prelude Agriculture in North-Central India (Pragdhara ank 18)
Anup Mishra , Agriculture in Chalolithic Age in North-Central India
Mahabharata
All Vedas
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Lallan Ji Gopal (Editor), 2008,  History of Agriculture in India -1200AD
K.K Nautiyal History of Agriculture in Garhwal , an article in History of Agriculture in India -1200AD
Steven A .Webber and Dorien Q. Fuller,  2006, Millets and Their Role in Early Agriculture. paper Presented in 'First Farmers in Global Prospective' , Lucknow 
Joshi A.B.1961, Sesamum, Indian central Oil Seeds Committee , Hyderabad
Drothea Bradigian, 2004, History and Lore of Sesame , Economic Botany vol. 58 Part-3
Chitranjan  Kole , 2007  ,  Oilseeds
P.S.Mehta, K.S.Negi, S.N. Ojha,2010,Nativa Plant genetic resources and traditional food of Uttarakhand Himalaya ...Indian Journal Of Natural Products and Resources, Vol 1(1) March 2010 page 89-96
K.S.Negi and R.D Gaur, 1994 Principal Wild Food Plants of Western Himalaya , Indian Forester
Gopinath Mohanty et all, 2007, Tappasu Bhallika of Orissa : Their Historicity and Nativity
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K.T. Achaya, 1998, A Historical Dictionary of Indian Food


Copyright @ Bhishma  Kukreti  15 /9/2013

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( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )
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Bhishma Kukreti

                         इन Like से भलो त 'Shit ! समझ में नहीं आया' ही ठीक च

                                  Like से Confuse -भीष्म कुकरेती


  जब बिटेन मि फेसबुक कु चौंतरा मा छ्वीं लगाणो तब बिटेन मि ए 'Like' से बड़ो परेशान छौं।  बिंगण इ मा नि आंद कि Like पर भरवस कौरुं कि नि कौरुं। जु मि Like पर भरवस करदो त म्यार पोस्टिंगुं तैं इथगा Like मिलण पर त मि तैं अब तलक गढवाली भाषा विकासौ बान  उत्तराखंड श्री अर पद्म श्री मील जाण चयाणों छौ।  अर Like पर भरवस नि करदो त फिर सवाल उठदो कि ड्यार बिटेन मेरि गंवाक बौ क  फोन किलै आण  कि हे भीषम ! फेसबुक मा त्यार चाण वाळ अडतालीस हजार एक सौ नौ ह्वे गेन। अर फिर बौन पूछ , "सूण तू त मेरि सौं घटणु छौ कि "हे बौ त्यार अलावा मि तैं क्वी Like नि करदो ". इथगा झूट बुल्दी हैं तू ?" अर जलन- इर्ष्या मा अब बौ म्यार फोन इ नि उठांदि।
Like की सत्यता परखणो बान मीन खोज खबर ल्याई त कुछ नया नया अनुबह्व ह्वेन।
जख तलक Like करण वाळु  प्रकार कु सवाल च अबि तलक मि तैं इथगा तरां 'लाइकेर' (Like करण वाळ ) मिलेन -

निदिवा लाइकेर  - यूं  फेसबुक सदस्योंन  जिन्दगी मा अपण बुबा अर नौनु तैं तक आज तक Like नि कार।  यी कंजूस किस्मौ होंदन जु अपण दांतों लू (मैल ) बि कै तै नि द्वावन त Like क्या द्यावन !
ठसठस लाइकेर- इन लाइकेर फेसबुक मा Like तैं अमृत माणदन अर बड़ी मुश्किल से कै तैं Like करदन।
मूडी लाइकेर - इन सदस्य जब मूड आंद त जु बि पोस्टिंग दिखदन दे दनादन Like बटन दबै दींदन।  वै दिन Like का भूखा सदस्य घमंड मा ऑफलाइन मा तूफ़ान मचै दींदन।
गुटबाजी का  ग्रुप लाइकेर - फेस बुक मा बि औफ़लाइनौ तरां गुटबाजी चलदी अर अपण गुटों सदस्यों बेकार से बेकार ,फंडधुळि छुयुं तैं बि Like करणा रौंदन। अर दुसर गुट की भली ले पोस्टिंग पौढिक  बि Like नि करदन।
राजनैतिक लाइकेर - अचकाल ट्वीटर , फेस बुक मा राजनैतिक पार्युं लाइकेरूं पिपड़कारो लग्युं रौंद।  अचकाल इन नि दिखे जांद कि ये राजनैतिक नेता तैं कथगा वोट मिलेन अर यु चुनाव जीत च कि ना।  पण अचकाल प्रसिद्धि को माप तोल, मेजरमेंट   सोसल मीडिया मा Like की संख्या से हूंद।  एक जिला परिषद सदस्य फेसबुक का अपण Like संख्या से इथगा प्रेरित ह्वे कि वो विधान सभा चुनाव मा खड़ो ह्वे ग्यायि अर जब चुनाव रिजल्ट आई तो बिचारा की जमानत ही ज्फ्त ह्वे ग्यायी।  बाद मा पता चौल कि वैको विधान सभा क्षेत्र का असली वोटरों मादे  कैमा बि इंटरनेट सुविधा नि छे।  सि द्याखदी नरेंद्र मोदी चुनाव जीतो या नि जीतो फेसबुक -ट्वीटर मा Like संख्या हिसाबन अबि से भारत का प्रधान मंत्री बणी गे।
पेड लाइकेर - इ राजनैतिक अर उद्योग पतियों चालाकी या मार्केटिंग रणनीति च।  कुछ इन्टरनेट मार्केटिंग कंपन्युं ब्यापार इ या च कि फेस बुक -ट्वीटर अर ब्लौग का वास्ता Like संख्या बढ़ाण।  इन ब्यापारी साइटों तैं प्रति Like का हिसाब से फीस मिलदी। 
अळगसि याने कबि -कब्यारो लाइकेर - यि Like की अहमियत का बारा मा संवेदनशील नि छन बस कबि कब्यार कै पोस्ट तै Like कर  दींदन . वस्तुत: यी आदतन अळगसि होंदन अर Like करण मा बि सोचदन कि कु माउस पर हाथ लगाओं !
संटर्वा -बंटर्वा का लाइकेर - या कौम जादातर लेखक अर अभिव्यक्ति का अति भूखा किस्मौ लोगुंक च।  यी बार्टर सिधांत का मुताबिक़ वूंकी पोस्ट Like करदन जो यूंकि पोस्ट Like करदन।  यूंक सिधांत च एक हाथ दे दूसरे  हाथ से ले। आप यूँ तैं द्वी दैं Like कारो त यि आप तैं द्वी दैं Like कारल।  हिसाब किताब का मामला मा यी डेबिट -क्रेडिट का बारा मा अति होशियार होंदन ।
अहसानमंद लाइकेर -  फेसबुक या सोसल मीडिया मा यूँ तैं यदि आपन कबि Like कौरि द्यायि त यि जिन्दगी भर तुम तै Like करणा रौंदन।
मुखमुल्यजा  लाइकेर - अब फेस बुक मा जाण -पछ्याणक वाळ बि हूँदन त वूंकि पोस्ट तैं Like करण ही पोड़द।
विश्लेषक लाइकेर -यी पोस्ट तैं पैल पढ़दा छन अर तबि Like करदन।  पण या कौम बहुत कम संख्या मा च।
अपण सिद्धांत पर अडिग लाइकेर - यी कै सिद्धांत जन पर्यावरण वादी , साम्यवादी हूंदन अर केवल अपण सिद्धांतौ पोस्ट तैं Like करदन।
उत्तराखंड समस्या प्रेमी लाइकेर - यी जादातर प्रवासी हूंदन अर यकीनन यूंन ड्यार नि बौड़ण पण हर समय चांदन कि उत्तराखंड की समस्याओं पर ही बात ह्वावो।  बस जनि उत्तराखंड के समस्या को शीर्षक पोस्ट ह्वावो ना कि यी Like का बटन दबै दींदन।
उत्तराखंड विकासवादी लाइकेर - यी चांदन कि फेसबुक मा केवल उत्तराखंड को विकास की बात ह्वावो।  बस उत्तराखंड विकास की पोस्ट तै ही  Like करदन।
सुदि  -मुदि का लाइकेर - यी बस आदतन लाइकेर छन।   जरा आप पोस्ट कारो कि 'मुंबई के श्री गीताराम भट्ट की देहरादून में मृत्यु ' त यी फटाक से Like कर दींदन।  आज ही बालकृष्ण भट्ट जीन समाचार दे बल -"मंत्री हड़क सिंह की पार्टी में गोली चली " त दसियों Like की प्रतिक्रिया ऐ।
           मि तैं अनुभव च कि मि इना गढ़वळि मा लेख पोस्ट करदो कि आधा सेकंड मा Like ह्वे जांद जबकि लेख की हेडिंग पढ़ण मा द्वी सेकंड लगदन।  सुदि -मुदि का लाइकेर सबसे जादा खतरनाक हूंदन किलै कि लेखक तै पता ही नि चलदो कि पाठक क्या विषय पसंद करणा छन।
पण एक बात बथाओ नि मामा होण से बढ़िया त काणु मामा ही भलो लगुद।  ऊनि हम गढ़वळि लिख्वारुं तै क्वी पुछण वाळ त छ ना तो सुदि -मुदि की Like बि मिल जावो त हमकुण यो ही काफी च। 

Copyright@ Bhishma Kukreti  18 /9/2013



[गढ़वाली हास्य -व्यंग्य, सौज सौज मा मजाक मसखरी  दृष्टि से, हौंस,चबोड़,चखन्यौ, सौज सौज मा गंभीर चर्चा ,छ्वीं;- जसपुर निवासी  के  जाती असहिष्णुता सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ढांगू वाले के  पृथक वादी  मानसिकता सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;गंगासलाण  वाले के  भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; लैंसडाउन तहसील वाले के  धर्म सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;पौड़ी गढ़वाल वाले के वर्ग संघर्ष सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; उत्तराखंडी  के पर्यावरण संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;मध्य हिमालयी लेखक के विकास संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;उत्तरभारतीय लेखक के पलायन सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; मुंबई प्रवासी लेखक के सांस्कृतिक विषयों पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; महाराष्ट्रीय प्रवासी लेखक का सरकारी प्रशासन संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; भारतीय लेखक के राजनीति विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; सांस्कृतिक मुल्य ह्रास पर व्यंग्य , गरीबी समस्या पर व्यंग्य, आम आदमी की परेशानी विषय के व्यंग्य, जातीय  भेदभाव विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; एशियाई लेखक द्वारा सामाजिक  बिडम्बनाओं, पर्यावरण विषयों   पर  गढ़वाली हास्य व्यंग्य श्रृंखला जारी ...]   

Bhishma Kukreti


                           उत्तराखंड के परिपेक्ष में मसूर दाल का इतिहास

                          History of Lentil ( Lens culinaris) in Uttarakhand context

                            दालों /दलहन का उत्तराखंड के परिपेक्ष  में इतिहास -भाग -3

                               History of Pulses Agriculture and food in Uttarakhand Part-3                         

                                         उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास --14

                                        History of Gastronomy in Uttarakhand 14


                                          आलेख :  भीष्म कुकरेती


  मसूर का जन्म स्थान मध्य एसिया व यूनान के दक्षिण को माना जाता है।  फ्रांचथी गुफा (दक्षिण यूनान ) में 10000 BC पहले के मसूर के अवशेस मिले हैं।
हडप्पा संस्कृति में  मसूर दाल के अवशेस मिले हैं किन्तु बाद की संस्कृति में नही ।   मसूर की खेती 7500 -8000 BC पहले गेंहू  की खेती के साथ शुरू हुई। गंगा दोआब में मसूर की खेती 2000 BC से शुरू हो चुकी थी।  महाराष्ट्र के2200 - 2000 बक्क पुरानी सावल्दा संस्कृति (दाइमाबाद , श्रीरामपुर , अहमदनगर ) के अवशेषों में मसूर दाल के अवशेष  मिले हैं।
                 
                        मसूर कृषिइतिहास
वेदों की टिप्पणी 'ब्रहदारणक्य' (5500 BC? ) में मसूर का वृत्तांत है , चरक संहिता (700 BC ) और सुश्रवा संहिता (400 BC ) में भी मसूर का वर्णन है. इसी तरह कौटिल्य (321 -296 BC ) ने भी मसूर का वर्णन किया है। 
कौटिल्य ने कृषि कैसी होती है का खाका भी दिया है और वैसे ही है जैसे अरहर या तुअर का है. ऐसा लगता है मसूर गेंहू के साथ साथ बोया जाता रहा है।
बाइबल में भी मसूर का उल्लेख कई बार मिला है. मसूर मांश का विकल्प माना गया है। 
सुलतान युग साहित्य (1200 -1555 AD ) में लिखा गया है कि मसूर को गाय के गोबर के साथ बोने से फसल अच्छी होती है (नेने ,1999 ). इसी समय के साहित्य में यह भी लिखा है कि मसूर के बीजों में चिड़ियाओं के बीट मिलाने से फसल अधिक होती है।

               मसूर का बाजार भाव

आइन -इ -अकबर (1590 ) में लिखा गया है कि मसूर का दाम गेंहू के बराबर है किन्तु मसूर की दाल का दाम गेंहू से एक तिहाई (33 %) अधिक है। वाट (1889 ) की सूचनानुसार सूखे खेतों में मसूर का उत्पादन 740 Kg प्रति हेक्टेयर और सिंचित भूमि में मसूर  उत्पादन 1100 प्रति हेक्टेयर था.

                    मसूर के उपयोग
दाल के अतिरिक्त आयुर्वेद में भी मसूर दाल का उपयोग होता था।  त्वचा के  घाव दाग मिटाने के लिए मसूर दाल का पेस्ट (मस्यट ) प्रयोग में लाया जाता था।   कई जातियां मसूर के लाल रंग के कारण मसूर उपयोग में नही लाते थे। 

                             
               उत्तराखंड में मसूर का महत्व

पहाड़ी भूभाग में मसूर को ग्राम दल के नाम से जाना जाता है।  और इसका प्रयोग कम ही होता है।  बहुत कम मात्रा में गेंहू के साथ मसूर बोई जाती है। यही कारण है कि डा डबराल ने जब उत्तराखंड इतिहास में जब भी दालों का जिक्र किया तब तब मूँद उड़द और दाल अदि लिखा है।

                    पाषाण  युग में मसूर
  कृषि आरम्भ अध्याय में उन्होंने जंगली खाद्य बीजों का नाम लिया है जिससे यह पता चलता है कि यह वनस्पति यहाँ उगती थी।  जिन्हें गढ़वाल -कुमाओं का ज्ञान है , उन्हें मालूम है कि मसूर जैसी एक जंगली वनस्पति बंजर खेतों व उसी तरह के जंगलों में मिलती है।  इससे अनुमान लग सकता है कि पत्थर युग में जंगली मूंग , उड़द के साथ जंगली मसूर भी उगती रही होगी। या हो सकता है कि मानव उत्तराखंड के पाषाण युग में मसूर भूनकर  खाता रहा हो।

                       धातु युग में सीढ़ी नुमा खेत और मसूर

धातु युग में कोल मुंड जाती ने कृषि को अपना लिया था अत: अनुमान किया जा सकता है कि मसूर को बोना या मसूर के साथ अविष्कार भी उत्तराखंड में हुए होंगे। यदि पहाड़ों में कोल -मुंड जाती ने मसूर का तिरस्कार किया भी  होगा तो भी तराई भाभर में किरात जाती ने मसूर को उगाया या जंगली मसूर को अवश्य अपनाया होगा.

                                 परवर्ती वैदिक काल
इस काल में वैदिक मानव ने पहाड़ों के दासों का नाश किया या उन्हें दास ब्नाया. वैदिक संस्कृति में मसूर का सन्दर्भ मिलता है अत: मसूर का उपयोग इस युग में भी होता होगा।
महाभारत में उत्तराखंड के वन सम्बन्धी वनस्पति का वर्णन अधिक है और खाद्य पदार्थ  को अन्न नाम दिया गया है.

आगे काल /समय के हिसाब से जब खाद्य अनाज /कृषि पर विवेचना होगी तो मसूर के बारे में भी विवेचना होती रहेगी। 


References -

Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts
Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
B.K G Rao, Development of Technologies During the  Iron Age in South India
V.D Mishra , 2006, Prelude Agriculture in North-Central India (Pragdhara ank 18)
Anup Mishra , Agriculture in Chalolithic Age in North-Central India
Mahabharata
All Vedas
Inquiry into the conditions of lower classes of population
Lallan Ji Gopal (Editor), 2008,  History of Agriculture in India -1200AD
K.K Nautiyal History of Agriculture in Garhwal , an article in History of Agriculture in India -1200AD
Steven A .Webber and Dorien Q. Fuller,  2006, Millets and Their Role in Early Agriculture. paper Presented in 'First Farmers in Global Prospective' , Lucknow 
Joshi A.B.1961, Sesamum, Indian central Oil Seeds Committee , Hyderabad
Drothea Bradigian, 2004, History and Lore of Sesame , Economic Botany vol. 58 Part-3
Chitranjan  Kole , 2007  ,  Oilseeds
P.S.Mehta, K.S.Negi, S.N. Ojha,2010,Nativa Plant genetic resources and traditional food of Uttarakhand Himalaya ...Indian Journal Of Natural Products and Resources, Vol 1(1) March 2010 page 89-96
K.S.Negi and R.D Gaur, 1994 Principal Wild Food Plants of Western Himalaya , Indian Forester
Gopinath Mohanty et all, 2007, Tappasu Bhallika of Orissa : Their Historicity and Nativity
Y .L .Nene ,2006, Indian Pulses Through Millenia, Asian Agri-History, Vol.10,No.3 (179-200)
K.T. Achaya, 1998, A Historical Dictionary of Indian Food
Michael Matern , A.A.Reddy   Commercial Cultivation and Profitability in  2007, Lentil: An ancient Crop for Modern Time (edited by Shyam S. Yadav et all)

Copyright @ Bhishma  Kukreti  15 /9/2013

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Bhishma Kukreti

                          पलायन रोका जाएगा  जन गम्भीर शब्दों , मुहावरों पर अब हौंस आंद

                                          चबोड़्या -चखन्यौर्या -भीष्म कुकरेती

कुछ शब्द , मुहावरा , वाक्य बड़ा गम्भीर छा अर मनमा पवित्र छवि बणाँदा था। अब यूँ शब्दों कीमत घटि गे , अब यूं शब्दुं से घीण लगद , अब इन शब्द सुणिs उकै -उल्टि हूण बिसे जांद , इन शब्दों नाम सूणिs मन खट्टो ह्वे जांद। 
एक जमानो  थौ जब देश का सरकारी दलौ  नेता अर मुख्य विरोधी दलौ  नेता कुछ ब्वालन धौं बल सरा भारत मा लोग चित्वळ ह्वे जांद था अर अब ? अब तआजौ नेता संयुक्त राष्ट्र संघ मा भारत तैं सबि राष्ट्रुं बुबा बि घोषित करि द्यावन त हम समजदवां यु नेता मजाक मा जोक्स सुणाणु होलु।  अब जब क्वी नेता मंदिर , मस्जिद जांद त हमर मनमा भक्ति भाव नि भर्यांद बल्कणम भगवान अर खुदा पर इ विश्वास ख़त्म ह्वे जांद।  अब नेता मन्दिर -मस्जिद पूजा वास्ता नि जांदन  पण पत्रकारों द्वारा अपण छवि मरोम्मत करणों बान जांद।
एक बगत थौ  जब क्वी नेता इफ्तार पार्टी दींद थौ त हम माणदा छा कि ये नेता की मनमा या धार्मिक  भावना च  ,"अल्लाहुमा इन्नि लका सुमतु वा अल्ला रिजकिका अफतारतु। याने हे अल्ला मीन यु  व्रत (रोजा ) त्यार बान धार अर त्यार आशीर्वाद से ही मि वर्त  तुड़णु छौं या तयार दियुं खाणक से वर्त ख़त्म करणु छौं " अर अब ? अब जनि समाचार आंद बल फलण नेता की आज इफ्तार पार्टी च त हमर दिमाग मा झट से विचार आंद बल यु नेता मुसलमानुं तैं शत प्रतिशत बेवकूफ बणाणो इफ्तार पार्टी दीणु च।  अर इन लगद कि इफ्तार पूजा मा यु नेता जरुर खुदा  से इन मंगणु होलु ,"हे खुदा यूँ मुसलमानुं तैं बेवकूफ बणा अर म्यार वोट बैंक बढ़ा । ". अब नेताओं की इफ्तार पार्टी राजनीतिक घोच -पेंच -डाव -पेंच 'को अश्त्र, नाटक , स्वांग ह्वे गे। इन मा नेताओं की इफ्तार पार्टी की गम्भीरता ही ख़त्म ह्वे।
एक शब्द च 'मुसलमानों का हितैसी।   जब बि क्वी नेता इन बुल्दु बल 'मि मुसलामानुं हितैषी छौं " त मि क्या सरा भारत समजद बल यु नेता मुसलमानुं तैं वोट देवी क मन्दिरौ  बान 'बली कु बुगठ्या' माणदु।
एक शब्द च 'सेक्युलर ' या  'धर्म निरपेक्ष ' । स्वतन्त्रता उपरान्त जथगा बेज्जती 'सेक्युलर ' या  'धर्म निरपेक्ष ' शब्द या सिद्धांत की ह्वाइ उथगा कै बि शब्द की नि ह्वाइ।  अब त अंगेजी शब्दकोश का संपादक , प्रकाशक  बि घंगतोळ ,  गलत फहमी मा छन कि सेक्युलर शब्द की परिभाषा क्या लिखे जावो। अंगेजी शब्दकोश का संपादकौ समज मा नि आंद कि इन्डियन मुस्लिम लीग एक सेक्युलर पोलिटिकल पार्टी माने जांद अर इन्डियन हिन्दू लीग नॉन सेक्युलर पार्टी माने जांद।  इंग्लिश इनसाइक्लोपीडिया का धुरंदर विद्वान् असमंजस्य मा बेहोश पड्या छन कि मायावती , नीतेश कुमार भौत सालुं तक भारतीय जनता पार्टी का बदौलत मुख्य मंत्री की कुर्सी कु  भगव्या डिसाण  मा फसोरिक पड्या  रैन अर तैबर तलक त भारतीय जनता पार्टी एक शसक्त सेक्युलर पार्टी छे अर जनि यी लोग भाजापा से अलग ह्वेन तनि भाजापा नॉन सेक्युलर पार्टी ह्वे जांद ? फारुख अब्दुला, ममता बनर्जी या करुणा  निधि का लोग जब तलक एन डी ए मा मंत्री रौंदन तब तलक भाजापा , शिव सेना, अकाली दल सेक्युलर पार्टी हूंदन  अर जनि फारुख अब्दुला, ममता बनर्जी या करुणा  निधि एन डी ए से भैर हॊन्दन तनि भाजापा , शिव सेना, अकाली दलनॉन सेक्युलर पार्टी ह्वे जांदन  ?
शब्द या वाक्य अब अर्थहीन  बि ह्वे गेन या बहुअर्थी ह्वे गेन।  राजनैतिक दलुं मा एक शब्द च या जुमला  च बल "हम सिद्धांतो की लड़ाई लड़  रहे हैं "। भारत वासी रौंका   धौंकि करणा छन कि कैकु सिद्धांत ? क्या च वू सिद्धांत ? वै  अणदिख्युं सिद्धांत कु उद्येश क्या च ? वु सिद्धांत कैकुण च ? कखम वु सिद्धांत लागू ह्वे ? अर जब क्वी राजनेता बयान दींदु बल "हम सिद्धांतो की लड़ाई लड़  रहे हैं " त जनता समजी जांद बल नेता जीs  बुलणो मतबल च बल "हम कुर्सी के छीना -झपटी की लड़ाई लड़  रहे हैं "।
अब शब्दों  या वाक्यों अर्थ ही बदल गेन।  जब बि राजनैतिक पार्टी क्वी पार्टी बुल्दि बल हम 'गरीबों के लिए नई योजना लेकर आये हैं। "। त बुद्धिजीवी अर आम जनता समजी जांद कि अब भ्रष्टाचारी जानवरों  हेतु नयो बुग्याळ कु बन्दोबस्त ह्वे ग्याइ अर जरुर निकट भविष्य मा अब नया चारा घोटाला , नया कॉमन वेल्थ गेम घोटाला , न्यू टू जी घोटाला , लेटेस्ट अभिनव, नयो कोयला घोटाला समिण आलु।
इनि उत्तराखंड मा बि कुछ शब्द अब हंसांद छन जन कि बुले जांद बल हम उत्तराखंड का विकास करला त हम सौब समजी जांदा अब तेजी से जल , जमीन अर जंगल भैर वाळु तै बिचे  जालु।
एक शब्द पैल पीड़ा दायक शब्द माने जांद छौ अब यु शब्द लाफिंग गैसौ काम करदो अर चुंकि लोग मंहगाई का मारा हौंस नि सकदी त राजनेता ये शब्द से जनता तै हंसादन।  यु शब्द च "उत्तराखंड से पलायन रोका जाएगा। "। जब बि क्वी उत्तराखंड को मंत्री या मुख्यमंत्री
सौं घटुद  "उत्तराखंड से पलायन रोका जाएगा। ". त सबि जाण जांदन बल ये मंत्रीन या मुख्यमंत्रीन दिल्ली , गोवा , इलाहाबाद , मौरिसिस मा  रिजॉर्ट/होटल  खुलणो योजना बणै याल अर पहाड्युं तै अपण रिजॉर्ट/होटलम बैरा , भंडमजा  रखणो तैयारी कौरि आल। 
आज इनि भौत सा शब्दुं  , मुहावरौं  , जुमलौंक  सही अर्थ हर्चि  गेन अर यी शब्द अब राजनैतिक हथियार बणि गेन पण खुंडा हथियार ह्वे गेन। अब इन जुमला जोक्स -मजाक बणि गेन। अब यी शब्द हंसांद जादा छन। 


Copyright@ Bhishma Kukreti  19 /9/2013



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