Author Topic: Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं  (Read 515369 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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मेरा पहाड़ की बात और कुच चा

मेरा पहाड़ की बात और कुच चा
नि बोल सकदु ना बिंग सकदु विंको स्वाद कुच और्री चा
मेरा पहाड़ की बात और कुच चा

शीर्ष पर हिमाला बस्युं चा
यूँ ह्युं चुलं यूँ डंडा कन्डोंमा घिरियूं चा
क्या बात कैरुं विंकी मि विंकी बात ही कुच और चा
कन बगनी गंगा की धारा
छ्ल छ्ल क नु मेरु पियार कुच और चा

मेरा पहाड़ की बात और कुच चा
नि बोल सकदु ना बिंग सकदु विंको स्वाद कुच और्री चा
मेरा पहाड़ की बात और कुच चा

ये नीलू सरग ये खुलु आक्स
ये रंगमत यख चौधिस् मौल्यार
हर एक फूलों मां वा हैंस्दी रैंदी विंकी बात ही कुच और चा
ढोल दामो झुमैलो छोलिया कि ये बयार चा
मेरु मुलका मेर लोक नृत्य गीतों कु रास्यांण चा

मेरा पहाड़ की बात और कुच चा
नि बोल सकदु ना बिंग सकदु विंको स्वाद कुच और्री चा
मेरा पहाड़ की बात और कुच चा

यख भगवती कू मंडाण
पितृ देबों कू ठों और्री जागर कू जगाण
ब्यो बारात मेल खोलों पिंगली जलेबी बाल मिठै विंकी बात ही कुच और चा
मीठा किन्गोड़ा काफल हिंसोलों कू ये पहाड़
मेरु मैता सौरास कु एक जनि लाड पियार

मेरा पहाड़ की बात और कुच चा
नि बोल सकदु ना बिंग सकदु विंको स्वाद कुच और्री चा
मेरा पहाड़ की बात और कुच चा

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"
September 11 at 8:38pm ·

बाल उड़िगी जब बटे शैम्पू लगाई।
आँखा फुट्टिगी जब बटे नेट चलाई।।

फेशा कु भि भलिके बिणांस ह्वाई।
बन-बनिकि क्रीम-पौडर जु लगाई।।

व्यसनों कि लत कलेजु फूकी ग्याई।
यु जिकुडु भि अब कामा कु नि राई।।

फ़ास्ट फ़ूड खै-खैकि अंदड़ा सड़ाई।
हड़गों मा बगतल हि कीर्तन कराई।।

रुपय्या-पैंसा त तिल खूब कमाई।
पर सब डॉक्टरों जुगता हि ह्वाई।।

शुद्ध पांणि पेकि बड़ु गालू उबाई।
पेप्सी-कोक ला खूब तीस बुझाई।।

घारा कु खाँणा मा स्वाद हि नि पाई।
भैरा कु बासि-तिबासि खूब पचाई।।

घरर्या नुस्खों कि क्वी कदर नि काई।
इलैई रे आज त्यारू यु कुहाल ह्वाई।।

सिकासैरियों मा तिल कन मौ गंवाई।
तन मन अर् धन कु सत्यानाश काई।।

©® सर्वाधिकार: धर्मपाल रावत,
ग्राम- सुन्दरखाल,
ब्लॉक- बीरोंखाल,
जिला- पौड़ी गढ़वाल-246169.
09.09.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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देखी छे क्या तिन

देखी छे क्या अ अ अ तिन न न अ
इन मौल्यार कख बी इन उल्यार कख बी
देखी छे क्या तिन

मुखडी विंकी बात कैनी देख,मेरु जीकोडी दख-दख्याट रे
मेरु जीकोडी दख-दख्याट रे
कैल नि बिंगी माया विंकी, मेरु माया कु रगरायट रे
मेरु माया कु रगरायट रे
मैसे ही तो बात कैर मैसे ही तू भेंट कैर
सुबेर सुबेर तू मैसे ही तू सुरवात कैर
देख ना तू कै और्री मेरो आँखा दगडी अपरू आँखा चार कैर

नि राई जियु मेरु पास ,कख लुक्युं हुलु वो आज रे
कख लुक्युं हुलु वो आज रे
उजाली रूप तेरु चाँद जनि ,चकोर सी किलै हुग्युं आज रे
चकोर सी किलै हुग्युं आज रे
मि मी नि राई कख हर्ची गयुं मि आज रे
खोजणा मि थे मेरा अपरा पराया
नि रेंगयुं मि अपरू का पास रे, नि रेंगयुं मि अपरू का पास रे

बालकृष्ण डी ध्यानी
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कन बरखा पोड़ली ,कब बरखा पोडाली

कन बरखा पोड़ली ,कब बरखा पोडाली
ना तोड़ा दीदा,ना इन यूँ कटा ,यूँ डलियुं …… २

बरखा नि पौडी बल देबता रुस्युं चा
ऐ बार पाणि बिस्युं चा बल देबता रुस्युं चा
बांज पौड़ी धरती बल देबता रुस्युं चा
अपरू घार अपरू देश तिसालु बल देबता रुस्युं चा

नि मानी मिल मेर गलती बल देबता रुस्युं चा
बस मेर च ये हलगर्जि बल देबता रुस्युं चा
बस चल ल मेर यख मर्जी बल देबता रुस्युं चा
बस मि छों और्री कोई ना बल देबता रुस्युं चा

बल चेत जा रे अभी कख देबता रुस्युं चा
तेर निकल जाल रे सब गरमा कख देबता रुस्युं चा
जब तिसलु व्है जाली ये धरती कख देबता रुस्युं चा
बस मोरी जालू तब प्राणी कख देबता रुस्युं चा

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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खड़ी चोरेकी लाई छों
त चल बैठी जोंला उस डाली के तौलि
ना कोई देखे, ना पहचाने
छिप जायें उस पहाड़ के पीछे

ककड़ी चोरेकी के लाई छों ...

कल बोड़ा बिजी गया था
मेरे पीछे ढुंगा लेके आ गया था
अरे ब्याल जो होना था व्हैग्याई
आज अब आज की सोचा
बिजी गै तो बिज ने दो ना
अच्छा ? हाँ
त चल बैठी जोंला...

चल उन चलूं पर इन खुठों दगडी
दूर वखि उडी जोंला
अरी खोजी ना पाये गौं वाला
इन खेतों से बोली जोंला
बोली दूँ त ?बोलने दो ना
अच्छा? हाँ
त चल बैठी जोंला ...

बालकृष्ण डी ध्यानी
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आज उतराखंडी फिल्म तरीका कुसुम चौहान जी और भगवान चंद जी लघु फिल्म देखी हिमालयन न्यूज़ पर उनके शानदार अभिनय और मार्मिक विषय को देख ये कविता तैयार हो गयी है
घाम मा जनानो की छु लगणी च हे दीदी
दिल्ली ब्वारी दिल्ली मा खप सक्दीन
अगर मजबूरी मा उत्तराखंड ऐगिन त
दिल्ली का ही गीत गांदीन
वी फर कैकु अड़ायु नि लगदु
बस गिच्चा एक छवी चा
मम्मीजी iam वर्किंग वोमन
मि आप जनु बैकवर्ड नि छो
अपणा अगने पिछने
सब्भु तै गवाणया समझदिन
अफु तै इत्गा मोर्डेन समझदिन
कबि किटी पार्टी त कभि ब्यूटीपार्लर खुटी रंदीन
स्येंदी दा बि लिपस्टिक पतोडी स्येदीन
म्येरा छोरा तै बि उत्तराखंड मा आकाल छो पडियु
ज्यू ब्वारी निहोणया दिल्ली मा खुजे
चला फण्डफुका दीदी भूलियो हौर छवी लांदा
दिल्ली ब्वारियु तै दिल्ली छोड़ा
अर घाम तापा ..............................................शैलेन्द्र जोशी

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देखी छे क्या तिन

देखी छे क्या अ अ अ तिन न न अ
इन मौल्यार कख बी इन उल्यार कख बी
देखी छे क्या तिन

मुखडी विंकी बात कैनी देख,मेरु जीकोडी दख-दख्याट रे
मेरु जीकोडी दख-दख्याट रे
कैल नि बिंगी माया विंकी, मेरु माया कु रगरायट रे
मेरु माया कु रगरायट रे
मैसे ही तो बात कैर मैसे ही तू भेंट कैर
सुबेर सुबेर तू मैसे ही तू सुरवात कैर
देख ना तू कै और्री मेरो आँखा दगडी अपरू आँखा चार कैर

नि राई जियु मेरु पास ,कख लुक्युं हुलु वो आज रे
कख लुक्युं हुलु वो आज रे
उजाली रूप तेरु चाँद जनि ,चकोर सी किलै हुग्युं आज रे
चकोर सी किलै हुग्युं आज रे
मि मी नि राई कख हर्ची गयुं मि आज रे
खोजणा मि थे मेरा अपरा पराया
नि रेंगयुं मि अपरू का पास रे, नि रेंगयुं मि अपरू का पास रे

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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Navin Dabral
September 10 at 4:57pm

लमफसारिक स्यूणो गिजै गयुं मी
मेरा चुफला खैचदारी भग्यान नि रै अब
मेरा कंड्यूड मरोड़दरी दुद्या बोए तै
जमणु व्हेगी सरग सिधारयां

म्यार बूब्बान कबि नि बिजई हमुते
फ़जलेकि गैणा दिख्यांदा
नौनौ तै देर तक स्यूणो
म्यार बूब्बा तै भलो लगदु छाई

सच त याच क़ि चैन क़ि निन्द
बूब्बा जी का जमौनु माँ
जू हमते मिली
उन चैन आज तक नि मिली

बिजण मां अर सेणु मां अब
क्वि फर्ख नि रैगी
सीण क़ि ढब दारु जनि होंदी
ढबै गयां त छुटदि नी छ

लम फसारिक स्यूण मां
जू मज़ा मिल्दु छ
भौत कम का नसीब मां होंद
निस्फ़िकरि क़ि निन्द

लिखरदू ( नवीन डबराल )
१०/ ९/ २०१५/ .....वड़ोदरा

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उदास घिंडुडु

ए घिंडुडी, इनै सूणिदी।
क्या स्वचणी छै मी बि बतादी।

जणणू छौं मि, जु मि स्वचणू छौं,
तुबी वी स्वचणी छै,
तबी त म्यारु छोड़ नि द्यखणी छै।

हालत देखिक ए गौं का,
त्यारा आंख्यू मा पाणि भ्वर्यूंच।
इनै देखिदी मेरी प्यारी,
म्यारु सरैल बि उदास हुयूंच।।

अहा, कना छज्जा, कनि उरख्यळी।
वूं डंडळ्यूं मा खूब मनखी।
पिसण कु रैंदु छाई, कुटण कु रैंदु छाई,
वूं थाडौं मा खूब बिसगुणा रैंद छाई।
दगड्यो का दगडि हम बि जांदा छाई,
वूं बिसगुणौं मा, वूं उरख्यळौं मा, खूब ख्यल्दा छाई।

अर हाँ, तु बि क्य, फर फर उडांदि छाई,
ड्वलणौं थै नाचिकि कनि बजांदि छाई।
वू डूंडु घिंडुडु, अब त भाजि ग्याई,
पर त्वैफर वु कनु छडेंदु छाई।
मिल बि एक दिन वु कनु भतगै द्याई,
वैदन बटि वैकि टक टुटि ग्याई।

सुणणी छै न,
म्यारु छोड़ द्यखणी छै न।

एक दिन कनु तु,फर फर भितर चलि गै।
भात कु एक टींडु, टप टीपिक ली ऐ।
वैबत मिल स्वाच, बस तु त गाई,
हाँ पर तुबि तब खूब ज्वान छाई।
जनि सर सर भितर गैई, उनि फर फर तू भैर ऐ गेई।

जब तु फत्यलौं का छोप रैंदि छाई,
मि बि चट चट ग्वाळु ल्यांदु छाई।
सैरि सार्यूं मा खेति हूंदि छाई,
हम जुगा त उरख्यळौं मा ई रैंदु छाई।
खाण पीणकी क्वी कमि नि छाई।

झणि कख अब वू मनखी गैं, झणि किलै गौं छोडिकि गैं।
हमरा दगड्या बी लापता ह्वै गैं,
स्वचणू छौं सबि कख चलि गैं।

मेरि प्यारी,सुणणी छै ई-
स्यूं बुज्यूं हम जाइ नि सकदा,
वूं बांजि कूड्यूं देखि नि सकदा।
हम त मनख्यूं का दगड्या छाई,
मनख्यूं का दगडी रैंदा छाई।

चल अब हम बी चलि जौंला,
मेरी घिंडुडी -
कैकि नि रै या दुन्या सदनी,
इथगि राओल यख अंजल पाणी।

छोड अब जनि खाइ प्याइ पिछनै,
चलि जौंला चल हिट अब अगनै।
वूं मनख्यूं कू सार लग्यां रौंला,
बौडि जाला त हम बि ऐ जौंला।

सर्वाधिकार सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई "
दिनांक 16/09/2015

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गौं-गळया

दिनेश ध्यानी।

भिण्डया दिनौं बाद
गौं जाणु ह~वै
मिन गौं कु गळ~यौ थै
सेवा लगौ
वो भक्वैरिकि रूण लगि गे।
मिन बोलि हे! क्य ह~वै?
बल, निरसा त्वै थैं बि
मेरि याद नि एै?
अरै बाळपन त त्यारू
मी दगडि हि बीति
यों ही बाटा-घाटौं म
तिन ग्वाय लगैं
यौं ही गाळ~यौ का रस्ता हिटी
इस्गोल आंदु जादु रै।
इनां सूणि परदे”ा जैकि
कतग बदलेग्यां तुम सब्बि
सच्ची पक्का ब्यौपारि ह~वै ग्यो
जै से मतलब वैका वोरा-धोरा
अर जैसे मतलब नीं वै तन्नि फूका।
मिन बोलि न-न सिनि बात नी
बल, चुपरै, म्यारू गिच्चु नि खुलौ
साख्यों बिटि द~यखणौं छौं
जो उंदै गै वो कब्बि बौडिकि नि ऐ
किलै कि ये पाड म
सदानि खैरि-अखरि हि रै,
हूण खाणा बान
सब्यौंन अपणु मुक्क लुकै,
पण यखौ विकास कनौ
कैन बि सांस नि कै।
बल इनी सूणी
वै छिप्वडू का क्य हाल छन?
मिन बोलि भैजी त रिटैर ह~वैगेन
बल, अरै वैकि कि कविता, स्याणि-गाणि बि
मंचौं अर ल्वखौं तकी सुणौण खुणि रैगेन
वैन बि कबि ये पाड़ कि सुध नि ल्हे,
सच्चु जि होंदु त रिटैर होणां बाद
अपणु गौं ता आंदु।
मिन बोलि ह~वैलि क्वी मजबूरी,
बल चुपरै, पक्ष नि ल्हे,
तु बि उन्नि छै
तुमरि कैकि क्वी मजबूरि नी
तुम सब्बि गुणा, घटाणु, नफा, नुकसान
की कला म पारंगत छां
गमलौं म सज्यां मनखि
बनावटी जिन्दगी जीणां छां।
बल
अरै वै वीरेन्दz पवारं भैन
सब्या धाणि देरादूण, होणि खाणि देरादूण
छोडा पाड~यौ घर गांैउ मारा ताणि देरादूण
गीत क्य लेखि तुम जना चकडैतौंन
अपणा घर गौं छोडिकि
सची देरादूण पौछी सांस सै,
हौरि त हौरि जब नरू भै बि
देरादूण वळु हि ह~वैगे त फिर
हौर्रयौं कि बात ही क्या रैगे।
हौर्रयौं कि बात ही क्या रैगे।।
दिनेश ध्यानी। 10/09/15

 

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