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Author Topic: Chholiya Dance - छोलिया नृत्य: युद्ध का प्रतीक नृत्य  (Read 18489 times)

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Offline पंकज सिंह महर

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Chholiya Dance - छोलिया नृत्य: युद्ध का प्रतीक नृत्य
« on: September 04, 2008, 09:22:37 PM »
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साथियो,
      आप सभी अवगत हैं को छोलिया नृत्य हमारे लोक नृत्यों में सबसे लोकाप्रिय नृत्य है। यह नृत्य युद्ध के प्रतीक के रुप में ही प्रयोग किया जाता है,  इस टोपिक के अन्तर्गत हम इसके संबंध में चर्चा करेंगे।





« Last Edit: March 23, 2011, 10:19:29 AM by हेम पन्त »
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आंखों के आगे वनश्री के खुलते पट न्यारे-२ हैं,
छोटे-छोटे खेत और आडू सेबों के बगीचे, देवदार वन,
जो नभ तक अपना छवि जाल पसारे हैं,
मुझको तो हिम से भरे अपने पहाड़ ही प्यारे हैं.

Offline पंकज सिंह महर

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Re: छोलिया नृत्य-युद्ध का प्रतीक नृत्य/ Cholia Dance
« Reply #1 on: September 04, 2008, 09:33:30 PM »
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छोलिया नृत्य मूल में युद्ध का नृत्य है, इस नृत्य का समाज में प्रचलन विद्वानों के अनुसार अनुमानतः १० वीं सदी के आस-पास का माना जाता है। यह नृत्य युद्धभूमि में लड़ रहे शूरवीरों की वीरता के मिश्रित छल का नृत्य है। छल से युद्ध भूमि में दुश्मन को कैसे परास्त किया जा सकता है, यही इस नृत्य का मुख्य लक्ष्य है। इसी कारण इसे छल नृत्य, छलिया नृत्य और हिन्दी में छोलिया नृत्य कहा जाता है।

       प्रश्न यह भी उठता है कि यह नृत्य युद्ध भूमि से समाज में कैसे आया? पूर्व काल में यह सर्वविदित ही है कि युद्ध वर्तमान के आयुधों की तरह नहीं, बल्कि आमने सामने दो राजाओं की सेना के बीच ढाल-तलवार, भाले, बरछे, कटार आदि से लड़े जाते थे। पूर्व में पर्वतीय क्षेत्र भी इस तरह के युद्धों से अछूता नहीं रहा। अगर हम अपनी विभिन्न प्रचलित तोक गाथाओं को देखें तो कहीं-कहीं पर मल्लों, पैकों के बीच मल्ल युद्ध भी होता था। जिस राजा के मल्ल जीत जाते, उसी राजा को जीता हुआ मान लिया जाता था। इस तरह के युद्ध मांडलिक राजाओं के बीच अपने राज्यों के विस्तार और अहंतुष्टि के लिये भी किये जाते थे।

   
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आंखों के आगे वनश्री के खुलते पट न्यारे-२ हैं,
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Offline हलिया

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Re: छोलिया नृत्य-युद्ध का प्रतीक नृत्य/ Cholia Dance
« Reply #2 on: September 04, 2008, 09:50:07 PM »
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बात ज्यादा पुरानी नहीं ठैरी कुछ ही दिन पहले तक यह होता था कि जब शादी की बात पक्की होती थी तो यह भी तय किया जाता था कि बारात में छलिया आयेंगे या नही.  छलिया वाली बारात को अधिक सम्मान जनक माना जाता था.  रस्ते में भी लोग बाग़ (खास कर स्त्रियाँ और बच्चे) अपना काम काज छोड़ कर बारात देखने आ जाने वाले ठैरे. कालांतर में "वन डे" बारात का प्रचलन शुरू हो गया जिसमें छलिया का स्थान "बेंड बाजे" ने ले लिया.

« Last Edit: April 06, 2011, 10:15:04 AM by हेम पन्त »
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हौसिया छन डाना पर्वत, हौसिया छन भरौ का भाड़ा,
मन में बसौ मेरो मुलुक, आँख में रिटौ 'म्यर पहाड़' ||

Offline पंकज सिंह महर

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Re: छोलिया नृत्य-युद्ध का प्रतीक नृत्य/ Cholia Dance
« Reply #3 on: September 04, 2008, 09:52:16 PM »
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मेरे विचार में इस युद्ध नृत्य का वर्तमान स्वरुप युद्ध भूमि से सर्वप्रथम सीधे राज महलों में प्रतीक युद्ध नृत्य (dumy battle dance)  के रुप में आया। अकसर जब कोई राजा युद्ध जीत लेता था तो कई दिनों तक राजमहल में विजय समारोह मनाया जाता था। वीरों को पुरुस्कृत करने के साथ ही उनके युद्ध-कौशल और ढाल-तलवार नचाने की निपुणता का महीनों तक बखान होता रहता था। यह बखान बहुत ही अतिशयोक्तिपूर्ण ढंग से किया जाता था और यह काम राज दरबार के चारण {भाट} किया करते थे। भाटों द्वारा युद्ध वर्णन सुनकर राज दरबार में श्रोताओं के रोंगटे खड़े हो जाते थे।
       कहा जाता है कि एक बार किसी विजयी राजा के दरबार में इस तरह के युद्ध वर्णन को सुनकर रानियां अभिभूत हो गईं और उन्होंने भी उस युद्ध में वीरों द्वारा दिखाई गई वीरता को प्रतीक रुप में अपनी आंखों के सामने देखना चाहा। तो राजा के आदेश पर उसके वीर सैनिकों ने स्वयं ही आपस में दो विरोधी दल बनाकर और युद्ध की भेष-भूसा पहनकर ढाल-तलवारों से युद्ध के मैदान की ही तरह प्रतीकात्मक युद्ध नृत्य करने लगे। ढोल-दमाऊं, नगाड़े, नरसिंगा आदि युद्ध के वाद्य बजने लगे और वीरों द्वारा युद्ध की सारी कलाओं का प्रदर्शन किया जाने लगा। उन्होंने इस विजय युद्ध में अपने दुश्मन को वीरता और छल से कैसे परास्त किया, इसका सजीव वर्णन उन्होने राज दरबार में किया।
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Re: छोलिया नृत्य-युद्ध का प्रतीक नृत्य/ Cholia Dance
« Reply #4 on: September 04, 2008, 10:10:59 PM »
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       राजमहल में प्रतीक रुप में किया गया यह युद्ध सभी रानियों , राजा और दरबारियों को बड़ा ही पसन्द आया। अतः समय-समय पर इस प्रतीक छलिया नृत्य का आयोजन राज दरबार में होने लगा। अति आकर्षक नृत्य, विविध ढंग से कलात्मक रुप से ढोल वादन, ढाल-तलवार द्वारा वीरों का युद्ध नृत्य समाज में अति लोकप्रिय हो गया। अपने अलौकिक आकर्षन के कारण यह नृत्य दसवीं सदी से आज तक निरंतर समाज में चलते आया है। समय के साथ-साथ इसके स्वरुप में भी थोड़ा परिवर्तन आ गया है।
      राज शाही खत्म होने के बाद यह आम लोगों में यह नृत्य के रुप में लोकप्रिय हुआ और उस समय के संस्कृति कर्मियों ने इस अमूल्य धरोहर को संजोने के लिये इसे विवाह एवं शुभ अवसरों पर किये जाने की अनिवार्यता बना दी। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि दसवीं सदी से निरंतर चला आ रहा हमारी समृद्ध संस्कृति का परिचायक लोक नृत्य आज व्यवसायिकता और आधुनिकता की अंधी दौड़ में कहीं खोता चला जा रहा है।
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Re: छोलिया नृत्य-युद्ध का प्रतीक नृत्य/ Cholia Dance
« Reply #5 on: September 04, 2008, 10:24:48 PM »
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छोलिया नृत्य में ढोल वादक और उसके नृत्य की भूमिका

       यह भी एक महत्वपूर्ण विषय है कि युद्ध भूमि में दरबारी दास द्वारा ढोल क्यों बजाया जाता था और उसके द्वारा युद्ध के दौरान ढोल नृत्य क्यों किया जाता था?
       इस विषय में लोक विद्वानों की राय है कि यह ढोल वादक मात्र वीरों के उत्साह वर्धन के लिये ढोल नहीं बजाता था, बल्कि वह युद्ध कला में भी प्रवीण होता था। वह युद्ध भूमि में अपने राजा की सेना की स्थिति पर पूरी दृष्टि रखता था, किसी समय उसकी सेना को आगे या पीछे बढ़ना है, किस दिशा में बढ़ना है, युद्ध जीतने के लिये अब सेना को कैसी व्यूह रचना करनी है, इसका उसे पूर्ण ग्यान होता था। महाभारत के "चक्रव्यूह" की ही तरह पर्वतीय क्षेत्रो में "गरुड़ व्यूह" "मयूर व्यूह" "सर्प व्यूह" की रचना की जाती थी। ढोल वादक इन व्यूह रचनाओं में पारंगत होता था, वह ढोल नृत्य करके संकेत में अपनी सेना को बताता था कि उसे अब युद्ध में किस प्रकार, क्या करना है, कैसे आगे बढ़ना है, कैसे पीछे हटना है, दुश्मन की सेना को कैसे घेरना है....यह सब वह सेना को अपने नृत्य और ढोल वादन के गुप्त संकेतों से बतलाता था।
     वर्तमान में भी छोलिया नृत्य के कई बाजे हैं, यथा-गंगोलिया बाजा, हिटुवा बाजा, बधाई का बाजा, दुल्हन के घर पर पहुंचने का बाजा, वापस गांव की सीमा पर बजने वाला बाजा आदि। इन अलग-अलग बाजों के अनुसार ही छोलिया, नृत्य करते हैं। अभी भी छोलिया नृत्य का कंट्रोल ढोल वादक के पास ही होता है, उसी की वाद्य धुनों के अनुसार यह नृत्य करते हैं।
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Offline हेम पन्त

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Re: छोलिया नृत्य-युद्ध का प्रतीक नृत्य/ Cholia Dance
« Reply #6 on: September 04, 2008, 10:28:31 PM »
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कुछ साल पहले तक छलिया नृत्य शादी-बारात का एक अभिन्न अंग होता था. छलिया दल के साथ डांस करने में बहुत मजा आता था.  छलिया दल का आकार उनकी संख्या के आधार पर निर्धारित होता है, अर्थात आप छलिया दल में ८-१० लोग चाहते हैं या १५-२०. दल में जितने ज्यादा लोग होंगे उतने ही ज्यादा नर्तक व वाद्ययन्त्र जुङेंगे.

छलिया दल केवल नृत्य ही नहीं करता. एक निश्चित समय के बाद विराम लेकर दल का एक सदस्य छपेली या चांचरी के बोल गाता है और गीत खतम होते ही पुनः द्रुतगति से ढोल-दमूं के वादन के साथ नृत्य शुरु होता है.

छलिया दल के साथ आम बाराती हाथों में रुमाल लेकर कलात्मक डांस करते हैं तो एक अद्भुत शमां बंध जाता है.
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मत जाओ पिया होलि आय रही...

Offline पंकज सिंह महर

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Re: छोलिया नृत्य-युद्ध का प्रतीक नृत्य/ Cholia Dance
« Reply #7 on: September 04, 2008, 10:42:05 PM »
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छोलिया नृत्य वीडियो की नजर से
http://www.youtube.com/watch?v=ms88yHG3Ecs

http://www.youtube.com/watch?v=1PGbqMInBnE

« Last Edit: September 05, 2008, 12:22:13 AM by धौंसिया.....! »
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Offline हेम पन्त

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Re: छोलिया नृत्य-युद्ध का प्रतीक नृत्य/ Cholia Dance
« Reply #8 on: September 04, 2008, 10:48:34 PM »
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यह कहना तो सही नहीं होगा कि छोलिया नृत्य के अस्तित्व को खतरा है, लेकिन शादी-बारातों में इसका प्रचलन अब लगभग समाप्त हो गया है. मैदानों से पहाङ के हर कोने में पहुंच चुके बैण्ड-बाजे वाले बहुत कम कीमत पर शादी में आने को तैयार हो जाते हैं. एक छलिया दल २ दिन की शादी के लगभग 8 हजार रुपये लेता है जबकि बैण्ड वाले सिर्फ 3 हजार रुपये में तैयार हो जाते हैं. मैने कई छलिया नर्तक व ढोल-दमूं बजाने वालों से बात की. उनका मानना है कि कम पैसा लेने पर इन लोगों का खर्चा चल नहीं पाता.

छलिया नर्तक अब मुख्य रूप से मंच प्रदर्शन से ही जीवन निर्वाह करते हैं. देश के हर कोने में यह लोग विभिन्न कार्यक्रमों में शिरकत करते हैं. पिथौरागढ में "छलिया महोत्सव" के नाम से एक वार्षिक आयोजन किया जाता है जिसमें उत्तराखण्ड के अलावा नेपाल से भी छलिया दल सर्वश्रेष्ट दल बनने के लिये प्रतिस्पर्धा करते हैं. यह आयोजन स्थानीय लोगों द्वारा उत्तराखण्ड सरकार के सहयोग से पिछले लगभग 10 सालों से किया जा रहा है.
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Re: छोलिया नृत्य-युद्ध का प्रतीक नृत्य/ Cholia Dance
« Reply #9 on: September 04, 2008, 11:30:00 PM »
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Keeping the old tradition alive, the Rajputs dance this at their weddings as a part of the marriage procession itself, led by the male dancers who go on dancing till they reach the bride's house. Performed by the Rajputs with sword and shield in pairs, the drummers are usually Harijans called Dholies, while the Turi and Ransing are played by Bairagis, Jogis or Gosains. The Turi and Ransing are typical Kumaon instruments. Perfectly synchronized, and marked with jumps and turns of the body, the dancers show several sword-fighting feats. Attired in the material costumes of ancient warriors, the flashing swords and shields, along with the war-like music, huge red flag with various animal symbols stuck on it conveys fear, joy, awe and wonder, through eyes, eyebrows and shoulders, creating at the same time, the impression of group advancing for an attack.
The costumes consist of a Churidar Pyjama, one long Chola, one cross belt, one belt round the waist, pattis on the legs and a turban. With' Chandan, or Sandalwood paste, and red vermillion they decorate their face, while on the ears are ear-rings, a bronze shield and real sword complete the ensemble. Specially trained, though dancing is not their profession, these Rajput dancers come from the Champawat and Almora. The full team consists of 22 person, eight of which are dancers
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Re: छोलिया नृत्य-युद्ध का प्रतीक नृत्य/ Cholia Dance
« Reply #10 on: September 04, 2008, 11:34:37 PM »
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Choliya Dance
 
Dating back to over a thousand years, the Chholiya Dance has its origins in the warring Khasiya Kingdom of Khasdesh, when marriages were performed at the point of the swords. They were united by the Chand kings who arrived' on the scene in the 10th century. In Nepal, the word Khasa is still asynonym for Kashatrya, and in Khasdesh, too, they took on the customs of the Rajputs, who were themselves honorary Kashatryas.

Keeping the old tradition alive, the Rajputs dance this at their weddings as a part of the marriage procession itself, led by the male dancers who go on dancing till they reach the bride's house. Performed by the Rajputs with sword and shield in pairs, the drummers are usually Harijans called Dholies, while the Turi and Ransing are played by Bairagis, Jogis or Gosains. The Turi and Ransing are typical Kumaon instruments. Perfectly synchronized, and marked with jumps and turns of the body, the dancers show several sword-fighting feats. Attired in the material costumes of ancient warriors, the flashing swords and shields, along with the war-like music, huge red flag with various animal symbols stuck on it conveys fear, joy, awe and wonder, through eyes, eyebrows and shoulders, creating at the same time, the impression of group advancing for an attack.

The costumes consist of a Churidar Pyjama, one long Chola, one cross belt, one belt round the waist, pattis on the legs and a turban. With' Chandan, or Sandalwood paste, and red vermillion they decorate their face, while on the ears are ear-rings, a bronze shield and real sword complete the ensemble. Specially trained, though dancing is not their profession, these Rajput dancers come from the Champawat and Almora. The full team consists of 22 person, eight of which are dancers, and 14 musicians. Cultivators all, they assemble when invited.
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Re: छोलिया नृत्य-युद्ध का प्रतीक नृत्य/ Cholia Dance
« Reply #11 on: September 04, 2008, 11:46:09 PM »
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सर, छोलिया निर्त्य और  सरंकार एक ही होता है क्या ?
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Re: छोलिया नृत्य-युद्ध का प्रतीक नृत्य/ Cholia Dance
« Reply #12 on: September 04, 2008, 11:59:50 PM »
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कुमाऊंनी संस्कृति में बदल गया छलिया नृत्य


पिथौरागढ़। कुमाऊंनी बारातों में ढ़ाल और तलवार के साथ सबसे आगे नाचते दो नृतक यहां राजाओं द्वारा युद्घ कर हरण कर सुन्दरियों को जीतने की परम्परा को दिखता है। 60 के दशक तक बारातों में ही नजर आने वाला छलिया नृत्य पहली बार 1963-1964 में मंच पर आया और धीरे-धीरे यह नृत्य कुमाऊं की संस्कृति के साथ जुड़ा।

छलिया नृत्य पहली बार 26 जनवरी को दिल्ली के ताल-कटोरा में मंच पर दिखाया गया इस नृत्य में प्रदर्शन करने के लिए पिथौरागढ़ के महरखोला से दो छलिया तथा रं संस्कृति के कुछ कलाकार संस्कृति कर्मी डूंगर सिंह ढ़करियाल के नेतृत्व में दिल्ली गये और यही वह समय था जब छलिया नृत्य कुमाऊं की विशिष्ट पहचान बन गया।

भीड़ भरी बारात में अपने पहनावे से ही पहचाने जाने वाले छलिया सर पर तुर्रेदार पगड़ी पहनते है, शरीर पर घुटनों तक लम्बा पूरी बांह का घेरेदार झगुला, कमर में फेंटा और चुड़ीदार पयजामा पहने हाथ में ढ़ाल और तलवार पकड़े छलिया मध्यकालीन भारत के योद्घा से लगते है। संस्कृत कर्मी पद्मा दत्त पंत कहते है कि छलिया नृत्य शुरू होने का कोई प्रमाण नहीं है लेकिन नगाड़ों की विविध धुनों तथा उन धुनों पर छलियाओं के नचाने के विभिन्न तरीकों से अनुमान लगाया जा सकता है कि यह कला कम से कम छह सौ वर्ष पुरानी तो होगी।

राजाओं द्वारा सुन्दरियों का हरण कर विवाह रचाने का भारत में इतिहास रहा है। भीष्म द्वारा कशिराज की कन्याओं तथा कृष्ण द्वारा रुक्मणी का हरण महाभारत की प्रसिद्घ कथायें है मध्यकाल में पृथ्वीराज द्वारा संयोगिता के हरण ने तो भारत के इतिहास का रुख ही बदल दिया था। छलिया नृत्य इस परम्परा के जीवंत प्रतिक के रूप में आज भी है।

आज भी कुमाऊं में विवाह के दौरान कन्या के घर के निकट पहुंचने पर कन्या का भाई बारात रोकता है और इसके बाद वर पक्ष तथा कन्या पक्ष में वाद्य यंत्रों को बजाने की प्रतियोगिता होती है। शुरुआती दौर में बड़े राजा ही इस परंपरा को चलाते थे लेकिन समय के साथ ही छोटे राजाओं ने भी अपनी बारातों में छलिया नृत्य की परंपरा शुरू की और आज यह नृत्य कुमाऊं की संस्कृति बन गया।
« Last Edit: September 05, 2008, 12:01:32 AM by धौंसिया.....! »
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Re: छोलिया नृत्य-युद्ध का प्रतीक नृत्य/ Cholia Dance
« Reply #13 on: September 05, 2008, 06:53:34 PM »
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Re: छोलिया नृत्य-युद्ध का प्रतीक नृत्य/ Cholia Dance
« Reply #14 on: September 08, 2008, 10:16:37 PM »
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Quote from: deepikakholia on September 08, 2008, 06:21:36 PM
hi


दीपिका जी नमस्कार,
    मेरा पहाड़ पोर्टल पर आपका स्वागत है, आप पिथौरागढ़ में किस जगह से हैं, इसका पूर्ण विवरण कृपया निम्न लिंक पर दें-
http://www.merapahad.com/forum/index.php?topic=2.0
अपने गांव की विस्तृत जानकारी आप यहां पर दे सकती हैं
http://www.merapahad.com/forum/index.php?topic=255.0
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