Author Topic: Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं  (Read 515340 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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बात फिर छिड़ी है मेरे पहाड़ की

बात फिर छिड़ी है मेरे पहाड़ की
मेरे बिछड़े गाँव घरबार की

एक एक मुख से वो सुहाता
मुझे बीते दिनों और उन पलों में ले जाता
कभी मिलकर रहते थे हम साथ साथ में
दुःख सुख बांटते थे मिल के सब प्यार से

बात फिर छिड़ी है मेरे पहाड़ की
मेरे बिछड़े गाँव घरबार की

अब तो बस वो बची हुयी शेष याद है
जो मैंने अब तक संभले रखा आपने दिल के पास है
वो गांव घर पहाड़ पल पल खंडहर हो रहा
मैंने बस दूर बैठा बीते पलों को ले रो रहा

बात फिर छिड़ी है मेरे पहाड़ की
मेरे बिछड़े गाँव घरबार की

यूँ दूर बैठे बैठे रोना मेरा क्या बेकार है
सच्चे हैं तेरे ये आँसूं तो तुझको ही ये अधिकार है
अब दूर नहीं वो दिन जब खुद कहेंगे ये पल छिन
तेरे बिना मेरा यूँ जीना दुश्वार है

बात फिर छिड़ी है मेरे पहाड़ की
मेरे बिछड़े गाँव घरबार की

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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मेरे पहाड़ से वो

मेरी बातों से तुम परेशाना ना होना
मैं तो पागल हूँ तुम मुझसे नाराज ना होना
प्यार करता हूँ मै फूलों और पत्तों से
एक एक पेड़ और उनके सूखे गिरते दरख़्तों से
बैठती फुदकती उन चिड़ियों की चहक
भौरों की गुन गुन और जगलों की मदमाती महक
हर वो कोना ,तितलियाँ वो रंग बिरंगी सी
नित नया रूप लेती वो चंचल चितवन से भरी
पास बुलाती है मुझे अपने सीने से वो लगा लेती है
अपनी हर बात वो मुझे बता देती है
कोने कोने उभरे झरने से मेरी प्यास बुझा देती ही
दीवाना कर देती है रोज वो अपना बना जाती है
हरयाली में मेरा बिछोना बिछा देती है
पत्तों की छाया बानी चादर मुझे उड़ा देती है
सपनो में मुझे इस तरह सुला कर वो
रोज मेरे अपने पहाड़ से वो मिला देती है

बालकृष्ण डी ध्यानी
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जो भी मिला यहां कम ही मिला

जो भी मिला यहां कम ही मिला
जाऊं जहां साला वहां गम ही मिला
रिश्ता ही कुछ ऐसा
संग संग वो मेरे हर वक्त चला है

रोना है क्यों और हँसना है क्यों
जीना है ऐसे फिर जीना है क्यों
घुट के दो आँसूं पीना है क्यों
झूठे ही खुल के यहां हँसना है क्यों

भूख को रोते बिलखते देखा है मैंने
जिस्म को मजबूरी बिकते देखा है मैंने
झूठ फ़रेब का जश्न यहां होता है क्यों
आदमी आदमी में इतनी नफरत है क्यों

मिलना है कैसा ये मिलाप है कैसा
पल पल मन में पल रहा ये पाप कैसा
गर्भ में ही अब ह्त्या होती है क्यों
कली फूल बनने से पहले मुरझाती है क्यों

जाने ऐसे कहाँ जाना ये कहाँ जा रहा
रास्ता अपना वो सीधा सा खुद भटका रहा
ना समझ है या वो जानबूझ कर रहा
पेड़ उसने ही लगया वो ही काट रहा

जो भी मिला यहां कम ही मिला ……

बालकृष्ण डी ध्यानी
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ये जन्नत है मेरी

ये जन्नत है मेरी ....... २
हर ओर पहाड़ों से घिरी
दूर दूर तक है ये बिखरी पड़ी
ये जन्नत है मेरी ....... २

हर हर महदेव की नगरी
ऊँ नम शिवया से छलक जाये गगरी
कण कण इसके ऐसे यंहा गीत गाये
हर कंकड़ में शंकर दिखा जाये
ये जन्नत है मेरी ....... २

हरी के हरीद्वार में लगती रोज फेरी
गंगा निरन्तर बहती जाये पहाड़ों में ना कर देरी
गागर गागर उसकी ऐसी छलकत जाये
नर और नारयण संग संग यंहा खड़े मिल जाये
ये जन्नत है मेरी ....... २

मेरी वो फूलों की डगरी
मेरी वो फलों की टोकरी
मेरा वो चढ़ाई का रास्ता
जीवन भर मेरा है उससे वास्ता
ये जन्नत है मेरी ....... २

बालकृष्ण डी ध्यानी
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मुझको अब अपने पहाड़ों में से तुम

मुझको अब अपने पहाड़ों में से तुम आवाज़ ना दो,आवाज़ ना दो
जिसकी आवाज़ से मै लौटा आऊं वो मुझे प्यार ना दो वो प्यार ना दो

मैंने अपने दम पर कुछ कर गुजर ने की कसम खाई है
क्या खबर तुमको मेरे इस पथ पर कितनी कठनाई है
मैं लौटा आऊं कसम खा के तुम ऐसा ना करो तुम ऐसा ना करो

दिल ने मेरा सोचा है आस मेरी बांध गयी
मेरे हाथों की किस्मत की लकीर आज मुझसे कह गयी
अब इस तूफ़ान को तुम साहिल का किनारा ना दो किनारा ना दो

बालकृष्ण डी ध्यानी
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कखड़ी चोरेकी लाई छों

कखड़ी चोरेकी लाई छों
त चल बैठी जोंला उस डाली के तौलि
ना कोई देखे, ना पहचाने
छिप जायें उस पहाड़ के पीछे

ककड़ी चोरेकी के लाई छों ...

कल बोड़ा बिजी गया था
मेरे पीछे ढुंगा लेके आ गया था
अरे ब्याल जो होना था व्हैग्याई
आज अब आज की सोचा
बिजी गै तो बिज ने दो ना
अच्छा ? हाँ
त चल बैठी जोंला...

चल उन चलूं पर इन खुठों दगडी
दूर वखि उडी जोंला
अरी खोजी ना पाये गौं वाला
इन खेतों से बोली जोंला
बोली दूँ त ?बोलने दो ना
अच्छा? हाँ
त चल बैठी जोंला ...

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एक कवि गिर्दा अब भी रहता है

मेरे उत्तराखंड के पहाड़ में
एक कवि गिर्दा अब भी रहता है
सादगी से भरा है उसका वो दिल
बस मेरे पहाड़ के लिये वो धड़कता है
मेरे उत्तराखंड के पहाड़ में .......

वो अडिग अटल है विचारों से
हर मोर्चे पर वो आगे पग धरता है
अति विलक्षण यथार्त् का वो धनी
अपनों के लिये वो दिन रात जलता है
मेरे उत्तराखंड के पहाड़ में .......

वो आया और वो चला भी गया
दो बोल जो बोले वो अमर हो गये
कविताओं की जो उन्होंने माला पिरोई
हमे दिन रात वो प्रेरणा देते रहते है
मेरे उत्तराखंड के पहाड़ में .......

बालकृष्ण डी ध्यानी
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.. अपंणचित ....

डिल्ली गै छौ अपंणचित् ! ..चिपगंणौ
मयलु मिलंणसार जंणकरौं का सारौं ,
मुखड़ी कैकी वख पछण्यांई नी ......
बैंरग लौटी औं ।


देरादूंण उतरू अपंणचित इलाजी कु ...
हिल्यां हडकौं फर ठंगरा लगांणा कु ,
कुगता करै यौं , तुमम् क्य लगौं
बीमरी त् द्वी ही छाई .... चार हौरी नैई
ये खरमुंड बोकी ल्हैयौं !

दारू छोड़ी अपंणचित फोड़ी बोतल
छुट्टी ऐन गौंमा फौजी पांच टोटल ,
लुकुंणु बि कख छायो फेमस जि छौं
पंच्यों दगड़ जर जरसि गिलसी ताल एक एक
समाजिक आदिमौ दग्ड़्या फर्ज निभै औं !

.
.
सुनील थपल्याल घंजीर

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दुष्यंत कुमार की मशहूर हिंदी ग.ज.ल 'हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए' का गढ.वाली रूपांतर :
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ह्वे गए परबत कनी, या पीड. गल़णी चैंद भै
ये हिमाला से कुई गंगा निकल़णी चैंद भै ।

आज मत्थे पाल़ परदौं की तरौं हलणा लगे
शर्त लेकिन छै कि मूडे. पौउ हलणी चैंद भै ।

हर सड.क फर, हर गल़ी मा हर नगर हर गौंउ मा
हाथ झटगांदा झटग, हर लाश चलणी चैंद भै ।

सिर्फ हफरोल़ो लगाणो ही मेरो मकसद नि छा
मेरी कोशिश छा कि या बघबौल़ मिटणी चैंद भै ।

मेरा जिकुडा. मा नि ह्वा त, तेरा जिकुडा. मा सही
ह्वा कखी भी आग लेकिन आग जगणी चैंद भै ।

(गढ.वाली रूपांतर : नेत्रसिंह असवाल )
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Darshan Singh
September 16 at 11:15am

उदास घिंडुडु

ए घिंडुडी, इनै सूणिदी।
क्या स्वचणी छै मी बि बतादी।

जणणू छौं मि, जु मि स्वचणू छौं,
तुबी वी स्वचणी छै,
तबी त म्यारु छोड़ नि द्यखणी छै।

हालत देखिक ए गौं का,
त्यारा आंख्यू मा पाणि भ्वर्यूंच।
इनै देखिदी मेरी प्यारी,
म्यारु सरैल बि उदास हुयूंच।।

अहा, कना छज्जा, कनि उरख्यळी।
वूं डंडळ्यूं मा खूब मनखी।
पिसण कु रैंदु छाई, कुटण कु रैंदु छाई,
वूं थाडौं मा खूब बिसगुणा रैंद छाई।
दगड्यो का दगडि हम बि जांदा छाई,
वूं बिसगुणौं मा, वूं उरख्यळौं मा, खूब ख्यल्दा छाई।

अर हाँ, तु बि क्य, फर फर उडांदि छाई,
ड्वलणौं थै नाचिकि कनि बजांदि छाई।
वू डूंडु घिंडुडु, अब त भाजि ग्याई,
पर त्वैफर वु कनु छडेंदु छाई।
मिल बि एक दिन वु कनु भतगै द्याई,
वैदन बटि वैकि टक टुटि ग्याई।

सुणणी छै न,
म्यारु छोड़ द्यखणी छै न।

एक दिन कनु तु,फर फर भितर चलि गै।
भात कु एक टींडु, टप टीपिक ली ऐ।
वैबत मिल स्वाच, बस तु त गाई,
हाँ पर तुबि तब खूब ज्वान छाई।
जनि सर सर भितर गैई, उनि फर फर तू भैर ऐ गेई।

जब तु फत्यलौं का छोप रैंदि छाई,
मि बि चट चट ग्वाळु ल्यांदु छाई।
सैरि सार्यूं मा खेति हूंदि छाई,
हम जुगा त उरख्यळौं मा ई रैंदु छाई।
खाण पीणकी क्वी कमि नि छाई।

झणि कख अब वू मनखी गैं, झणि किलै गौं छोडिकि गैं।
हमरा दगड्या बी लापता ह्वै गैं,
स्वचणू छौं सबि कख चलि गैं।

मेरि प्यारी,सुणणी छै ई-
स्यूं बुज्यूं हम जाइ नि सकदा,
वूं बांजि कूड्यूं देखि नि सकदा।
हम त मनख्यूं का दगड्या छाई,
मनख्यूं का दगडी रैंदा छाई।

चल अब हम बी चलि जौंला,
मेरी घिंडुडी -
कैकि नि रै या दुन्या सदनी,
इथगि राओल यख अंजल पाणी।

छोड अब जनि खाइ प्याइ पिछनै,
चलि जौंला चल हिट अब अगनै।
वूं मनख्यूं कू सार लग्यां रौंला,
बौडि जाला त हम बि ऐ जौंला।

सर्वाधिकार सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई "
दिनांक 16/09/2015

 

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