मलेठा (देवप्रयाग से 25 किलोमीटर दूर)
पहाड़ियों पर खुले एवं विस्तृत सिंचित खेत लगभग दुर्लभ सा ही है। सड़क पर दो स्थानों पर एक जलाशय में पहाड़ से भारी मात्रा में जल गिरता है। एक गर्म दोपहरी में ये दो बिन्दु अत्यावश्यक सुविधाएं जैसे साफ-सुथरा होना या अगर आप चाहे तों स्नान भी कर सकते हैं।
मलेठा के इस यथेष्ट जल से संबंधित एक कहावत है जो तत्कालीन पहाड़ी लोगों के जीवन तथा उनकी कृषि के लिये व्यंगोक्ति ही है। गढ़वाल से देश की सबसे बड़ी दो नदियां निकलती और ये गंगा एवं यमुना हैं एवं इनके साथ रास्ते में अलकनंदा में गिरने वाली पांच प्रमुख नदियां हैं। फिर भी इस क्षेत्र के वासी बिना अपने खेतों की सिंचाई के नदियों को केवल प्रवाहित होते देखते हैं स्थानीय स्तर पर एक कहावत है कि पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी, काम नहीं आती। गढ़वाल में कृषि योग्य खेतों के 15 प्रतिशत से अधिक भूमि के लिये सिंचाई उपलब्ध नहीं है।
मलेठा की बात इससे भिन्न नहीं है। विशाल अलकनंदा पास ही प्रवाहित है, पर यहां के खेतों में इसका एक क्यूलक जल भी प्राप्त नहीं होता है। अगर मलेठा के खेत बड़ी मात्रा में सिंचित है या यहां सड़क पर प्रचुर जल उपलब्ध है तो यह पहाड़ी के पीछे के छोटे जलश्रोत से संभव है। और यहीं 17वीं सदी की कथा का असाधारण अभियांत्रिकी की सफलता छिपी है, जिसने पहाड़ी के पीछे झरनों के पानी को मलेठा के कभी झुलसते खेतों में ले आया है।
टिहरी के महीपत शाह के शासनकाल में माधो सिंह भंडारी सेनापति था। मलेठा संभवत: उसकी पत्नी का मायके था। यहां के लोगों की जीविका की घोर कठिनाईयों के प्रति वह चिंतित था जो खासकर कृषि की खराब हालत के कारण थी। लोग गंगा या अलकनंदा को प्रवाहित होते फटी आंखों से देखते जो बहुत दूर नहीं थी पर इसके जल को ऊपर पहुंचाया नहीं जा सकता था। परंतु खेतों के विपरित दूसरी तरफ पहाड़ी पर एक झरना था। इसी जल को मलेठा के खेतों तक लाने का निश्चय माधो सिंह ने किया। इसका अर्थ था पहाड़ी पर एक नाला खोदना। माना जाता है कि इस क्रम में माधो सिंह को अपने पुत्र का बलिदान भी करना पड़ा, जिसे भारी मन से सहन करते हुए भी उसने अपना संकल्प पूरा किया। उसी समय से उजाड़ खेतों में प्रचुर पैदावार होती है तथा आज जुलाई के निश्चित धान रोपाई के समय परंपरागत संगीतकार लोगों के साथ खेतों तक जाकर खेत जोतने या रोपाई से पहले माधो सिंह भंडारी के प्रशंसागीत गाते हैं।
यह नाला आज भी है और एक किलोमीटर दूर जाकर फिर पीछे घूमकर एक किलोमीटर और आगे (खेतों के ऊपर) टिहरी की ओर मुड़ती सड़क पर इसे देखा जा सकता है। टिहरी के प्रवेश पथ पर यह रास्ता एक छोटा स्मारक पार्क के साथ ही माधो सिंह की प्रतिमा और आगे नाले तक ले जाता है।