Author Topic: D.D Pant famous physicist  (Read 9701 times)

shailesh

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D.D Pant famous physicist
« on: June 12, 2008, 02:11:06 PM »
शिक्षाशास्त्री प्रो. डीडी पंत का देहावसान
 हल्द्वानी: महान शिक्षाविद्, कुमाऊं विश्र्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति व उक्रांद के संस्थापक प्रो. डीडी पंत अब इस दुनिया में नहीं रहे। वह 90 साल के थे। बुधवार को उन्होंने अपने आवास पर अंतिम सांस ली। शाम को रानीबाग स्थित चित्रशिला घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया। शिक्षा जगत में महान योगदान देने वाले प्रो.पंत लंबे समय से बीमार चल रहे थे। बुधवार को उनका निधन हो गया। वे अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़ गये हैं। शाम के समय रानीबाग स्थित चित्रशिला घाट में तक उनकी शव यात्रा निकाली गयी। उनकी अंतिम यात्रा में सैकड़ों लोग शामिल हुये। घाट पर उनके बड़े पुत्र समेत भतीजों ने मुखाग्नि दी। उनका जन्म नवंबर 1918 में पिथौरागढ़ जनपद के देवराड़ी पंत में हुआ। प्रो. पंत राज्य की सबसे बड़ी क्षेत्रीय पार्टी उत्तराखंड क्रांति दल के संस्थापक भी रहे हैं। उनके दो पुत्र राजेन्द्र पंत व कौशल पंत में दो वर्ष पूर्व कौशल का निधन हो गया था। उनकी तीन लड़कियां हैं इसमें सबसे बड़ी लड़की दीपा सिंह है जिनके पति गढ़वाल विश्र्वविद्यालय के कुलपति रह चुके हैं। दूसरी लड़की डा. मीरा भट्ट और तीसरी लड़की डा. बीना श्रीवास्तव जो अलीगढ़ में मुख्य चिकित्साधिकारी पद पर कार्यरत है। उनके निधन की सूचना मिलते ही उनके आवास पर शोक संवेदना व्यक्त करने वालों का तांता लग गया। इनमें गढ़वाल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. एसपी सिंह, कानपुर आईआईटी के सेवानिवृत प्रो. एचडी बिष्ट, उच्च शिक्षा के पूर्व निदेशक पीसी बाराकोटी, एमबी पीजी कालेज के प्राचार्य एमसी पाण्डे, वरिष्ठ लेखाकार केडी परगाई, वीर सिंह, बिष्ट, केएस जलाल, विकास पाण्डेय, पूर्व डीजीपी बीडी खर्कवाल, कुमाऊं विश्र्वविद्यालय के कविता पाण्डेय, डा हीरा बल्लभ त्रिपाठी, उक्रांद के अध्यक्ष नारायण सिंह जंतवाल समेत सैकड़ों लोग उपस्थित थे।



महान भौतिकविद डॉक्टर डी. डी. पंत
by Asutosh, source:http://bugyaal.blogspot.com
(आप रौशनी हैं हमारे लिए)




यह वाकया उस जमाने का है, जब देश को आजादी मिली ही थी। हिमालय के दूर-दराज गांव के अत्यंत विपन्न परिवार का एक छात्र नोबेल विजेता और महान भौतिकविद सर सी.वी. रमन की प्रयोगशाला (रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट, बेंगलूर) में अपना शोधकार्य समेट रहा था। घर की माली हालत बेहद खराब थी। रमन साहब ने उसे भारतीय मौसम विभाग की शानदार नौकरी कर लेने का सुझाव दिया। गांधी को अपना आदर्श मानने वाले छात्र को निर्देशक का प्रस्ताव कुछ जंचा नहीं- मैं आपकी तरह शिक्षक बनना चाहता हूं। रमन साहब हंस पड़े, बोले- तब तुम जीवन भर गरीब और उपेक्षित ही रहोगे।

रमन साहब की बात सचमुच सही साबित हुई। हजारों छात्रों के लिए सफलता की राह तैयार करने वाले प्रो. देवी दत्त पन्त अपने जीवन की संध्या में आज भी लगभग गुमनाम और उपेक्षित हैं। बीती सदी के पांचवें दशक में जब नैनीताल में डीएसबी कालेज की स्थापना हुई तो प्रो. पन्त भौतिकविज्ञान विभाग का अध्यक्ष पद संभालने आगरा कालेज से यहां पहुंचे। वह स्पेक्ट्रोस्कोपी के आदमी थे और उन्होंने यहां फोटोफिजिक्स लैब की बुनियाद डाली। जाने-माने भौतिकशास्त्री और इप्टा (इंडियन फिजिक्स टीचर्स ऐसोसिएशन) के संस्थापक डी.पी. खण्डेलवाल उनके पहले शोधछात्र बने। उस जमाने में शोध को आर्थिक मदद देने वाली संस्थाएं नहीं थीं। दूसरे विश्वयुद्ध के टूटे-फूटे उपकरण कबाडि़यों के पास मिल जाया करते थे और पन्त साहब अपने मतलब के पुर्जे वहां जाकर जुटा लेते थे। कबाड़ के जुगाड़ से लैब का पहला टाइम डोमेन स्पेक्ट्रोमीटर तैयार हुआ। इस उपकरण की मदद से पन्त और खण्डेलवाल की जोड़ी ने अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण शोधकार्य किया। यूरेनियम के लवणों की स्पेक्ट्रोस्कोपी पर हुए इस शोध ने देश-विदेश में धूम मचाई। इस विषय पर लिखी गई अब तक की सबसे चर्चित पुस्तक (फोटोकैमिस्ट्री ऑफ यूरेनाइल कंपाउंड्स, ले. राबिनोविच एवं बैडफोर्ड) में पन्त और खण्डेलवाल के काम का दर्जनों बार उल्लेख हुआ है। शोध की चर्चा अफवाहों की शक्ल में वैज्ञानिक बिरादरी से बाहर पहुंची। आज भी जिक्र छिड़ने पर पुराने लोग बताते हैं- प्रो. पन्त ने तब एक नई किरण की खोज की थी, जिसे `पन्त रे´ नाम दिया गया। इस मान्यता को युरेनियम लवणों पर उनके शोध का लोकfप्रय तर्जुमा कहना ठीक होगा।

कुछ समय बाद प्रो. पन्त डीएसबी कालेज के प्रिंसिपल बना दिए गए। उनके कार्यकाल को डीएसबी का स्वर्णयुग माना जाता है। न केवल कालेज के पठन-पाठन का स्तर नई ऊंचाइयों तक पहुंचा बल्कि प्रो. पन्त की पहल पर छात्रों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अलग से कक्षाएं लगने लगीं। एक बेहद पिछड़े पहाड़ी इलाके के लिए इस पहल का खास अर्थ था। उस जमाने में शहरों में पहुंचने वाले किसी पहाड़ी नौजवान की पहली छवि अमूमन ईमानदार घरेलू नौकर की होती थी। पहाड़ की जवानी मैदान के ढाबों में बर्तन धोते या फिर सीमा पर पहरेदारी करते बीतती थी। ऊंची नौकरियों में इक्का-दुक्का भाग्यशाली ही पहुंच पाते थे। प्रो। पन्त के बनाए माहौल ने गरीब घरों के सैकड़ों छात्रों को देश-विदेश में नाम कमाने लायक बनाया। उस जमाने के जाने कितने छात्र आज भी अपनी सफलता का श्रेय देते हुए उन्हें श्रद्धापूर्वक याद करते हैं।

बाद में प्रो. पन्त उत्तर प्रदेश के शिक्षा निदेशक और कुमाऊं विश्वविद्यालय की स्थापना होने पर इसके पहले वाइस चांसलर बने। इस विश्वविद्यालय के साथ उनके सपने जुड़े थे। कुमाऊं व गढ़वाल विश्वविद्यालयों की स्थापना भारी राजनीतिक दबाव में एक साथ की गई थी। राज्य सरकार ने इन्हें खोलने की घोषणा तो कर दी लेकिन संसाधनों के नाम पर ठेंगा दिखा दिया। प्रो. पन्त इसे नामी-गिरामी विश्वविद्यालयों की कतार में लाना चाहते थे। इसलिए जब-जब कोई अपनी हैसियत की आड़ में विश्वविद्यालय को समेटने की कोशिश करता, वह पूरी ताकत से प्रतिरोध करते। तत्कालीन गवर्नर (और कुलाधिपति) एम् चेन्ना रेड्डी से प्रो. पन्त की ऐतिहासिक भिड़ंत को कौन भुला सकता है! एम् चेन्ना रेड्डी अपने किसी खासमखास ज्योतिषी को मानद डाक्टरेट दिलवाना चाहते थे। प्रो. पन्त के कुलपति रहते यह कैसे संभव था! वह अड़े और अंतत: जब बात बनती नजर नहीं आयी तो इस्तीफा देकर बाहर निकल आए। प्रो. पन्त के इस्तीफे की भारी प्रतिक्रिया हुई। लोग सड़कों पर उतर आए और अंतत: गवर्नर को झुकना पड़ा। पन्त साहब ने वापस वीसी की कुर्सी संभाली।

प्रशासनिक जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद प्रो. पन्त अपनी लैब में वापस लौट आए और रिसर्च में जुट गए। दूसरी प्रयोगशालाओं और शोध निर्देशकों से कई मायनों में प्रो. पन्त बिलकुल अलग थे। लैब की नियमित बातचीत में नए शोधछात्रों के बचकाने तर्कों को भी वह बड़ी गंभीरता से सुनते और उनकी कमजोरियों को दूर करते। उनकी मेज के सामने लगे बोर्ड पर छात्र बारी-बारी से अपनी प्रॉब्लम पर चर्चा करते और अंत में प्रो. पन्त खुद उठकर बोर्ड के सामने पहुंच जाते। वैज्ञानिक दृष्टि के बुनियादी मूल्य भाषणों के बजाय उनके व्यवहार से छात्रों को मिलते थे। एक बार अपने एक प्रतिभाशाली छात्र (डा. प्रेम बल्लभ बिष्ट, जो अब आईआईटी मद्रास में प्रोफेसर हैं) के शोधपत्र में दिए गए विश्लेषण से वह संतुष्ट नहीं हो पा रहे थे। बिष्ट भी अपने तर्कों से समझौता करने को तैयार नहीं थे। अंत में प्रो. पन्त ने बेहद विनम्रता से कहा- तुम्हारी बात में दम है, हालांकि मैं इससे सहमत नहीं हूं। अब ऐसा करो, मेरा नाम लेखकों में शामिल करने के बजाय एकनॉलेजमेंट्स में डालकर पेपर छपने भेज दो। खोखली प्रोफेसरी के वजन से छात्रों को दबाए रखने वाले और ठीकपने की व्याधि से ग्रस्त विश्वविद्यालयी प्राध्यापकों की भीड़ में प्रो. पन्त अलग चमकते थे। उन्होंने माइकल कासा और हाईजेनबर्ग (Heisenberg received Nobel prize in 1932  )  जैसे दिग्गज नोबेल विजेताओं के साथ काम किया था। ये दोनों वैज्ञानिक प्रो. पन्त की प्रतिभा के कायल थे और कई वर्षों तक उन्हें अमेरिका आकर काम करने के लिए उकसाते रहे। कासा से उनकी गहरी दोस्ती थी। वह हर साल क्रिसमस के आसपास उनका पत्र प्रो. पन्त की टेबल पर रखा मिलता।

अब तक अलग उत्तराखंड राज्य की मांग उठने लगी थी। प्रो. पन्त `स्मॉल इज ब्यूटीफुल´ के जबर्दस्त मुरीद थे। बड़े प्रदेश की सरकार के साथ उनके अनुभवों ने भी उन्हें छोटे राज्य की अहमियत से वाकिफ कराया और वह उत्तराखण्ड राज्य की मांग के मुखर समर्थक बन गए। इसलिए, जब अलग राज्य के लिए उत्तराखण्ड क्रांति दल का गठन हुआ तो नेतृत्व के लिए प्रो. पन्त के नाम पर भला किसको आपत्ति होती। और इस तरह विज्ञान की सीधी-सच्ची राह से वह राजनीतिक की भूल-भुलैया में निकल आए। उन्होंने यूकेडी के टिकट पर अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ सीट से लोकसभा के लिए चुनाव लड़ा और जमानत जब्त करवाई। शायद पेशेवर घुन्ने नेताओं के सामने लोगों को सीधा-सरल वैज्ञानिक हजम नहीं हुआ।
 
बचपन

प्रो. पन्त का जन्म 1919 में आज के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ गांव देवराड़ी में हुआ था। प्राथमिक शिक्षा गांव के स्कूल में हुई। पिता अम्बा दत्त वैद्यकी से गुजर-बसर करते थे। बालक देवी की कुशाग्र बुfद्ध गांव में चर्चा का विषय बनी तो पिता के सपनों को भी पंख लगे लगे। किसी तरह पैसे का इंतजाम कर उन्होंने बेटे को कांडा के जूनियर हाईस्कूल और बाद में इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई के लिए अल्मोड़ा भेजा। आजादी की लड़ाई की आंच अल्मोड़ा भी पहुंच चुकी थी। देवी दत्त को नई आबोहवा से और आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली।

घर के माली हालात आगे पढ़ने की इजाजत नहीं देते थे। तभी पिता के एक मित्र बैतड़ी (सीमापार पश्चिमी नेपाल का एक जिला) के एक संपन्न परिवार की लड़की का रिश्ता लेकर आए। पिता-पुत्र दोनों को लगा कि शायद यह रिश्ता आगे की पढ़ाई का रास्ता खोल दे। इस तरह इंटरमीडिएट के परीक्षाफल का इंतजार कर रहे देवीदत्त पढ़ाई जारी रखने की आस में दांपत्य जीवन में बंध गए। इंटरमीडिएट के बाद देवी दत्त ने बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी में दाखिला लिया। यहां उन्होंने भौतिकविज्ञान में मास्टर्स डिग्री पाई। ख्यातिनाम विभागाध्यक्ष प्रो. आसुंदी को इस प्रतिभाशाली छात्र से बेहद स्नेह था। देवी उन्हीं के निर्देशन में पीएच डी करना चाहते थे। प्रो. आसुंदी ने वजीफे के लिए तत्कालीन वाइस चांसलर डा. राधाकृष्णन से मिलने का सुझाव दिया। पन्त अर्जी लेकर राधाकृष्णन के पास पहुंचे। राधाकृष्णन स्पांडिलाइटिस के कारण आरामकुर्सी पर लेटकर काम करते थे। पन्त की अर्जी देख उनका जायका बिगड़ गया। बोले- आसुंदी आखिर कितने छात्रों को स्कॉलरशिप दिलाना चाहते हैं। हमारे पास अब पैसा नहीं है। निराश देवी दत्त वापस लौट आए। आसुंदी ने उन्हें ढाढ़स बंधाया और बेंगलूर में रमन साहब के पास जाकर रिसर्च करने को कहा। इस तरह देवराड़ी का देवी दत्त महान वैज्ञानिक सर सी.वी. रमन का शिष्य बन गया।

नैनाताल परिसर की फोटोफिजिक्स लैब प्रो. के नाम से देश की विज्ञान बिरादरी में जानी जाती है। इस लैब से उन्हें बेहद प्यार था। अपनी आधी-अधूरी आत्मकथा की भूमिका में एक जगह उन्होंने लिखा है कि वह मृत्युपर्यंत लैब के अपने कमरे से जुड़े रहना चाहेंगे। लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था। रहस्यमय परिस्थितियों में एक दिन फिजिक्स डिपार्टमेंट का पूरा भवन आग की भेंट चढ़ गया। संभवत: यह फोटोफिजिक्स लैब के अवसान की भी शुरुआत थी। कई वर्षों तक अस्थाई भवन में लैब का अस्तित्व बनाए रखने की कोशिश की गई। बाद में फिजिक्स डिपार्टमेंट के भवन का पुनर्निर्माण हुआ तो फोटोफिजिक्स लैब को भी अपनी पुरानी जगह मिली। लेकिन अब इसका निश्चेत शरीर ही बाकी था, आत्मा तो शायद आग के साथ भस्मीभूत हो गई। प्रो. पन्त का स्वास्थ्य भी अब पहले जैसा नहीं रहा। वह नैनीताल छोड़ हल्द्वानी रहने लगे। इस लैब ने कई ख्यातनाम वैज्ञानिक दिए और कुमाऊं जैसे गुमनाम विश्वविद्यालय की इस साधनहीन प्रयोगशाला ने फोटोफिजिक्स के दिग्गजों के बीच अपनी खास जगह बनाई।

जिस किसी को प्रो. पन्त के साथ काम करने का सौभाग्य मिला, वह उनकी बच्चों जैसी निश्छलता, उनकी बुfद्धमत्ता, ईमानदारी से सनी उनकी खुद्दारी और प्रेम का मुरीद हुए बिना नहीं रहा। निराशा जैसे उनके स्वभाव में है ही नहीं। चाहे वह रिसर्च का काम हो या फिर कोई सामाजिक सरोकार, प्रो. पन्त पहल लेने को उतावले हो जाते। अपने छात्रों को वह अक्सर चुप बैठे रहने पर लताड़ते और आवाज उठाने को कहते। गांधी के विचारों को उनकी जुबान ही नहीं, जीवन में भी पैठे हुए देखा जा सकता है। जो कहते वही करते और ढोंग के लिए कहीं जगह नहीं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि अगर आप अपने विचारों पर दृढ़ रहें तो हताशा, निराशा और दु:ख मुश्किल से मुश्किल हालात में भी आपको नहीं घेरेंगे।

गांधी के रास्ते पर चलने वाले प्रो. पन्त का ecology में गहरा विश्वास है। वह अक्सर कहते हैं कि कुदरत मुफ़्त में कुछ नहीं देती और हर सुविधा की कीमत चुकानी पड़ती है। अपने जीवन में उन्होंने बहुत कम सुविधाएं इस्तेमाल कीं लेकिन बदले में उनकी जरूरत से ज्यादा कीमत चुकाई।

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Re: D.D Pant famous physicist
« Reply #1 on: June 12, 2008, 02:15:14 PM »
पंत का भौतिकी में अभूतपूर्व योगदान
जागरण संवाददाता, हल्द्वानी: महान शिक्षाविद् प्रो. डीडी पंत नाम, सम्मान व पद प्रतिष्ठा की दौड़ से हमेशा दूर रहे। उन्होंने शिक्षा के प्रति जीवन को समर्पित कर दिया। कुमाऊं विश्र्वविद्यालय का नाम राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय जगत में रोशन किया। शिक्षा जगत में उनका अभूतपूर्व योगदान अविस्मरणीय रहेगा। पिथौरागढ़ जनपद के देवराड़ी ग्राम नवंबर 1918 में जन्मे प्रो. पंत की आरंभिक पढ़ाई गांव में ही हुई। हाईस्कूल व इंटरमीडिएट की शिक्षा अल्मोड़ा से हासिल करने के बाद वर्ष बनारस चले गये। बनारस हिन्दू विश्र्वविद्यालय से भौतिक विज्ञान के स्पेक्ट्रास्कोपी विषय में विशेषज्ञता के साथ ही एमएससी की डिग्री हासिल की। मेधावी छात्र के रुप में पहचान बनाने वाले प्रो. पंत ने भाभा एटोमिक सेंटर के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. आर के अंसुडी के निर्देशन में डाक्टर ऑफ साईस की उपाधि प्रदान की। प्रो. पंत ने देश के पहले नोबल पुरस्कार विजेता सीबी रमन के साथ दो वर्ष कार्य किया। वर्ष 1951-52 में नैनीताल आ गये। यहां पर डीएसबी में भौतिकी के अध्यक्ष रहे। इसके बाद वर्ष 1971 में उत्तर प्रदेश के शिक्षानिदेशक रहे। उन्होंने कुमाऊं विश्र्वविद्यालय के निर्माण को अपना भरपूर योगदान दिया। 1973 में कुमाऊं विश्र्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति बने। उन्होंने कुमाऊं विश्र्वविद्यालय का नाम राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन किया। शिक्षा जगत में अभूतपूर्व योगदान देते हुये 20 पीएचडी दी और 150 शोध पत्र प्रस्तुत किये। उन्हें प्रतिष्ठित शांति स्वरुप भटनागर पुरस्कार से भी नवाजा गया। इसके अलावा प्रो. पंत रमन सेन्टेनरी स्वर्ण पदक, फैलो ऑफ इंडियन एकेडमी ऑफ साईस, फुल ब्राइट स्कॉलर समेत कई पुस्कार व सम्मान से नवाजे गये थे। अमेरिका की सिग्मा साई सोसाइटी का सदस्य होने का गौरव भी उन्हें प्राप्त था। प्रो. पंत विद्यार्थी जीवन में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से मिले थे। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में समर्पित होने की इच्छा जाहिर की की लेकिन गांधी जी ने उन्हें अपने क्षेत्र में ही रहकर कार्य करने की प्रेरणा दी थी।

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Tribute to D.D Pant famous physicist
« Reply #2 on: June 12, 2008, 02:22:06 PM »
शिक्षाशास्त्री प्रो. डीडी पंत का देहावसान
 हल्द्वानी: महान शिक्षाविद्, कुमाऊं विश्र्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति व उक्रांद के संस्थापक प्रो. डीडी पंत अब इस दुनिया में नहीं रहे। वह 90 साल के थे। बुधवार को उन्होंने अपने आवास पर अंतिम सांस ली। शाम को रानीबाग स्थित चित्रशिला घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया। शिक्षा जगत में महान योगदान देने वाले प्रो.पंत लंबे समय से बीमार चल रहे थे। बुधवार को उनका निधन हो गया। वे अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़ गये हैं। शाम के समय रानीबाग स्थित चित्रशिला घाट में तक उनकी शव यात्रा निकाली गयी। उनकी अंतिम यात्रा में सैकड़ों लोग शामिल हुये। घाट पर उनके बड़े पुत्र समेत भतीजों ने मुखाग्नि दी। उनका जन्म नवंबर 1918 में पिथौरागढ़ जनपद के देवराड़ी पंत में हुआ। प्रो. पंत राज्य की सबसे बड़ी क्षेत्रीय पार्टी उत्तराखंड क्रांति दल के संस्थापक भी रहे हैं। उनके दो पुत्र राजेन्द्र पंत व कौशल पंत में दो वर्ष पूर्व कौशल का निधन हो गया था। उनकी तीन लड़कियां हैं इसमें सबसे बड़ी लड़की दीपा सिंह है जिनके पति गढ़वाल विश्र्वविद्यालय के कुलपति रह चुके हैं। दूसरी लड़की डा. मीरा भट्ट और तीसरी लड़की डा. बीना श्रीवास्तव जो अलीगढ़ में मुख्य चिकित्साधिकारी पद पर कार्यरत है। उनके निधन की सूचना मिलते ही उनके आवास पर शोक संवेदना व्यक्त करने वालों का तांता लग गया। इनमें गढ़वाल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. एसपी सिंह, कानपुर आईआईटी के सेवानिवृत प्रो. एचडी बिष्ट, उच्च शिक्षा के पूर्व निदेशक पीसी बाराकोटी, एमबी पीजी कालेज के प्राचार्य एमसी पाण्डे, वरिष्ठ लेखाकार केडी परगाई, वीर सिंह, बिष्ट, केएस जलाल, विकास पाण्डेय, पूर्व डीजीपी बीडी खर्कवाल, कुमाऊं विश्र्वविद्यालय के कविता पाण्डेय, डा हीरा बल्लभ त्रिपाठी, उक्रांद के अध्यक्ष नारायण सिंह जंतवाल समेत सैकड़ों लोग उपस्थित थे।



महान भौतिकविद डॉक्टर डी. डी. पंत
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(आप रौशनी हैं हमारे लिए)



यह वाकया उस जमाने का है, जब देश को आजादी मिली ही थी। हिमालय के दूर-दराज गांव के अत्यंत विपन्न परिवार का एक छात्र नोबेल विजेता और महान भौतिकविद सर सी.वी. रमन की प्रयोगशाला (रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट, बेंगलूर) में अपना शोधकार्य समेट रहा था। घर की माली हालत बेहद खराब थी। रमन साहब ने उसे भारतीय मौसम विभाग की शानदार नौकरी कर लेने का सुझाव दिया। गांधी को अपना आदर्श मानने वाले छात्र को निर्देशक का प्रस्ताव कुछ जंचा नहीं- मैं आपकी तरह शिक्षक बनना चाहता हूं। रमन साहब हंस पड़े, बोले- तब तुम जीवन भर गरीब और उपेक्षित ही रहोगे।

रमन साहब की बात सचमुच सही साबित हुई। हजारों छात्रों के लिए सफलता की राह तैयार करने वाले प्रो. देवी दत्त पन्त अपने जीवन की संध्या में आज भी लगभग गुमनाम और उपेक्षित हैं। बीती सदी के पांचवें दशक में जब नैनीताल में डीएसबी कालेज की स्थापना हुई तो प्रो. पन्त भौतिकविज्ञान विभाग का अध्यक्ष पद संभालने आगरा कालेज से यहां पहुंचे। वह स्पेक्ट्रोस्कोपी के आदमी थे और उन्होंने यहां फोटोफिजिक्स लैब की बुनियाद डाली। जाने-माने भौतिकशास्त्री और इप्टा (इंडियन फिजिक्स टीचर्स ऐसोसिएशन) के संस्थापक डी.पी. खण्डेलवाल उनके पहले शोधछात्र बने। उस जमाने में शोध को आर्थिक मदद देने वाली संस्थाएं नहीं थीं। दूसरे विश्वयुद्ध के टूटे-फूटे उपकरण कबाडि़यों के पास मिल जाया करते थे और पन्त साहब अपने मतलब के पुर्जे वहां जाकर जुटा लेते थे। कबाड़ के जुगाड़ से लैब का पहला टाइम डोमेन स्पेक्ट्रोमीटर तैयार हुआ। इस उपकरण की मदद से पन्त और खण्डेलवाल की जोड़ी ने अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण शोधकार्य किया। यूरेनियम के लवणों की स्पेक्ट्रोस्कोपी पर हुए इस शोध ने देश-विदेश में धूम मचाई। इस विषय पर लिखी गई अब तक की सबसे चर्चित पुस्तक (फोटोकैमिस्ट्री ऑफ यूरेनाइल कंपाउंड्स, ले. राबिनोविच एवं बैडफोर्ड) में पन्त और खण्डेलवाल के काम का दर्जनों बार उल्लेख हुआ है। शोध की चर्चा अफवाहों की शक्ल में वैज्ञानिक बिरादरी से बाहर पहुंची। आज भी जिक्र छिड़ने पर पुराने लोग बताते हैं- प्रो. पन्त ने तब एक नई किरण की खोज की थी, जिसे `पन्त रे´ नाम दिया गया। इस मान्यता को युरेनियम लवणों पर उनके शोध का लोकfप्रय तर्जुमा कहना ठीक होगा।

कुछ समय बाद प्रो. पन्त डीएसबी कालेज के प्रिंसिपल बना दिए गए। उनके कार्यकाल को डीएसबी का स्वर्णयुग माना जाता है। न केवल कालेज के पठन-पाठन का स्तर नई ऊंचाइयों तक पहुंचा बल्कि प्रो. पन्त की पहल पर छात्रों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अलग से कक्षाएं लगने लगीं। एक बेहद पिछड़े पहाड़ी इलाके के लिए इस पहल का खास अर्थ था। उस जमाने में शहरों में पहुंचने वाले किसी पहाड़ी नौजवान की पहली छवि अमूमन ईमानदार घरेलू नौकर की होती थी। पहाड़ की जवानी मैदान के ढाबों में बर्तन धोते या फिर सीमा पर पहरेदारी करते बीतती थी। ऊंची नौकरियों में इक्का-दुक्का भाग्यशाली ही पहुंच पाते थे। प्रो। पन्त के बनाए माहौल ने गरीब घरों के सैकड़ों छात्रों को देश-विदेश में नाम कमाने लायक बनाया। उस जमाने के जाने कितने छात्र आज भी अपनी सफलता का श्रेय देते हुए उन्हें श्रद्धापूर्वक याद करते हैं।

बाद में प्रो. पन्त उत्तर प्रदेश के शिक्षा निदेशक और कुमाऊं विश्वविद्यालय की स्थापना होने पर इसके पहले वाइस चांसलर बने। इस विश्वविद्यालय के साथ उनके सपने जुड़े थे। कुमाऊं व गढ़वाल विश्वविद्यालयों की स्थापना भारी राजनीतिक दबाव में एक साथ की गई थी। राज्य सरकार ने इन्हें खोलने की घोषणा तो कर दी लेकिन संसाधनों के नाम पर ठेंगा दिखा दिया। प्रो. पन्त इसे नामी-गिरामी विश्वविद्यालयों की कतार में लाना चाहते थे। इसलिए जब-जब कोई अपनी हैसियत की आड़ में विश्वविद्यालय को समेटने की कोशिश करता, वह पूरी ताकत से प्रतिरोध करते। तत्कालीन गवर्नर (और कुलाधिपति) एम् चेन्ना रेड्डी से प्रो. पन्त की ऐतिहासिक भिड़ंत को कौन भुला सकता है! एम् चेन्ना रेड्डी अपने किसी खासमखास ज्योतिषी को मानद डाक्टरेट दिलवाना चाहते थे। प्रो. पन्त के कुलपति रहते यह कैसे संभव था! वह अड़े और अंतत: जब बात बनती नजर नहीं आयी तो इस्तीफा देकर बाहर निकल आए। प्रो. पन्त के इस्तीफे की भारी प्रतिक्रिया हुई। लोग सड़कों पर उतर आए और अंतत: गवर्नर को झुकना पड़ा। पन्त साहब ने वापस वीसी की कुर्सी संभाली।

प्रशासनिक जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद प्रो. पन्त अपनी लैब में वापस लौट आए और रिसर्च में जुट गए। दूसरी प्रयोगशालाओं और शोध निर्देशकों से कई मायनों में प्रो. पन्त बिलकुल अलग थे। लैब की नियमित बातचीत में नए शोधछात्रों के बचकाने तर्कों को भी वह बड़ी गंभीरता से सुनते और उनकी कमजोरियों को दूर करते। उनकी मेज के सामने लगे बोर्ड पर छात्र बारी-बारी से अपनी प्रॉब्लम पर चर्चा करते और अंत में प्रो. पन्त खुद उठकर बोर्ड के सामने पहुंच जाते। वैज्ञानिक दृष्टि के बुनियादी मूल्य भाषणों के बजाय उनके व्यवहार से छात्रों को मिलते थे। एक बार अपने एक प्रतिभाशाली छात्र (डा. प्रेम बल्लभ बिष्ट, जो अब आईआईटी मद्रास में प्रोफेसर हैं) के शोधपत्र में दिए गए विश्लेषण से वह संतुष्ट नहीं हो पा रहे थे। बिष्ट भी अपने तर्कों से समझौता करने को तैयार नहीं थे। अंत में प्रो. पन्त ने बेहद विनम्रता से कहा- तुम्हारी बात में दम है, हालांकि मैं इससे सहमत नहीं हूं। अब ऐसा करो, मेरा नाम लेखकों में शामिल करने के बजाय एकनॉलेजमेंट्स में डालकर पेपर छपने भेज दो। खोखली प्रोफेसरी के वजन से छात्रों को दबाए रखने वाले और ठीकपने की व्याधि से ग्रस्त विश्वविद्यालयी प्राध्यापकों की भीड़ में प्रो. पन्त अलग चमकते थे। उन्होंने माइकल कासा और हाईजेनबर्ग (Heisenberg received Nobel prize in 1932  )  जैसे दिग्गज नोबेल विजेताओं के साथ काम किया था। ये दोनों वैज्ञानिक प्रो. पन्त की प्रतिभा के कायल थे और कई वर्षों तक उन्हें अमेरिका आकर काम करने के लिए उकसाते रहे। कासा से उनकी गहरी दोस्ती थी। वह हर साल क्रिसमस के आसपास उनका पत्र प्रो. पन्त की टेबल पर रखा मिलता।

अब तक अलग उत्तराखंड राज्य की मांग उठने लगी थी। प्रो. पन्त `स्मॉल इज ब्यूटीफुल´ के जबर्दस्त मुरीद थे। बड़े प्रदेश की सरकार के साथ उनके अनुभवों ने भी उन्हें छोटे राज्य की अहमियत से वाकिफ कराया और वह उत्तराखण्ड राज्य की मांग के मुखर समर्थक बन गए। इसलिए, जब अलग राज्य के लिए उत्तराखण्ड क्रांति दल का गठन हुआ तो नेतृत्व के लिए प्रो. पन्त के नाम पर भला किसको आपत्ति होती। और इस तरह विज्ञान की सीधी-सच्ची राह से वह राजनीतिक की भूल-भुलैया में निकल आए। उन्होंने यूकेडी के टिकट पर अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ सीट से लोकसभा के लिए चुनाव लड़ा और जमानत जब्त करवाई। शायद पेशेवर घुन्ने नेताओं के सामने लोगों को सीधा-सरल वैज्ञानिक हजम नहीं हुआ।
 
बचपन

प्रो. पन्त का जन्म 1919 में आज के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ गांव देवराड़ी में हुआ था। प्राथमिक शिक्षा गांव के स्कूल में हुई। पिता अम्बा दत्त वैद्यकी से गुजर-बसर करते थे। बालक देवी की कुशाग्र बुfद्ध गांव में चर्चा का विषय बनी तो पिता के सपनों को भी पंख लगे लगे। किसी तरह पैसे का इंतजाम कर उन्होंने बेटे को कांडा के जूनियर हाईस्कूल और बाद में इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई के लिए अल्मोड़ा भेजा। आजादी की लड़ाई की आंच अल्मोड़ा भी पहुंच चुकी थी। देवी दत्त को नई आबोहवा से और आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली।

घर के माली हालात आगे पढ़ने की इजाजत नहीं देते थे। तभी पिता के एक मित्र बैतड़ी (सीमापार पश्चिमी नेपाल का एक जिला) के एक संपन्न परिवार की लड़की का रिश्ता लेकर आए। पिता-पुत्र दोनों को लगा कि शायद यह रिश्ता आगे की पढ़ाई का रास्ता खोल दे। इस तरह इंटरमीडिएट के परीक्षाफल का इंतजार कर रहे देवीदत्त पढ़ाई जारी रखने की आस में दांपत्य जीवन में बंध गए। इंटरमीडिएट के बाद देवी दत्त ने बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी में दाखिला लिया। यहां उन्होंने भौतिकविज्ञान में मास्टर्स डिग्री पाई। ख्यातिनाम विभागाध्यक्ष प्रो. आसुंदी को इस प्रतिभाशाली छात्र से बेहद स्नेह था। देवी उन्हीं के निर्देशन में पीएच डी करना चाहते थे। प्रो. आसुंदी ने वजीफे के लिए तत्कालीन वाइस चांसलर डा. राधाकृष्णन से मिलने का सुझाव दिया। पन्त अर्जी लेकर राधाकृष्णन के पास पहुंचे। राधाकृष्णन स्पांडिलाइटिस के कारण आरामकुर्सी पर लेटकर काम करते थे। पन्त की अर्जी देख उनका जायका बिगड़ गया। बोले- आसुंदी आखिर कितने छात्रों को स्कॉलरशिप दिलाना चाहते हैं। हमारे पास अब पैसा नहीं है। निराश देवी दत्त वापस लौट आए। आसुंदी ने उन्हें ढाढ़स बंधाया और बेंगलूर में रमन साहब के पास जाकर रिसर्च करने को कहा। इस तरह देवराड़ी का देवी दत्त महान वैज्ञानिक सर सी.वी. रमन का शिष्य बन गया।

नैनाताल परिसर की फोटोफिजिक्स लैब प्रो. के नाम से देश की विज्ञान बिरादरी में जानी जाती है। इस लैब से उन्हें बेहद प्यार था। अपनी आधी-अधूरी आत्मकथा की भूमिका में एक जगह उन्होंने लिखा है कि वह मृत्युपर्यंत लैब के अपने कमरे से जुड़े रहना चाहेंगे। लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था। रहस्यमय परिस्थितियों में एक दिन फिजिक्स डिपार्टमेंट का पूरा भवन आग की भेंट चढ़ गया। संभवत: यह फोटोफिजिक्स लैब के अवसान की भी शुरुआत थी। कई वर्षों तक अस्थाई भवन में लैब का अस्तित्व बनाए रखने की कोशिश की गई। बाद में फिजिक्स डिपार्टमेंट के भवन का पुनर्निर्माण हुआ तो फोटोफिजिक्स लैब को भी अपनी पुरानी जगह मिली। लेकिन अब इसका निश्चेत शरीर ही बाकी था, आत्मा तो शायद आग के साथ भस्मीभूत हो गई। प्रो. पन्त का स्वास्थ्य भी अब पहले जैसा नहीं रहा। वह नैनीताल छोड़ हल्द्वानी रहने लगे। इस लैब ने कई ख्यातनाम वैज्ञानिक दिए और कुमाऊं जैसे गुमनाम विश्वविद्यालय की इस साधनहीन प्रयोगशाला ने फोटोफिजिक्स के दिग्गजों के बीच अपनी खास जगह बनाई।

जिस किसी को प्रो. पन्त के साथ काम करने का सौभाग्य मिला, वह उनकी बच्चों जैसी निश्छलता, उनकी बुfद्धमत्ता, ईमानदारी से सनी उनकी खुद्दारी और प्रेम का मुरीद हुए बिना नहीं रहा। निराशा जैसे उनके स्वभाव में है ही नहीं। चाहे वह रिसर्च का काम हो या फिर कोई सामाजिक सरोकार, प्रो. पन्त पहल लेने को उतावले हो जाते। अपने छात्रों को वह अक्सर चुप बैठे रहने पर लताड़ते और आवाज उठाने को कहते। गांधी के विचारों को उनकी जुबान ही नहीं, जीवन में भी पैठे हुए देखा जा सकता है। जो कहते वही करते और ढोंग के लिए कहीं जगह नहीं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि अगर आप अपने विचारों पर दृढ़ रहें तो हताशा, निराशा और दु:ख मुश्किल से मुश्किल हालात में भी आपको नहीं घेरेंगे।

गांधी के रास्ते पर चलने वाले प्रो. पन्त का ecology में गहरा विश्वास है। वह अक्सर कहते हैं कि कुदरत मुफ़्त में कुछ नहीं देती और हर सुविधा की कीमत चुकानी पड़ती है। अपने जीवन में उन्होंने बहुत कम सुविधाएं इस्तेमाल कीं लेकिन बदले में उनकी जरूरत से ज्यादा कीमत चुकाई।

हेम पन्त

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Re: D.D Pant famous physicist
« Reply #3 on: June 12, 2008, 02:38:27 PM »
पन्त जी पहाड के बहुत विख्यात बुद्धिजीवी, महान शिक्षाविद, भौतिकशास्त्री व राजनैतिक चिन्तक थे... उनके देहान्त से उत्तराखण्ड को अपूर्णनीय क्षति हुई है. मेरा पहाड परिवार की और से इस महान आत्मा को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजली...

http://www.merapahad.com/forum/index.php/topic,251.30.html

पंकज सिंह महर

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डा० पंत का निधन हमारे लिये अपूरणीय क्षति है, आज उनको फोरम पर श्रद्धांजलि देने के बाद सर्च किया तो निम्न पोस्ट मिली है, उनके एक शिष्य की, जो प्रस्तुत है-

प्रोफेसर डी.डी. पंत नहीं रहे.हलद्वानी में ११ जून की दोपहर मे लगभग नब्बे साल की आयु में उन्होंने अपना चोला त्याग दिया.दीपक तो बुझ गया लेकिन उसके मन,वचन और कर्म द्वारा उद्भूत-उर्जस्वित उजास बाकी है और रहेगी. जलते दीपक को तो एक न एक दिन बुझना ही होता है किंतु बात तो तब है जब कि वह अपने पीछे दृष्टि,दीप्ति और दर्शन की एक शानदार अनमिट लकीर उकेर जाय ;वह भी इस क्रूर,कुटिल,कुचाली समय में चुपचाप,शान्तिपूर्वक,सलीके से।


रात दस बजे के आसपास अशोक पांडे का फोन आया तो पता चला कि आज दोपहर में प्रोफेसर डी.डी. पंत नहीं रहे.हलद्वानी की उसी कालोनी में अशोक का घर भी है लेकिन उन्हें यह खबर शाम को मिली पाई.हमने फोन पर उनके बारे में बात की,अपने कालेज के दिनों में उनकी गरिमामयी उपस्थिति को याद किया.फोन रखने के बाद मैंने अपनी अलबम निकाली और ग्रुप फोटो में उनकी तस्वीर को छुआ..अलविदा प्रोफेसर डी.डी. पंत
अशोक ने कहा है आज मैं उनपर कुछ लिखूं. क्या लिखूं? मैं तो कभी उनका छात्र नहीं रहा.वे ठहरे फिजिक्स के एमिरिटस प्रोफेसर और मैं हिन्दी का एक अदना-सा विद्यार्थी.मेरे ज्यादतर दोस्त फिजिक्स वाले थे और मैं अक्सर वहीं पाया जाता था.अपनी थीसिस लिखने के अलावा सारे काम जरूरी लगते थे.नाटक ,गोष्ठी,सभा-संगत आदि-इत्यादि में बुलाने पर प्रोफेसर पंत आते जरूर थे.उन्हें बोलते हुए सुनने पर पता चलता था कि एक विद्वान बोल रहा है.बदमाश-बिगड़ैल छात्र भी उनके सामने सभ्य श्रोता बन जाया करते थे.
अशोक ने फोन पर ही मेरी एक कहानी के प्लाट की याद दिलाई जिसमे कुछ लिक्खाड़ टाइप के लोग एक एक मशहूर मरणासन्न साहित्यकार पर संस्मरण-लेख आदि तैयार किये बैठे हैं और वह वृद्ध साहित्यकार निरंतर जिए चला जा रहा है और छपासु भाई लोग मरे जा रहे हैं कि वह चलें तो यह छपे.पंत जी पर भी बहुत कुछ लिखा जाएगा (शायद लिख भी लिया गया होगा) और छपेगा भी किन्तु डी.एस.बी.कालेज (अब कुमाऊं विश्वविद्यालय का नैनीताल कैंपस)के स्वर्ण काल और उसकी तलछट के दिनों में वहां पढ़े-पढ़ाए लोग प्रोफेसर डी.डी. पंत को भूल नहीं पायेंगे.




साभार - http://kabaadkhaana.blogspot.com/

पंकज सिंह महर

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Re: D.D Pant famous physicist
« Reply #5 on: June 12, 2008, 03:06:30 PM »
अंतिम दर्शन




पंकज सिंह महर

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Re: D.D Pant famous physicist
« Reply #6 on: June 12, 2008, 03:12:33 PM »


पंत का भौतिकी में अभूतपूर्व योगदान

 महान शिक्षाविद् प्रो. डीडी पंत नाम, सम्मान व पद प्रतिष्ठा की दौड़ से हमेशा दूर रहे। उन्होंने शिक्षा के प्रति जीवन को समर्पित कर दिया। कुमाऊं विश्र्वविद्यालय का नाम राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय जगत में रोशन किया। शिक्षा जगत में उनका अभूतपूर्व योगदान अविस्मरणीय रहेगा। पिथौरागढ़ जनपद के देवराड़ी ग्राम नवंबर 1918 में जन्मे प्रो. पंत की आरंभिक पढ़ाई गांव में ही हुई। हाईस्कूल व इंटरमीडिएट की शिक्षा अल्मोड़ा से हासिल करने के बाद वर्ष बनारस चले गये। बनारस हिन्दू विश्र्वविद्यालय से भौतिक विज्ञान के स्पेक्ट्रास्कोपी विषय में विशेषज्ञता के साथ ही एमएससी की डिग्री हासिल की। मेधावी छात्र के रुप में पहचान बनाने वाले प्रो. पंत ने भाभा एटोमिक सेंटर के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. आर के अंसुडी के निर्देशन में डाक्टर ऑफ साईस की उपाधि प्रदान की। प्रो. पंत ने देश के पहले नोबल पुरस्कार विजेता सीबी रमन के साथ दो वर्ष कार्य किया। वर्ष 1951-52 में नैनीताल आ गये। यहां पर डीएसबी में भौतिकी के अध्यक्ष रहे। इसके बाद वर्ष 1971 में उत्तर प्रदेश के शिक्षानिदेशक रहे। उन्होंने कुमाऊं विश्र्वविद्यालय के निर्माण को अपना भरपूर योगदान दिया। 1973 में कुमाऊं विश्र्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति बने। उन्होंने कुमाऊं विश्र्वविद्यालय का नाम राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन किया। शिक्षा जगत में अभूतपूर्व योगदान देते हुये 20 पीएचडी दी और 150 शोध पत्र प्रस्तुत किये। उन्हें प्रतिष्ठित शांति स्वरुप भटनागर पुरस्कार से भी नवाजा गया। इसके अलावा प्रो. पंत रमन सेन्टेनरी स्वर्ण पदक, फैलो ऑफ इंडियन एकेडमी ऑफ साईस, फुल ब्राइट स्कॉलर समेत कई पुस्कार व सम्मान से नवाजे गये थे। अमेरिका की सिग्मा साई सोसाइटी का सदस्य होने का गौरव भी उन्हें प्राप्त था। प्रो. पंत विद्यार्थी जीवन में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से मिले थे। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में समर्पित होने की इच्छा जाहिर की की लेकिन गांधी जी ने उन्हें अपने क्षेत्र में ही रहकर कार्य करने की प्रेरणा दी थी।


साभार- दैनिक जागरण, हल्द्वानी
 

हेम पन्त

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Re:Tribute toTrD.D Pant famous physicist
« Reply #7 on: June 13, 2008, 01:25:05 PM »
Sanju Pahadi Ji's message

With deep hearted sorrow, i would like to convey my condolences to the Pant family. We have lost a distinguished physicist, former director education (UP), founder head of Physics and former VC Kumaon University Nainital, yesterday the June 11, 2008 at Haldwani, where he had been putting up his post-retirement life. Shri Vijay Sharma brought this news and I am extremely sad to hear,  I had many instances to talk to him over phone and strongly believe that he was a great physicist, moreover a great Uttarakhandi, could be counted on among the very few hard core Indian photo physicist.
Dear Professor, your vision in terms of UKD would always enlighten the society and your research work would always bring cutting edge transformations in physics.
Your publications in well known international journals like "Journal of Photochemistry and Photobiology" ,  "Journal of Luminescence", chemical physics and chemical physics letters etc, would always be referred with high citations.

One can read more about him at
http://www.creativeuttarakhand.com

A brief about him>>

**"Born in Pithoragarh in 1918 ,completed his Msc from BHU,worked with Prf .Raman in Banglore.He started his academic career as lecturer in Agra university, then moved to Nainital and established a physics lab In 1971 followed by the retirement from the post of director higher education U.P.He was the founder of Uttarakhand kranti dal (UKD) and first vice chancellor of kumaun university.In University academics Dr Pant has always been mark with his outspoken nature,cool temperament,uncompromisable principles ,sincerity and devotion to the profession. As a politician also, he represented several public problems to the local, state and central governing bodies and was able to resolve several issues indeed. He maintained high standards and motivated among his colleagues and students to uphold international standards. With his reputation and contacts he mustered a sustained collaboration with reputed national and international laboratories involved in physics research. His work took him to many countries.He was a great lover of music and gardening ,both of which gave him hours of pleasure and relaxation.The untimely death of his younger son was a blow from which he never recovered. He is survived by three daughters,son and wife. All those who knew him personally will miss him greatly"


A heartiest salute to this great personality.
May god rest his soul in peace.

Its really a great loss to the scientific community and Uttarakhand both.

हेम पन्त

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A Brief Biodata of Prof. Debi Datt Pant
« Reply #8 on: June 19, 2008, 12:00:32 PM »
Source: http://www.physics.iitm.ac.in/~labs/photophysics/Homage_to_DDPant.htm

Born: 1918, Village : Deorari (Pithoragarh) U.P. (now Uttarakhand)

Died: 2008, June 11 (Haldwani, Uttarakhand).

Academic Qualification

M.Sc. Physics, Benares Hindu University, Varanasi in 1942 (First batch of Spectroscopy student of Prof. R.K. Asundi).
D.Sc. Banaras Hindu University, Varanasi 1949.
Research

Worked with Prof. C.V. Raman at Indian Institute of Science, Bangalore (1942-44) on Photoconductivity of Diamond and the luminescence spectra of Uranyl salts.

Worked at N.R.C., Ottawa with Herzberg, a Nobel Laureate, 1960.
Fulbright Scholar (1960-61) worked in Prof. M. Kasha*s Lab.

Established research laboratory at D.S.B. Degree College (Nainital). The initial work on Uranyl salts had been extensively quoted in *Spectroscopy and Photochemistry of Uranyl Compounds* by B. Belford and B. Rabinowitch (1965). Various aspects of luminescence of Inorganic and Organic molecules dopants, etc. using steady state and a locally fabricated life time measurement device upto micro-second range was studied. Interesting D2O effect was found in lifetime and quantum yield. Energy transfer studies were made in rare earth. The research activities in the lab have been extended to the study on photophysics of structurally and biologically important molecules using steady state and time resolved spectroscopy in nano- and pico-second ranges.
About One hundred forty research papers have been published and twenty students have received Ph.D. degree under him.
Awards, Recognition and Academic roles

Awarded fellowship of Sigma Si, USA 1969.
Awarded fellowship of Indian Academy of Sciences Bangalore.
Received Raman Centenary Award.
Asundi Centenary Award.
Also actively involved in several other educational programmes with UGC, U.P. Govt., Govt. of India, Science Education, NCERT, etc.
Selected for USID programme to study Science Education in USA. Participated in International Conference in Columbus, Ohio, Gordon conferences on Spectroscopy, Raman Centenary, CNR Paris (1976), Himalayan Ecology, etc.
Foggety short time visitor Rockyille (1982 & 84) etc.
 

Employment

Lecturer at Agra College, Agra.
Professor at RBS College, Agra.
Professor at DSB Govt. College, Nainital, Uttaranchal (1952-62).
Principal, DSB Govt. College, Nainital, Uttaranchal (1962-71).
Director of Education, UP 1971-72.
Dean, Faculty of Science, University of Agriculture and Technology, Pantnagar, Uttaranchal (1972-73).
Vice Chancellor, Kumaun University, Nainital (1973-77). Since 1978 Emeritus Professor, Advisor and Principal Investigator of several sciences research projects.


contributions of Prof. D. D. Pant

Dr. D.D. Pant was a rare and judicious mix of a physicist, an educationist and a social activist. He was an institution in himself.

He was a student of Nobel laureate, Sir C.V. Raman and had the rare distinction of doing his post-doctoral with him. Dr. D.D. Pant imbibed a scientific temper from the great C.V. Raman and an insatiable quest for truth for which the great scientist was known. Dr.Pant was his favourite student and he profusely expressed his appreciation for him and wanted him to work in the lab of a Nobel laureate, outside India. Dr. D.D. Pant infused with a spirit of nationalism and Gandhian ideology politely refused the offer and opted for a career in teaching and research in Agra College, Agra at a paltry sum of Rs.100 only. Dr. D.D. Pant sacrificed his career and preferred to popularize Physics in a nation which had been shackled by the alien yoke.

Dr. D.D. Pant did not make a compromise with his ideology of popularizing Physics in India. Untouched by brain drain, he stated in a recent interview that *I have no regrets for sacrificing my career and I don*t gloat over what I sacrificed; but given an opportunity, again I would follow the same path.*

In 1964, he declined the position of Professor and Head of the Physics Department of Rajasthan University because research equipment support was not assured to him. In 1972, he resigned from the coveted position of Director of Education, Uttar Pradesh to become Dean of Science and Humanities at Pantnagar University so as to continue his work as a scientist. In 1973 he accepted the founder Vice Chancellorship of Kumaun University for fulfilling his childhood dream of disseminating education to masses in the hills who could not afford education outside the region owing to economics constraints. His motto was :education for those who are residing in fragmented pockets in geographical isolation. It was a result of his total dedication toward research that the Physics Department of D.S.B. Campus, Kumaun University earned an international repute with the most advanced equipments in the frontier field of Time Resolved Spectroscopy and its identification as a national centre in this field. To him also goes the credit as a Vice Chancellor that he invited Professor K.S. Valdiya and Professor J.S. Singh to join Kumaun University both of whom were awarded FNA (Fellow of National Academy of Science) during his tenure as Vice Chancellor.

For a person of his academic achievements several honours were conferred on him and he got the opportunity to work as a Fulbright Scholar (1960-61) with Nobel Laureate Prof. M. Kasha of USA and in Henzberg*s Lab in Ottawa. He was awarded the Raman Centenary Gold Medal and had the rare distinction of being the first scientist to receive the Professor Asundi Centenary Award.

He had been a great teacher, had supervised the research of 20 Ph.D. students, and published 140 research papers in National and International journals. All the Ph.D. scholars from his school of Photo Physics have blossomed into good teachers and scientists and are working in leading institutions, both in India and abroad.

Dr. D.D. Pant was an avid reader and had a voracious appetite to delve into subjects like Ecology, History, Philosophy, Culture and Literature, etc. His communicative and oratorial skills are impeccable and he had a tremendous capacity to simplify any subject and communicate it to the audience in an extremely popular style. His penchant for reading and his analytical skill laced with outstanding dialogue delivery and language had made him a very popular teacher and a thinker.

Dr. D.D. Pant was a self-made man, with a very humble background. He got his early education in a village school of Pithoragarh district and had to negotiate a distance of 50 km to the road head from his village. This is why he had a deep insight into rural problems of the Himalayan region. The ruggedness of the terrain, its inaccessibility and lop-sided development by the U.P. Govt. in Uttaranchal, his anguish and concern for the region inspired him to institute the Uttarakhand Krantidal and mooted the idea of a separate hill state.

Dr. D. D. Pant became a lifetime legend as founder Vice Chancellor of Kumaun University. The quality which distinguishes Prof. Pant from rest of the Indian scientists is that he combined undertaking research of highest quality with his commitment to social work that is reflected in his widespread popularity among the masses of the rural hills. His awe inspiring popularity had wafted through the masses and made him a source of inspiration not only for students but also for the village folk. It would not be an exaggeration to state that his humane attitude and sensitivity towards societal problems had made him a folk hero in Uttarakhand.

पंकज सिंह महर

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Re: D.D Pant famous physicist
« Reply #9 on: May 20, 2009, 02:59:08 PM »
source- http://www.ias.ac.in/currsci/sep252008/786.pdf

D. D. Pant (1919–2008)

The organization of the 1989 National Symposium on Laser and Spectroscopy at the Banaras Hindu University (BHU), Varanasi coincided with 50 years of spec-troscopy research in the university. Tenof the senior-most students of R. K. Asundi, who had helped him in making BHU in-ternationally famous in the field of mo-lecular spectroscopy, were honoured bythe university on the occasion. D. D. Pant (then 70 years old) and P. Venkateswarlu were then the only two active scientistsin research, with Venkateswarlu havingset up the spectroscopy laboratory fromscratch at Huntsville, USA after achievingthe same feat at IIT Kanpur many years ago, and Pant having, at long last, ac-quired equipment for his picosecond ex-periments at Nainital. When Pant and Jagdeo Singh, students from the first batch of M Sc Spectroscopy, met their former teacher Nand Lal Singh (then 85years old, whom they affectionatelycalled ‘Master Saheb’) on the occasion,emotions ran high with reminiscences ofbuilding the spectroscopy laboratorybrick by brick.Devi Dutt Pant, born in 1919 in the remote village of Deorari in the hill dis-trict of Pithoragarh now in Uttarakhand, preferred BHU over Allahabad Univer-sity in 1940 for his postgraduate studies in physics because of his involvement in the freedom struggle. His love for Banaraswas intense till the end; he did not be-lieve in rituals, but he was highly spiri-tual and the Sankatmochan temple was his most preferred place after the BHU campus, perhaps because of its serenity.He would remember following the Hindi poet, Nirala on the road in front of theBirla and Broacha hostels, among a groupof students who had great admiration for the famous poet in his torn kurta andcarefree mood.Pant was one of the favourite studentsof Asundi, who sent him to C. V. Ramanfor research soon after Pant completed hisM Sc in 1942. The main reason for keep-ing him away from Banaras was to protect his academic career from the repressive British Government, which came down heavily on the student community in Ba-naras after the Quit India Movement. Pant stayed in Bangalore till 1944 andcarried out experiments on the photocon-ductivity of diamond and luminescenceof uranyl salts. He earned the affection of Raman because of his fearless and in-quisitive temperament, and the latter showed him how to prepare one’s eyes, by sitting in a fully darkened room long enough, to see light emanating from sin-gle photons.Raman knew the difficult financial po-sition of Pant and his family, his Gandhianideals and his intention to be a teacher toserve the cause of nation-building. Since there was paucity of funds for research scholarships at Bangalore, Raman advisedPant to combine his research work along with a teaching job and helped him to get one in Agra. Pant started his teaching ca-reer as a lecturer in physics at Agra College in 1944, visiting BHU to carry out re-search work during vacations. He re-ceived his D Sc from BHU in 1949 andjoined as a professor in physics at R.B.S.College, Agra, where he set up one of the finest teaching laboratories in physics. He joined the D.S.B. College, Nainital asHead of the physics department in 1952 and built a spectroscopy laboratory fromscratch. He started experiments on detec-tion of light emission from uranyl saltsusing a photomultiplier tube and a sensi-tive galvanometer procured from dis-carded military equipment of the Second World War. By the time Pant eventually stopped going to his laboratory due to ill health, it had become an internationally known centre for picosecond fluores-cence decay measurements.Molecular spectrum contains two vital pieces of information about the atomic ormolecular species: in the form of (a) wavelength and (b) intensity of the spec-tral line. Measurements of wavelengthsprovide valuable data about the energylevels, which can be translated into struc-ture of the atom or the molecule. The measurements of intensities of spectral lines provide data on the lifetime of the excited energy states, which can betranslated into the dynamics of the emit-ting species. There was great emphasison the measurements of spectral wave-lengths with higher and higher resolu-tions till 1950, and the three main Indian spectroscopy laboratories at Banaras, Visakhapatnam and Aligarh excelled in high-resolution spectroscopy research. It was perhaps the initial training under Raman that induced Pant to undertake the measurements of the decay of emis-sion from optically excited molecules. He could easily measure lifetimes in the microsecond range with his home-builtequipment at Nainital, and studied alarge number of organic and inorganic molecules in solution phase, obtaining interesting effects of D2O on the lifetimeand the quantum yield. In the community of high-resolution Indian spectroscopists, perhaps Pant did not get the encourage-ment and appreciation that he deserved. I remember his lecture in a Physical Re-search Committee Meeting at BHU in 1963, which I, as a M Sc student, did notunderstand much at that time. At the end of this talk, which obviously related todecay rate of luminescence, Asundi stoodup and asked, ‘Where is spectroscopy in this work?’. Pant tried to explain hispoint with utmost courtesy and respect for his teacher, but Asundi continued re-buking him to the embarrassment of all. It was Savadatti, who had recently re-turned from England after his researchwork in the laboratory of Porter, whomentioned something in support of thetalk to end the discussion. Later in 1965the research work at Nainital found ex-tensive coverage in a book entitled Spec-troscopy and Photochemistry of Uranyl Compounds by Belford and Rabinowitch.As a Fulbright scholar during 1960–61, Pant chose to work at Florida State University with Michael Kasha, the ‘Renaissance man’, who discovered thatphosphorescence emanated from the trip-let states in organic molecules. Duringhis stay in the US, Pant visited many important spectroscopy laboratories inNorth America, including NRC at Ot-tawa, the Mecca of high-resolution spec-troscopy in those days. At the 1982 GordonConference on Molecular ElectronicSpectroscopy at the Brewster Academy, Inoticed a great deal of similarity between Pant and Kasha and the two discussedproblems of nonradiative transitions andenergy transfer in molecules at great length. The advent of short-pulse lasershad made the field of lifetime measure-ments and time-resolved spectroscopy fashionable in India by this time, but Pant had not found it easy to get research funding for the state-of-the-art equip-ment for his laboratory. Pant was a great admirer of Asundiand Raman. He played a key role in the formation of the ‘Laser and SpectroscopySociety of India’ in 1981, as the newavatar of ‘Convention of Spectroscopists’an unregistered academic body initiated by Asundi. He also encouraged his student D. P. Khandelwal to start the ‘Indian Asso-ciation of Physics Teachers’ to strengthenand popularize physics education right from the school level. The cause of phys-ics teaching was very dear to him. Whenthe matter of making cheap helium–neonlasers available for schools was raised bya relatively junior spectroscopist at aConference in IIT Kanpur in mid 1980s, most of the senior members on the panel were annoyed. Pant was the only person who stood up in favour of He–Ne laserand emphasized that quality research in experimental spectroscopy could not be carried out without modernizing ourteaching laboratories. He was straight-forward and never hesitated in puttingforth his honest points of view in anyforum. He did not like indiscriminate import of equipment and took great pains to check the performance of those hepurchased for use in his own laboratory. He even published the data obtained from his laboratory to challenge the claims that the manufactures made about the performance of their instruments.Pant was the principal of D.S.B. Col-lege, Nainital from 1962 to 1971; Direc-tor of Education, Uttar Pradesh during 1971–72; Dean, Faculty of Science, Uni-versity of Agriculture and Technology,Pantnagar during 1972–73 and founderVice-Chancellor of Kumaun Universityfrom 1973 to 1977. He preferred to re-sign from the posts of Director of Educa-tion and Vice-Chancellor rather thanyielding to pressure and compromisingwith his principles. The burden of admin-istrative work never made him lose con-tact with his laboratory and research students. He remained an Emeritus Pro-fessor from 1978 onwards, not only inname, but with his physical presence inthe laboratory till he became bed-ridden due to ill health. I remember spending aweek in the mid 1990s in his laboratory,and it was great pleasure to walk withPant from his residence to the laboratoryalong the mountain path which Pantcould negotiate more comfortably than I, 25 years younger than him. He alwaystalked of research problems in molecular spectroscopy and sometimes lamented about the degradation in the character ofscience managers in our country. He did not give importance to money and lived asimple life. He focused on research and teaching under adverse circumstances. He was kind to younger scientists and met people with a smile.Pant was an extremely modest indi-vidual and never exhibited his scholar-ship. He was a Fellow of the IndianAcademy of Sciences, Bangalore; Sigma Si, USA, and Laser and Spectroscopy Society of India. He was honoured onseveral occasions for his contributions tothe cause of education and public wel-fare. He was recipient of Raman Centen-ary Award as well as Asundi Centenary Award. With his passing away on 11June 2008 in Haldwani, the Indian spec-troscopy community has lost one of itsmost respected members. He was a sym-bol of courage and hope in the most ad-verse conditions. Pant has left behind a large group of students who will carry onhis legacy into the future.

S. N. THAKUR, Department of Physics,Banaras Hindu University, Varanasi 221 005,
 Indiae-mail: snthakur@yahoo.com
PERSONAL NEWSCURRENT SCIENCE, VOL. 95, NO. 6, 25 SEPTEMBER 2008

 

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