Author Topic: Folk Songs & Dance Of Uttarakhand - उत्तराखण्ड के लोक नृत्य एवं लोक गीत  (Read 53266 times)



राजेश जोशी/rajesh.joshee

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Mehta ji,
Thanks for this use ful information,  I think what known as Mangal in Garhwal the same is known as Sagun Akhar in Kumaun.  Means Songs sung at the time of marriage procession.
with regards

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Malushahi

This Ballad is about a king called Malushah who ruled in Kumaon- it is the love story of Malushah and Rajuli.

It is usually sung by a main artist along with his team during fairs or festivals. The main accompanying instrument is the hudka. 
 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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उत्तराखंड में लोकगीतों की विशेष पहचान

09 अक्तूबर 2007
11:25 IST

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देहरादून- उत्तराखंड के लोक जीवन में अलग ही ताल और लय है जिसकी छाप यहाँ के लोकगीत एवं लोकनृत्यों में साफतौर पर परिलक्षित होती है। यहाँ के लोकगीत नृत्य केवल मनोरंजन ही नहीं बल्कि लोक जीवन के अच्छे-बुरे अनुभवों एवं उनसे सीख लेने की प्रेरणा भी देते हैं।

संस्कृति एवं कला परिषद से मिली जानकारी के अनुसार वैश्वीकरण के दौर में इन लोक कलाओं का महत्व और भी बढ़ गया है। ये लोकगीत-लोकनृत्य आडियो-वीडियो के माध्यम से आय के साधन बन गए हैं। जगह-जगह इनके प्रस्तुतीकरण से कलाकारों की अच्छी कमाई हो रही है।

हालाँकि आधुनिक परिवेश के समयचक्र में पहाड़ों में बहुत सारे लोकगीत नृत्य विलुप्त हो गए हैं लेकिन बचे हुए लोकगीतों और नृत्यों की अपनी विशेष पहचान है। यहाँ लगभग दर्जन भर लोकगीतों की विधाएँ आज भी अस्तित्व में हैं जिनमें चैती गीत चौंफला, चांछडी और झुमैलो सामूहिक रूप से किए जाने वाले गीत-नृत्य हैं।

शरदकालीन त्योहारों में चांछडी और झुमैलों पहले ही शामिल थें लेकिन अब बासंती खुशी का विशेष गीत चौंफला भी इन त्योहारों में गाया जाने लगा है। झुमैंलो और चांछडी तथा चौंफला तीनों गीतों में पुरुष और महिलाओं की टोली बनाकर या एक ही घेरे में नृत्य किया जाता है। तीनों के नृत्य की शैली भिन्न है किंतु तीनों में श्रृंगार एवं भाव प्रधान होते है।

थडिया गीत भी इसी मौसम में गाया जाता है और ये गीत चौक तथा थडों (आंगन) में गाए जाते हैं इसीलिए इन्हें थडिया गीत कहा जाता है। इसके अलावा इन गीतों की विशिष्ट गायन एवं नृत्य शैली को भी थडिया कहा जाता है।

पांडवों के साथ जुड़ी घटनाओं पर आधारित पंडावर्त शैली के लोक नृत्य वास्तव में नृत्य नाटिका के रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं। ये लोकनृत्य 20 लोकनाट्यों में 32 तालों एवं 100 अलग-अलग स्वर लिपि में आबद्ध होते हैं।

टिहरी और उत्तरकाशी जिले में मंडाण लोकनृत्य ढोल-दमाऊँ पर किया जाता है। इनको चार ताल में किया जाता है जिसमें देवी-देवताओं के आह्वान के गीत शामिल हैं। देव जात्रा, जात और शुभ कार्य शादी विवाह एवं चूड़ाक्रम आदि अवसरों पर इसकी प्रस्तुति की जाती है।

उत्तरकाशी तथा टिहरी जिले के जौनपुर क्षेत्र में तांदि नृत्य को खुशी के अवसरों पर और माघ के पूरे महीनें में पेश किया जाता है तथा इस नृत्य के साथ में गाए जाने वाले गीत सामाजिक घटनाओं पर आधारित होते हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से रचा जाता है। झुमैला सामूहिक नृत्य है जो बिना वाद्ययंत्रों के दीपावली और कार्तिक के महीने में रात भर गाया जाता है।

ऐसी मान्यता है कि जागर और पंवाडे लोकनृत्य गीत देवी-देवताओं को नचवाने के लिए किए जाते हैं। देवी-देवताओं की कथाओं पर आधारित गायन और छंदबद्ध कथावाचन (गाथा) के प्रस्तुतीकरण इस विधा का रोचक पक्ष है। गायन-वादन के लिए विशेष रूप से गुरु शिष्य परंपरा से प्रशिक्षित व्यक्ति ही आमंत्रित किए जाते हैं जिनका आज भी यही रोजगार है।

गढ़वाल में सरौं और छोलिया तथा पौंणा नृत्य प्रसिद्ध हैं। तीनों की शैलियाँ अलग-अलग हैं लेकिन भाव वीर रस एवं शौर्य प्रधान सामग्री का प्रयोग तीनों में किया जाता है। सरौं नृत्य में ढोलवादक मुख्य किरदार में होते हैं जबकि छोलिया और पौंणा नृत्य में वादक और नर्तक के साझे करतब परिपूर्णता प्रदान करते हैं।

इन नृत्यों में सतरंगी पोशाक, ढोल-दमाऊँ, नगाड़े, झंकोरा तथा कैंसाल और रणसिंगा वाद्य यंत्र एवं ढाल-तलवार अनिवार्य है। इन नृत्य गीतों में पचास साठ कलाकर एक साथ शामिल होते हैं।

वीरान किंतु सुरम्य पहाड़ी वादियों में जंगल में घास काटती गढ़वाली महिलाओं की अलग गायन शैली है। विरह वेदना से व्यथित अथवा उदास पर्वतीय नारी के मन की पीड़ा इन गीतों की स्वर लहरियों में फूट पड़ती है। बिना वादन और नृत्य के ये गीत आज भी गढ़वाल के दूर-दराज जंगलों में घसियारियों द्वारा गाए जाते हैं।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कुमाऊंनी संस्कृति में बदल गया छलिया नृत्यNov 05, 02:29 am

पिथौरागढ़। कुमाऊंनी बारातों में ढ़ाल और तलवार के साथ सबसे आगे नाचते दो नृतक यहां राजाओं द्वारा युद्घ कर हरण कर सुन्दरियों को जीतने की परम्परा को दिखता है। 60 के दशक तक बारातों में ही नजर आने वाला छलिया नृत्य पहली बार 1963-1964 में मंच पर आया और धीरे-धीरे यह नृत्य कुमाऊं की संस्कृति के साथ जुड़ा।

छलिया नृत्य पहली बार 26 जनवरी को दिल्ली के ताल-कटोरा में मंच पर दिखाया गया इस नृत्य में प्रदर्शन करने के लिए पिथौरागढ़ के महरखोला से दो छलिया तथा रं संस्कृति के कुछ कलाकार संस्कृति कर्मी डूंगर सिंह ढ़करियाल के नेतृत्व में दिल्ली गये और यही वह समय था जब छलिया नृत्य कुमाऊं की विशिष्ट पहचान बन गया।

भीड़ भरी बारात में अपने पहनावे से ही पहचाने जाने वाले छलिया सर पर तुर्रेदार पगड़ी पहनते है, शरीर पर घुटनों तक लम्बा पूरी बांह का घेरेदार झगुला, कमर में फेंटा और चुड़ीदार पयजामा पहने हाथ में ढ़ाल और तलवार पकड़े छलिया मध्यकालीन भारत के योद्घा से लगते है। संस्कृत कर्मी पद्मा दत्त पंत कहते है कि छलिया नृत्य शुरू होने का कोई प्रमाण नहीं है लेकिन नगाड़ों की विविध धुनों तथा उन धुनों पर छलियाओं के नचाने के विभिन्न तरीकों से अनुमान लगाया जा सकता है कि यह कला कम से कम छह सौ वर्ष पुरानी तो होगी।

राजाओं द्वारा सुन्दरियों का हरण कर विवाह रचाने का भारत में इतिहास रहा है। भीष्म द्वारा कशिराज की कन्याओं तथा कृष्ण द्वारा रुक्मणी का हरण महाभारत की प्रसिद्घ कथायें है मध्यकाल में पृथ्वीराज द्वारा संयोगिता के हरण ने तो भारत के इतिहास का रुख ही बदल दिया था। छलिया नृत्य इस परम्परा के जीवंत प्रतिक के रूप में आज भी है।

आज भी कुमाऊं में विवाह के दौरान कन्या के घर के निकट पहुंचने पर कन्या का भाई बारात रोकता है और इसके बाद वर पक्ष तथा कन्या पक्ष में वाद्य यंत्रों को बजाने की प्रतियोगिता होती है। शुरुआती दौर में बड़े राजा ही इस परंपरा को चलाते थे लेकिन समय के साथ ही छोटे राजाओं ने भी अपनी बारातों में छलिया नृत्य की परंपरा शुरू की और आज यह नृत्य कुमाऊं की संस्कृति बन गया।

पंकज सिंह महर

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Choliya Dance
 
Dating back to over a thousand years, the Chholiya Dance has its origins in the warring Khasiya Kingdom of Khasdesh, when marriages were performed at the point of the swords. They were united by the Chand kings who arrived' on the scene in the 10th century. In Nepal, the word Khasa is still asynonym for Kashatrya, and in Khasdesh, too, they took on the customs of the Rajputs, who were themselves honorary Kashatryas.

Keeping the old tradition alive, the Rajputs dance this at their weddings as a part of the marriage procession itself, led by the male dancers who go on dancing till they reach the bride's house. Performed by the Rajputs with sword and shield in pairs, the drummers are usually Harijans called Dholies, while the Turi and Ransing are played by Bairagis, Jogis or Gosains. The Turi and Ransing are typical Kumaon instruments. Perfectly synchronized, and marked with jumps and turns of the body, the dancers show several sword-fighting feats. Attired in the material costumes of ancient warriors, the flashing swords and shields, along with the war-like music, huge red flag with various animal symbols stuck on it conveys fear, joy, awe and wonder, through eyes, eyebrows and shoulders, creating at the same time, the impression of group advancing for an attack.

The costumes consist of a Churidar Pyjama, one long Chola, one cross belt, one belt round the waist, pattis on the legs and a turban. With' Chandan, or Sandalwood paste, and red vermillion they decorate their face, while on the ears are ear-rings, a bronze shield and real sword complete the ensemble. Specially trained, though dancing is not their profession, these Rajput dancers come from the Champawat and Almora. The full team consists of 22 person, eight of which are dancers, and 14 musicians. Cultivators all, they assemble when invited
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पंकज सिंह महर

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Langvir Nritya

Langvir Nritya is an acrobatic dance and is performed by the men folk only. In this dance, a long bamboo pole is fixed at a place. The dancer acrobat climbs to the top of this pole and then balances himself on his stomach on the top. Under the pole, a band of musicians play 'Dhol' and 'Damana' while the dancer acrobat rotates on the top of the pole doing other feats with the help of his hands and feet. This dance is popular in Tehri Garhwal region.

पंकज सिंह महर

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धार्मिक गीत

धार्मिक गीतों की सँख्या कुमाऊँ में अधिक है । धार्मिक गीतों में पौराणिक आख्यानों वाले गीतों का प्रथम स्तर पर लिया जा सकता है । ऐसे गीतों में दक्ष प्रजापति के यज्ञ से लेकर रामायण, महाभारत के अनेक अवसरों के गीत आ जाते हैं । ऐसे गीतों का क्रम बहुत लम्बा चलता है । पौराणिक देवी-देवताओं के सभी गीत इस क्षेत्र में गाये जाते हैं ।

धार्मिक गीतों के अन्तर्गत स्थानीय देवी-देवताओं को भी स्थान मिला है । इन्हों जागर गीत के नाम से जाना जाता है । गढ़वाल-कुमाऊँ में 'जागरों' का विशेष महत्व है । जागरी, ढोल, हुड़का, डौंर-थाली बजाकर देवता विशेष के जीवन व कार्यों का बखान गीत गाकर करता है । जिस व्यक्ति पर 'देवता' विशेष अवतरित होता है - वह डंगरिया कहलाता है । जागरी जैसे-जैसे वाद्य बजाकर देवता विशेष के कार्यों का उल्लेख करता हुआ गाता है - वैसे-वैसे ही 'औतारु' (डंगरिया) नाचता जाता है । उसके शरीर में एक विशेष प्रकार की 'कम्पन शक्ति' प्रवेश करती है । जन-मानस मनौती मनाकर देवता को जागरी से नचवाते हैं और देवता को नाचने पर विपत्ति को टली हुई मानते हैं । आश्विन के महीने में ऐसे 'जागर' लगाये जाते हैं । स्थानीय देवी-देवताओं का पूजन 'बैसी' कहलाता है । जागरों में ग्वेल, गंगनाथ, हरु, कव्यूर, भोलानाथ, सेम और कलविष्ट आदि के जागर विशेष रुप से प्रसिद्ध हैं ।


पंकज सिंह महर

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 संस्कार गीत

संस्कार गीतों को यदि नारी-हृदय के गीत कहें तो अत्युक्ति न होगी । जन्म, छठी, नामकरण, यज्ञोपवीत तथा विवाह आदि के गीत संस्कार गीतों की श्रेणी में आते हैं । जिन्हें महिलाएँ अपने कोमल कण्ठ से बड़े प्यार से गाती हैं । 'स्वकुनाखर' (शकुन गीत) ऐसा गीत होता है जो प्रत्येक मंगल कार्य के अवसर पर गाया जाता है । गढ़वाल में 'मांगलगीत' इसी प्रकार का गीत है ।

ॠतु गीत

ॠतु-त्यौहार के गीतों को डॉ. त्रिलोचन पाण्डेय ने मुक्तक गीतों की श्रेणी में लिया है । उन्होंने ऐसे गीतों को नौ श्रेणियों में बाँटा है -

१. नृत्य प्रधान गीत
२. अनुभूति प्रधान गीत
३. तर्क प्रधान गीत
४. संवाद प्रधान गीत
५. स्फुट गीत
६. ॠतु गीत
७. देवी-देवता गीत
८. व्रत त्यौहार के गीत
९. कृषि गीत


ॠतु विशेष के आगमन पर ऐसे गीत गाये जाते हैं । चैत्र मास से शुरु होने वाले ऐसे गीतों को 'रितु रवैण' कहते हैं । इसके अलावा कुमाऊँ के ॠतु गीतों में 'काफलिया', 'रुड़ी', 'हिनौल' और 'होली' विशेष रुप से प्रसिद्ध हैं । फागुन के महीने में सर्वत्र होलियाँ गाई जाती हैं । गंगोली, चम्पावत, द्वाराहाट और सतराली आदि स्थानों की होलियाँ बहुत प्रसिद्ध हैं



 

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