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Author Topic: Dehradun Capital of Uttarakhand-देहरादून, उत्तराखण्ड की राजधानी(अस्थाई)  (Read 3329 times)

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दोस्तों इस टोपिक के जरिये  हम उत्तराखंड की अस्थाई राजधानी देहरादून की जानकारी आप लोगों तक पहुचने का एक छोटा सा प्रयास है, मुझे आशा है की आप सभी इसमें मेरी जरूर मदद करेंगें !!

Regards

M S JAKHI
« Last Edit: December 14, 2009, 10:41:22 AM by पंकज सिंह महर »
"जुगराज रैया या धरती और याखाका मनखी जय देवभूमि उत्तराखंड "

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गुच्छुपानी

पिकनिक के लिए एक आदर्श स्थान रॉबर्स केव सिटी बस स्टेंड से गढ़वा केंट होते हुए अनारवाला में स्थित केवल 8 कि.मी. पर स्थित है। हरिद्वार-ऋषिकेश मार्ग पर लच्छीवाला-डोईवाला से 3 कि.मी. और देहरादून से 22 कि.मी. दूर है। सुंदर दृश्यावली वाला यह स्थान पिकनिक-स्पॉट है।

यहाँ हरे-भरे स्थान पर फॉरेस्ट रेस्ट हाउस में पर्यटकों के लिए ठहरने की व्यवस्था है। बसें अनारवाला गांव तक जाती है जहाँ से यहाँ पहुँचने के लिए एक किलोमीटर की दूरी पैदल तय करनी पड़ती है।

 कई सारी विशेषताओं में से एक जो इसे अत्यंत लोकप्रिय जगह बनाती है, वह है धरती के नीचे से पानी की धारा का बहना और फिर कुछ मीटर की दूरी पर उसका प्रकट हो जाना। यह गुफा भी चारों तरफ से पहाड़ियों से घिरी है और यह आत्मिक और मानसिक शांति की तलाश में जुटे व्यक्ति के लिए यह एक बेहतरीन अवसर उपलब्ध कराता है।
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राफ्टिंग व ट्रैकिंग,देहरादून

देहरादून के पास गंगा के तेज़ बहाव में राफ्टिंग की जाती है। कौडियाला और ऋषिकेश के बीच ३६ किलोमीटर के विस्तार पर १० महीनों के लिए १ सितंबर से ६ जून तक रैफ्टिंग का मज़ा लिया जा सकता है। लेकिन इसके लिए पर्यटन विभाग की कुछ शर्तों को पूरा करना होता है। ये शर्ते स्वास्थ्य और प्रशिक्षण से संबंधित होती हैं।


शहन्शाही आश्रम से मसूरी के लिए ट्रेकिंग का सुंदर मार्ग है। शहंशाही से पैदल रास्ता शुरू होता है और झारी-पानी पर समाप्त होता है। यह एक सुन्दर चढा़ई है जो लगभग 4-5 किलोमीटर की दूरी को 2-3 घण्टे में पूरा करती है। पूरा रास्ता पिक्चर महल की तरफ, जो मंसूरी से सात किलोमीटर दूर है जाता है। ऊपर जाने में पथरीला रास्ता और हरियाली है। जैसे जैसे ऊपर बढ़ते हैं हवा ठंडी और ताजी होती जाती है।

रूकना और साँस लेना, चारो ओर देखना अच्छा लगता है। यदि इस रास्ते से गर्म मौसम में जाना हो तो पीने के पानी की बोतल साथ लेकर जाना ठीक रहेगा। एक रास्ता पुराने राजपुर गाँव से भी मसूरी की ओर जाता है। यदि पैदल चलने का आन्नद लेना है तो यह पैदल चलने का ठीक मार्ग है। मुख्य राजपुर सडक के अन्त में, पुराना राजपुर गाँव जहाँ पर तिब्बती, पंजाबी, गढवाली मूल के लोग रहते है।

लगभग 2 किलोमीटर दूर राजपुर गाँव या डाकपट्टी एक ढा़ल पर है। मशहूर राजपुर 'पकोडे वाले' की दुकान से चढाई की शुरूवात होती है और थोडी दूर चलने पर मोड के पास सुन्दर पुरानी इमारतें दिखाई देती है।
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फन वैली,देहरादून

देहरादून, ऋषिकेश और हरिद्वार के नजदीक स्थित यह पार्क अपने आप में खास है। इस पार्क में बच्चे लेजी रीवर, मल्टीपल वाटर स्लाइड, किड्स पुल और वाटर डिस्को का आनंद ले सकते हैं।

इस मनोरंजन पार्क में रेसिंग कार, ड्रेगन कोस्टर, मिनी ट्रेन और क्वाइन गेम्स की सुविधाएं मौजूद हैं। यहां पर विवाह, जन्म दिन पार्टी, कॉर्पोरेट सम्मेलन व सेमिनार आयोजित करने की विशेष व्यवस्था है और इस पर छूट भी मिलती है। लक्ष्मण सिद्ध मंदिर : लच्छीवाला के घने वन में स्थित यह मंदिर आध्यात्मिक प्रवृति वाले पर्यटकों में बहुत ही लोकप्रिय है। सुसवा नदी के किनारे स्थित इस मंदिर के आसपास का दृश्य काफी मनोरम है। हर रविवार को यहां श्रद्धालुओं की काफी भीड़ रहती है।

प्रत्येक साल के अप्रैल महीने के अंतिम रविवार को यहां मेला का आयोजन होता है और मुफ्त में भोजन बांटा जाता है। इस अवसर पर लाखों लोग जुटते हैं। धार्मिक मान्यता है कि ब्राह्म हत्या के दोष से छुटकारा पाने के लिए भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्मण ने यहीं पर तपस्या की थी।
नीलकंठ माधव मंदिर, डोईवाला

नीलकंठ माधव मंदिर : स्थानीय लोगों का मानना है कि पहले यहां पर एक नागराज मंदिर था। लगभग 300 साल पहले जाखन नदी से लाया गया शिवलिंग यहां स्थापित किया गया।

इस अवसर पर यज्ञ हुआ और यहां पर शिव मंदिर का निर्माण हुआ। यज्ञ के समय 11 गाय दान के रूप में दी गईं। यह मंदिर 9 एकड़ क्षेत्र में है।
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फन एंड फूड किंगडमः

यह घंटाघर से 11 किलोमीटर की दूरी पर प्रेम नगर के कौलागढ़ में स्थित है। यह इस क्षेत्र के सबसे बड़े आकर्षणों में से एक है।

 कुछ बेहतरीन वाटर गेम्स और लुभावनी प्रकृति परिवार के साथ यहां मौज-मस्ती के लिए प्रेरित करती है। फन एंड फूड ने अपने आप को देहरादून के आसपास एक बेहतरीन आकर्षण के रूप में खुद को स्थापित किया है।
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देहरादून के विश्व प्रशिध बासमती चावल



बासमती  भारत की लम्बे चावल की एक उत्कृष्ट किस्म है। इसका वैज्ञानिक नाम है ओराय्ज़ा सैटिवा। यह अपने खास स्वाद और मोहक खुशबू के लिये प्रसिद्ध है। इसका नाम बासमती अर्थात खुशबू वाली किस्म होता है। इसका दूसरा अर्थ कोमल या मुलायम चावल भी होता है। भारत इस किस्म का सबसे बड़ा उत्पादक है, जिसके बाद पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश आते हैं।

पारंपरिक बासमती पौधे लम्बे और पतले होते हैं। इनका तना तेज हवाएं भी सह नहीं सकता है। इनमें अपेक्षाकृत कम, परंतु उच्च श्रेणी की पैदावार होती है। यह अन्तर्राष्ट्रीय और भारतीय दोनों ही बाजारों में ऊँचे दामों पर बिकता है।

बासमती के दाने अन्य दानों से काफी लम्बे होते हैं। पकने के बाद, ये आपस में लेसदार होकर चिपकते नहीं, बल्कि बिखरे हुए रहते हैं।

 यह चावल दो प्रकार का होता है :- श्वेत और भूरा। कनाडियाई मधुमेह संघ के अनुसार, बासमती चावल में मध्यम ग्लाइसेमिक सूचकांक ५६ से ६९ के बीच होता है , जो कि इसे मधुमेह रोगियों के लिये अन्य अनाजों और श्वेत आटे की अपेक्षा अधिक श्रेयस्कर बनाता है।
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देहरादून की लीची



देहरादून की लीची बहुत ही प्रशिध है,देहरादून में लीची का उत्पादन बहुत बड़ी मात्रा में होता है!इसका मध्यम ऊंचाई का सदाबहार पेड़ होता है, जो कि 15-20 मीटर तक होता है, ऑल्टर्नेट पाइनेट पत्तियां, लगभग 15-25 सें.मी. लम्बी होती हैं। नव पल्लव उजले ताम्रवर्णी होते हैं, और पूरे आकार तक आते हुए हरे होते जाते हैं।

 पुष्प छोटे हरित-श्वेत या पीत-श्वेत वर्ण के होते हैं, जो कि 30 सें.मी. लम्बी पैनिकल पर लगते हैं। इसका फल ड्रूप प्रकार का होता है, 3-4 से.मी. और 3 से.मी व्यास का।इसका छिलका गुलाबी-लाल से मैरून तक दाने दार होता है, जो कि अखाद्य और सरलता से हट जाता है।

इसके अंदर एक मीठे, दूधिया श्वेत गूदे वाली, विटामिन- सी बहुल, कुछ-कुछ छिले अंगूर सी, मोटी पर्त इसके एकल, भूरे, चिकने मेवा जैसे बीज को ढंके होती है। यह बीज 2X1.5 नाप का ओवल आकार का होता है, और अखाद्य होता है। इसके फल जिलाई से अक्तूबर में फ़ूल के लगभग तीन मास बाद पकते हैं। इसकी दो उप-जातियां हैं
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देहरादून लोक संस्कृति

इस घाटी की परम्परागत पौशाक ऊनी कम्बल जिसे लाबा कहते है अब भी ऊँचाई पर स्थित गाँव में पहने जाते है। स्त्रियाँ पूरी बाहों की कमीज के साथ साडी़ पहनती है। अंगरा (एक प्रकार की जाकेट) पहनती है। नौजवान औरते घाघरा पहनती है। एक फन्टू (रंगीन स्कार्फ) या एक ओढनी (लम्बा स्कार्फ) जो सिर और कन्धों को ढके हुए हो। दूसरी तरफ पुरूष आमतौर से मिरजई, अंगरखा, लगोंट या धोती बाँधते है।

 धोती को पहने का तरीका उनके स्तर को प्रदर्शित करता है। उदाहरण के रूप में छोटी धोती का मतलब वे नीची जाति से और लम्बी धोती का मतलब ऊँची जाति से है। सर्दी में पुरूष सदरी (जाकेट), टोपी और घुटनो तक का कोट पहनते है। क्योकि उस क्षेत्र के जंगलो में भाँग उगती है। भाँग का धागा सूत के रूप में प्रयोग किया जाता है जिसे भाँगला कहते है। देहरादून की अधिकांश जनसंख्या खेती करती है, बडी संख्या में लोग सेना में जाते हैं या व्यापारी होते है या बुद्धिजीवी होते है।

 लोगो का भोजन सादा है। भोजन में दालभात (दाल-चावल) दोपहर बाद, रोटी सब्जी शाम को। इसके अतिरिक्त आलू गुटका, रायता (स्थानीय, खीरे या ककडी का) उडद की दाल का वड़ा और गेहत की दाल का वडा यहाँ के लोकप्रिय भोजन हैं।
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देहरादून प्रौद्योगिकी संस्थान



देहरादून प्रोद्योगिकी संस्थान, उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में मसूरी जाने वाली सड़क पर स्थित एक प्रौद्योगिकी संस्थान है। यह देशरादून का एक प्रमुख प्रौद्योगिकी संस्थान है। देहरादून नगर से इसकी दूरी १० किमी है और मसूरी से २० किमी। ये दून घाटी की मनोहर पर्वतश्रृंखला से घिरा हुआ है।

यहाँ तक पहुँचने के लिए पक्की सड़क है और निजी या सार्वजानिक वाहन द्वारा यहाँ सरलता से पहुंचा जा सकता है। निकटतम रेलवे स्टेशन यहाँ से लगभग १२ किमी या ३० मिनट की दूरी पर स्थित है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से देहरादून की दूरी लगभग २५० किमी है और दोनों नगर सड़क और रेल मार्ग से जुड़े हुए हैं जिससे यहाँ पहुंचना सरल है।

संस्थान की स्थापना २८ अक्टूबर, १९९८ में की गयी थी। आज यहाँ २,३००+ छात्र-छात्राएं विभिन्न पाठ्यक्रमो में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। ये यूनिसन ग्रुप की सबसे बड़ी परियोजना थी। ग्रुप की अन्य परियोजनायें हैं आई एम एस, देहरादून; आई एम एस नौएडा; डी ई टी-वास्तुशिल्प संकाय, डी ई टी-फार्मेसी संकाय, यूनिसन विधि विद्यालय, और यूनिसन विश्वविद्यालय। इन सबके अतिरिक्त अन्य भी बहुत से संस्थान यूनिसन ग्रुप द्वारा विचाराधीन या निर्माणाधीन है।

डी आई टी में पढने के लिए स्थानीय छात्रों के आतिरिक्त पूरे उत्तराखंड से और देश के अलग-अलग राज्यों से छात्र आते हैं, जिससे यहाँ पढने वाले छात्रों को देश के अन्य राज्यों के बारे में जानकारी मिलती है।
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शिक्षा संस्थान,देहरादून

देहरादूत अत्यंत प्राचीनकाल से अपने शैक्षिक संस्थानों के लिए प्रसिद्ध रहा है। दून और वेल्हम्स स्कूल का नाम बहुत समय से अभिजात्यवर्ग में शान के साथ लिया जाता है।

 यहाँ भारतीय प्रशासनिक सेवा और सैनिक सेवाओं के प्रशिक्षण संस्थान हैं जो इसे शिक्षा के क्षेत्र में विशेष स्थान दिलाते हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग, सर्वे ऑफ इंडिया, आई.आई.पी. आदि जैसे कई राष्ट्रीय संस्थान स्थित हैं। देहरादून में वन अनुसंधान संस्थान से भारत के अधिकतम वन अधिकारी बाहर आते हैं।

 इसी प्रकार यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम फॉर एनर्जी स्टडीज़ उच्च श्रेणी का एक विशेष अध्ययन संस्थान है जो देश में गिने चुने ही हैं। यहाँ सभी धर्मों के अलग अलग विद्यालयों के साथ ही बहुत से पब्लिक स्कूल भी हैं। योग, आयुर्वेद और ध्यान का भी यह नगर लोकप्रिय केन्द्र है।

कुछ अन्य महत्वपूर्ण संस्थाएँ शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं, जिनमें नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर द वर्चुअल हैंडीकैप  (एन.आई.वी.एच) का नाम महत्वपूर्ण है जो दृष्टिहीनों के विकास में सहत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह संस्थान भारत में पहला है और यहाँ देश की सबसे पहली ब्रेली लिपि की प्रेस है। यह राजपुर रोड पर निरन्तर कार्यशील है और इसका परिसर बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है। इसके कर्मचारी परिसर में ही रहते हैं।

इसके अतिरिक्त शार्प मेमोरियल स्कूल फॉर द ब्लाइंड नामक निजी संस्था राजपुर में है जो दृष्टि से अपंग बच्चों की शिक्षा तथा पुनर्वास का काम करते हैं। कानों से सम्बन्धित रोगों और अपंगता के लिए बजाज संस्थान (बजाज इंस्टीट्यूट ऑफ़ लर्निंग) है। ये सभी संस्थाएँ राजपुर मार्ग पर ही स्थित है। उत्तराखण्ड सरकार का एक और केन्द्र है- करूणा विहार[१५], जो मानसिक रूप से चुनौतियाँ झेल रहे बच्चों के लिए कार्य करते है।

राफील रेडरचेशायर अर्न्तराष्ट्रीय केन्द्र द्वारा टी.बी व अधरंग के इलाज के लिये डालनवाला में एक अस्पताल है। ये सभी संस्थाएँ देहरादून का गौरव बढ़ाती हैं तथा यहाँ के निवासियों के बेहतर जीवन के प्रति कटिबद्ध हैं।
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दून विद्यालय,DEHRADUN




दून विद्यालय भारत के जाने-माने निजी/स्वतंत्र विद्यालयों मेम से एक है, जो देहरादून, उत्तराखंड में है। यह विद्यालय कुल ७० एकड़ (२,८०,००० वर्ग मीटर) में फैला है। सन् १९३५, मेम इस विद्यालय की स्थापना सतीश संजन दास द्वारा कि हई थी। वे भारत के एक स्वतंत्रता सेनानी चितरंजन दास और भारत के एक मुख्य न्यायाधीश सुधि संजन दास के बंधु थे।

इस विद्यालय के सर्वप्रथम प्रधानाध्यापक के आर्थर ई फूट, जो पहले एटन महाविद्यालय में विज्ञानाध्यापक थे। इस विद्यालय में यह पद स्वीकार करने से पहले फूट कभी भी भारत नहीं आए थे, और उन्होनें सबसे पहले हैरो से जे ए के मार्टिन को अपना उप प्रधानाध्यापक नियुक्त किया।

रविन्द्रनाथ टैगोर द्वारा रचित जन गण मन को १९३५ में विद्यालय गान चुना गया, जिसे बाद में सन् १९४७ में भारत का राष्ट्र गान चुना गया। इस विद्यालय का उद्देश्य युवा भारतीयों को एक उदारवादी शिक्षा प्रदान करना है, जिससे उनमें धर्मनिरपेक्षता, अनुशासन, और समानता के सिद्धांतों के प्रति आदर भाव जगे।

२००८ में, एज्युकेशन व्लर्ड द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण में इस विद्यालय को भारत के "सबसे सम्मानित आवासीय विद्यालय" का दर्जा दिया गया।


http://www.doonschool.com/
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ओएनजीसी केंद्रीय विद्यालय, देहरादून



केंद्रीय विद्यालय ओएनजीसी, देहरादून, अगस्त १९८० में अस्तित्व में आया, और यह केंद्रीय विद्यालय संगठन का एक प्रतिष्ठित विद्यालय है। यह विद्यालय केवीएस नई दिल्ली, की एक घटक इकाई है, और मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्था है।

विद्यालय का प्रबंधन स्थानीय प्रबंधन समिति द्वारा किया जाता है, जिसका अध्यक्ष, जी एम ओएन्जीसी, होता है। वीएमसी द्वारा भवन रखरखाव, अन्य उपकरण, आवर्ती और अनाअवर्ती शुल्क और अन्य प्रशासनिक शुल्क उपलब्ध कराया जाता है।

विद्यालय के बारे में सामान्य जानकारी इस प्रकार है:-

    * देहरादून में स्थिति : कौलागढ़ रोड, देहरादून, जिला - देहरादून, उत्तराखंड - २४८ ००१
    * दिशा : यह घंटाघर से ३ किलोमीटर की दूरी पर कौलागढ़ रोड़ पर स्थित है।

    * अन्य विशेषतायें/विशेष रुचि : इस विद्यालय में लगभग २,००० छात्र-छात्राएँ हैं और यहां कक्षा एक से लेकर १२ वीं तक है। लड़के और लड़कियों दोनों के लिए उपलब्ध इस विद्यालय में कम्प्यूटर और विज्ञान प्रयोगशाला भी है।
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दून केंब्रिज स्कूल,DEHRADUN



दून केंब्रिज स्कूल, देहरादून में स्थित एक निजी विद्यालय है, और भारत के जाने माने विद्यालयों में से एक है। इस विद्यालय की स्थापना श्री डब्लू ची कश्यप द्वारा १९८२ में की गई थी, और तबसे इस विद्यालय से पढ़कर निकले छात्र आगे चलकर विशिष्ट शिक्षाविद और जनाधिकारी, अभियन्ता, चार्टर्ड अकाउंटेंट, और सफ़ल उद्यमी बनें हैं।

दून केंब्रिज स्कूल, देहरादून में किसी भी धर्म और जाति के लिए कोई भेदभाव नहीं है। इस विद्यालय में समाज के सभी वर्गों के बच्चों को प्रवेश मिलता है। यहाँ शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी है। अभी यहाँ लगभग १,७०० विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, और विद्यालय परिसर बहुत बड़ क्षेत्र में फैला हुआ है।
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डीएवी इंटर कॉलेज, प्रेम नगर,DEHRADUN




डीएवी इंटर कॉलेज देहरादून, उत्तराखंड के प्रेमनगर में स्थित एक सरकारी विद्यालय है। यह दयानन्द एंग्लो वैदिक से संबंधित एक संस्थान है।

विद्यालय के बारे में सामान्य जानकारी इस प्रकार है:-

    * देहरादून में स्थिति : प्रेम नगर, देहरादून, जिला - देहरादून, उत्तराखंड - २४८ ००१
    * दिशा : यह देहरादून रेलवे स्टेशन से ९ किलीमीटर की दूरी पर प्रेम नगर में स्थित है।
    * समय :
          o गर्मी में ८:०० सुबह से १:०० दोपहर
          o सर्दी में १०:०० सुबह से ४:०० दोपहर
    * कार्य दिवस : सोमवार से शनिवार।
    * उल्लेखनीय भूतपूर्वछात्र : महेन्द्र सिंह राणा, वरिष्ट अधीक्षक अभियन्ता; सुभाष सिंघल - सम्पादक, रामायण (टीवी धारावाहिक)
    * अन्य विशेषतायें/विशेष रुचि : इस विद्यालय में लगभग ४८६ छात्र हैं और यहां कक्षा १ से लेकर १२ वीं तक है। इस विद्यालय में कम्प्यूटर और विज्ञान प्रयोगशाला भी है। यहां १०वीं के बाद कला, विज्ञान तथा वाणिज्य तीनों की पढ़ाई होती है।

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Indian Military Academy,Dehradun



Located in Dehradun, the Indian Military Academy is an institution that trains men who officer the Indian Army. The Indian Military Academy became functional from 1st October 1932 with batch of 40 Gentlemen Cadets. Brigadier L.P. Collins was its first commandant.

The first course, christened as 'Pioneers', had on its roll great soldiers like Sam Manekshaw, Smith Dun and Mohammad Musa, all of whom went on to become chiefs of armies of their respective countries namely, India, Burma and Pakistan.



For the purpose of Indian Military Academy, the government acquired the estate of erstwhile Railway College at Dehradun which had the appropriate buildings and a large campus, enough to meet the upcoming academy's needs.

The beautiful main building of IMA is called Chetwode Building. It is named after Field Marshal Sir Philip Chetwode, who was at the time of IMA's inception, the Commander-in-Chief of India and had also inaugurated the new academy.

Indian Military Academy is located at 8 Km on Dehradun-Chakrata road. It is adjacent to Forest Research Institute, another premier institute of the country. The majestic main building of the Indian Military Academy is a sight to behold.

The well maintained campus of IMA with nicely done up gardens and training fields reek of sheer class and high standards of discipline that the institute upholds.
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Last post May 19, 2010, 06:53:09 AM
by parashargaur
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by Devbhoomi,Uttarakhand