Author Topic: Stinging Nettle (Bichhu Ghass) - सियूँण, बिच्छू घास , कनाली (Urtica Dioica )  (Read 26435 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Dosto,

Stinging Nettle locally known as Kandli, Bichhu Ghass, Siyon is found in Himalayan region of India, particularly in Uttarakhand hills. Apart from India this Grass is found  in Eupope, Asia etc. More Information is here:

Stinging nettle or common nettle, Urtica dioica, is a herbaceous perennial flowering plant, native to Europe, Asia, northern Africa, and North America, and is the best-known member of the nettle genus Urtica. The plant has many hollow stinging hairs called trichomes on its leaves and stems, which act like hypodermic needles, injecting histamine and other chemicals that produce a stinging sensation when contacted by humans and other animals.[1] The plant has a long history of use as a medicine and as a food source.
Description    Urtica dioica from Thomé, Flora von Deutschland, Österreich und der Schweiz 1885.   Stinging nettle is a dioecious herbaceous perennial, 1 to 2 m (3 to 7 ft) tall in the summer and dying down to the ground in winter. It has widely spreading rhizomes and stolons, which are bright yellow as are the roots. The soft green leaves are 3 to 15 cm (1 to 6 in) long and are borne oppositely on an erect wiry green stem. The leaves have a strongly serrated margin, a cordate base and an acuminate tip with a terminal leaf tooth longer than adjacent laterals. It bears small greenish or brownish numerous flowers in dense axillary inflorescences. The leaves and stems are very hairy with non-stinging hairs and also bear many stinging hairs (trichomes), whose tips come off when touched, transforming the hair into a needle that will inject several chemicals: acetylcholine, histamine, 5-HT (serotonin), moroidin,[2] leukotrienes,[2] and possibly formic acid.[3][4] This mixture of chemical compounds cause a painful sting or paresthesia from which the species derives its common name, as well as the colloquial names burn nettle, burn weed, burn hazel. (Source Wikipeida)
M S Mehta

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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 सियूँण, कंडली उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रो में पाया जाता है! इस पौधे को जहाँ कुमाऊ मंडल में सियूँण के नाम से जाना जाता है वही गढ़वाल में इस कंडली कहते है! इस पौधे पर हाथ लगता ही एक करंट सा लगता जैसे बिच्छू ने काटा हो !  तभी हिंदी में इसे बिच्छू घास के नाम से भी जाना जाता है! इस पौधे के पत्तो एव तनो पर हलके कांटे भी होते है सुई की तरह!  जहाँ लोग इस पौधे को छूने से डरते है तो इस पौधे के कई मेडिसिनल फायदे भी है!


 जैसे - आप के शरीर के  किसी पर चोट के कारण सूजन है तो बिना हिचकिचाए इस पौधे के टहनी से एक दो छपाक लगा दो, देखिये पांच मिनट में सूजन एव दर्द गायब!

   

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Vegetable of  Siyon / Kandli

खाना खजाना

संसार में एक कहावत मशहुर है , दिल तक पहुँचने का रास्ता पेट से होकर गुजरता है | और हो भी क्यों ना ! इसी पेट के खातिर लोग क्या क्या जतन करते रहते हैं , अच्छे - अच्छे पकवान बनाते हैं व खिलाते हैं | उत्तराखंड में जितने भी प्रकार का खाना बनाया जाता हो उनकी सुची व जानकारी निचे दी जा रही है |

यदि आप के पास भी इस तरह की कोई जानकारी है तो कृपया हमें मेल करें हम उस रेसिपी में आप का नाम लिख कर इस साईट में प्रकाशित करेगे |

बिच्छू घास , कनाली (Urtica Dioica ) का कापलु या कापा : उत्तराखंड में बिच्छू घास , कनाली का कापलु या कापा सर्दियों में बनाते हैं इस के दो कारण हैं पहला इसकी तासीर गर्म होती है जो सर्दियों में बेहद जरुरी होती है दूसरा सर्दियों में इस पौधे की पतियाँ काफी कोमल होती हैं जो खाने में लजीज होती है |

 

सामग्री : बिच्छू घास , कनाली (Urtica Dioica ) , नमक , मिर्च ,गरम मसाला , हल्दी स्वाद अनुसार , अदरक ,लहसुन , चावल का मांड या बेसन का आटा , आमचूर के पते |

 

बनाने की विधि : सबसे पहले बिच्छू घास , कनाली (Urtica Dioica ) के पतों को साफ़ धोकर बर्तन में उबालने के लिये रखिये | उबालने के बाद पतों को निकालकर उसे मिक्सी में पिस लीजिये व उबला हुआ पानी एक तरफ रखिये जो बाद में काम आयेगा | अब आपको मसालों का पेस्ट बनाना है जिसमें अदरक ,लहसुन , मिर्च व आमचूर के कुछ पते | अब आप कढ़ाई में तेल को गर्म करके मसालों का पेस्ट , मिर्च ,गरम मसाला , हल्दी स्वाद अनुसार हलकी आंच में भुनियें अब उसमें मिक्सी का पेस्ट निकालकर कढाई में डालें व नमक स्वाद अनुसार , 2 - 3 मिनट पकने के बाद , उसमें उबला बचा हुआ पानी व चावल का मांड या बेसन का आटा ( बेसन के आटे का पेस्ट ) मिला दीजिये 5 मिनट बाद गरमा गरम परोसें | (Ref - swargbhoomi.com)

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Medicinal uses
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Nettle leaf is a herb that has a long tradition of use as an adjuvant remedy in the treatment of arthritis in Germany. Nettle leaf extract contains active compounds that reduce TNF-α and other inflammatory cytokines.[6][7] It has been demonstrated that nettle leaf lowers TNF-α levels by potently inhibiting the genetic transcription factor that activates TNF-α and IL-1B in the synovial tissue that lines the joint.[8]

Nettle is used in shampoo to control dandruff and is said to make hair more glossy, which is why some farmers include a handful of nettles with cattle feed.[9]

Nettle root extracts have been extensively studied in human clinical trials as a treatment for symptoms of benign prostatic hyperplasia (BPH). These extracts have been shown to help relieve symptoms compared to placebo both by themselves [10] and when combined with other herbal medicines.[11]

Because it contains 3,4-divanillyltetrahydrofuran, certain extracts of the nettle are used by bodybuilders in an effort to increase free testosterone by occupying *-hormone binding globulin[12]

As Old English Stiðe, nettle is one of the nine plants invoked in the pagan Anglo-Saxon Nine Herbs Charm, recorded in the 10th century. Nettle is believed to be a galactagogue, a substance that promotes lactation.[13]

Urtication, or flogging with nettles, is the process of deliberately applying stinging nettles to the skin in order to provoke inflammation. An agent thus used is known as a rubefacient (something that causes redness). This is done as a folk remedy for rheumatism, providing temporary relief from pain.[citation needed] The counter-irritant action to which this is often attributed can be preserved by the preparation of an alcoholic tincture which can be applied as part of a topical preparation, but not as an infusion, which drastically reduces the irritant action.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Daya re - Daya re Chad giyo papi bichua, Madhumati Film song was composed on this Bichhu Ghass.


www.youtube.com/watch?v=0gr_pUCHOuQ

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 Bichoo Ghas Someone who tells me what this is called (in English), gets a respectful look from me!
I tried googling it, in vain.
This is a common shrub that grows in most parts of Kumaon - touch it with your bare hands (or body part) and it'd start itching a lot. Parents use it as a weapon, after dipping it in water and then caning the hind-side. Also, the leaves are cooked to make a 'saag' like veggie dish - I've had it, not so good. Shishoon is the local term for this plant. (Snaprr flicker.com)
 

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अब बुखार भी भगाएगी बिच्छू घास

अगर सब कुछ उम्मीद के मुताबिक रहा तो जल्द बुखार की एक और दवा का इजाद हो जाएगा। यह दवा होगी बिच्छू घास। यह घास पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती है। अगर इस पर जारी परीक्षण सफल रहे तो उससे जल्द ही बुखार भी भगाया जा सकेगा। वैज्ञानिक इससे बुखार भगाने की दवा तैयार करने में जुटे हैं। प्राथमिक प्रयोगों ने बिच्छू घास के बुखार भगाने के गुण की वैज्ञानिक पुष्टि कर दी है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे तैयार दवा परीक्षण में पैरासीटामोल से भी बेहतर साबित हुई है। बुखार भगाने की दवा तैयार करने के लिए किए गए परीक्षण में बिच्छू घास के पत्तों का सत्व निकालकर पेट्रोलियम, क्लोरोफार्म, ईथर, एसीटोन, मेथेनाल और पानी में मिलाया गया, जिनका परीक्षण चूहों के सात समूहों पर किया गया।
इन चूहों में पहले कृत्रिम तरीके से बुखार पैदा किया गया। इसके बाद चूहों के एक समूह को पैरासीटामोल के इंजेक्शन दिए गए जबकि अन्य को बिच्छू घास के तत्व वाले घोलों के इंजेक्शन लगाए गए। परीक्षण में सामने आया कि बिच्छू घास पैरासीटामोल से ज्यादा बेहतर काम कर रही है। पैरासीटामोल के इंजेक्शन दिए हुए चूहों की अपेक्षा बिच्छू घास के सत्व के इंजेक्शन लगाए गए चूहों का बुखार जल्दी उतर गया। बिच्छू घास का बुखार खत्म करने वाला गुण एक शोध में सामने आया है।

देहरादून स्थित सरदार भगवान सिंह पीजी इंस्टीट्यूट आफ बायोमेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च के फार्मास्युटिकल केमिस्ट्री विभाग की दो शोध छात्राएं बिच्छू घास से बुखार भगाने की दवा तैयार करने के लिए परीक्षण में जुटी हैं। प्रिलिमनरी फायटोकेमिकल इंवेस्टिगेशन एंड इवैल्यूशन आफ ऐंटी पायरेटिक ऐक्टिविटी आन अर्टिका पर्वीफ्लोरा शीर्षक के तहत शोध कर रही प्रियंका पोखरियाल व अनुपमा सजवाण का कहना है कि चूहों पर परीक्षण के बाद अब महज यह देखना है कि किस रसायन के घोल ने चूहों के बुखार को जल्दी व बेहतर तरीके से खत्म किया। उनका कहना है कि स्थानीय चिकित्सा पद्धति में बिच्छू बूटी के अन्य इलाजों की वैज्ञानिक पुष्टि के लिए वे अपने प्रयोग जारी रखेंगी। क्या है बिच्छू घास आम तौर पर दो वर्ष की उम्र वाली बिच्छू घास को गढ़वाल में कंडाली व कुमाऊं में सिसूण के नाम से जाना जाता है। अर्टिकाकेई वनस्पति परिवार के इस पौधे का वानस्पतिक नाम अर्टिका पर्वीफ्लोरा है। बिच्छू घास की पत्तियों पर छोटे-छोटे बालों जैसे कांटे होते हैं। पत्तियों के हाथ या शरीर के किसी अन्य अंग में लगते ही उसमें झनझनाहट शुरू हो जाती है, जो कंबल से रगड़ने या तेल मालिश से ही जाती है। अगर उस हिस्से में पानी लग गया तो जलन और बढ़ जाती है।
पर्वतीय क्षेत्रों में बिच्छू घास का प्रयोग तंत्र-मंत्र से बीमारी भगाने, पित्त दोष, गठिया, शरीर के किसी हिस्से में मोच, जकड़न और मलेरिया के इलाज में तो होता ही है, इसके बीजों को पेट साफ करने वाली दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। पर्वतीय क्षेत्रों में इसका साग भी बनाया जाता है। माना जाता है कि बिच्छू घास में काफी आयरन होता है।

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Other Benefits (ha ha)

महिलाओं ने शराबी पर लगाई बिच्छू घास


जागरण प्रतिनिधि, गोपेश्वर : पाडुली गांव की महिलाओं ने नैग्वाड़ जाकर शराबियों को खदेड़ा। पकड़े गए एक शराबी पर बिच्छू घास लगाकर उसे दंडित भी किया गया। हालांकि बाद में माफी मांगने व दुबारा शराब न पीने की कसम खिलाने के बाद शराबी को मुक्त किया गया। शराबियों से पांच बोतल कच्ची शराब जब्त कर उसे मौके पर ही नष्ट किया गया।

पाडुली गांव की महिलाएं पिछले दो माह से नैग्वाड़ अनुसूचित जनजाति बस्ती में बन रही अवैध कच्ची शराब के विरुद्ध अभियान चला रही हैं। महिलाएं दोपहर व सांय को नैग्वाड़ पहुंचकर यहां शराब पीने वाले शराबियों को खदेड़ रही हैं। जो शराबी पकड़ में आ रहा है उस पर बिच्छू घास लगाकर उसे दंडित भी किया जा रहा है। गुरुवार को महिलाएं जब नैग्वाड़ पहुंची तो वहां मौजूद शराबियों में अफरा तफरी मच गयी। शराब किसी तरह महिलाओं से जान छुड़ाकर भागे। हालांकि एक शराबी महिलाओं की पकड़ में आ गया। उस पर बिच्छू घास लगायी गयी। बाद में माफी मांगने व भविष्य में शराब न पीने की कसम खिलाने के बाद शराबी को छोड़ा गया। शराबियों को पकड़ने वाली महिलाओं में गीता देवी, मंजू देवी, रेवती देवी, संगीता देवी, बीना देवी, सुभागा देवी, शिवदेई, भारती देवी, सुलोचना देवी, देवेश्वरी देवी, बिलेश्वरी देवी, गुड्डी देवी, धर्मा देवी आदि शामिल थीं। (source dainik jagran)