Author Topic: History of Haridwar , Uttrakhnad ; हरिद्वार उत्तराखंड का इतिहास  (Read 63641 times)

Bhishma Kukreti

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                                   History Aspects- Parshuram Era in context History of Haridwar, History of Bijnor and History of Saharanpur
                                                         
                                                    हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर  इतिहास संदर्भ में  परशुराम युग

                                                                                   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  --65   

                                                                    हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -65

                                                                   इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती


    दो शताब्दियों तक परशुराम युग में सूर्यवंश की शक्ति क्षीण हो गयी।  पुरुवंशियों में भी कोई बलशाली राजा नही हुआ।  इस युग में सुर्यवँशियों में सगर व पुरुवसंहियों में दुष्यंत अधिक प्रसिद्ध राजा हुए।
                                                कार्तवीर्य अर्जुन अथवा सहस्त्रार्जुन

हैहय वंश में कृतवीर्य का पुत्र  कार्तवीर्य अर्जुन , सहस्त्रवाहु अर्जुन या सहस्त्रार्जुन एक वीर , प्रसिद्ध , नारियों का संरक्षक , दानी , शक्तिशाली , पशुपालक राजा हुआ . उसका राज्य  सौराष्ट्र , मालवा , मध्यदेश , मध्यप्रदेश , राजस्थान , पंजाब , नर्मदा क्षेत्र तक फैला था।   जिसने लंका नरेश रावण को भी कैद में रखा था। उसकी राजधानी महिष्मतीनगर में थी।  उसका राज्य उत्तरपश्चमी सीमान्त तक फैली थी व उसकी सेना में शक , यवन , कम्बोज , पारद , पल्हवा सैनिक भी थे।

                                                परशुराम

 जिन दिनों सहस्त्रार्जुन उत्तरभारत में अपना राज्य फैला रहा था , भृगुवंशियों का उत्पाटन कर रहा था उस समय भृगु वंश में जमदग्नि का पराक्रमी पुत्र , तपस्वी , विष्णु अवतार परशुराम पैदा हुआ।  वैशाली , विदेह, काशी , कान्यकुब्ज , व अयोध्या नरेशों को संगठित कर परशुराम ने सहस्त्रार्जुन को हराया और उसे मार डाला।  सहस्त्रार्जुन के सैनिकों ने परशुराम के पिता जमदग्नि को मर डाला।  उत्तर भारत में सहस्त्रार्जुन से सैनिकों के साथ परशुराम को २१ युद्ध लड़ने पड़े। प्रत्येक युद्ध में परशुराम विज्ञ्यी हुए। परशुराम ने उत्तर भारत को हैहय व आयुधजीवियों से मुक्त कराया ।

** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
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History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास; बिजनौर इतिहास, सहारनपुर इतिहास  -भाग 66

History Aspects- Parushram Era in context History of Haridwar, History of Bijnor and History of Saharanpur to be continued ...

History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ; History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ; History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ; History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ; History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ; History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ; History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ; History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ; History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ; History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ; History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar; History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;History of Bijnor; History of Nazibabad Bijnor ; History of Saharanpur;
History of Nakur , Saharanpur; History of Deoband, Saharanpur; History of Badhsharbaugh , Saharanpur; कनखल , हरिद्वार का इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार का इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार का इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार का इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार का इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार का इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार का इतिहास ;लक्सर हरिद्वार का इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार का इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार का इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार का इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार का इतिहास ;बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास
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Bhishma Kukreti

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                        Sagar and Bhagirath of Parshuram Era in context History of Haridwar, History of Bijnor and History of Saharanpur
                                                         
                                                    हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर  इतिहास संदर्भ में  परशुराम युग में सगर और भगीरथ

                                                                                   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  --66   

                                                                    हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -66

                                                                   इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती
                                  सगर
 मान्धाता और पुरुकुत्स के पश्चात अयोध्या वंश की शक्ति क्षीण होती गयी। सत्यवादी हरिश्चंद्र की छटी पीढ़ी में राजा बाहु हुआ। हैहय वंशियों म्लेच्छों ( यवन , शक , कम्बोज आदि ) को लेकर ने जब बाहु के राज्य अयोध्या पर आक्रमण किया तो अयोध्या नरेश बाहु ने  पराजित होकर अपनी गर्भवती पत्नी के साथ भार्गव मुनि के आश्रम में शरण ली. वहां बाहु की मृत्यु हो गयी।  कुछ समय बाद बाहु पुत्र सगर  का जन्म हुआ जिसका लालन पोषण भार्गव आश्रम में हुआ।
हैहय वंशियों के साथ म्लेच्छ भी सनातन धर्मी हो गए थे।
सगर ने पहले अपना छीना राज्य का कुछ हिस्सा प्राप्त किया फिर अश्वमेध यज्ञ किया और अपने 60000  पुत्रों को घोड़ा लेकर संसार जीतने भेजा।
सगर पुत्र घोड़े को ढँढते ढूंढते कपिल मुनि के आश्रम (मायापुर या कनखल में ?) पंहुचे और उन्होंने कपिल मुनि से अभद्र व्यवहार किया।  कपिल मुनि के श्राप से सभी सगर पुत्र भष्म हो गए।
सगर का राज्य उत्तर भारत से बंगाल की खाड़ी तक अनुमान लगाया जाता है।
                        भगीरथ याने उत्तराखंड का सफल पौराणिक अन्वेषक

सगर के प्रपौत्र दिलीप और भगीरथ ने सगर पुत्रों के उद्धार हेतु गंगा को पृथ्वी में लाने का प्रयत्न किया।
भगीरथ ने तपस्या की और गंगा को पृथ्वी तक लाये और फिर हरिद्वार , कनखल में गंगा को लाकर अपने  पुरखों का उद्धार किया।
पुराण व महाभारत अनुसार भगीरथ शक्तिशाली , दानशील व परजामुखी सम्राट था। (महाभारत में रामयण कथा ).
ऐसा लगता है कि भगीरथ परम अन्वेषक था।  उसने गंगा स्रोत्र का अन्वेषण किया था अथवा कोई बड़ी नहर खुदवाई होगी।


** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
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History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास; बिजनौर इतिहास, सहारनपुर इतिहास  -भाग 67
History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ; History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ; History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ; History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ; History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ; History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ; History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ; History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ; History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ; History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ; History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar; History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;History of Bijnor; History of Nazibabad Bijnor ; History of Saharanpur;
History of Nakur , Saharanpur; History of Deoband, Saharanpur; History of Badhsharbaugh , Saharanpur; कनखल , हरिद्वार का इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार का इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार का इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार का इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार का इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार का इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार का इतिहास ;लक्सर हरिद्वार का इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार का इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार का इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार का इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार का इतिहास ;बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास
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                                               Vishwamitra and History of Garhwal, Haridwar , Bijnor and Saharanpur


                                             विश्वामित्र का गढ़वाल , बिजनौर , हरिद्वार और सहारनपुर इतिहास से संबंध

                                                                History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  --67   

                                                                    हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -67

                                                                   इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती


                              विश्वामित्र का गढ़वाल , बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर इतिहास से संबंध

कान्यकुब्ज के गाधीनरेश का पुत्र विश्वामित्र भी परशुराम युग में प्रसिद्ध हुआ। वह जमदग्नि व परशुराम का संबंधी भी था।
वशिष्ठ व विश्वामित्र के परिवारों के मध्य शत्रुता युगों से चली आ रही थी।
विश्वामित्र ने कुछ काल तक कान्यकुब्ज पर शाशन किया। एक बार वह वशिष्ठ आश्रम गया और नंदिनी गाय के प्रभुत्व से प्रभावित हो उसने वशिष्ठ से नंदिनी मांगी किन्तु वसिष्ठ ने नंदनी गाय नही दी तो विश्वामित्र ने जबरदस्ती की और नंदिनी को भगा ले गया।  नंदनी धेनु क्रोधित हुयी और उसने अपने प्रभाव से विश्वामित्र की सेना व धन को नुक्सान पंहुचाया।
विश्वामित्र तब हीन भावना का शिकार हो उसने राज त्यागा और ब्रह्मर्षि बनने हेतु तपस्या लींन  हो गया।
विश्वामित्र की तपस्या से डर कर इंद्र ने मेनका अप्सरा को विश्वामित्र की तपस्या भंग करने हेतु भेजा।  मेनका और विश्वामित्र से एक पुत्री (शकुंतला ) हुई  जिसे मेनका ने मालनी नदी तट पर शकु पक्षियों के पास छोड़ दिया और स्वयं स्वर्ग चली गयी; विश्वामित्र भी कहीं और चले गए । इसी समय कण्व ऋषि उधर आये और शकुंतला को अपने आश्रम ले गए।  कण्व आश्रम मालनी नदी तट पर था और  शकुंतला का विवरण आगे दिया जाएगा।  मालनी नदी का संबंध गढ़वाल , भाभर , बिजनौर भाभर और हरिद्वार भाभर से सीधा है।
विश्वामित्र को नंदनी की रक्षा हेतु एवं आदि सैनकों के आने की कथा से साफ़ है कि शकादि आयुधजीवी उत्तर भारत व मध्यभारत में आ बसे थे और वशिष्ठ जैसे ऋषियों ने उन्हें सनातन धर्मी बना डाला था।

** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
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       History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  to be continued --68   

   हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -687

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                        History of Rama , Sita in context History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur

                                 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर इतिहास संदर्भ में राम सीता का इतिहास

                                                  History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  --68   

                                                   हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -68

                                                                   इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

                                          सम्राट दिलीप
इक्ष्वाकु वंश में सम्राट दिलीप एक प्रसिद्ध राजा हुए। महाभारतानुसार दिलीप भगीरथ का पिता  और सगर का प्रपौत्र था।  अन्य पौराणिक गाथाओं अनुसार दिलीप भगीरथ की कुछ पीढ़ियों बाद का राजा था जिसका नाम खट्वांग भी था। संतान की कमना हेतु चक्रवर्ती सम्राट नदिलीप ने मुनि वशसित आश्रम में धेनु नंदनी की पूजा की थी।
वशिष्ठ का आश्रम गढ़वाल में गंगा तट पर था व वहां देवदारु वृक्ष थे।  यहां गंगा तट पर देवदारु वृक्ष के नीचे मायावी सिंह मिला था।
                                       चक्रवर्ती सम्राट रघु
रघु महान प्रतापी राजा हुआ और इक्ष्वाकु वंश का नाम रघुवंश पद गया। कालिदास अनुसार रघु ने भगीरथी के झरने वाले प्रदेश गढ़वाल नरेश से युद्ध किया था। और फिर मैत्री कर ली थी।
                                सम्राट  दशरथ
रघु का पुत्र अज हुआ और दशरथ अजपुत्र था।
दशरथ ने पड़ोसी राज्यों से मित्रता भाव हेतु कौशल व कैकेय की राजकुमारियों से विवाह किया व अपने पुत्रों का भी विवाह अन्य नजदीकी रजकुमारियों से किया। दशरथ के चार पुत्र हुए - राम , लक्ष्मण , भरत व शत्रुघ्न।
                                       राम
राजा राम चन्द्र रघुवीर नाम से प्रसिद्ध हुए और उन्हें विष्णु का अवतार माना जाता है।  चौदह वर्ष के वनवास काल में राम ने बाली व रावण आदि को जीता।
रघु या दिलीप के समय से ही उत्तराखंड माय बिजनौर व सहारनपुर इक्ष्वाकु वंश के प्रभाव में था।
 जहां तक रामायण काल का उत्तराखंड से संबध है ऐसा कहा जाता है कि पूर्वी हरिद्वार के पास स्वर्गाश्रम के नजदीक लक्ष्मण ने तपस्या की थी। ऐसा कहा जाता है कि लक्ष्मण ने बबूल घास  की रस्सियों से बने झूला पुल से गंगा पार किया था।
 लोककथा है कि सीता को जब वनवास दिया गया तो वह सितौनस्यूं पट्टी , पौड़ी गढ़वाल में रही थी और यहीं  पृथ्वी में समायी थी।
लोककथाओं अनुसार सीता ने पेड़ों को भी श्राप दिया था अतः कहा जाता था कि सितौनस्यूं में पेड़ कम होते थे किन्तु सीता ने रहवासियों को वरदान दिया था कि इस प्रदेश में घास भी लकड़ी जैसे भोजन पकाने के लिए काफी होगा।
लोककथा अनुसार कोटसड़ा गाँव , सितौनस्यूं पौड़ी गढ़वाल में मान्यता है किसी विशेष दिन जमीन खोदा जाता है और वहां सीता की लोड़ी (पत्थर ) निकलती हैं और उत्स्व मनाया जाता है (चित्रकार ब्रिज मोहन नेगी द्वारा दी गयी सूचना ).


राम के इहलोक जाने के बाद राज्य आठ भागों में बांटा गया था और लक्ष्मण पुत्र अंगद को उत्तराखंड मिला था (केदारखंड १२१/२४-२६ , डा डबराल )

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Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India  26 /2/2015

   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --69   

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -69
   
History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ; History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ; History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ; History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ; History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ; History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ; History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ; History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ; History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ; History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ; History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar; History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;History of Bijnor; History of Nazibabad Bijnor ; History of Saharanpur;
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                                 King Dushyant in context History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur

                                हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर इतिहास संदर्भ में दुष्यंत

                                                  History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  --69   

                                             हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -69

                                                                   इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

 पुरुवंशी , चंद्रवंशी राजा दुष्यंत सुरवंशी राजा सगर से पचास साठ वसर्ष बाद हुआ।  उसकी राजधानी हस्तिनापुर थी और राज्य गांधार तक फैला था।
दुष्यंत के ईमानदार , पुरुषार्थी , बलवान राजा था। आदिपर्व महाभारत में कहा गया है कि वह मंदराचल पर्वत को उठा लेता था।
दुष्यंत के शाशन में प्रजा सुखी थी।  कृषि और पशुपालन व खनिज उद्यम से प्रजा का पालन सही तरह से होता था।
राज्य में धर्म अनुसार प्रशासन चलता था।


 ** संदर्भ - ---
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Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India  28 /2/2015

   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --70

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -70
   
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              History Aspects of Shakuntala with reference History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur


                                            हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर इतिहास संदर्भ में शकुंतला का पौराणिक वर्णन

                                                  History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  --70   

                                             हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -70

                                                                   इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती


            शकुंतला ब्रह्मर्षि विश्वामित्र व अप्सरा की पुत्री मेनका की पुत्री थी जिसका पालन पोषण महर्षि कण्व आश्रम में कण्व की देखरेख में हुआ।  कण्वाश्रम मालनी नदी के तट पर था । मालनी नदी गढ़वाल से बिजनौर के नजीबाबाद के पश्चिम में बहकर गंगा से मिल जाती है।  यही कारण है कि शकुंतला को गढ़वाल व बिजनौर के पौराणिक इतिहास से जोड़ा जाता है। ऐसा माना जाता है कि शकुंतला का बचपन भाभर में बीता और यह भाभर बिजनौर , हरिद्वार और गढ़वाल तीनो क्षेत्र का हिस्सा है।
कण्व मुनि तब आश्रम में नही थे जब एक बार राजा दुष्यंत भाभर में वन आखेट हेतु आया और उसकी भेंट शकुंतला से हो गयो।  दोनों को प्रेम हो गया।  तुरंत गन्धर्व विवाह में दुष्यंत ने शकुंतला को अंगूठी भेंट की।  कुछ दिन शकुंतला के साथ विताने के वाद दुष्यंत अपने राज्य की और चला गया।
कण्व ऋषि को भी दोनों के गन्धर्व विवाह की बात पता चल गयी थी।
शकुंतला से भरत नाम का पुत्र हुआ।  शकुंतला पुत्र सहित दुष्यंत की रजधानी पंहुची।  अंगूठी खो जाने से दुष्यंत ने शकुंतला को पहचानने से मना कर दिया।  अंत में आकाशवाणी होने से दुष्यंत ने शकुंतला को पहचाना।  शकुंतला -दुष्यंत पुत्र भरत बड़ा पराक्रमी व वीर राजा हुआ और जिसके नाम से जम्बूद्वीप का नाम भारत पड़ा।


** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज
घोषाल , स्टडीज इन इंडियन हिस्ट्री ऐंड कल्चर
आर के पुर्थि , द एपिक सिवलीजिसन

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   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --71

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -71
   
History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand  Dushyant  -Shakuntala ; History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand Dushyant  -Shakuntala ; History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand Dushyant  -Shakuntala ; History of Telpura Haridwar, Uttarakhand Dushyant  -Shakuntala ; History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand Dushyant  -Shakuntala ; History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand Dushyant  -Shakuntala ; History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand Dushyant  -Shakuntala ; History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand Dushyant  -Shakuntala ; History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand Dushyant  -Shakuntala ; History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand Dushyant  -Shakuntala ; History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand Dushyant  -Shakuntala ; History of Pathri Haridwar, Uttarakhand Dushyant  -Shakuntala ; History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand Dushyant  -Shakuntala ; History of Bahdarabad, Uttarakhand Dushyant  -Shakuntala ; Haridwar; History of Narsan Haridwar, Uttarakhand Dushyant  -Shakuntala ;History of Bijnor; History of Nazibabad Bijnor Dushyant  -Shakuntala ; History of Saharanpur Dushyant  -Shakuntala ;
History of Nakur , Saharanpur; History of Deoband, Saharanpur; History of Badhsharbaugh , Saharanpur; कनखल , हरिद्वार का इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार का इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार का इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार का इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार का इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार का इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार का इतिहास ;लक्सर हरिद्वार का इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार का इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार का इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार का इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार का इतिहास ;बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास
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                        Great King Bharat in context History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur
                     
                                हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर इतिहास संदर्भ में महान सम्राट भरत


                                                History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  --71   

                                             हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -71

                                                                   इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

                            भरतजन व पुरुवंश में दुष्यंत पुत्र की ख्याति बहुत अधिक है। (महाभारत, शतपथब्राह्मण )
 शकुंतला के गर्भ में दुष्यंत पुत्र धीरे धीरे बढ़ने लगा।  पुरे तीन वर्ष के बाद शकुंतला ने गढ़वाल भाभर में मालनी तट पर तेजश्वी पुत्र को जन्म दिया।
कण्व मुनि ने ब्राह्मणो से बालक का विधिपूर्वक जातिकर्म संस्कार करवाये।
छ वर्षीय बालक शेरोन , बाघों से लड़ाई कर उन्हें हरा देता था। भाभर क्षेत्र जहां भरत बालक ने बचपन बिताया आज भी बिजनौर , गढ़वाल व हरिद्वार का मिला जुला क्षेत्र है।
कणवा मुनि के प्रयाश से बालक को बारह वर्ष की आयु में समस्त शास्त्रों व वेदों का ज्ञान हो गया था।
जब दुष्यंत ने आकाशवाणी सुनने के बाद शकुंतला और बालक को अपनाना स्वीकार किया तो दुष्यंत ने भरत नाम देकर उसे युवराज बनाया।
राजगद्दी संभालने के बाद भरत ने समस्त भारतवर्ष के राजाओं को जीता। भरत को चक्रवर्ती सम्राट माना जाता है।
भरत राज्य में प्रजा सुखी थी , व्यवस्था सुदृढ़ थी।
ग्रंथों के अनुसार भरत ने यमुना तट पर 78 और गंगा तट पर 55 अश्वमेध यज्ञ किये। और एक हजार से अधिक अश्वमेध यज्ञ कर साड़ी वसुधा जीती। उसने सारा धन ब्राह्मणो को दान में दे दिया था।
शकुंतला उत्तराखंड की नारी थी व भरत ने भाभर में बाल्यकाल विताया था।


** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज
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   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --72

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -72
   
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                         Bhardwaj Sage in context   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur


                                                  हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर  इतिहास संदर्भ में भारद्वाज ऋषि

                                                History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  --72   

                                             हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -72

                                                                   इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती
महाभारत में रामायण आख्यान में भारद्वाज का वर्णन  मिलता है। ऋग्वेद में भी भारद्वाज का उल्लेख मिलता है।
 महाभारत अनुसार भारद्वाज का आश्रम गंगाद्वार (हरिद्वार ?) में था. यहीं घृताची अप्सरा के कारण उनका अयोनिज पुत्र द्रोण का जन्म हुआ (आदिपर्व )। महाभारत में द्रोण को द्रोणी यानी कलश से पैदा बताया गया है। किन्तु द्रोण याने घाटी (देहरादून ) में पैदा होना अधिक तर्कपूर्ण है।  महाभारत में गंगाद्वार के निकट भाभर प्रदेश के लिए द्रोणी शब्द का प्रयोग मिलता है - भद्रमित्रस्य द्रोणीघाटे (शुंगकालीन लिपि में देहरादून से प्राप्त मुद्रालेख ).
भारद्वाज व उनके वंशजों का संबंध गंगाद्वार /हरिद्वार से चिरकाल तक रहा।
भारद्वाज आश्रम होने के कारण गंगाद्वार जनपद को भारद्वाज जनपद कहा जाने लगा था (आदिपर्व व भीष्म पर्व , महाभारत )

** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज
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   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --73

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -73

   
History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand Bhardwaj Sage; History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand Bhardwaj Sage; History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand Bhardwaj Sage; History of Telpura Haridwar, Uttarakhand Bhardwaj Sage; History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand Bhardwaj Sage; History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand Bhardwaj Sage; History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand Bhardwaj Sage; History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand Bhardwaj Sage; History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ; History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ; History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ; History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ; History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar; History of Narsan Haridwar, Uttarakhand Bhardwaj Sage;History of Bijnor; History of Nazibabad Bijnor Bhardwaj Sage; History of Saharanpur Bhardwaj Sage;
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                   Shri Krishna Era in context History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur

                                   हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर  इतिहास  संदर्भ में श्री कृष्ण युग
                                                History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  --73   

                                             हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -73

                                                                   इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती
                                         कुरुवंश व हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर
                       श्री राम युग के बाद श्री कृष्ण युग शुरू हुआ जिसमे कुरु व यादव वंश की विशेष समृद्धि हुयी
   श्रीकृष्ण युग में पौरव  नरेश बड़े प्रतापी राजा हुए। पौरव ने कुरुक्षेत्र व कुरुजांगल में अपने राज्य का विस्तार किया।  इस तरह इस वंश का नाम कुरु वंश पड़ा।
  कुरु वंश में शांतनु बड़े राजा हुआ।  शांतनु की पत्नी गंगा से देवव्रत पुत्र हुआ जिसने पिता हेतु जीवन भर ब्रह्मचर्य रहने का व्रत लिया और भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।  शांतनु की दूसरी पत्नी का नाम सत्यवती था , सत्यवती से दो पुत्र किन्तु वे पुत्र प्राप्त न कर सके अतः नियोग से सत्यवती पुतर्बहुओँ से तीन पुत्र प्राप्त किये गए।
                                                 पाण्डु
 नियोग से विचित्रवीर्य की दो पत्नियों व एक दासी से क्रमशः तीन व्यास पुत्र हुए -धृतराष्ट्र , पाण्डु व विदुर।  विदुर दासी पुत्र होने से राज्य प्राप्त नही कर सकते थे , धृतराष्ट्र चक्षुहीन होने से राजगद्दी ना पा सके व पाण्डु को कुरुवंश की राजगद्दी प्राप्त हुयी।
 पाण्डु ने स्वंबर से कुंती से विवाह किया व धन से माद्री  से शादी की। पांडु ने कई देस जैसे दर्शाण , मगध , विदेह , कशी , सुम्ह्य व पुंड्रदेश जीते।
पांडु शिकार करने का शौक़ीन था।  हस्तिनापुर के नजदीक भाभर क्षेत्र था जहां पांडु अधिकांश शिकार करने आता था याने पांडु का संबंध सहारनपुर , हरिद्वार , बिजनौर व गढ़वाल से था। गढ़वाल भाभर  स्थान का नाम पाण्डुवालात सोत है।
पांडु को किसी खास वीमारी के चलते राजगद्दी छोड़ गढ़वाल या भाभर में रहना पड़ा. महाभारत में इस क्षेत्र वर्णन है जिससे पता चलता है कि पांडु हस्तिनापुर से भाभर होकर नागशत /नागथात पर्वत पर चले गए।  पाण्डु आश्रम हिमालय में था और हस्तिनापुर से दो सौ मील के लगभग  क्योंकि कुंती को इस आश्रम से हस्तिनापुर पंहुचने में सोलह दिन लगे थे। कुंती से तीन देवताओं से तीन पुत्र -युधिष्ठर , भीम व अर्जुन हुए और देव वरदान से माद्री से नकुल व सहदेव पुत्र हुए। पांडु का आश्रम शतश्रृंग शायद अगस्त्यमुनि के पास था जहां पांडुओं का जन्म हुआ। शायद गढ़वाल के इस क्षेत्र  में नागपुर नाम पाण्डु के आने के बाद पड़ा होगा
 ** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
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Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India  7/3 /2/2015

   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --74

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -74
   
Shri Krishna Era in context History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ; Shri Krishna Era in context History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ;Shri Krishna Era in context History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ;Shri Krishna Era in context History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ;Shri Krishna Era in context  History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;Shri Krishna Era in context History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ;Shri Krishna Era in context  History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ; Shri Krishna Era in context History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ;Shri Krishna Era in context History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ;Shri Krishna Era in context History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;Shri Krishna Era in context History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ; Shri Krishna Era in context History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ;Shri Krishna Era in context History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ;Shri Krishna Era in context History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar; History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;History of Bijnor; History of Nazibabad Bijnor ; History of Saharanpur;
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                                   Yudhisthir in context History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur
                                    हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर   इतिहास संदर्भ में युधिष्ठिर

                                              History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  --74


                                             हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -74

                                                                   इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

                  महाभारत कथाओं के संदर्भ में ऐसा लगता है कि सहारनपुर हस्तिनापुर क्षेत्र में था।  गंगाद्वार (हरिद्वार)  व बिजनौर क तुलनात्मक दृष्टि से कौरव -पांडवों के मुकाबले आदिवासी क्षेत्र रहा होगा।  गंगा का माहत्म्य शुरू हो गया था और कनखल एक विख्यात आश्रम व विद्याध्ययन क्षेत्र बन चुका था। हरिद्वार के पास ही भृगुश्रृंगी पर भृगु आश्रम था।  हरिद्वार के समीप पौड़ी गढ़वाल के उदयपुर पट्टी में भृगुखाल स्थान को भृगुश्रृंगी माना जाता है।  भृगुखाल के कुछ दूरी पर एक गाँव है रिख्यड जो ऋषि अड्डा का अपभरंश माना जाता है।
                                             युधिष्ठिर

युधिष्ठिर पांडु पुत्रों में सबसे बड़े थे।  पांडु मृत्यु के बाद कुंती युधिष्ठिर सहित अन्य पुत्रों को हस्तिनापुर लायी थी। यद्यपि कुछ लोगों ने इन्हे पाण्डु पुत्र मैंने में संसय किया था पर ये पाण्डु पुत्र ही कहलाये।  इनकी शिक्षा दीक्षा भी धृतराष्ट्र पुत्र कौरवों के साथ द्रोणाचार्य के नेतृत्व में हुआ।  युधिस्ठिर को कुरु की राजगद्दी हेतु कुंवा बनाया गया किन्तु दुर्योधन की रणनीति तहत जैसे लक्षागृह में जलाने  का प्रयत्न तो कुंती को पांडुओं वनवास में छुपना पड़ा और इस समय वे गंगाद्वार के निकट किसी वन में छुपे जहां भीम ने  हिडम्ब राक्षस को मर उसकी भीं हिडंबना राक्षसी से विवाह किया. उनसे घटोतकच्छ पुत्र हुआ जो बड़ा वीर व दुस्साहसी था.
फिर पांडव एकचक्रांनगरी (वर्तमान चकरौता ) गए।  वहां यमुना तट पर भीम ने  बक राक्षस का वध किया।
महाभारत के आदिपर्व के वर्णन से लगता है कि पांडवों का यह वनप्रवास सहारनपुर, हरिद्वार, बिजनौर , गढ़वाल क्षेत्र में बीता था। पांडवों ने इस दौरान ब्राह्मण वेश में मत्स्य , त्रिगर्त , पंचाल व कीचक क्षेत्रों में भी प्रवास किया।  मत्स्य , त्रिगर्त , पंचाल व कीचकबिजनौर से दक्षिण पूर्व में थे।


 ** संदर्भ - ---
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डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
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घोषाल , स्टडीज इन इंडियन हिस्ट्री ऐंड कल्चर
आर के पुर्थि , द एपिक सिवलीजिसन

Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India 8 /3/2015

   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --75

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -75
   
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