Author Topic: Bal Krishana Dhyani's Poem on Uttarakhand-कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी  (Read 26404 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Dosto,

We are posting some exclusive poems written by Shri Bal Krishna Dhyani on Uttarakhand. We are sure that you will appreciate these poems on various of Uttarakahnd by Dhyani Ji.


कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
 
बस इनि मा ही गैई

बस इनि मा ही गैई
म्यार मुल्का का लोक ,म्यार मुल्का का लोक
घुमी घुमी सड़की
घूमे कैकि ले गेनि दूर ऊ सड़की छोर,ऊ सड़की छोर
बस इनि मा ही गैई

पैल दोई खुटीन हिटदा जाँदा
अबै दा लागि चार पाईयों को जोड़ ,चार पाईयों को जोड़
कैमा कया लगाण
ते थे कया रैगे दिखाण रीता रीता गौंऊ,रीता रीता गौंऊ
बस इनि मा ही गैई

सुधि कया मिसाण
कैल कुल देब्तों कु निशाँण उठन,कैल निशाँण उठन
ढोल दामू अब हर्ची
नरसिंगा कैल तेर जै कार लगाण,कैल जै कार लगाण
बस इनि मा ही गैई

बस इनि मा ही गैई
म्यार मुल्का का लोक ,म्यार मुल्का का लोक
घुमी घुमी सड़की
घूमे कैकि ले गेनि दूर ऊ सड़की छोर,ऊ सड़की छोर
बस इनि मा ही गैई

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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M S Mehta


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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
 
उघड़ी गे

उघड़ी गे रे उघड़ी गे
बाबा केदार कु कपाट
भोला भंड़री
त्रिकाल चटी कु दार
उघड़ी गे रे उघड़ी गे
बाबा केदार कु कपाट

ऐजावा बाबा डोला मा बिराजी
नरसिंगा हड़कु डोलकु बाजी
गढ़वाल रैफल की धुन मा
बाबा ऐजावा अपरा घोर मा

उघड़ी गे रे उघड़ी गे
बाबा केदार कु कपाट
भोला भंड़री
त्रिकाल चटी कु दार
उघड़ी गे रे उघड़ी गे
बाबा केदार कु कपाट

रूद्र रूप ना धार
सौम्या बणीकी विराजा
बाबा पाप सबि बोगेगेनी
अब शांत वहइजा महराजा

उघड़ी गे रे उघड़ी गे
बाबा केदार कु कपाट
भोला भंड़री
त्रिकाल चटी कु दार
उघड़ी गे रे उघड़ी गे
बाबा केदार कु कपाट

एक उत्तराखंडी

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
May 5 
७ वोट फॉर उत्तराखंड

बिजी जावा बिजी जावा
बिजी जावा बिजी जावा
पाडे का पाड़ि मेरा बिजी जावा
बिजी जावा बिजी जावा

आच तारिक़ सात च
पाड़ि ते थे कया याद च ..... २
झट तैर व्हैजा ..... २
अपरा मत दे कि ऐजा

सियुं ना रै इनि नि तर सियुं रै जालु अपरू पाड़
बिजी जावा बिजी जावा
बिजी जावा बिजी जावा
पाडे का पाड़ि मेरा बिजी जावा
बिजी जावा बिजी जावा

सोचि ले समझि ले
जैन भाग थे प्रगति बाट ले जालूं
वै थे अपरू कीमती वोटो दे
नोट दरू देनारुँ थे छोड़ि दे

नै त ऐ दारू ला धार से पाड़ा बोगी जालु
बिजी जावा बिजी जावा
बिजी जावा बिजी जावा
पाडे का पाड़ि मेरा बिजी जावा
बिजी जावा बिजी जावा

एक उत्तराखंडी

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
May 2
माया अ अ अ अ अ

माया अ अ अ अ अ
माया तू कै कि बि ना

बल पुट्गी खानी दानी
निभैनी ब्स तेरि जिमेदारी

किसा मा ना तेरा टक्का
कु बाबाजी कु छे रे तू बच्चा

माया अ अ अ अ अ
माया तू कै कि बि ना

पाड़ा मेरु तू मेरु गेल्या
रैगे मेर जनि तू यकुला

छोड़ गैनी ते थे मै थे
वो मेर भैजी परदेसी टक्का

माया अ अ अ अ अ
माया तू कै कि बि ना

बैठी रैगे बौजी मेरि
दीद कि दौड़ी जि इनि

अपरा परै थे छोड़ीकी
माया माया दगडी मुख मौड़ीकी

माया अ अ अ अ अ
माया तू कै कि बि ना

एक उत्तराखंडी

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
April 29
मेर देबी भगवती

मेर देबी भगवती
मेर पाडे कि माता देबी भगवती
राखि सबु परि हाथ माता भगवती
किरपा रै सदनी हम परि बोई भगवती
मेरे देबी भगवती
मेर पाडे कि माता देबी भगवती

लाल चुनरी हरि कांचा कि चूड़ी माता भगवती
पिंगला बाघा मा सवारी व्हैजा ऐजा माँ भगवती
ऊंचा पाड़े की माता माता रानी भगवती
लाल सिंदूरी लाली छे पाड़ा मा माता भगवती
मेरे देबी भगवती
मेर पाडे कि माता देबी भगवती

चारा हाथा कि त्रिरकल त्रिशूला माता भगवती
मेर बालकुंवारी माता माँ भगवती
शंका मा गुँजे तेरि गूंज पाड़ा मा भगवती
मै बालक तु मेरि माता माँ भगवती
मेरे देबी भगवती
मेर पाडे कि माता देबी भगवती

मेर देबी भगवती
मेर पाडे कि माता देबी भगवती
राखि सबु परि हाथ माता भगवती
किरपा रै सदनी हम परि बोई भगवती
मेर देबी भगवती
मेर पाडे कि माता देबी भगवती

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
April 27
हैंस दि रै

हैंस दि रै
तेर मुखडी हैंस दि रै …२

पीड़ा ना लुकेई
आंसूं ना इनि चूलेई
खैरी कि भासा
ईं आँखों थे ना बथेई

बिंग दि रै
तेर मुखडी ईं हैंसी थे बिंग दि रै …२

अपरी मा लगी रै
ऊपरी का ना थक खै
सबु मा बोल और्री बचे
यखुली मा ना वै थे बिसरै

खिल दि रै
बिगरैल मेरी ईं हैंसी थे खिल दि रै …२

पीड़ा ना लुकेई
आंसूं ना इनि चूलेई
खैरी कि भासा
ईं आँखों थे ना बथेई

हैंस दि रै
तेर मुखडी हैंस दि रै …२

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
April 26
खूब रुनु छों आच

खूब रुनु छों आच यखुली काली राता मा
झन कै की खुद ऐ रूले मि कै बाता मा
खूब रुनु छों आच यखुली काली राता मा

रुन्दा रुन्दा ना थामेन्दा आंसूं ये आँख का
झन किले छे जीयु तू रुना कैकि माया मा
खूब रुनु छों आच यखुली काली राता मा

खुद बौडी ऐ किले तू किले की बौडी गै
जान्दा जान्दा ऐ गौली थे किले भीगे की गै तू
खूब रुनु छों आच यखुली काली राता मा

पीड़ा मेर दबी छे किले उखरि की गै तू
बौल्या बाने कि मी थै तेर जीकोडी चैन नि ऐ
खूब रुनु छों आच यखुली काली राता मा

एक उत्तराखंडी

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
April 25
लगे कुदगली

लगे कुदगली
खुटे कि थेडि मा............ २
अंग्वाल ले लेकि
पिल मेर बुकी बोई ई मुखडी मा
लगे कुदगली .......

बैठी छों दूर
वै सड़की की मोड़ी मा............ २
बाबा जी कंडली की मार
तेर माया बोई कंडली भुजी मा
लगे कुदगली .......

हाथा की रेघा
किले तू खरेचि वाली आच............ २
बोई बाबा की कुदगली
लागि ये बडुळि मा
लगे कुदगली .......

लगे कुदगली
खुटे कि थेडि मा............ २
अंग्वाल ले लेकि
पिल मेर बुकी बोई ई मुखडी मा
लगे कुदगली .......

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
April 24
मयाल ही

मायाल ही मिलहो
मायाल ही बिछोहो
मायल ही गीत मि गैहो
बौडी जंद ते थे बौडी अंद ऐ थे
माया की अंग्वाल …२

गेड मारि माया इनि
देके ना किले कु नि
स्पर्श वै थे नि चैन्दु
आंखीं गेन्दुं नि बचेंदु
माया की अंग्वाल …२

बड़ ऊ भागी जे दारी
माया ल बाटू बैठी हेरी
मी थे चैन्दु हरी हरी
माया जिते बल माया हरि
माया की अंग्वाल …२

मायाल ही मिलहो
मायाल ही बिछोहो
मायल ही गीत मि गैहो
बौडी जंद ते थे बौडी अंद ऐ थे
माया की अंग्वाल …२

एक उत्तराखंडी

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
April 21
सिंकुली सै गैनी

गैनी गैनी
बिसरी गैनी
अपरा अपरा
आच सिंकुली सै गैनी

कोई नि हेरदु
रात का गैंणा
जून ते थे
सब बिसरी गैना

सुबेर कु उठानु
लग्युं वै थे घै की घेर
ध्याड़ी छूटी जाली
भूकी रै जाला फेर

गोळ मौळ
सब आच व्हैगैनि
नीरजक पाड़ि
सिंकुली सै गैनी

एक उत्तराखंडी

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