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Author Topic: Kedarnath Dham Uttarakhand- कर लो दर्शन केदारनाथ धाम के  (Read 2137 times)

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Online एम.एस. मेहता /M S Mehta

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Dosto,

भारत वर्ष यह मुकुट हिमालय राज्य जो देव भूमि के नाम से भी विख्यात है! जहाँ पर पग-२ पर देवी देवताओ के मंदिर है! आज हम यहाँ पर जानकारी दे रहे है उत्तराखंड के चार धामों में एक केदारनाथ धाम का !

इस टोपिक में हम केदारनाथ से जुडी धार्मिक कथा और केदारनाथ धाम के कुछ तस्वीरे प्रस्तुत करंगे! जो सदस्य केदारनाथ धाम में पहले जा चुके है वो अपना अनुभव और यात्रा के बारे में जानकारी और फोटो भी इस टोपिक में शेयर कर सकते है !

जय केदारनाथ जी की!



एम् एस मेहता

"जय १००८ मूल मूलनारायण जी की जय हो" !!

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                                             केदारनाथ की बड़ी महिमा है।
                                          ================


उत्तराखंड  में बदरीनाथ और केदार नाथ-ये २ प्रधान तीर्थ हैं, दोनों के दर्शनों का बड़ा माहात्म्य है। केदारनाथ के संबंध में लिखा है कि जो व्यक्ति केदारेश्र्वर के दर्शन किये बिना बदरीनाथ की यात्रा करता है, उसकी यात्रा निष्फल जाती है :

अकृत्वा दर्शनं बश्य! केदारस्याघनाशिनः। यो गच्छेद् बदरींतस्य यात्रा निष्फलतां ब्रजेत्‌॥

और केदारेश्वरसहित नर-नारायण मूर्ति के दर्शन का फल समस्त पापों के नाशपूर्वक जीवन्मुक्ति की प्राप्ति बतलाया गया है।

तस्यैव रूपं द्दष्ट्वा च सर्वपापैः प्रमुच्यते। जीवन्मुको भवेत्‌ सोऽपि यो गतो बदरीवने॥

दृष्ट्वा रूपं नरस्यैव तथा नारायणस्य च। केदारेश्र्वरनाम्नश्र्च मुक्तिभागी न संशयः॥

इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना का इतिहास संक्षेप में यह है कि हिमालय के केदार श्रृंग पर विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न हो कर भगवान्‌ शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में वहां सदा वास करने का वर प्रदान किया।


« Last Edit: March 08, 2010, 01:18:52 AM by devbhoomi »
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केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित हैं। शिखर के पूर्व की ओर अलकनंदा के सुरम्य तट पर बदरीनारायण अवस्थित हैं और पश्चिम में मंदाकिनी के किनारे श्री केदारनाथ विराजमान हैं। अलकनंदा और मंदाकिनी-ये दोनों नदियां रुद्रप्रयाग में मिल जाती हैं और देवप्रयाग में इनकी संयुक्त धारा गंगोतरी से निकल कर आयी हुई भागीरथी गंगा का

आलिंगन करती है। इस प्रकार जब गंगा स्नान करते हैं, तब सीधा संबंध श्री बदरी और केदार के चरणों से हो जाता है। बदरीनाथ के यात्राी प्रायः केदारनाथ हो कर जाते हैं और जिस रास्ते से जाते हैं, उसी रास्ते से वापस न लौट कर रामनगर की ओर से लौटते हैं। यात्रा मार्ग में यात्रियों के सुविधार्थ बीच-बीच में चट्टियां बनी हुई हैं। यहां गरमी में भी सर्दी बहुत पड़ती है। कहीं-कहीं तो नदी जल तक जम जाता है।

श्री केदारेश्र्वर ३ दिशा में बर्फ से ढके रहते हैं और शीत काल में तो वहां रहना असंभव सा ही है। कार्तिकी पूर्णिमा के होते-होते पंडे लोग केदार जी की पंचमुखी मूर्ति ले कर नीचे ÷ऊखी मठ' में, जहां, रावल जी रहते हैं, चले आते हैं और फिर ६ मास के बाद मेष संक्राति लगने पर बर्फ को काट कर, रास्ता बना कर, पुनः जा कर मंदिर के पट खोलते हैं।

मंदिर मंदाकिनी के घाट पर पहाड़ी ढंग का बना हुआ है। भीतर घोर अंधकार रहता है और दीपक के सहारे ही शंकर जी के दर्शन होते हैं। दीपक में यात्री लोग घी डालते रहते हैं। शिव लिंग अनगढ़ टीले के समान है।

सम्मुख की ओर यात्री जल-पुष्पादि चढ़ाते हैं और दूसरी ओर भगवान्‌ के शरीर में घी लगाते हैं तथा उनसे बांह भर कर मिलते हैं। यह मूर्ति चार हाथ लंबी और डेढ़ हाथ मोटी है। मंदिर के जगमोहन में द्रौपदी सहित पंच पांडवों की विशाल मूर्तियां हैं। मंदिर के पीछे कई कुंड हैं, जिनमें आचमन तथा तर्पण किया जाता है।

केदारनाथ के निकट ÷भैरव झांप' पर्वत है। पहले यहां कोई-कोई लोग बर्फ में गल कर, अथवा ऊपर से कूद कर शरीरपात करते थे। पर १८२९ से सती एवं भृगुपतन की प्रथाओं की भांति सरकार ने इस प्रथा को भी बंद करा दिया।
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                                         जय बद्रीकेदारनाथ
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यहां स्थापित प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ केदारनाथ मंदिर अति प्राचीन है। कहते हैं कि भारत की चार दिशाओं में चार धाम स्थापित करने के बाद जगद्गुरू शंकराचार्य ने ३२ वर्ष की आयु में यहीं श्री केदारनाथ धाम में समाधि ली थी। उन्हीं ने वर्तमान मंदिर बनवाया था। यहां एक झील है जिसमें बर्फ तैरती रहती है इस झील के बारे में प्रचलित है इसी झील से युधिष्ठिर स्वर्ग गये थे।

 श्री केदारनाथ धाम से छह किलोमीटर की दूरी चौखम्बा पर्वत पर वासुकी ताल है यहां ब्रह्म कमल काफी होते हैं तथा इस ताल का पानी काफी ठंडा होता है। यहां गौरी कुण्ड, सोन प्रयाग, त्रिजुगीनारायण, गुप्तकाशी, उखीमठ, अगस्तयमुनी, पंच केदार आदि दर्शनीय स्थल हैं।

केदारनाथ आने के लिए कोटद्वार जो कि केदारनाथ से २६० किलोमीटर तथा ऋर्षिकेश जो कि केदारनाथ से २२९ किलोमीटर दूर है तक रेल द्वारा आया जा सकता है। सड़क मार्ग द्वारा गौरीकुण्ड तक जाया जा सकता है जो कि केदारनाथ मंदिर से १४ किलोमीटर पहले है।

 यहां से पैदल मार्ग या खच्चर तथा पालकी से भी केदारनाथ जाया जा सकता है। नजदीक हवाई अड्डा जौली ग्रांट २४६ किलोमीटर दूरी पर स्थित है, यहां से केदारनाथ के लिए हवाई सेवा हाल ही में शुरू हुई है।
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                   केदारनाथ महात्म्य
                       *************


लिंग पुराण के मतानुसार जो मनुष्य संन्यास ग्रहण करके केदार कुण्ड में निवास करता है वह शिव समान हो जाता है। कर्मपुराण का वक्तव्य है कि महालय तीर्थ में स्नान करने और केदारनाथ का गरुड़ पुराणानुसार केदारनाथ की तीर्थ करने से समस्त पापों का क्षय हो जाता है।

 महाभारत ग्रंथ केदारनाथ की महिमा का उपदेश प्रदान करते हुए वर्णन करता है कि जगत में सात सरस्वती है जो कि सुप्रभा के नाम से पुष्कर में, कांचीनाक्षी के नाम से नैमिषारण में, विशाला के नाम से गया में, मनोरमा के नाम से अशेधया में, ओघवती के नाम से कुरुक्षेत्र में, सुरेश के नाम से गंगाद्वार में तथा बिमलोदकी के नाम से हिमालय पर स्थित है। जो व्यक्ति केदारांचल पर गमन करके ( प्राकृतिक) मृत्यु को प्राप्त होता है वह निश्चय शिवलोक पहुंचता है।

पह्म पुराण, इस महात्म्य में एक और विशेषता संलग्र करते हुए स्पष्ट करता है कि जब कुंभ राशि पर सूर्य तथा गुरू ग्रह स्थित हो तब केदारनाथ का दर्शन तथा स्पर्श मोक्ष प्रदान करता है। ( कुंभ राशि में सूर्य फरवरी मास के अंतर्गत भ्रमण करता है)।

 हमारे सनातन धर्म में एक विशेष महापुराण है जिसे स्कंद पुराण कहा जाता है। इसके अनेक अंश दुर्लभ हो चुके हैं। इसी पुराण में केदार महात्म्य भी स्पष्ट किया गया है।
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