Author Topic: Chandra Singh Garhwali : वीर चन्द्र सिंह "गढ़वाली"  (Read 35941 times)

पंकज सिंह महर

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साथियो,
यों तो उत्तराखण्ड हमेशा से वीरों की भूमि रहा है, इस धरती ने इन्हीं वीरों में से कुछ परमवीर भी पैदा किये। जिनमें चन्द्र सिंह गढ़वाली का नाम सर्वोपरि कहा जा सकता है। उन्होंने २३ अप्रैल, १९३० को अफगानिस्तान के निहत्थे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों पर गोली चलाने से इन्कार कर एक नई क्रान्ति का सूत्रपात किया था और अंग्रेजी हुकूमत को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि भारत में उनके राज के कुछ ही दिन बचे हैं।
 
हालांकि इस अजर-अमर विभूति की एक कमजोरी थी कि वह एक पहाड़ी था, जो टूट जाना पसन्द करते हैं लेकिन झुकना नहीं। चन्द्र सिह जी भी कभी राजनीतिज्ञों के आगे नहीं झुके, जिसका प्रतिफल यह हुआ कि स्वतंत्रता संग्राम के इस जीवट सिपाही को स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी जेल जाना पड़ा और कई अपमान झेलने पड़े। इनकी जीवटता को कभी भी वह सम्मान नहीं मिल पाया जिसके वे हकदार थे। उनके अंतिम दिन काफी कष्टों में बीते, जब स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाम पर लोग मलाई चाट रहे थे, वहीं गढ़वाली जी अपने साथियों की पेंशन के लिये संघर्ष कर रहे थे।
 
इस अमर सेनानी को हमारा सलाम, उनका सपना था कि उत्तराखण्ड पृथक आत्मनिर्भर राज्य बने, जिसकी राजधानी भी उत्तराखण्ड के केन्द्र में हो, दूधातोली, जो उनका पैतृक स्थान था, उसका विकास हो, वहां पर गढ़वाल नगर बसे, राजा भरत की जन्म स्थली कण्व आश्रम, कोटद्वार में भरत नगर बसाया जाय....आदि। लेकिन दुर्भाग्य है कि राज्य मिलने के इतने समय बाद भी उनके सपने अधूरे हैं।

पंकज सिंह महर

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चन्द्र सिंह भण्डारी "गढ़वाली"
 

जन्म- 25 दिसम्बर, 1891, निधन- 1 अक्टूबर, 1979
ग्राम- मासी, रौणीसेरा, चौथान पट्टी, गढ़वाल।
महात्मा गांधी के शब्दों में "मुझे एक चंद्र सिंह गढ़वाली और मिलता तो भारत कभी का स्वतंत्र हो गया होता।"

११ सितम्बर, १९१४ को २/३९ गढ़वाल राईफल्स में सिपाही भर्ती हो गये, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अगस्त १९१५ में मित्र राष्ट्रों की ओर से अपने सैनिक साथियों के साथ योरोप और मध्य पूर्वी क्षेत्र में प्रत्यक्ष हिस्सेदारी की। अक्टूबर में स्वदेश लौटे और १९१७ में अंग्रेजों की ओर से मेसोपोटामिया के युद्ध में भाग लिया। १९२१-२३ तक पश्चिमोत्तर प्रांत में रहे, जहां अंग्रेजों और पठानों में युद्ध हो गया था। १९२० के बाद चन्द्र सिंह देश में घटित राजनैतिक घटनाओं में रुचि लेने लगे। १९२९ में गांधी जी के बागेश्वर आगमन पर उनकी मुलाकात गांधी जी से हुई और गांधी जी के हाथ से टोपी लेकर, जीवन भर उसकी कीमत चुकाने का प्रण उन्होंने कर लिया।
      १९३० में इनकी बटालियन को पेशावर जाने का हुक्म हुआ, २३ अप्रैल, १९३० को पेशावर में किस्साखानी बाजार में खान अब्दुल गफ्फार खान के लालकुर्ती खुदाई खिदमतगारों की एक आम सभा हो रही थी। अंग्रेज आजादी के इन दीवानों को तितर-बितर करना चाहते थे, जो बल प्रयोग से ही संभव था। कैप्टेन रैकेट ७२ गढ़वाली सिपाहियों को लेकर जलसे वाली जगह पहुंचे और निहत्थे पठानों पर गोली चलाने का हुक्म दिया। चन्द्र सिंह भण्डारी कैप्टेन रिकेट के बगल में खड़े थे, उन्होंने तुरन्त सीज फायर का आदेश दिया और सैनिकों ने अपनी बन्दूकें नीचीं कर ली। चन्द्र सिंह ने कैप्टेन रिकेट से कहा कि "हम निहत्थों पर गोली नहीं चलाते"  इसके बाद गोरे सिपाहियों से गोली चलवाई गई। चन्द्र सिंह और गढ़वाली सिपाहियों का यह मानवतावादी साहस अंग्रेजी हुकूमत की खुली अवहेलना और राजद्रोह था। उनकी पूरी पल्टन एबटाबाद(पेशावर) में नजरबंद कर दी गई, उनपर राजद्रोह का अभियोग चलाया गया। हवलदार २५३ चन्द्र सिंह भण्डारी को मृत्यु दण्ड की जगह आजीवन कारावास की सजा दी गई, १६ लोगों को लम्बी सजायें हुई, ३९ लोगों को कोर्ट मार्शल के द्वारा नौकरी से निकाल दिया गया। ७ लोगों को बर्खास्त कर दिया गया, इन सभी का संचित वेतन जब्त कर दिया गया। यह फैसला मिलिट्री कोर्ट दआरा १३ जून] १९३० को ऎबटाबाद छावनी में हुआ। बैरिस्टर मुकुन्दीलाल ने गढ़वालियों की ओर से मुकदमे की पैरवी की थी। चन्द्र सिंह गढ़्वाली तत्काल ऎबटाबाद जेल भेज दिये गये, २६ सितम्बर, १९४१ को ११ साल, ३ महीन और १८ दिन जेल में बिताने के बाद वे रिहा हुये। ऎबटाबाद, डेरा इस्माइल खान, बरेली, नैनीताल, लखनऊ, अल्मोड़ा और देहरादून की जेलों में वे बंद रहे और अनेक यातनायें झेली। नैनी सेन्ट्रल जेल में उनकी भेंट क्रान्तिकरी राजबंदियों से हुई। लखनऊ जेल में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से भेंट हुई।
       श्री गढ़वाली एक निर्भीक देशभक्त थे, वे बेड़ियों को "मर्दों का जेवर" कहा करते थे।जेल से रिहा होने के बाद कुछ समय तक वे आनन्द भवन, इलाहाबाद रहने के बाद १९४२ में अपने बच्चों के साथ वर्धा आश्रम में रहे। भारत छोड़ो आन्दोलन में उत्साही नवयुवकों ने इलाहाबाद में उन्हें अपना कमाण्डर इन चीफ नियुक्त किया। डा० कुशलानन्द गैरोला को डिक्टेटर बनाया गया, इसी दौरान उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया, नाना जेलों में कठोर यातनायें दी गई, ६ अक्टूबर, १९४२ को उन्हें सात साल की सजा हुई। १९४५ में ही उन्हें जेल से छोड़ दिया गया, लेकिन गढ़वाल प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। जेल प्रवास के दौरान उनका परिचय यशपाल से परिचय हुआ और कुछ दिन उनके साथ वे लखनऊ में रहे। फिर अपने बच्चों के साथ हल्द्वानी आ गये।
       जेल प्रवास के दौरान वे आर्य समाजी हो गये, इस बीच उन्होंने क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट विचारों को अपनाया और १९४४ में कम्युनिस्ट कार्यकर्ता के रुप में सामने आये, १९४६ में चन्द्र सिंह ने गढ़वाल में प्रवेश किया, जहां जगह-जगह पर जनस्मूह ने उनका भव्य स्वागत किया। कुछ दिन गढ़वाल में रहने के पश्चात वे किसान कांग्रेस में भाग लेने लुधियाना चले गये और वहां से लाहौर पहुंचे, दोनों जगह उनका भारी स्वागत हुआ। टिहरी रियासत् की जनक्रान्ति में भी इनकी सक्रिय भूमिका रही है। नागेन्द्र सकलानी के शहीद हो जाने के बाद गढ़वाली ने आन्दोलन का नेतृत्व किया। कम्युनिस्ट विचारधारा का व्यक्ति होने के कारण स्वाधीनता के बाद भी भारत सरकार उनसे शंकित रहती थी। वे जिला बोर्ड के अध्यक्ष का चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन सरकार ने उनपर पेशावर कांड का सजायाफ्ता होने के आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया। सामाजिक बुराईयों के उन्मूलन के लिये वे सदैव संघर्षरत रहे, १९५२ में उन्होंने पौड़ी विधान सभा सीट से कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से चुनाव लडा, लेकिन कांग्रेस की लहर के आगे वे हार गये।
       उत्तराखण्ड के विकास की योजनाओं के लिये उन्होंने अपनी आवाज उठाई और बाद के वर्षों में पृथक उत्तराखण्ड राज्य के समर्थन से लेकर विभिन्न सामाजिक और राजनैतिक गतिविधियों में उन्होंने हिस्सेदारी की।
* बैरिस्टर मुकुन्दी लाल के शब्दों में "आजाद हिन्द फौज का बीज बोने वाला वही है"
* आई०एन०ए० के जनरल मोहन सिंह के शब्दों में "पेशावर विद्रोह ने हमें आजाद हिन्द फौज को संगठित करने की प्रेरणा दी।"


पंकज सिंह महर

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गढ़वाल के महानायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में भाई-चारे के प्रतीक बन सकते हैं। आजादी के आंदोलन के समय पेशावर में चंद्र सिंह गढ़वाली ने जो काम किया, उसकी वजह से पाकिस्तान और अफगानिस्तान का पख्तून समाज (पठान) आज भी गढ़वालियों की वही इज्जत करता है। 1881 में उत्तराखं़ड के चमोली जिले के रौणीसेरा गांव में जन्मे वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ब्रिटिश फौज में हवलदार थे। 23 अप्रैल 1930 को उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की एक महान घटना को अंजाम दिया। वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में उनके सैनिक साथियों ने ब्रिटिश अफसरों के पेशावर के किस्सा ख्वानी बाजार में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे अपने देशवासी पठानों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया। लालकुर्ती आंदोलन के नाम से मशहूर ये खुदाई खिदमतगार बादशाह खान (खान अब्दुल गफ्फार खान) और मलंग बाबा महात्मा गांधी के गिरफ्तारी का विरोध कर रहे थे। ब्रिटिश राज में भारतीय सैनिकों द्वारा हुक्म मानने से इनकार की यह पहली घटना थी, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को हिला कर रख दिया। गढ़वाली फौज के इस अहिंसक विद्रोह का यह नतीजा हुआ कि उनका व उनके 59 साथियों का कोर्टमार्शल हुआ। चंद्र सिंह व उनके कुछ साथियों को आजीवन कारावास की सजा हुई। गढ़वाली फौज की इस हिम्मत का पठानों पर गहरा प्रभाव पड़ा। वे गढ़वालियों को अपने भाई जैसा मानने लगे। पौड़ी गढ़वाल के पतगांव गांव के चंद्रप्रकाश सुंदरियाल के पिता इंद्रमणि सुंदरियाल और ताऊजी गोवर्धन प्रसाद देश के बंटवारे के समय क्वेटा (पाकिस्तान) में रह रहे थे। चंद्र प्रकाश बताते हैं देश सांप्रदायिक दंगों की आग में जल रहा था। तब एक पठान ने सिर्फ यह जानकर उनके पिता और ताऊ को अपने देखरेख में भारतीय सीमा तक पहुंचाया था कि वे गढ़वाली हैं। वह बताते हैं कि वह पठान हथियार के साथ सारा समय उनके पिता के साथ रहा और कहता रहा कि चाहे जान कुर्बान करनी पड़े पर वह चंद्र सिंह गढ़वाली के भाइयों का बाल भी बांका न होने देगा। देश के मशहूर चरित्र अभिनेता एके हंगल ने भी अपनी पुस्तक पेशावर से बंबई तक में लिखा है कि पेशावर कांड के बाद खुदाई खिदमतगारों ने पेशावर में शहीदों की स्मृति में एक स्मारक भी बनाया था, लेकिन बाद में ब्रिटिश फौजों ने पेशावर पर फिर से कब्जा कर यह स्मारक नष्ट कर दिया। वीर चंद्र सिंह गढ़वाली पर व्यापक शोध करने वाले डा.एसआर शर्मा कहते हैं कि वीर चंद्र सिंह गढ़वाली और भारत-पाक और अफगानिस्तान के एकता के प्रतीक हो सकते है।


पंकज सिंह महर

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चन्द्र सिंह गढ़वाली
 
   
 
भारतीय इतिहास में चन्द्र सिंह गढ़वाली को पेशावर कांड के नायक के रूप में याद किया जाता है। २३ अप्रैल १९३० को हवलदार मेजर चन्द्र सिंह गढवाली के नेतृत्व में रॉयल गढवाल राइफल्स के जवानों ने भारत की आजादी के लिये लडनें वाले निहत्थे पठानों पर गोली चलानें से इन्कार कर दिया था। बिना गोली चले, बिना बम फटे पेशावर में इतना बडा धमाका हो गया कि एकाएक अंग्रेज भी हक्के-बक्के रह गये, उन्हें अपनें पैरों तले जमीन खिसकती हुई सी महसूस होनें लगी।
 जीवनी  चन्द्र सिंह गढ़वाली का जन्म 25 दिसम्बर 1891 में हुआ था। चन्द्रसिंह के पूर्वज चौहान वंश के थे जो मुरादाबाद में रहते थे पर काफी समय पहले ही वह गढ़वाल की राजधानी चांदपुरगढ़ में आकर बस गये थे और यहाँ के थोकदारों की सेवा करने लगे थे। चन्द्र सिंह के पिता का नाम जलौथ सिंह भंडारी था। और वह एक अनपढ़ किसान थे। इसी कारण चन्द्र सिंह को भी वो शिक्षित नहीं कर सके पर चन्द्र सिंह ने अपनी मेहनत से ही पढ़ना लिखना सीख लिया था।  3 सितम्बर 1914 को चन्द्र सिंह सेना में भर्ती होने के लिये लैंसडौन पहुंचे और सेना में भर्ती हो गये। यह प्रथम विश्वयुद्ध का समय था। 1 अगस्त 1915 में चन्द्रसिंह को अन्य गढ़वाली सैनिकों के साथ अंग्रेजों द्वारा फ्रांस भेज दिया गया। जहाँ से वे 1 फरवरी 1916 को वापस लैंसडौन आ गये। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ही 1917 में चन्द्रसिंह ने अंग्रेजों की ओर से मेसोपोटामिया के युद्ध में भाग लिया। जिसमें अंग्रेजों की जीत हुई थी। 1918 में बगदाद की लड़ाई में भी हिस्सा लिया।
प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हो जाने के बाद अंग्रेजो द्वारा कई सैनिकों को निकालना शुरू कर दिया और जिन्हें युद्ध के समय तरक्की दी गयी थी उनके पदों को भी कम कर दिया गया। इसमें चन्द्रसिंह भी थे। इन्हें भी हवलदार से सैनिक बना दिया गया था। जिस कारण इन्होंने सेना को छोड़ने का मन बना लिया। पर उच्च अधिकारियों द्वारा इन्हें समझाया गया कि इनकी तरक्की का खयाल रखा जायेगा और इन्हें कुछ समय का अवकास भी दे दिया। इसी दौरान चन्द्रसिंह महात्मा गांधी के सम्पर्क में आये।
कुछ समय पश्चात इन्हें इनकी बटैलियन समेत 1920 में बजीरिस्तान भेजा गया। जिसके बाद इनकी पुनः तरक्की हो गयी। वहाँ से वापस आने के बाद इनका ज्यादा समय आर्य समाज के कार्यकर्ताओं के साथ बीता। और इनके अंदर स्वदेश प्रेम का जज़्बा पैदा हो गया। पर अंग्रेजों को यह रास नहीं आया और उन्होंने इन्हें खैबर दर्रे के पास भेज दिया। इस समय तक चन्द्रसिंह मेजर हवलदार के पद को पा चुके थे।
उस समय पेशावर में स्वतंत्रता संग्राम की लौ पूरे जोरशोर के साथ जली हुई थी। और अंग्रेज इसे कुचलने की पूरी कोशिश कर रहे थे। इसी काम के लिये 23 अप्रेल 1930 को इन्हें पेशावर भेज दिया गया। और हुक्म दिये की आंदोलनरत जनता पर हमला कर दें। पर इन्होंने निहत्थी जनता पर गोली चलाने से साफ मना कर दिया। इसी ने पेशावर कांड में गढ़वाली बटेलियन को एक ऊँचा दर्जा दिलाया और इसी के बाद से चन्द्र सिंह को चन्द्रसिंह गढ़वाली का नाम मिला और इनको पेशावर कांड का नायक माना जाने लगा।
अंग्रेजों की आज्ञा न मानने के कारण इन सैनिकों पर मुकदमा चला। गढ़वाली सैनिकों की पैरवी मुकुन्दी लाल द्वारा की गयी जिन्होंने अथक प्रयासों के बाद इनके मृत्युदंड की सजा को कैद की सजा में बदल दिया। इस दौरान चन्द्रसिंह गढ़वाली की सारी सम्पत्ति ज़प्त कर ली गई और इनकी वर्दी को इनके शरीर से काट-काट कर अलग कर दिया गया।
1930 में चन्द्रसिंह गढ़वाली को 14 साल के कारावास के लिये ऐबटाबाद की जेल में भेज दिया गया। जिसके बाद इन्हें अलग-अलग जेलों में स्थानान्तरित किया जाता रहा। पर इनकी सज़ा कम हो गई और 11 साल के कारावास के बाद इन्हें 26 सितम्बर 1941 को आजाद कर दिया। परन्तु इनके में प्रवेश प्रतिबंधित रहा। जिस कारण इन्हें यहाँ-वहाँ भटकते रहना पड़ा और अन्त में ये वर्धा गांधी जी के पास चले गये। गांधी जी इनके बेहद प्रभावित रहे। 8 अगस्त 1942 के भारत छोड़ों आंदोलन में इन्होंने इलाहाबाद में रहकर इस आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई और फिर से 3 तीन साल के लिये गिरफ्तार हुए। 1945 में इन्हें आजाद कर दिया गया।
22 दिसम्बर 1946 में कम्युनिस्टों के सहयोग के कारण चन्द्रसिंह फिर से गढ़वाल में प्रवेश कर सके। 1957 में इन्होंने कम्युनिस्ट के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा पर उसमें इन्हें सफलता नहीं मिली। 1 अक्टूबर 1979 को चन्द्रसिंह गढ़वाली का लम्बी बिमारी के बाद देहान्त हो गया। 1994 में भारत सरकार द्वारा उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया गया। तथा कई सड़कों के नाम भी इनके नाम पर रखे गये।
साभार- विकीपीडिया

पंकज सिंह महर

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वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली जी की याद को अक्षुण्ण रखने के लिये उत्तराखण्ड क्रान्ति दल ने २५ दिसम्बर, १९९२ को गैरसैंण में उनकी एक आदमकद प्रतिमा की स्थापना की। जिसमें यह संकल्प लिया गया कि भावी उत्तराखण्ड राज्य की राजधानी का नाम गढ़वाली जी के नाम पर चन्द्रनगर होगा।

लेकिन यह सपना साकार नहीं हुआ और क्यों?

पंकज सिंह महर

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भारत सरकार द्वारा इनकी याद में दिनांक 23 अप्रैल, 1994 को एक डाक टिकट जारी किया।



पंकज सिंह महर

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30 अप्रैल, 1930 को हुए ऐतिहासिक पेशावर कांड और उसके नायक वीर चंद्रसिंह गढ़वाली पर पीतांबरदत्त डेवरानी का विजारोत्तजेक आलेख

नगाधिराज हिमालय के नाभिकांड में स्थित गढ़वाल अपने पराक्रम, शौर्य और अप्रतिम देशभक्ति के लिए सुविख्यात है। 2/18 रायल गढ़वाल राइफल्स के गढ़वाली सैनिक ने वीर चंद्रसिंह गढ़वाली के नेतृत्व में सन् 1930 में पेशावर में निहत्थे देशभक्त पठानों पर गोली चलाने से इनकार कर साम्राज्यवादी अंग्रेजी शासन की चूलें हिला दी थीं और इस प्रकार देशभक्ति का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया था। दुर्भाग्य की बात है कि वीर चंद्रसिंह गढ़वाली और पेशावर कांड को आजादी के बाद जो स्थान और सम्मान मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला। जब भी सही ढंग से स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास लिखा जाएगा, पेशावर कांड के वीर नायक चंद्रसिंह गढ़वाली और उनके साथियों को सम्मान स्मरण किया जाएगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो वह स्वतंत्रता संग्राम का सच्चा इतिहास नहीं हो सकता। चंद्रसिंह गढ़वाली के लिए गांधीजी ने कहा था कि, ‘मेरे पास बड़े चंद्रसिंह गढ़वाली जैसे चार आदमी होते तो देश कभी का आजाद हो गया होता। मृत्युशय्या पर लेटे पंडित मोतीलाल नेहरू ने कहा था कि, ‘वीर चंद्रसिंह गढ़वाली को देश न भूले। उसे ‘गढ़वाली' को हमारे नेता और इतिहासकार क्यों और कैसे भूल गए, यह हमारे सामने एक गंभीर विचारणीय प्रश्न है। जिस ‘गढ़वाली' ने पेशावर कांड द्वारा साम्राज्यवादी अंग्रजों को यह बताया था कि वह भारतीय सैनिकों की बंदूकों और संगीनों के बलबूते पर अब हिंदुस्तान पर शासन नहीं कर सकते, उसकी इतनी उपेक्षा क्यों हुई- इतिहासकारों को इसका जवाब देना होगा।गढ़वाल के सुदूर उत्तरांचल में एक सामान्य कृषक श्री जाथलीसिंह भंडारी के परिवार में ग्राम रौणी सेरा मासौ पट्टी चौथान में चंद्रसिंह का जन्म हुआ था। उस समय गढ़वाल में शिक्षा-दीक्षा की कोई व्यवस्था न होने के कारण चंद्रसिंह सामान्य शिक्षा ही प्राप्त कर सके, परंतु वे जीवन भर लगनशील-स्वाध्यायी रहे और उन्होंने ऐसा कुछ पढ़ा-सीखा, जिसे दूसरे बड़ी-बड़ी डिग्रियां हासिल कर भी नहीं सीख पाए। वे जन्मजात भड़ (वीर) थे। नेतृत्व करने का गुण उनमें बचपन से ही था। गांव के बालकों के वे सरदार थे। वीरों जैसा साहस था बालक चंद्रसिंह में। एक बार एक अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर की पत्नी गांव वालों से इसलिए नाराज हो गई थी कि वे ढंग के कपड़े नहीं पहने हुए थे। गांव के स्त्री-पुरुषों को पौड़ी तलब किया गया। एक तो पचासों मील की दूरी, दूसरी ओर अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर से कठोर सजा मिलने का भय। तब बड़ा दबदबा और आतंक था अंग्रेजों का । गांव के पुरोहित ने रास्ता सुझाया कि यदि कोई साहब के सिर पर उसके द्वारा मंत्रित भभूत डाल दे तो साहब का कोप शांत हो जाएगा। भला कौन कर पाता ऐसा दुस्साहस? लेकिन बालक चंद्रसिंह ने गांव वालों के साथ पौड़ी जाकर, चुपके से साहब की कुर्सी के पीछे जाकर साहब के सिर पर भभूत झाड़ दी। साहब ने सजा नहीं दी और गांव वाले, हंसी-खुशी चंद्रसिंह का गुणगान करते वापस गांव लौट आए। तब के भभूत झाडऩे वाले बालक ने आगे चलकर अंगेजी साम्राज्यवाद का भूत झाडऩे में भी कोई कसर नहीं रखी।

युवा चंद्रसिंह लैंसडौन पहुंच कर रायल गढ़वाल राइफल्स में भर्ती हो गया। प्रथम विश्व युद्ध में मेसापोटामिया में अतुल पराक्रम दिखाने के बाद जब 1919 में सिपाही चंद्रसिंह लैंसडौन पहुंचे तो उन्हें हवलदार मेजर बना दिया गया। युद्ध समाप्त होते ही सैनिकों की छंटनी शुरू हो गई। हवलदार और जे.सी.ओ. सामान्य सिपाही बना दिए गए। हवलदार मेजर चंद्रसिंह को भी पदावनत कर सिपाही बना दिया गया और आश्वासन देकर एक महीने की छुट्टी पर घर भेज दिया गया। इस घटना ने चंद्रसिंह के मन में अंग्रेजों के प्रति आक्रोश पैदा कर दिया।

उस समय देश में कई घटनाएं घटीं। जलियांवाला बाग में नृशंस डायर ने सैकड़ों लोगों को गोलियों से भून दिया था और सारे पंजाब में मार्शल ला लागू कर दिया था। महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन शुरू हो गया था। देश ने लंबी नींद के बाद अंगड़ाई ली थी। चंद्रसिंह पर इन घटनाओं का प्रभाव पड़े बिना नहीं रहा। वे घर जाने के बजाय गांधीजी से मिलने चल पड़े। लेकिन वे गांधीजी के दर्शन नहीं कर पाए और एक माह बाद लैंसडौन लौट आए।

साभार- http://lekhakmanch.com/

पंकज सिंह महर

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डेवरानी के लेख का दूसरा भाग-

सन् 1920 से 1922 तक चंद्रसिंह युद्ध मोर्चे पर रहे और सन् 1922 में जब वे लैंसडौन लौटे तो उन्हें फिर हवलदार मेजर बना दिया गया। लैंसडौन में रहते वे एक कट्टर आर्यसमाज श्री टेकचंद वर्मा के संपर्क में आए और उनसे तथा आर्यसमाज के सिद्धांतों से प्रभावित होकर वे भी पक्के आर्यसमाजी बन गए। देशभक्ति का बीज जो उनके मानस में सोया पड़ा था, जहां आकर अंकुराने लगा। वे छिप कर समाचार पत्र पढ़ते, जिनसे देश-विदेश की राजनीतिक घटनाओं की जानकारी उन्हें मिलती रहती थी। लगभग इन्हीं दिनों गढ़वाल के सुविख्यात साहित्यकार एवं कवि तथा तब के सेना के क्लर्क श्री भजनसिंह ‘सिंह’ से चंद्रसिंह की भेंट हुई। वे रात को बंद कमरे में देश में हो रही हलचल के बारे में बातचीत करते और विचार-विमर्श किया करते कि आजादी की लड़ाई में भारतीय सैनिकों की क्या भूमिका हो। छुट्टियों में वे समीपवर्ती जंगलों में जाकर भावी योजना के बारे में गंभीरता से सोचते-विचारते थे। उल्लेखनीय है कि सेना में भर्ती होने से पूर्व श्री भजनसिंह ‘सिंह’ क्रांतिकारियों से बहुत गहराई से जुड़े थे और उन्हीं के परामर्श से सेना में भर्ती हुए थे। अंग्रेज अधिकारियों को यह भनक पडऩे पर कि चंद्रसिंह और भजनसिंह ‘सिंह’ गुप्त रूप से गढ़वाल पल्टन को अंग्रेजी शासन के खिलाफ भड़काने का षड्यंत्र रच रहे हैं, उन्हें उनकी कंपनियों के साथ अन्यत्र भेज दिया गया। चंद्रसिंह को उनकी बटालियन के साथ पेशावर भेज दिया गया। पेशावर जाने से पूर्व उन्हें एक महीने का अवकाश स्वीकृत किया गया।

चंद्रसिंह को सूचना मिली कि गांधीजी बागेश्वर (अल्मोड़ा) पधार रहे हैं। वे घर जाने के बजाए बागेश्वर पहुंच गए। बागेश्वर में गांधीजी की सभा में गोरखा हैट पहने चंद्रसिंह भी बैठे थे। उन्हें देखकर गांधीजी ने कहा, ”यह गोरखा हैट पहने मुझे डराने कौन यहां बैठा है? तपाक से खड़े होकर चंद्रसिंह बोले, ”मुझे सफेद टोपी मिले तो मैं भी उसे पहन सकता हूं। सभा के बीच से किसी ने एक गांधी टोपी चंद्रसिंह की ओर फेंकी। चंद्रसिंह वह टोपी गांधीजी की ओर फेंकते हुए बोले, ”यह बूढ़ा यदि अपने हाथ से मुझे टोपी दे तभी मैं उसे पहनूंगा। ऐसा ही हुआ और चंद्रसिंह ने गोरखा हैट उतार कर सफेद गांधी टोपी धारण कर ली। उस क्षण चंद्रसिंह ने संकल्प लिया कि वह प्राण देकर भी गांधी द्वारा पहनाई गई टोपी के आन-मान की रक्षा करेगा, देश की आजादी के लिए बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने से पीछे नहीं हटेगा और सन् 1930 में उसने उस टोपी की कीमत चुका भी दी।
1929-30 भारत में जारी राजनीतिक हलचल का वर्ष था। 1929 में लाहौर के कांग्रेस अधिवेशन में रावी के तट पर ‘पूर्ण स्वराज्य’ की घोषणा की गई थी। सविनय अवज्ञा आंदोलन की देशभर में धूम मची थी। 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद लाहौर की जेल में यतींद्रदास की शहादत से सारा देश गुस्से से उफन रहा था। भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दिए जाने की चर्चा से देश का वातावरण गरम था। चटगांव में क्रातिकारियों ने शस्त्रागार से हथियार लूट कर अंग्रेज साम्राज्यवादियों को खुली चुनौती दी थी। दिल्ली में वायसराय की गाड़ी को बम से उड़ा देने की कोशिश की गई थी। 12 मार्च, 1930 को गांधीजी के डांडी मार्च ने देशभर में तहलका मचा दिया था। देश के कोने-कोने में विदेशी वस्त्रों की होली जलाई जा रही थी। देश में बदलती हुई परिस्थितियों से चंद्रसिंह जैसा क्रांतिकारी कैसे अप्रभावित रह सकता था?

ऐतिहासिक पेशावर कांडपेशावर कांड भावुकताजन्य सैनिक विद्रोह नहीं था, इसके लिए एक लंबी तैयारी की गई थी। चंद्रसिंह को अपने साथी सैनिकों का सहयोग पाने में तथा उन्हें बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने के लिए तैयार करने में कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ा होगा, इसकी सहज की कल्पना की जा सकती है।
2/18 रायल गढ़वाल राइफल्स के सैनिक पेशावर में हरिसिंह लाइन में थे। चंद्रसिंह और उनके साथी बैरक की एक कोठरी में खिड़कियों पर कंबल डालकर देर रात तक देश में घटने वाली राजनीतिक घटनाओं पर चर्चा किया करते थे। एक दिन छिपते-छिपते चंद्रसिंह अपने दो साथियों के साथ बाजार पहुंचे। उस दिन शाहीबाग में कांग्रेस की सभा हो रही थी। हजारों स्त्री-पुरुष नमक कानून तोडऩे के लिए शाहीबाग में जमा थे। बैरक की उसी कोठरी में फिर चर्चा और विचार-विमर्श हुआ। ‘साम्राज्यवादियों के हाथों हम अपना शोषण नहीं होन देंगेÓ – देशवासियों की यह घोषणा चंद्रसिंह ने शाहीबाग में सुनी थी। ‘हम भी अपने देश के साथ गद्दारी नहीं करेंगे। ऐसा निश्चय किया था चंद्रसिंह और नारायणसिंह गुसाई आदि ने।
23 अप्रैल, 1930 को परेड मैदान में जब सब ओहदेदार जमा थे, एक अंग्रेज कमांडर ने उनसे कहा कि ‘शहर में 98 प्रतिशत मुसलमान, 2 प्रतिशत हिंदुओ को सता रहे हैं। ये मुसलमान हिंदुओं के देवी-देवताओं को गालियां देते हैं, हिंदुओं की बहू-बेटियों की इज्जत लूटते हैं, इसीलिए हिंदुओं की हिफाजत के लिए सरकार बहादुर ने गढ़वाली पल्टन को यहां भेजा है। कल गढ़वाली पल्टन शहर जाएगी और जरूरत पडऩे पर इन मुसलमानों पर गोलियां चलानी पड़ेगी।

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पंकज सिंह महर

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डेवरानी जी के लेख का तीसरा भाग-
 
चंद्रसिंह अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की कुटिल नीति से बखूबी परिचित थे। चालाक अंग्रेज कमांडर के चले जाने पर चंद्रसिंह अपने साथियों से बोले, ”भाइयो! गढ़वाली होने के नाते मुझे भी अपने गढ़वाली भाइयों से कुछ कहना है। गोरे साहब ने अभी जो कुछ कहा है, वह सब गलत है, बेबुनियाद है। असलियत तो यह है कि कांग्रेस में हिंदु भी हैं और मुसलमान भी। अंग्रेज हिंदु-मुसलमान का सवाल उठाकर दोनों में दरार पैदा कर आजादी के आंदोलन को कमजोर करना चाहते हैं। आंदोलन को कुचलने के लिए हमारी पल्टन को कल शहर भेजा जाएगा। अपने ही भाइयों पर गोली चलाने के लिए कल हमसे कहा जाएगा। मैं पूछता हूं, क्या गढ़वाली इसके लिए तैयार हैं? और चंद्रसिंह के इस सवाल के जवाब में मिली-जुली आवाज उभर कर आई, ”नही, हम अपने भाइयों पर गोली नहीं चलाएंगे। फिर बैरक का वही कमरा। कुछ कर गुजरने का दृढ़ निश्चय लेकर सब गढ़वाली सैनिक आने वाले सवेरे की प्रतिक्षा करने लगे।

23 अप्रैल 1930। ‘ए’ कंपनी को शहर जाने के लिए ‘फालइन’ का ओदश। सभी सैनिक हवलदार चंद्रसिंह सहित मोटर-गाडिय़ों में बैठ गए। तभी एक अंग्रेज कप्तान ने चंद्रसिंह को मोटर से उतर जाने को कहा। चंद्रसिंह नीचे उतर गए। शायद किसी ने चंद्रसिंह की शिकायत अंग्रेज कप्तान से कर दी थी, लेकिन बाद में सैनिकों को पानी और रसद पहुंचाने का बहाना बनाकर चंद्रसिंह शहर पहुंच गए।
पेशावर उस दिन उफन रहा था। हजारों स्त्री-पुरुष कांग्रेस के जुलूस में शामिल होने को उमड़ आए थे। इंकलाब-जिंदाबाद के नारों से आसमान गूंज रहा था। आजादी के दीवानों की दीवानगी देखते ही बनती थी। अपार जन समूह का समुद्र ठाटे मार रहा था। उसी समय मोटरसाइकिल पर बैठा एक गोरा सिपाही तेजी से भीड़ को चीरता हुआ आया। कई कुचले गए। कितने ही जमीन पर गिर पड़े। भीड़ उत्तेजित हो गई। गोरे सिपाही की खूब धुनाई की गई और उसकी मोटर-साइकिल पर पेट्रोल डालकर आग लगा दी गई।
यह देखकर अंगे्रज अधिकारी बौखला गए। 2/18 रायल गढ़वाल राइफल की फौज बुलाई गई। कंधों पर राइफल लिए सिपाही शहर के प्रमुख स्थानों पर भेज दिए गए। आकाश में चीलों की भांति हवाई जहाज मंडराने लगे। एक अजीब दहशत का माहौल था। काबुली फाटक के सामने निहत्थे सत्याग्रहियों का जुलूस खड़ा था। उसके ठीक आगे गढ़वाली पल्टन की एक कंपनी तैनात थी। कंपनी कमांडर का हुक्म हुआ, ”सिपाही जुलूस के दायें-बायें जाएं। सिपाहियों ने जुलूस को घेर लिया। फिर आदेश, ”जुलूस को हटाओ। गढ़वाली सिपाहियों ने अपने ही स्थान पर खड़े-खड़े पठान भाइयों से हट जाने को कहा, लेकिन वे हटे नहीं। बस कंपनी कमांडर आग बबूला हो गया। उसे यह हुक्म अदूली बर्दाश्त नहीं हुई और उसने हुक्म दिया, ”गढ़वालीज ओपन फायर…” और फिर एक महान ऐतिहासिक घटना क्षणभर में घटित हो गई। एक कड़कती हुई आवाज कमांडर के पास से ही सुनाई दी, ”गढ़वाली, सीज फायर। और यह आवाज थी वीरवर चंद्रसिंह गढ़वाली की! यह आवाज वह थी जिसमें अंग्रेज साम्राजियों को देश से निकाल बाहर करने की एक खुली चुनौती थी। एक ललकार थी। जुलूस की ओर तनी हुई राइफलें जमीन से टिक गईं। एक अजीब सा सन्नाटा छा गया सारे वातावरण में। दांत पीसते अंग्रेज अधिकारी समझ नहीं पा रहे थे कि यह सब क्यों और कैसे हो गया। फिर बौखलाहट में गोरी पल्टन के एक दस्ते ने मशीनगनों से आग बरसानी शुरू कर दी। सड़क निहत्थे सत्याग्रहियों के खून से लाल हो गई। कई मर गए और कई घायल हो गए। गढ़वाली सिपाहियों के शस्त्र ले लिए गए और उन पर कड़ी निगरानी रखी जाने लगी।
रात को फिर बैठक हुई। एक संयुक्त त्यागपत्र तैयार किया गया कि ”हम ‘ए’ कंपनी नं. 1 प्लाटून 2/18 रायल गढ़वाल राइफल्स सरकार को नोटिस देते हैं कि 24 घंटे के अंदर हमारा इस्तीफा मंजूर किया जाए। 24 अप्रैल, 1930, फिर सिपाहियों को ‘फालइन’ का आदेश दिया गया, लेकिन ‘ए’ कंपनी के ओहदेदार और सिपाही अपनी जगह पर खड़े रहे। कतार में खड़े नहीं हुए। हवलदार मेजर चंद्रसिंह को सूबेदार ने बहुत समझाया, लेकिन उनका एक ही जवाब था, ”हम अपने देश का नमक खाते हैं। अपने भाइयों पर गोली चलाकर हम देश के साथ गद्दारी नहीं करेंगे।
 
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पंकज सिंह महर

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पीताम्बर दत्त डेवरानी जी के लेख का चौथा भाग-
 
बटालियन के सभी ऑफिसर जमा हो गए। सूचना मिलते ही कर्नल बाकर भी पहुंच गया। चंद्रसिंह ने अपनी जेब से इस्तीफा निकालकर कर्नल को थमा दिया। कर्नल अपना सा मुंह लेकर चला गया। तब कैप्टन टकर ने चंद्रसिंह से पूछा, ”क्या आप बताएंगे कि यह बगावत क्यों हुई? निर्भीक चंद्रसिंह ने कहा, ”हम हिंदुस्तानी सिपाही हिंदुस्तान की हिफाजत के लिए भर्ती हुए हैं, न कि अपने भाइयों पर गोली चलाने के लिए। निहत्थी जनता पर सच्चे सिपाहियों का कर्तव्य नहीं कि गोली चलाएं। आप लोग अपने गोरे सिपाहियों के मुकाबले हमें कुत्ते से भी बदतर समझते हैं। हमारे सूबेदार, जमादार आपके एक मामूली गोरे को सलाम करते हैं। आपके एक गोरे को 90 रुपये माहवार वेतन मिलता है और हमारे सिपाहियों को सिर्फ 16 रुपये माहवार! चंद्रसिंह का यह जवाब गोरी सरकार के मुंह पर एक करारा तमाचा था। कुछ देर बाद ही गढ़वाली सिपाहियों को बैरक में कैद कर लिया गया।
सन् 1857 के बाद, गढ़वाली सिपाहियों की अंग्रेजी शासन के खिलाफ ऐतिहासिक क्रांति ने सारे देश को झकझोर दिया। वीर चंद्रसिंह के साथी कोर्ट में हथियार जमा करने के पक्ष में नहीं थे। वे मरने-मारने को तैयार थे, परंतु दूरदर्शी चंद्रसिंह ने अपने साथियों को समझाते हुए कहा, ”साथियो! यदि गढ़वाली पल्टन को यहां अंग्रेजों ने मार कर समाप्त कर दिया तो दूसरी भारतीय पल्टनें डर जाएंगी। फिर कोई अंग्रेजों के खिलाफ सिर उठाने का साहस नहीं करेगा। जो कुछ हमने करना था, वह अच्छी तरह कर लिया है। हमने निहत्थी मुस्लिम जनता पर गोली नहीं चलाई है। इससे गढ़वाल का माथा ऊंचा हुआ है। हमने सच्चे भारतीय सैनिकों के रूप में अपने देश के प्रति कर्तव्य निभाया है। मेरी बात मानें तो आप अपनी राइफलें कोर्ट में जमा कर दें। उनके साथी सैनिकों को यह बात अच्छी नहीं लगी। बीच में से किसी ने तो चिल्लाकर यहां तक कह दिया था, ”यह देशद्रोही हैं। इसे मार डालो। लेकिन फिर उन्हें लगा कि चंद्रसिंह का कहना ठीक है। हथियार जमा न होते तो पहले कुछ अंग्रेज अधिकारी मारे जाते और फिर गढ़वाली पल्टन को गोरों द्वारा भून दिया जाता। सैनिकों की इस क्रांति का सारा मकसद ही व्यर्थ चला जाता। हथियारबंद सैनिकों की अहिंसक क्रांति अपने आप में एक मिसाल बन गई। चंद्रसिंह गढ़वाली और गढ़वाली सैनिकों की जयजयकार से सारा सीमांत प्रदेश गूंजने लगा। एक नई चेतना, नई जागृति सारे देश में हिलोरें लेने लगी। तब लगता था कि जब भारतीय सैनिक ही विद्रोह पर उतर आए है तो अंग्रेज अब गए, तब गए।
अंग्रेज बहुत चालाक थे। वे नहीं चाहते थे कि इस ऐतिहासिक कांड को महत्व मिले। उन्होंने उन 67 सैनिकों का कोर्ट मार्शल किया, जिन्होंने त्यागपत्र में हस्ताक्षर किए थे। 17 ओहदेदारों को अलग-अलग कोठरियों में बंद कर दिया गया और शेष को एक अलग बैरक में बंद कर दिया। कोर्ट मार्शल शुरू हुआ तो चंद्रसिंह ने पैरवी के लिए बैरिस्टर मुकंदीलाल की मांग की, जिसे मान लिया गया। बैरिस्टर मुकंदीलाल कैप्टन टकर और कैप्टन चैनल के साथ वीर चंद्रसिंह से मिले। उल्लेखनीय है कि गढ़वाल के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर ने बैरिस्टर मुकंदीलाल को तब एक तार भेजा था कि ‘सबका ध्यान एबटाबाद की ओर लगा है।’ डिप्टी कमिश्नर जानता था कि यदि गढ़वाली सैनिकों को प्राणदंड दिया गया तो सारे गढ़वाल में भयंकर क्रांति हो जाएगी।
 
अगली पोस्ट में अंतिम भाग।