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Author Topic: Devprayag - देवप्रयाग: ३३ कोटि देवताओं का आवास  (Read 2992 times)

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Offline पंकज सिंह महर

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साथियो,
        देवप्रयाग हमारे उत्तराखण्ड के पंच प्रयागों में एक है, इसके बारे में कहा जाता है कि जब भागीरथ ने भागीरथी (गंगा) को पृथ्वी पर उतरने को राजी कर लिया तो 33 कोटि देवता भी गंगा के साथ स्वर्ग से उतरे। उन्होंने अपना आवास देवप्रयाग में बनाया जो गंगा की जन्म भूमि है। भागीरथी और अलकनंदा के संगम के बाद यही से पवित्र  नदी गंगा का उद्भव हुआ है। यहीं से यह नदी गंगा के नाम से जानी जाती है, इससे पहले इसके अलग-अलग नाम हैं।
      आइये जानते हैं इस ऎतिहासिक और पौराणिक स्थान के बारे में।


« Last Edit: August 25, 2009, 08:46:23 AM by हिमांशु पाठक »
आंखों के आगे वनश्री के खुलते पट न्यारे-२ हैं,
छोटे-छोटे खेत और आडू सेबों के बगीचे, देवदार वन,
जो नभ तक अपना छवि जाल पसारे हैं,
मुझको तो हिम से भरे अपने पहाड़ ही प्यारे हैं.

 

Offline पंकज सिंह महर

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वेधशाला के संस्थापक
आंखों के आगे वनश्री के खुलते पट न्यारे-२ हैं,
छोटे-छोटे खेत और आडू सेबों के बगीचे, देवदार वन,
जो नभ तक अपना छवि जाल पसारे हैं,
मुझको तो हिम से भरे अपने पहाड़ ही प्यारे हैं.

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रीवर राफ्टिंग

गंगा पेशेवर एवं प्रशिक्षु नदी बेड़ायन (रीवर राफ्टिंग) का आनंद भी देती है नदी पर बेड़ायन द्वारा भागीरथी एवं अलकनंदा के मिलनस्थल पर देवप्रयाग जल काफी उतार-चढ़ाव का होता है जो एक निपुण नाविक के लिये भी चुनौती पेश करता है।

देवप्रयाग से नीचे उतरकर गंगा एक स्थिर तालाब में जल की तरह हो जाती है। लगभग 70 किलोमीटर के प्रवाह तक यह नये खिलाड़ियों एवं प्रशिक्षुओं के लिये यह बिल्कुल ठीक है क्योंकि यहां नदी के प्रवाह में तृतीय श्रेणी की उत्तम धारा तथा दो चतुर्थ श्रेणी की धाराएं होती हैं जो 4 किलोमीटर शिवपुरी के नीचे ब्यासी की दीवार तथा गोल्फ कोर्स तक है। प्रत्येक में गहरा पर शांत जल होता है। बीच-बीच में बालू के किनारे भी होते है जहां बेड़ा चालक बगल से निकल जाते हैं।     

गंगा के सफेद जल पर बेड़ा चलाने योग्य दूरी कौडियाला से ऋषिकेश तक है जहां के 36 किलोमीटर दूरी पर 12 प्रमुख धाराएं हैं, जहां पर नौकायन सहज है।

अगर आपकी रूचि बेड़ायन में हो तो सम्पर्क करें: धानेश्वर रिसार्ट, बाह बाजार, देवप्रयाग, दूरभाष: 09411722061 या ईमेल करें: info@gangarafttrek.com. आप गढ़वाल मंडल विकास निगम के वेबसाईट (www.gmvnl.com/newgmvn/sports/) पर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
 
 
आंखों के आगे वनश्री के खुलते पट न्यारे-२ हैं,
छोटे-छोटे खेत और आडू सेबों के बगीचे, देवदार वन,
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चंद्रबदनी देवी (देवप्रयाग से 22 किलोमीटर, कांडीखाल से 10 किलोमीटर पैदल।)

स्कंद पुराण के अनुसार राजा दक्ष की पुत्री सती का विवाह भगवान शिव से हुआ था। त्रेता युग में असुरों की पराजय के बाद दक्ष को सभी देवताओं का प्रजापति चुना गया इसलिये कंखाल में उसने एक यज्ञ आयोजित किया। चूंकि भगवान शिव ने उसके प्रजापति बनाये जाने का विरोध किया था इसलिये उसने भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया तथा भगवान शिव के घर कैलाश पर्वत की चोटी से सती ने सभी देवताओं को जाते देखा और उन्हें पता चला कि उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया है। जब सती को अपने पति के प्रति इस अपमान की बात मालुम हुई तो वे यज्ञ स्थल पर गयी और हवन कुंड में अपना बलिदान कर दिया। जब तक भगवान शिव वहां पहुंचे वह सती हो चुकी थी। क्रोधित होकर भगवान शिव ने तांडव नृत्य किया तथा अपने गणों को मुक्त कर उन्हें दक्ष का सिर काट डालने एवं सभी देवों को डराने एवं मारपीट करने का आदेश दिया। देवों के समुदाय ने भगवान शिव से क्षमा याचना की तथा उनसे निवेदन किया कि वे दक्ष को यज्ञ पूरा करने की अनुमति दें। फिर भी चूंकि दक्ष मृत्यु को प्राप्त हो चुका था इसलिये एक बकरा का सिर काटकर दक्ष के शरीर पर लगा दिया गया ताकि वह अपना यज्ञ संपन्न कर लें।
      भगवान शिव ने सती के शव को हवन कुंड से बाहर निकालकर अपने कंधों पर रख लिया। वर्षों तक वे इसी प्रकार चिंतन एवं क्रोध में घूमते रहे। इस विकट परिस्थिति पर विचार करने के लिये देवताओं की एक सभा हुई क्योंकि वे जानते थे कि क्रोध में भगवान शिव विश्व को ध्वंश करने की क्षमता रखते हैं। अंत में यह तय हुआ कि भगवान विष्णु अपने सुदर्शन चक्र का प्रयोग करें। भगवान शिव को बिना बताये ही भगवान विष्णु ने सती के शरीर को 52 टुकड़ों में सुदर्शन चक्र से काट दिया। जहां कहीं भी भूमि पर सती के शरीर का कोई भाग भी गिरा वह सिद्धपीठ या शक्तिपीठ बन गया। उदाहरण के लिये नैना देवी वहां है जहां उनकी आंखें गिरी, ज्वालपा देवी में उनकी जीभ, सुरकुंडा देवी में उनकी गर्दन तथा चंद्रबदनी में उनके शरीर का निम्न भाग गिरा।
     
     चंद्रबदनी में देवी को देखा नहीं जा सकता क्योंकि देवी के सम्मान की रक्षा के लिये इसके सामने एक कपड़े का परदा लगा रहता है क्योंकि यहां उनके शरीर के जिस भाग की पूजा होती है। परदा होने का एक अन्य कारण यह है कि सदियों पहले मानव बलि लेने वाले श्री यंत्र को परदे से ढ़ककर रखा गया है ताकि मानव इसे देख न पाये।
मंदिर के बाहर कई प्राचीन मूर्तियां एवं लोहे के त्रिशूल हैं। यहां से सिरकंडा, केदारनाथ एवं बद्रीनाथ शिखरों का सुंदर दृश्य देखा जा सकता है। यहां के मंदिर छोटे पर बहुत ही पूजनीय है। अप्रैल में यह बड़े धार्मिक एवं सांस्कृतिक मेले का स्थल होता है।





       
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मलेठा (देवप्रयाग से 25 किलोमीटर दूर)

पहाड़ियों पर खुले एवं विस्तृत सिंचित खेत लगभग दुर्लभ सा ही है। सड़क पर दो स्थानों पर एक जलाशय में पहाड़ से भारी मात्रा में जल गिरता है। एक गर्म दोपहरी में ये दो बिन्दु अत्यावश्यक सुविधाएं जैसे साफ-सुथरा होना या अगर आप चाहे तों स्नान भी कर सकते हैं।

मलेठा के इस यथेष्ट जल से संबंधित एक कहावत है जो तत्कालीन पहाड़ी लोगों के जीवन तथा उनकी कृषि के लिये व्यंगोक्ति ही है। गढ़वाल से देश की सबसे बड़ी दो नदियां निकलती और ये गंगा एवं यमुना हैं एवं इनके साथ रास्ते में अलकनंदा में गिरने वाली पांच प्रमुख नदियां हैं। फिर भी इस क्षेत्र के वासी बिना अपने खेतों की सिंचाई के नदियों को केवल प्रवाहित होते देखते हैं स्थानीय स्तर पर एक कहावत है कि पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी, काम नहीं आती। गढ़वाल में कृषि योग्य खेतों के 15 प्रतिशत से अधिक भूमि के लिये सिंचाई उपलब्ध नहीं है।

मलेठा की बात इससे भिन्न नहीं है। विशाल अलकनंदा पास ही प्रवाहित है, पर यहां के खेतों में इसका एक क्यूलक जल भी प्राप्त नहीं होता है। अगर मलेठा के खेत बड़ी मात्रा में सिंचित है या यहां सड़क पर प्रचुर जल उपलब्ध है तो यह पहाड़ी के पीछे के छोटे जलश्रोत से संभव है। और यहीं 17वीं सदी की कथा का असाधारण अभियांत्रिकी की सफलता छिपी है, जिसने पहाड़ी के पीछे झरनों के पानी को मलेठा के कभी झुलसते खेतों में ले आया है।

टिहरी के महीपत शाह के शासनकाल में माधो सिंह भंडारी सेनापति था। मलेठा संभवत: उसकी पत्नी का मायके था। यहां के लोगों की जीविका की घोर कठिनाईयों के प्रति वह चिंतित था जो खासकर कृषि की खराब हालत के कारण थी। लोग गंगा या अलकनंदा को प्रवाहित होते फटी आंखों से देखते जो बहुत दूर नहीं थी पर इसके जल को ऊपर पहुंचाया नहीं जा सकता था। परंतु खेतों के विपरित दूसरी तरफ पहाड़ी पर एक झरना था। इसी जल को मलेठा के खेतों तक लाने का निश्चय माधो सिंह ने किया। इसका अर्थ था पहाड़ी पर एक नाला खोदना। माना जाता है कि इस क्रम में माधो सिंह को अपने पुत्र का बलिदान भी करना पड़ा, जिसे भारी मन से सहन करते हुए भी उसने अपना संकल्प पूरा किया। उसी समय से उजाड़ खेतों में प्रचुर पैदावार होती है तथा आज जुलाई के निश्चित धान रोपाई के समय परंपरागत संगीतकार लोगों के साथ खेतों तक जाकर खेत जोतने या रोपाई से पहले माधो सिंह भंडारी के प्रशंसागीत गाते हैं।
यह नाला आज भी है और एक किलोमीटर दूर जाकर फिर पीछे घूमकर एक किलोमीटर और आगे (खेतों के ऊपर) टिहरी की ओर मुड़ती सड़क पर इसे देखा जा सकता है। टिहरी के प्रवेश पथ पर यह रास्ता एक छोटा स्मारक पार्क के साथ ही माधो सिंह की प्रतिमा और आगे नाले तक ले जाता है।
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लच्छमोली (देवप्रयाग से 12 किलोमीटर दूर।)

लच्छमोली एक छोटी जगह है जहां पुरातात्विक तौर पर जुड़ा मंदिर है। आज मंदिर परिसर एक काफी बड़े आश्रम में परिवर्तित हो गया है जहां तीर्थयात्री अपना भोजन पकाते है या दोपहर या फिर रात का विश्राम करते हैं। एक साधारण भोजन हमेशा उपलब्ध रहता है। अन्य लोगों के लिये, सड़क के किनारे या दूर, मध्यम एवं उच्च श्रेणी के होटल एवं रिसार्ट भी बनते जा रहे हैं।
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Offline Anubhav / अनुभव उपाध्याय

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Devprayag se hi Ganga sampurna hoti hai matlab Ganga ke naam se jaani jaati hai.
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Offline हेम पन्त

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इस अति महत्वपूर्ण जानकारी के लिये पंकज दा को हार्दिक धन्यवाद! देवप्रयाग बहुत ही आध्यात्मिक नगर है. रुद्रप्रयाग की जानकारी देने का भी कष्ट करें ..... पुनश्च धन्यवाद....

ठंडु-माठु चौमास डांड्यूं मां सोरि गै!!!
तिसळि धरति की प्यास बुझे गै !!!

Offline dinesh bijalwan

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स्थानो का नाम सिरक्न्डा नही बल्कि सुरकन्डा है वो भी एक महत्त्वपुर्ण देवी मन्दिर है /

Offline dinesh bijalwan

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मलेठा नही बल्कि  मलेथा है

Offline सन्दीप काला

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महर जी बहुत ही सुन्दर वर्णन किया है ।
धन्यवाद ।

जय बद्री, केदारनाथ , गंगोत्री जय जय, यमनोत्री जय जय ।

Offline dinesh bijalwan

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लोक गाथाओ मै जिक्र है कि माधो भन्डारी का एक ही बेटा था किन्तु इतेहास मे उसके एक अन्य पुत्र गजे सिन्ह भन्डारी , क जिक्र  आत है जो कि मह्त्वपुर्ण  वजीर था जो  दर्बारी साजिशो मै कैठ्तो के हाथ मार गया / उसेके बाद उस्का बेटा मदन सिन्ह बजीर बना

Offline dinesh bijalwan

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लोक गीतो मे माधो को इस तरह याद किया जात है-
एक सिन्ग रण बण, एक सिन्ग गाय क ,
एक सिन्ग (सिन्ह) माधो सिन्ग, और सिन्ग काहे क आ

Offline पंकज सिंह महर

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लोक गीतो मे माधो को इस तरह याद किया जात है-
एक सिन्ग रण बण, एक सिन्ग गाय क ,
एक सिन्ग (सिन्ह) माधो सिन्ग, और सिन्ग काहे क आ

दिनेश जी, मेरी आपसे अपेक्षा है कि आप माधो सिंह जी की जीवन गाथा से हमें परिचित करायेंगे। मैंने कहीं सुना है कि उनका एक मंदिर भी है, यदि आपको जानकारी हो तो.......इंतजार रहेगा।
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Offline Himanshu Risky Pathak

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इन सब मंदिरों के अतिरिक्त यहा भरत मन्दिर भी स्थित है| जिसके बारे में कहा जाता है की मुग़ल शासक औरंगजेब के हिंदू धर्म विरोध और आक्रमण के भय के कारण इस मन्दिर का निर्माण ऋषिकेश स्थित भरत मन्दिर के पुजारियों ने यहा करवाया|

लुकी छिपी बादवो में चमकी जैसी ज्यून तेरो मुख चमको
तेरा रसीला होठो बे आज मौ जै टपको

Offline पंकज सिंह महर

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