Author Topic: Mention about Uttarakhand Places in Epics-धार्मिक ग्रंथो में उत्तराखंड का वर्णन  (Read 8707 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Dosto,

Devbhoomi – A land of God and Goddess, a land where Great Saint did penance to attain salvation, a land where the pious River Ganga originate and a land where God of three loka’s Mahadev got married. This land is called “Devbhoomi Uttarakhand”. There are several mythological stories connected with Uttarakhand abut which there is mentioned in Great Hindu Epics.

We will give information about many the places of Uttarakhand about which there is mentioned on Hindu Epics.  We are sure you would like the information and add the same your side also.

Regards,

M S Mehta

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Mentioned about Uttarakhand in Skand Puran
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स्कन्द पुराण में हिमालय को पॉच भौगोलिक क्षेत्रों में विभक्त किया गया है:-

खण्डाः पत्र्च हिमालयस्य कथिताः नैपालकूमाँचंलौ । केदारोऽथ जालन्धरोऽथ रूचिर काश्मीर संज्ञोऽन्तिमः ।।

अर्थात हिमालय क्षेत्र में नेपाल ,कुर्मांचल , केदारखण्ड़ (गढवाल), जालन्धर ( हिमाचल प्रदेश ) और सुरम्य काश्मीर पॉच खण्ड है। पौराणिक ग्रन्थों में कुर्मांचल क्षेत्र मानसखण्ड के नाम से प्रसिद्व था। पौराणिक ग्रन्थों में उत्तरीय हिमालय में सिद्ध गन्धर्व, यक्ष, किन्नर जातियों की सृष्टि और इस सृष्टि का राजा कुबेर बताया गया हैं। कुबेर की राजधानी अलकापुरी ( बद्रीनाथ से ऊपर) बताई जाती है।पुराणों के अनुसार राजा कुबेर के राज्य में आश्रम में ऋषि -मुनि तप व साधना करते थे।

अंग्रेज इतिहासकारों के अनुसार हुण, सकास, नाग खश आदि जातियां भी हिमालय क्षेत्र में निवास करती थी। किन्तु पौराणिक ग्रन्थों में केदार खण्ड व मानस खण्ड के नाम से इस क्षेत्र का व्यापक उल्लेख है। इस क्षेत्र को देव-भूमि व तपोभूमि माना गया है। मानस खण्ड का कुर्मांचल व कुमाऊं नाम चन्द राजाओं के शासन काल में प्रचलित हुआ।कुर्मांचल पर चन्द राजाओं का शासन कत्यूरियों के बाद प्रारम्भ होकर सन 1790 तक रहा। सन 1790 में नेपाल की गोरखा सेना ने कुमाऊं पर आक्रमण कर कुमाऊ राज्य को अपने आधीन कर दिया। गोरखाओं का कुमाऊं पर सन 1790 से 1815 तक शासन रहा। सन 1815 में अंग्रजो से अन्तिम बार परास्त होने के उपरान्त गोरखा सेना नेपाल वापिस चली गई किन्तु अंग्रजों ने कुमाऊं का शासन चन्द राजाओं को न देकर कुमाऊं को ईस्ट इण्ड़िया कम्पनी के अधीन कर किया। इस प्रकार कुमाऊं पर अंग्रेजो का शासन 1815 से प्रारम्भ हुआ।

ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार केदार खण्ड कई गढों( किले ) में विभक्त था। इन गढों के अलग राजा थे और राजाओं का अपने-अपने आधिपत्य वाले क्षेत्र पर साम्राज्य था। इतिहासकारों के अनुसार पंवार वंश के राजा ने इन गढो को अपने अधीनकर एकीकृत गढवाल राज्य की स्थापना की और श्रीनगर को अपनी राजधानी बनाया। केदार खण्ड का गढवाल नाम तभी प्रचलित हुआ। सन 1803 में नेपाल की गोरखा सेना ने गढवाल राज्य पर आक्रमण कर गढवाल राज्य को अपने अधीन कर लिया ।महाराजा गढवाल ने नेपाल की गोरखा सेना के अधिपत्य से राज्य को मुक्त कराने के लिए अंग्रजो से सहायता मांगी । अग्रेज सेना ने नेपाल की गोरखा सेना को देहरादून के समीप सन 1815 में अन्तिम रूप से परास्त कर दिया । किन्तु गढवाल के तत्कालीन महाराजा द्वारा युद्ध व्यय की निर्धारित धनराशि का भुगतान करने में असमर्थता व्यक्त करने के कारण अंग्रजो ने सम्पूर्ण गढवाल राज्य गढवाल को न सौप कर अलकनन्दा मन्दाकिनी के पूर्व का भाग ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन में शामिल कर गढवाल के महाराजा को केवल टिहरी जिले ( वर्तमान उत्तरकाशी सहित ) का भू-भाग वापिस किया।गढवाल के तत्कालीन महाराजा सुदर्शन शाह ने 28 दिसम्बर 1815 को टिहरी नाम के स्थान पर जो भागीरथी और मिलंगना के संगम पर छोटा सा गॉव था, अपनी राजधानी स्थापित की। कुछ वर्षों के उपरान्त उनके उत्तराधिकारी महाराजा नरेन्द्र शाह ने ओड़ाथली नामक स्थान पर नरेन्द्र नगर नाम से दूसरी राजधानी स्थापित की । सन1815 से देहरादून व पौडी गढवाल ( वर्तमान चमोली जिलो व रूद्र प्रयाग जिले की अगस्तमुनि व ऊखीमठ विकास खण्ड सहित) अंग्रेजो के अधीन व टिहरी गढवाल महाराजा टिहरी के अधीन हुआ।
भारतीय गणतंन्त्र में टिहरी राज्य का विलय अगस्त 1949 में हुआ और टिहरी को तत्कालीन संयुक्तप्रान्त का एक जिला घोषित किया गया। भारत व चीन युद्व की पृष्ठ भूमि में सीमान्त क्षेत्रों के विकास की दृष्टि से सन 1960 में तीन सीमान्त जिले उत्तरकाशी, चमोली व पिथौरागढ़ का गठन किया गया ।
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Souce of information : Wikipedia.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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प्रयागकूले यमुनातटे वा सरस्वती पुण्यजले गुहायाम्।
यो योगिनां ध्यान गतो%पि सूक्ष्म तस्मै नम: श्री रविनंदनाय।।

जो व्यक्ति यमुनोत्तरी धाम आकर यमुनाजी के पवित्र जल में स्नान करते हैं तथा यमुनोत्तरी के सान्निध्य खरसाली में शनिदेव का दर्शन करते हैं उनके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। यमुनोत्तरी में सूर्यकुंड, दिव्यशिला और विष्णुकुंड के स्पर्श और दर्शन मात्र से लोग समस्त पापों से मुक्त होकर परमपद को प्राप्त हो जाते हैं।


    यमुनोत्तरी 
     सर्वलोकस्य जननी देवी त्वं पापनाशिनी।
      आवाहयामि यमुने त्वं श्रीकष्ण भामिनी।।

    पं. पवन प्रकाश उनियाल

http://www.nutansavera.com/new/index.php

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पद्मपुराण उत्तराखंड में महर्षि मार्कण्डेय कृत महामृत्युंजय मंत्र व स्तोत्र का वर्णन है। पद्मपुराण में वर्णित दंत कथा के अनुसार मुनि मुकण्डु संतानहीन थे, अत: उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि तुम्हें योग्य संस्कारों और तेजस्वी बालक का वरदान चाहिए तो उसकी आयु केवल सोलह वर्षहोगी। बालक का नाम मार्कण्डेय रखा गया और यह देखने में आया कि वह शिवभक्त है।

बालक की सोलह वर्ष की आयु पूर्णहोने पर यमराज स्वयं उसके प्राणों को हरने आए। बालक ने उन्हें देख स्नेह से शिवलिंग को कसकर पकड़ लिया और जैसे ही यमराज बालक के प्राण हरने के लिए आगे बढ़े तो शिवलिंग से भगवान शिव प्रकट हुए और महामृत्युंजय की उत्पित्त हुई। इसी प्रकार स्कंदपुराण (प्रभास खण्ड) में शुक्राचार्य द्वारा शिवजी की आराधना का उल्लेख है, जिसमें उन्होंने कहा है कि यदि तुष्टो महादेव विद्या देहि महेश्वर।


यथा जीविन्त संप्राप्ता मृत्यु संख्येपि जन्तव।।


हे महेश्वर महादेव यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो वह विद्या दीजिए जिससे युद्ध में मृत्यु को प्राप्त प्राणी जीवित हो जाए। शिवजी द्वारा शुक्राचार्य को शक्तिशाली संजीवनी महामृत्युंजय विद्या वरदान के रूप में दी गई। विभिन्न पुराण ग्रंथों जैसे स्कंदपुराण, देवी भागवत पुराण, लिंग पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण व पद्मपुराण में मृत्युंजय साधना के विशिष्ट क्रम उल्लेखित हैं। इसके अतिरिक्त वाल्मीकि रामायण, दशमग्रंथ (सिक्खमत) किरातार्जुनीयम़ रामकृष्णलीलामृत में भी इसका उल्लेख है।

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 स्कंदपुराण में नंगप्रयाग को कण्व आश्रम कहा गया है जहां दुष्यंत एवं शकुंतला की कहानी गढ़ी गयी। स्पष्ट रूप से इसका नाम इसलिये बदल गया क्योंकि यहां नंद बाबा ने वर्षों तक तप किया था।

नंदप्रयाग से संबद्ध एक दूसरा रहस्य चंडिका मंदिर से जुड़ा है। कहा जाता है कि देवी की प्रतिमा अलकनंदा नदी में तैर रही थी तथा वर्तमान पुजारी के एक पूर्वज को यह स्वप्न में दिखा। इस बीच कुछ चरवाहों ने मूर्ति को नदी के किनारे एक गुफा में छिपा दिया। वे शाम तक जब घर वापस नहीं आये तो लोगों ने उनकी खोज की तथा उन्हें मूर्ति के बगल में मूर्छितावस्था में पाया। एक दूसरे स्वप्न में पुजारी को श्रीयंत्र को प्रतिमा के साथ रखने का आदेश मिला। रथिन मित्रा के टेम्पल्स ऑफ गढ़वाल एंड अदर लैंडमार्क्स, गढ़वाल मंडल विकास निगम 2004 के अनुसार, कहावतानुसार भगवान कृष्ण के पिता राजा नंद अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में यहां अपना महायज्ञ पूरा करने आये तथा उन्हीं के नाम पर नंदप्रयाग का नाम पड़ा।


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पुरातन हिन्दू धर्म ग्रन्थों जैसे कि वेद, उपनिष्द, पुराण तथा महाभारत ने इस मध्य हिमालय क्षेत्र को विभिन्न नामों से पहचाना है जैसे कि हिमवंत, ब्रह्मव्रत, तपोभूमि, स्वर्गभूमि, आर्यवृत, देवभूमि, ब्रह्मऋषि देश, पांचालदेश, केदारखण्ड, बादीकाश्रम, केदारमण्डल, खासमण्डल, तथा उत्तराखण्ड।

पुरातन विद्वानों ने इस क्षेत्र को बहुत प्रशंसा भरे इन शब्दों से अलेकृत किया हैः

“गंगाद्वारोत्तारम विप्र! स्वर्ग भूमि स्मरिता बुधेi
अन्यत्र पृथ्विनि प्रोक्ता गंगाद्वारोत्तारम वीना”


गंगाद्वार से यानि हरिद्वार से उत्तर की भूमि को ज्ञानी स्वर्गभूमि (पैराडाइज) कहते हैं तथा अन्य सभी क्षेत्र पृथ्वी कहलाते हैं।

यह माना जाता है कि ऋगवेद के समय आर्य पांच मुख्य कबीलों में विभाजित थे त्रितसु, पुरू, अनु, यदु तथा त्रावसु। त्रित्सुओं ने यमुना तथा सतलुज के मध्य का भाग जो कि उत्तर में हिमालय की गंगोत्री श्रंखला तक फैला हुआ था, पर राज किया। यहां के स्वच्छ वातावरण वस्तु नैसर्गिक सुंदरता से मुग्ध आर्यों ने इस स्थान को पवित्र माना। गढ़वाल की अपने धार्मिक रीतिओं से समानता जैसे कि प्रकृति के कारण आर्यों ने इस स्थान को प्रकृति के देव-स्थान के रूप में मान्यता दी। वैदिक काल में ऋषि मानते थे कि यह स्थान प्रकृति द्वारा स्वयं धार्मिक यज्ञों, बलियों तथा अन्य धार्मिक कार्यों के लिए चुना गया है। मिथिहास के अनुसार यहां से जो भी यज्ञ अथवा धार्मिक अनुष्ठान करता था उसे उच्च पुण्य की प्राप्ति होती थी तथा पाप मुक्त होता था। इस स्थान को ज्ञान प्राप्ति के लिए चुन लिया गया यहां पर ही चार आश्रम (जीवन की अवस्थाएं) ब्रह्मचार्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा सन्यास प्रत्येक हिन्दू के लिये निर्मित किये गये।

पवित्र हिन्दू अभिलेखों के अनुसार दर्शन ज्ञान के छहः मे से पांच दार्शनिक विचारधारओं के संस्थापकों ने अपने मतों की शुरूआत गढ़वाल से ही की: हरिद्वार में कपिल, बद्रीनाथ में कश्यप, मंदाकिनी के तट पर गौतम, तथा सरस्वती नदी के तटों पर व्यास तथा जैमिनी गढ़वाल विभिन्न गुरूकुलों के उन हजारों युवा अनुयाईयों का घर था जो यहां पर पुरान महाभारत, वेदों, सूत्रों, ब्राह्मणों तथा विभिन्न दर्शनों के श्लोक संगीतमयी वाणी में उच्चारित करते थे। उन शिष्यों को शायद अनेकों शताब्दियां लगी होगी सीखने में तथा फिर वे आम लोगों के मध्य पहुंचे होंगे अपना पूर्ण समर्पण से ग्रहण किया ज्ञान बांटने।

महान खगोलशास्त्री गर्ग ने अपनी खोजें द्रोणगिरी पर्वत पर की। उसके भी बहुत से शिष्य तथा अनुयायी होगें जिन्हें उसने खगोल शास्त्र में निपुण किया होगा और संसार में खगोल विसान को फैलाने के लिए भेजा होगा। आधुनिक समय में भी खगोल शास्त्र इस देश में प्रच्चुर मात्रा में सुरक्षित है।


Source : http://staging.ua.nic.in/chardham/hindi/history.asp

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गढ़वाल में इन पांच स्थलों को पंच केदार कहा जाता है। माना जाता है कि जो भी तीर्थयात्री इन पांच मंदिरों में पूजा कर लेता है उसके जीवन भर के पाप धुल जाते हैं।

मम क्षेत्राणी पंचेवा भक्तिप्रीतिकारिणी वै
केदारम मध्यम तुंग थाता रूद्रालयम प्रियम
कल्पकम चा महादेवी सर्वपाप प्रनाशमम्
कथितं ते महाभागे केदारेश्वर मंडलम्


मेरे मात्र पांच स्थल हैं जो शिष्यों में प्रेम लाते हैं, वे केदारनाथ, मध्यम (मधमाहेश्वर) तुंग (तुंगनाथ) रूद्रालय (रूद्रनाथ) तथा कल्पकार (कल्पेश्वर) हैं। हे महादेवी, ये सभी पाप धो डालते हैं।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Mention about Bhimtaal in Shrimad Bhagwat Puran

भीमेश्वर भीमताल के किनारे है! चित्रेश्वर महादेव गौला नदी के किनारे विश्वकर्मा का बनाया है ! चित्रशिला के उपर की छोटी पर पश्चिम की और मार्कंडेय ऋषि का आश्रम था ! उसका उल्लेख श्रीमद भागवत के द्वादश सकंद व् अध्याय ८ में है !

तेवै तदाश्रम जग्मुहिमाद्राये पार्श्उत्तरे
पुष्पभद्रा नदी यत्र, चित्रख्या च शिला विभौ !! (१७)

Source of Information : Kumaon Ka Itihas Book.

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मानसखंड  में अल्मोड़ा नगरी के जिस पर्वत पर वसी है, उसका वर्णन इस प्रकार है,

  कौशिकी शाल्मली मध्ये पुण्य कापाय पर्वत:!
  तस्य पश्चिमे भागे वै क्षेत्र विष्णो प्रतिषीतम!!

मानसखंड, अध्याय २ 

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पुराणों के अनुसार शिवजी जहां-जहां खुद प्रगट हुए उन बारह स्थानों पर स्थित शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंगों के रूप में पूजा जाता है।

सौराष्ट्रे सोमनाथ च श्री शैले मल्लिकार्जुनम, उज्जयिन्या महाकाल, मोंधारे परमेश्वरम, केदार हिमवत्पृष्ठे, डाकिन्या भीमशंकरम वारासास्था च विश्वेश, त्र्यम्बक गौतमी तीरे, वैद्यनाथ चिता भूमौनागेश द्वारका वने। सेतुबन्धे च रामेशं घुश्मेशं च शिवाल्ये। द्वादशेतानिनामानि प्रातरुत्थायय: पठेत, सर्व पापैर्विनिर्मुक्त: सर्व सिद्धि फल लभत्।

हाँ पर "नागेश दारुकावने" जो शब्द है, उसका सम्बन्ध जागीश्वर से है ! क्योकि जागेश्वर देवदारु की बनी जागीश्वर का मंदिर होना मानसखंड में माना गया है, (हर्न्यसाग ने भी इसके बारे में लिखा है) 

 

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