Author Topic: Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं  (Read 515369 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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मुर्गा कनै गै? (दुसुरु भाग)

हैंक ब्यखुनी चरि चोरों की फीरि मती मोरी गे।
घुंगर्या बरांड एक जैरकन वूंल कची घटगै दे।।

कची का पुटग जांदी वूंकी लगण लैगे घाण।
ग्यारा सौ फीरि डांड द्यूंला घ्यपळी घपगाण।।

अधा राती मा बबडाट करदा घ्यपळी कु घौर कु गैं।
घ्यपळी कु घार समझी वूंल पदनौं का द्वार भटगैं।।

अस्वाल बाडा ल समझैकि वूंकू घौर कु पैटा दीं।
निरभग्यों की उल्टी खोपड़ी हैंक बाट लगी गैं।।

बियण्या टैम घ्यपळी काका का घार माैं पौंछी गैं।
काका भ्यार जयूंछौ वूंकू समधी थै सटगै गैं।।

काकि त पैली भग्यान ह्वै गेछै, भुलि भि ब्यवै दे।
मुर्गा कु सूंणिकी काका कु समधी मिलणौं अयूं रै।।

काका कु भितर आणु क्य ह्वैई समधी कणाणू रै।
घ्यपळी काका ल चट फोन मिलैक पुलिस बुलै दे।।

थाणा लिजैक चरि चोरों क वूंल मुर्गा बणै द्याई।
थाणादार कुकरेती जी वूंथै लगलि ठ्वकणा छाई।।

तबी बुनूंच "दर्शन "फीरि बडु ह्वैलु बडु जनु रै।
कमजोर ल्वखु की हाय लगद नाजैज ना सतै।।

नाम, जगा, घटना सब काल्पनिक छैं। कैसे कैकु क्वी संबंध नीछ।

सर्वाधिकार सुरक्षित@:-दर्शनसिंह रावत "पडखंडांई "
दिनांक 03/09/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Darshan Singh
August 31 at 9:41pm · Edited ·

मुर्गा कनै गै?

एक ब्यखुनी घ्यपळी काका कु मुर्गा हरची गे।
चार च्वरौंल चोरिकि वैकू, ब्वगच्या बणै दे।।

पल्या गैरी गोटम वूंल, कुमेटी कैरी दे।
चट्ट बणैकी चुपचाप खौंला कुकरुंद धैरि दे।।

ताळ माथि का गुट्यळौं थैं वूंल पैली सीण दे।
सींटी नि मार प्रेशर जनुकै बडु ढुंगु धैरी दे।।

चूला का चौछडि बैठिकि वूंकी कछडी लगी गे।
दमद्याट कैरिकि वूंल चूला मा झैळ लगाई दे।।

एक घडी मा कुकरकु पुटग गैस भ्वरेई गे।
भट्टम भट्टम गगडाट करदा कुकर उतडे गे।।

कुकरकु फैर ल छै जोळा की गोट उजड़ी गे।
तीन चोरों की टंगडी टुटी एककु मुंड फुटिगे।।

गोर बाखरा तांद समेत सार्युं मा चली गैं।
अधा राती मा गौं का लोग भि गोटम पौंछी गैं।।

गोटम पौंछिकि गौं वलूं कू गबलाट ह्वै गे।
तब पता चाल घ्यपळी काकाकु मुर्गा च्वरे गे।।

फजलेक गौं मा भै बंधौं की पंचैत बैठि गे।
चरि चोरों थै ग्यारा सौ कू डांड भी पोडी गे।।

कुकर फुटण मा घ्यपळी काका कु भाग खुली गे।
ग्यारा सौ म घ्यपळी काका चार कुखडा ली ए।।

तबी बुनूंच "दर्शन "आज खैरि कमैक खै।
काणा की जोनि म जाण नथर भंडि खाण वलु नि ह्वै।

नाम,जगा अर घटना काल्पनिक छैं। कैसे कैकु क्वी संबंध नीछ।

सर्वाधिकार सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई "
दिनांक 31/08/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Darshan Singh with Sudesh Bhatt
August 25 at 11:56am ·

रखडी (राखी) कु त्योहार नजदीक च। जौं कि भैणि या भाई नि ह्वाला, वूं थैं कनु लगदु होलु। --------------------------------------------------

कनू छै विधाता तू त निरदयी रैई।
रखडी त्यौहार द्याई भैणी नि देई।।
कनु छै विधाता तू त निरदयी रैई।
रखडी त्यौहार द्याई भाई नि द्याई।।

एक भैणी मीकू दिंदु क्या बिगड़ी जांदू।
ए त्यौहार मि भि त्वैकु भेट पिठै ल्यांदु।।
एक भाई मीकू दिंदु क्या बिगड़ी जांदू।
ए त्यौहार मि भि त्वैकु भेट पिठै ल्यांदु।।

जौं भयों कि भैणि ह्वैलि रखडी पैराला।
बिना भैणि वळा छ्वारा प्यटा प्यटि र्वाला।।
जौं भैण्यू का भाई ह्वाला रखडी पैराली।
बिना भायों वळी छे्वरी प्यटा प्यटी र्वेली।।

त्योहार का बान सुदी दंतुडी द्यखाला।
आंख्यू का कूणू मा छ्वारा आंसू लुकाला।।
त्योहार का बान सुदी दंतुडी द्यखाली।
आंख्यू का कूणू मा छ्वेरी आंसू लुकाली।।

दगड्या भग्यान म्यारा रखडी पैराला।
अपणी भैण्यू का हथौं खटी मीठि खाला।।
दगड्या भग्यान मेरी रखडी पैराली।
अपणा भयों थै टीका पिठैई लगाली।।

त्योहार कू भैणी नि दे त्यारु च कसूर।
खुशि कनकै मनौलु नि दे घार पूरू।।
त्योहार कू भाई नि दे त्यारु च कसूर।
खुशि कनकै मनौलु नि दे घार पूरू।।

निठुर समिझि मिल, क्याच तेरी माया।
धर्म्यालि भैणि, त्वैन मीकू दे ही द्याया।।
निठुर समिझि मिल, क्याच तेरी माया।
धर्म्यालु भाई, त्वैन मीकू दे ही द्याया।।

ऐंसु की रखडी,देवी तु ह्वै जैई दैणी।
भैण्यू थै तु भाई देई,भायों थैई भैणी।।
ऐंसु की रखडी, देवी................

सर्वाधिकार
सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई
दिनांक 25/08/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Darshan Singh
August 22 · Edited ·

पदनु कु थाड़ मा कछडी लगीं छाई।
जनि मि पौंछु त एकल पूछ,
भाई आज पंद्रा अगस्त छाई।।
मिल ब्वाल -छाई क्या छैंच।
रात तकि चलणी लग्यूं च।।
इथगा मा एक भै कुर्सि लि आई,
ब्वाल -सरकार यखम बैठो।
जरा एक बात बताओ।।
आज त कुछ मिलुणु छाई।
ब्वलद ई कुर्सि मा बिठै द्याई।।
कुर्सि मा बैठदी मेरि गैत बर्र बर्रा ग्याई।
सरकारकु सर्या भा मिफर ऐ ग्याई।।
मिल ब्वाल बोलो -क्या चैणू छाई।
बल पोरु बिटि अकौंट ख्वल्यूं छाई।।
रुप्या मीलला इनु सारु लग्यां छाई।
जु पल्ला मा छाई वूंल अकौंट खोलि द्याई।।
मिल ब्वाल आला, जरूर आला।
ऐंसु ना त भ्वाळ त जरूर आला।।
बलकन रुप्या तआ ही ग्या छाई।
तबरि त स्यु बसगाल लगि ग्याई।।
काळु बसगाळ मा बड़ि बड़ि गाड़ी
मोटर बोगि गैं।
रुप्या भि जख बिटि आणां छाई,
उनै खुणी उडै गैं।।
खुशि से पंद्रा अगस्त मनाओ।
तीन दा जोर से नारू लगाओ।।
भा ss र ssssssत माता की।
इन्कला ssssssssssssब।।
लोग नारू लगाणा छाई,
मि प्याट ही प्याट स्वचणू छाई।
मि भि कथगा मजबूर छाई।
किलैकि वैबत मि सरकार छाई।।

सर्वाधिकार सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत पडखंडाई : दिनांक :-22/08/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Darshan Singh
August 17 · Edited ·

दगड्याें एक हैंस्वाड कविता भ्यजणू छौं।
आप ल्वखु थैं हैंसिसि ऐलि त धन्य समझुलु।

"जागरु मा रेलगाड़ी "

यीं ही हुडकि मा जागर लगणा छाई।
बडु गौं की बात छाई,
जागर थाड मा ना फांग मा लगणा छाई।
जगरी ल सब्यी द्यबता नचै की,
ब्वाल -जजमान जी ह्वैग्याई?
इथगा मा कुतग्यों की अवाज आई,
न न ना रेलगाड़ी त अजि रै ग्याई।
वु तीस पैंतीस खड़ा ह्वैकि,
कट्ठा नचदा छाई।
सैब सुणदरौं का तीन,
फ्यारा फिरांदा छाई।।
जगरी ल भि मुंड फर हाथ लगाई।
जनु वैसे भौत बडि गल्ति ह्वैग्याई।।
जगरी ल हाथ जोड़िकि हुडकि उठाई।
धौं धौं धौं छुक छुक छुक थाप लगाई।।
जगरी धौं धौं धौं छुक छुक छुक बजाणू छाई।
रेलगाड़ी का एक एक डब्बा ज्वणीणा छाई।।
पैलु फ्यारा त ठिक ठाक ह्वैग्याई।
दुसुरु फ्यारा मा एक डब्बा गोल ह्वैग्याई।।
गारड वलु डब्बा दौडिक अगनै आई।
ब्वाल बंद करा जागर,
नुकसान ह्वैग्याई।
सब्यों ल हाथ जोड़िकि पूछ-
परमेश्वरा बता क्या ह्वाई?
ब्वाल एक डब्बा ताळ,
कंडळि कु बुज्या पोडि ग्याई।।
वख स्याल विअयूं छाई,
वैल रेलकु डब्बा गंमजै द्याई।
रेलगाड़ी भि एक झटका मा,
खडि ह्वै ग्याई।
अब रेलगाड़ी कु नचुणु भि,
बंद ह्वै ग्याई।।

सर्वाधिकार सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई "
दिनांक 17/08/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Darshan Singh
August 6 · Edited ·

जब भि गौं की याद मी आंद,
छ्वटु बच्चा सी बणि जांदु मी।
रड़गुसि खेलिकि, माट मा लप्वडेकी,
जिंगला मा झुंटा लगांदु मी।।
जब भि गौं की याद मी आंद.....

वोबरी तैलख्वाळ वोबरी मैलख्वाळ,
सरपट सरपट दौडि जांदु मी।
बमणौं ख्वाळ बिटि बिचल ख्वाळ तकि,
खोळि तिबर्यूं मा लुकि जांदु मी।।
जब भि गौं की याद मी आंद.....

इस्कोल की छुटि ह्वैगे अब,
दौडि दौडि चलि जांदु मी।
पाटि ब्वलख्या छाल धैरिक,
ढंड्यों मा घपळम जांदु मी।।
जब भि गौं की याद मी आंद.....

माँजी मैल्या सारि जयींचा,
भुला मैल्या खंड सीणूंचा।
माँजी कु अधरा कु जाण से पैली,
पाणी कसेरा लि आंदु मी।
जब भि गौं की याद मी आंद.....

छुटि प्वडीगैं इस्कोल की,
डाळ्यूं डाळ्यूं चलि जांदु मी।
बेडु तिमला खाण से पैलि,
भौंटों मा फिंग्वा लगांदु मी।।
जब भि गौं की याद मी आंद.....

जेठ कि रात्यूं मा भि यख,
ठंडु बथौं जब सरकद।
खटुली भ्यार लगैकी अपणी,
थाड मा लमसट पोडि जांदु।।
जब भि गौं की याद मी आंद.....

ग्वर गैणू बै भान बियण्या,
खाट खटूला अर तियड्या।
जूनि का चौछडि देखि देखिक,
सब्या गैणों थै गैणुदु मी।।
जब भि गौं की याद मी आंद.....

रात्यूं का स्वीणों मा उडि जांदु,
ढयूं ढयूं चलि जांदु मी।
असमान थै हाथ लगैक,
टप एक गैणू टीपि दिंदु मी।।

सर्वाधिक सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई "
दिनांक :-06/08/2015

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मेरी भूमि भूम्याली

मेरी भूमि भूम्याली
बणों बणों मा पसरी हैरायलि
कख जानू ये छोड़ी की लाटा
ये ना छिन तेरा जणा का बाटा
मेरी भूमि भूम्याली

कया कया नि द्याई इन हम थे
कया कया नि पाई हमुल इं से
जब विं थे देना की बारी ऐ
भुला तू ये बकसा उठे कख हीटे
मेरी भूमि भूम्याली

बगत नि रैगे पैलि जनि अब
मिल बी मान नि राई पैली जनि लोक
पर तू किलै की बदल्नु छे रे
अपरा बाण ही तू किलै जिनु छे रे
मेरी भूमि भूम्याली

देख आस लगै कि वा बी बैंठी चा
तू बी यख रैकी साथ निभै ले
क्या पाई इन ते थे पढ़े लिखे की
तेरो बी सोर बल भैर ही सजे रे
मेरी भूमि भूम्याली

बालकृष्ण डी ध्यानी
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कन बरखा पोड़ली ,कब बरखा पोडाली

कन बरखा पोड़ली ,कब बरखा पोडाली
ना तोड़ा दीदा,ना इन यूँ कटा ,यूँ डलियुं …… २

बरखा नि पौडी बल देबता रुस्युं चा
ऐ बार पाणि बिस्युं चा बल देबता रुस्युं चा
बांज पौड़ी धरती बल देबता रुस्युं चा
अपरू घार अपरू देश तिसालु बल देबता रुस्युं चा

नि मानी मिल मेर गलती बल देबता रुस्युं चा
बस मेर च ये हलगर्जि बल देबता रुस्युं चा
बस चल ल मेर यख मर्जी बल देबता रुस्युं चा
बस मि छों और्री कोई ना बल देबता रुस्युं चा

बल चेत जा रे अभी कख देबता रुस्युं चा
तेर निकल जाल रे सब गरमा कख देबता रुस्युं चा
जब तिसलु व्है जाली ये धरती कख देबता रुस्युं चा
बस मोरी जालू तब प्राणी कख देबता रुस्युं चा

बालकृष्ण डी ध्यानी
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ऐ बार तू बी ऐजा कौथिगा मा

ऐ बार तू बी ऐजा कौथिगा मा
बोई भगवती का मंदिर मा
भेंट चढ़ूँला हात जोडिकी
मोंड टेकोंलु खुठा बौड़ीकी

आशीष देलि बोई जी भोरीकि
अपरा द्वि हाथ खोलि कि
देर ना कैरा स्वामी झट दौड़ी आ
अपरा गौं देब्तों से भेटि जा

नागरा निशाण ढोल दामो बाजू जी
हल्दू चवलों कू टिका कप्ला मा लगुजी
डोली बोई की सरया पाड़ा मा घुमी ऐ
जयकार बोई का चौधिशा मा छैई गे

ऐ बार तू बी ऐजा कौथिगा मा
बोई भगवती का मंदिर मा
भेंट चढ़ूँला हात जोडिकी
मोंड टेकोंलु खुठा बौड़ीकी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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मेरी भूमि भूम्याली

मेरी भूमि भूम्याली
बणों बणों मा पसरी हैरायलि
कख जानू ये छोड़ी की लाटा
ये ना छिन तेरा जणा का बाटा
मेरी भूमि भूम्याली

कया कया नि द्याई इन हम थे
कया कया नि पाई हमुल इं से
जब विं थे देना की बारी ऐ
भुला तू ये बकसा उठे कख हीटे
मेरी भूमि भूम्याली

बगत नि रैगे पैलि जनि अब
मिल बी मान नि राई पैली जनि लोक
पर तू किलै की बदल्नु छे रे
अपरा बाण ही तू किलै जिनु छे रे
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देख आस लगै कि वा बी बैंठी चा
तू बी यख रैकी साथ निभै ले
क्या पाई इन ते थे पढ़े लिखे की
तेरो बी सोर बल भैर ही सजे रे
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