!!

Registration

Please Register To View All Content(Photos, Videos, Audio Files)

Author Topic: उत्तराखंड पर कविताये : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!  (Read 12943 times)

0 Members and 1 Guest are viewing this topic.

Offline dinesh bijalwan

  • Moderator
  • Sr. Member
  • *****
  • Posts: 305
  • Karma: 13
साथियो  - कविताओ के लिए एक नया  कालम/थ्रेड आरम्भ कर रहा हु/ आप सभी सुधि जनो से आग्रह है कि कविता पोस्ट करे/ कविता स्वरचित हो तो अछ्छा होगा/ किसी अन्य की हो तो लेखक क नाम जरूर दे / श्रीगणेश मै अपनी  कविता क्लर्क से कर रहा हू :-

मै क्लर्क हू ,  सरकारी श्रस्टी का आधार स्तम्भ,
अनपढो के लिये पूर्ण ब्रह्म ,
अनादि काल से मेरा अस्तित्व है ,
यम राज के यहा भी ( चित्रगुप्त) मेरा प्रभुत्व है,
समय के साथ साथ मैने भी विकास किया है,
काय्स्थ , ्मुनिम  , लिपिक से  कलर्क तक का सफर तय किया है,
चम्चागिरी  धर्म है मेरा , ओवरटाइम कर्म है मेरा,
बगल मे फाइलो की ढेरी, सामने कम्प्यूटर की भेरी,
 
भारतीय परजातन्त्र तेरे लिए पुन्य प्रसाद हू मै ,
लार्ड मैकाले की आखरी याद हु मै
अर्थशास्त्री मुझसे खौफ  खाते है,
पन्च वर्शीय  योजनाओ की विफल्ता का मुझे प्रमुख कारण  ठ्हराते है.
 
सुबह देर से दफतर जाना, शाम को जल्दी घर आना,
आधा घन्टा चाय पीने मे तो घन्टा भर लगाना,
उस पर भी बोनस बोनस , डीए- डीए चिल्लाना
 
उन्हे कौन बताए मै सब कुछ कर सकता हु
क्लर्क से गवर्नर- जनरल बन सकता हू
बस की क्यू मे अडे अडे ,  विस्व राजनीति पर बहस कर सकता हू खडे खडे,
परमाणु कार्यकर्म , ड्ब्लूटीओ वार्ता,  भारतीय  हाकी - किर्केट,
कौन कैसे जीतता, कैसे हारता,
 
मै सब जानता हू , कैसे?  चलो बताता हू, एक क्लर्क के ज्न्म की कथा सुनाता हू,
 
जब एक भावी क्लर्क पैदा होता है, जग हसता है वो रोता है,
माता  लोरी देती है,  पिता तान सुनाएगे-
हम अपने लाड्ले को डाक्टर , इन्जिनियर, आए ए एस बनाएगे,
प्बलिक स्कूल की खोज होती है,
पर उनकी जेब रोती है
हारकर- झकमारकर , सन्तोस कर लेते है,
लाड्ले को म्युनिसिप्ळ्टी के स्कूल मे डालकर
दस्वी मे साठ प्रतिसत, १२वी मे ५० और बीए मे ४५  प्रतिसत प्राप्त कर ,
वह लाल नाम कमाता है,
पढा लिखा बेरोजगार कहलाता है,
ओर दे डालता है ,
अधिकारी वर्ग की सैकडो  प्रतियोगी  प्ररीक्छाए ,
और वह किसी को भी  लक्छ्म्ण रेखा की तरह पार नही कर पाता, और
टूटता है , वह बाद   हर इम्तिहान के,
बामियान बुद्ध जैसे हाथ तालिबान के,
और तब  वह सर्व ग्यानी होकर, अपना चार्म खोकर,
उतरता है स्टाफ सिलेक्स्न  कमीशन के समरान्ग्न मे,
और पहूचता है, सरकारी कार्यालयो  के प्रान्ग्न मे
 
रोज्गार पाते ही  दोपाये से चौपाया होता है,
फिर सन्त्तती होती है , फिर जेब रोती है-----
 
 
और एक बार फिर वही स्ब कुछ दोहराया जाता है,
ओर तब वक्त  की याज्सेना (द्रोप्दी) हस कर कह्ती है,
अन्धो के अन्धे और क्लर्को के क्लर्क
 
और चलता रह्ता है नियती चक्र - चलता रहता है नियती चक्र
« Last Edit: August 11, 2008, 11:58:27 AM by M S Mehta »

 

Offline jagmohan singh jayara

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 150
  • Karma: 3
"सरग दिदा  पाणि-पाणि"

हमारा मुल्क प्यारा पहाड़,
जख छ गंगा यमुना कू मैत,
जख बगदा छन गाड गदना,
पेन्दा था मनखि ठण्डु पाणी,
लोठ्या, गिलास, छमोट भरिक,
गदना मा बगदा धारा बिटि,
मूळ अर सिळ्वाणि फर.

पर ऐंसु  यनु निछ,
जू पहाड़ प्रेम वश,
अपणा प्यारा गौं गैन,
गौं का सुख्याँ धारा देखिक,
मन ही मन भौत पछतैन,
ऊ पुराणा दिन भि याद ऐन,
कख हर्चि होलु पाणी?
देखि उन द्योरा जथैं,
दूर कखि ऊड़दु-ऊड़दु 
चोळी तीसन त्रस्त ह्वैक,
जोर-जोर सी  बासणी,
"सरग दिदा  पाणि-पाणि".

क्या ह्वै होलु यनु?
हर्चिगी पहाड़ कू ठण्डु पाणी,
द्यो देवता रूठिग्यन,
या लोग ऊँ भूलिग्यन,
जू भि ह्वै, भलु निछ,
वरूण देवता बरखौ,
प्यारा पहाड़ मा पाणी,
ह्वैगि  आज अनर्थ,
लोग बोन्ना छन,
"सरग दिदा  पाणि-पाणि".


रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित.मेरा पहाड़, यंग उत्तराखंड, हिमालय गौरव उत्तराखंड, पहाड़ी फोरम पर)
दिनांक:२४.६.२०१०, दिल्ली प्रवास से.....(ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी.चन्द्रबदनी, टिहरी गढ़वाल)

Offline jagmohan singh jayara

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 150
  • Karma: 3
"सिद्धपीठ चन्द्रबदनी"

चंद्रकूट पर्वत शिखर,
खास पट्टी, टिहरी गढ़वाल,
२७५६ मीटर की ऊँचाई फर,
स्थित छ  चन्द्रबदनी मन्दिर,
जख औन्दा छन भक्त गण,
दूर दूर देश, प्रदेश बिटि,
अर  करदा छन कामना,
होंणी, खाणी, सुखी जीवन की,
होन्दि छ मनोकामना पूर्ण,
माँ चन्द्रबदनी का दर्शन  करिक.

जब भगवान शिव शंकर,
माता सती कू मृत शरीर,
दगड़ा ल्हीक विरह मा,
विचरण कन्न लग्यां था,
माता सती कू बदन,
सुदर्शन चक्र सी कटिक,
चंद्रकूट पर्वत शिखर फर,
भ्वीं मा पड़ी,
"सिद्धपीठ चन्द्रबदनी",
एक प्रसिद्ध तीर्थ बणि.

चन्द्रबदनी तीर्थ स्थल,
सुरम्य अर रमणीक भारी,
जख बिटि दिखेन्दि छन,
हिवाँळी काँठी, डाँडी प्यारी.

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित.मेरा पहाड़, यंग उत्तराखंड, हिमालय गौरव उत्तराखंड, पहाड़ी फोरम पर)
दिनांक:२५.६.२०१०, दिल्ली प्रवास से.....(ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी.चन्द्रबदनी, टिहरी गढ़वाल)

Offline jagmohan singh jayara

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 150
  • Karma: 3
"छायाकार"

करदु छ कैमरा सी कैद,
पहाड़ की प्राकृतिक सुन्दरता,
संस्कृति की झलक,
दूध जनि बगदि जल धारा,
धौळ्यौं का मनमोहक किनारा,
बणु का बुरांश प्यारा,
डांडा, काँठा, पर्वतजन, न्यारा,
देवदार अर कुळैं का डाळा,
पहाड़ मा घुमावदार सड़क,
लग्दि छन जन हो माळा,
पर्वतीय परिवेश मा सज्याँ,
दादा, दादी, बोडा, बोडि हमारा.

कवि लेखक जब कल्पना करिक,
लिख्दा छन कहानी अर गीत,
छायाकार करदु छ छायांकन,
भला लगदा पहाड़ी गीत संगीत.

छायाकार की  छायाकारी का द्वारा,
लग्दि छन मन मा कुतग्याळि,
पहाड़ी गीतु की गीत माळा हेरि,
परदेश मा पहाड़ की झलक देखि,
मन मा खुश होन्दा छन पहाड़ी,
कुमाऊनी अर गढ़वाळी.

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं पहाड़ी फोरम, यंग उत्तराखंड, मेरा पहाड़ पर   प्रकाशित दिनांक: १.७.२०१०)


"ऊलारया पराण"

घुटिक घुटिक कुजाणि क्यौकु,
परदेश  मा पराण,
सोचि नि थौ कबि मन मा,
पाड़ छोड़िक चलि जाण.

छट्ट छुटिगि क्या बतौण,
अपणु पहाड़ प्यारू,
दुनियां मा देवभूमि,
कथ्गा  सुन्दर मुल्क हमारू.

देवभूमि सी दूर दर्द छ,
हमारू मुल्क स्वर्ग का समान,
चारधाम देवतों कू वास,
जख बद्रीविशाल जी विराजमान.

जन्मभूमि सी दूर दगड़्यौं,
क्वांसु सी होन्दु  पराण,
मयाळु मन भि मरिगि,
तर्स्युं  छ "ऊलारया पराण".

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं पहाड़ी फोरम,  यंग उत्तराखंड, मेरा पहाड़ पर प्रकाशित दिनांक: १.७.२०१०)

Offline jagmohan singh jayara

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 150
  • Karma: 3
"अबत डौर लगणि छ"

भारी खुश होन्दु थौ,
यू पापी पराण,
यनु सोचिक,
मेरी प्यारी  जन्मभूमि,
देवभूमि उत्तराखण्ड छ.

उत्तराखण्ड की राजधानी,
उत्तराखंडी नेतौं की नगरी,
गैरसैण की सौत देरादूण,
वख बल अजग्याल,
थेंचि धोळि आलू की तरौं,
उत्तराखण्ड की मित्र पुलिसन,
सत्तापक्ष कू एक विधायक,
जबकि,
विधायक बोन्न थौ लग्युं,
अरे! मैं विधायक छौं.

क्या होलु?
उत्तराखंडी भै बन्धु,
देखा अब यनु होलु,
उत्तराखण्ड कू विकास,
हमारी भी टूटि सक्दि छन,
कमजोर हाथ गौणी,
ऊँका हाथन,
जौन नेता जी कू करि,
पलग पछोड़,
जबकि ऊ  एक थैलि का,
चट्टा बट्टा छन.

"अबत डौर लगणि छ",
कनुकै जौला, वे प्यारा मुल्क,
भौं कबरी, पहाड़ प्रेम मा,
ज्यु कनु छ जब जौलु,
खोजलु कर्ण कू कवच कुंडल.

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित, यंग उत्तराखण्ड, मेरा पहाड़, पहाड़ी फोरम पर प्रकाशित)
दिनांक:१३.७.२०१०

Offline jagmohan singh jayara

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 150
  • Karma: 3
"खाड्डु अर बाखरू नि छौं"

सुपिना मा देखि मैन,
पाड़ पिड़ान घैल ह्वैक,
छट पटाण थौ लग्युं,
मैन पूछि, हे पाड़ जी क्या ह्वै?

पाड़जिन मैकु बताई,
आज मैं बिमार छौं,
पर कै सनै मै फर,
कतै दया नि औन्दि,
मेरा कपड़ा फटिग्यन,
मेरा बदन फर चीरा धर्यलन,
मैकु सदानि बुखार रंदु छ,
पीठ फर मेरा बणांग लगौन्दन,
क्या बतौँ, भौत सतौन्दन.

मैन बोलि पाड़ जी,
आपकी दुर्दशा देखिक,
मेरा मन मा भि,
भारी पिड़ा छ,
पर आज मनखि,
भारी स्वार्थी अर लालची ह्वैगी,
आपकी दुर्दशा वैका हाथन ह्वै.

हाँ यू सच छ,
हे कवि "जिज्ञासु",
क्वी नि पोंज्दु,
मेरा डळबळ औन्दा आंसू,
यनु न करा, हे मनख्यौं,
मैं "खाड्डु अर बाखरू नि छौं"

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित,
(मेरा पहाड़, यंग उत्तराखंड, पहाड़ी फोरम पर प्रकाशित)
दिनांक: १४.७.२०१० 

Offline jagmohan singh jayara

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 150
  • Karma: 3
"अगेला की आग"

देखि होलि कैन,
प्यारा  कुमौं अर गढ़वाल,
किलै नि दिखेन्दि आज?
मन मा छ सवाल.

अणसाळ कू तपैयुं,
लोखर कू टुकड़ु,
जैन रगोड़दा छन,
घंघतीर कू मुखड़ु.

चिणगारी पैदा होन्दी,
कबासी फर लगदि आग,
जगौंदा था तब  चुल्लू,
बणौन्दा रोठी अर साग.

बाखी खोळा का लोग,
केड़ा, दळ-छिल्ला जगैक ल्ह्योंदा आग,
माचिस  कू जमानु छ आज,
देखा, ऐगि अगेला कू अभाग.

तमाख्या लोग रखदा था,
चिलम तमाखु अर अगेलु,
पेन्दा था चिलम भरिक,
दगड़ा मा या अकेलु.

सार्थक नि रै अब,
बग्त बदलिगि आज,
जैकु अतीत मा थौ अस्तित्व,
वैसी अनविज्ञ छ,
हमारू  उत्तराखंडी समाज,
नि जाणदा अब लोग,
कनि  होन्दि "अगेला की आग".

(बचपन मा पहाड़ मा अगेलु जगौंदु देख्दा था हम.. कै गौं समाज का दाना मनख्यौं ...आज हर्चिगी अगेलु...देखि होलु आप लोगुन भी.  या कविता  आपतैं जरूर याद दिलालि पहाड़ का पारंपरिक अगेला की.   पैलि का जमाना मा "अगेला की आग" जगैक खोळा बाखी का लोग आपस मा बाँटदा था...पर आज व बात निछ )
रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु "
(सर्वाधिकार सुरक्षित, यंग उत्तराखण्ड, मेरा पहाड़, पहाड़ी फोरम  पर प्रकाशित, १८.७.२०१०)

Offline jagmohan singh jayara

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 150
  • Karma: 3
"मनखी अर कला"

जबरी मनखि शुरू मा,
धरती मा अवतरित ह्वै,
उबरी ऊ आदि मानव थौ,
धीरे-धीरे वैकु,
मानसिक विकास,
सामाजिक विकास ह्वै.

पैलि वेन,
ढुंगा सी औजार बणैन,
ढुंगा सी आग बणाई,
बण का जीव,
आग मा भड़ेक खाई,
ये प्रकार सी,
वैका समझ मा,
कला कू प्रयोग,
कन्न कु विचार आई.

कला कू प्रयोग करि,
अतीत का मन्खिन,
जिंदगी बेहतर बणाई,
अतीत कनु थौ,
ढुंगौं फर ऊकेरिक,
वैकी झलक संकलित करि,
आज का मनखी तैं समझाई.

कला विहीन अतीत कू मनखी,
पैलि जानवर का सामान थौ,
आज आपस  मा सार्थक छ,
"मनखी अर कला".

रचना: जगमोहन सिंह  जयाड़ा "जिज्ञासु"
(२३.७.२०१०)
दिल्ली प्रवास से.....
(सर्वाधिकार सुरक्षित, यंग उत्तराखण्ड, मेरा पहाड़, पहाड़ी फोरम  पर प्रकाशित)

Offline jagmohan singh jayara

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 150
  • Karma: 3
"पहाड़ सी ऊंचा"

मनखी का इरादा,
मेहनत अर लग्न,
साकार करदि सुपिना,
होन्दि छ लक्ष्य की प्राप्ति,
मिल्दि छ प्रसिद्धि,
मन मा भारी सकून,
पहाड़ सी उंचा ऊठिक.

पहाड़ प्रेरणादायक छन,
अटल इरादा कू संचार होन्दु छ ,
मनखी का मन मा,
कल्पनाशीलता पैदा होन्दि छ,
कवि, लेखक, छायाकार,
गितांग का मन मा.

बहादुरी कू भाव पैदा होन्दु,
सैनिक का मन मा,
जन, माधो सिंह भण्डारी,
गबर सिंह, दरमियान सिंह,
वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली,
उत्तराखंड आन्दोलन का शहीद,
जौंका इरादा अर काम,
"पहाड़ सी ऊंचा" था.
रचना: जगमोहन सिंह  जयाड़ा "जिज्ञासु"
(२५.७.२०१०)
दिल्ली प्रवास से.....
(सर्वाधिकार सुरक्षित, यंग उत्तराखण्ड, मेरा पहाड़, पहाड़ी फोरम  पर प्रकाशित


Offline jagmohan singh jayara

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 150
  • Karma: 3
"लग्याँ छन जुगाड़ मा"

जिन्दगी चन्नि  छ सब्यौं की,
मन मारिक जन भि चलु,
महंगाई की मार मा,
कनुकै पळलि आस औलाद,
हमारा देश का सब्बि मनखी,
लग्याँ छन जुगाड़ मा.

कटणि छ जनता की जेब,
जौंका खातिर,
ऊ सब्बि ठगणा  छन,
भोली-भाली  जनता तैं,
राजनीती की आड़ मा,
सत्तापक्ष अर विपक्ष द्वी,
सत्ता का खातिर,
लग्याँ छन जुगाड़ मा.

पहाड़ कू घर्या घ्यू ,
दाळ, गौथ अर तोर,
छौंकण का खातिर जख्या,
कख बिटि मिललु,
सोचदा छन ऊ,
जू नि रन्दन पाड़ मा,
कु होलु यनु रिश्तेदार,
प्यारा पाड़ मा,
जू भेजि द्यो कैमु,
लग्याँ छन जुगाड़ मा.

उत्तराखंडी कवि,
लिख्दा छन पहाड़ फर,
रन्दा नि छन पाड़ मा,
कल्पना करदा छन,
कविता लिखण सी पैलि,
कनुकै लिखौं सुन्दर कविता,
लग्याँ छन जुगाड़ मा.

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(२८.७.२०१०)
दिल्ली प्रवास से.....
(सर्वाधिकार सुरक्षित, यंग उत्तराखण्ड, मेरा पहाड़, पहाड़ी फोरम  पर प्रकाशित)

Offline jagmohan singh jayara

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 150
  • Karma: 3
"अतीत उबरी यनु थौ "

रज्जा का जमाना मा, जनतान बिगार बोकी,
होणी खाणी कनुकै होण, शिक्षा कू विकास रोकी.

जनता का खातिर रज्जा, बल बोलान्दु बद्रीनाथ थौ,
अनपढ़ जनता कू भाग, संत्री-मंत्रियों का हाथ थौ.

आजादी का बाद भी, लोग भूखा तीसा रैन,
आस अर औलादन, कंडाळी,खैणा-तिमला खैन.

लाणु पैन्नु यनु थौ, टल्लौं  मा टल्ला लगौंदा,
रात सेण कनुकै थौ, खटमल, ऊपाणा खूब तड़कौन्दा

उबरी बाटौं कू हिटणु  थौ,  सैणी सड़क दूर थै,
जख भी जाण हिटिक, जनता भौत मजबूर थै.

आजादी का बाद पाड़ मा, सब्बि नौना नौनी स्कूल गैन,
शिक्षा प्राप्ति का बाद, रोजगार का खातिर प्रवासी ह्वेन.

विकास की बयार बगि, अब यनु निछ पहाड़ मा,
अतीत उबरी यनु थौ, अब मनखी कम छ पाड़ मा.

रचना: जगमोहन सिंह  जयाड़ा "जिज्ञासु"
(२८.७.२०१०)
दिल्ली प्रवास से.....
(सर्वाधिकार सुरक्षित, यंग उत्तराखण्ड, मेरा पहाड़, पहाड़ी फोरम  पर प्रकाशित)

Offline jagmohan singh jayara

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 150
  • Karma: 3
"बसगाळ्या बरखा"

चौक मा चचेन्डी, तोमड़ी लगिं,
कुयेड़ी लगिं घनघोर,
तितरू बासणु गौं का न्योड़ु,
द्योरू होयुं अंध्याघोर.

मनखी बैठ्याँ भितर फुंड,
बरखा लगिं झकझोर,
फूल्टी भरी ऊस्यौण लग्याँ,
मुंगरी, गौथ अर तोर.

हरीं भरीं दिखेण लगिं,
कोदा झंगोरा की सार,
डांडी कांठ्यौं मा छयुं छ,
संगति हर्युं रंग हपार.

रसमसु होयुं छ द्योरू,
बगदा बथौं कू फुम्फ्याट,
कखि दूर सुणेण लग्युं,
गाड गद्न्यौं कू सुंस्याट.

विरह वेदना मन मा लगिं,
पति जौंका परदेश,
देवतौं छन मनौण  लगिं,
कब बौड़ि आला गढ़देश.

छोरा छन कौंताळ मचौणा,
ऐगि "बसगाळ्या बरखा",
दादा दादी बोन्न लग्याँ,
हे बेटों भितर सरका.

रचना: जगमोहन सिंह  जयाड़ा "जिज्ञासु"
(१.८.२०१०)
दिल्ली प्रवास से.....
(सर्वाधिकार सुरक्षित, यंग उत्तराखण्ड, मेरा पहाड़, पहाड़ी फोरम  पर प्रकाशित)

Offline jagmohan singh jayara

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 150
  • Karma: 3
"नानी सुणैदि एक कहानी"
 
नानी-नानी आज सुणैदि,
मैकु एक कहानी,
भूत की हो चा जैकि भि,
या क्वी रज्जा रानी.

नानी बोन्नि सुण हे नाती,
एक भूत की कहानी,
बात या उबरी किछ,
जबरि मै फर थै जवानी.

हमारा गौं मा तबरी थै,
पाणी की किल्लत भारी,
रात  मा ऊठिक धारा मू गयौं,
मुण्ड मा बंठा धारी.

धारा निस बंठा लगैक,
मैन नजर उनै फुनै दौड़ाई,
दूर  एक पुंगड़ा मा खड़ु,
भूत मैकु नजर आई.

वे भूतन जोर जोर सी,
खूब मचाई खिंख्याट,
लम्बू  दिखेणु द्योरा तक,
होणु अति भारी भिभड़ाट.   

छोरा क्या बोन्न तब मेरी,
ज्युकड़ी धक् धक् धक्द्याई,
डौरन यकुलि अँधेरी रात मा,
 कुछ बात समझ नि आई.

भर्युं  बंठा मुण्ड मा ऊठैक,
हिटदु-हिटदु नरसिंग मैन पुकारी,
भूत कुजाणि कख भागिगी,
मेरा गौणा ह्वेन भारी.

घौर का न्योड़ु जनु पौन्छ्यौं,
एक  आवाज मैकु आई,
अब नि डरी रोट काटी दे,
देवतान मैकु यनु बताई.

रचना: जगमोहन सिंह  जयाड़ा "जिज्ञासु"
(१०.८.२०१०)
दिल्ली प्रवास से.....
(सर्वाधिकार सुरक्षित, यंग उत्तराखण्ड, मेरा पहाड़, पहाड़ी फोरम  पर प्रकाशित)

"बौड़ कू डाळु"
 
मेरा गौं मा सबसि पुराणु,
पाणी का धारा का न्योड़ु,
द्वी सौ साल की उम्र कू,
तप्पड़ मा फैल्युं,
एक  बड़ु भारी "बौड़ कू डाळु",
जैका  नीस बैठदा छन,
ग्वैर, बट्वै, गौं का मनखी,
वैका  बकळा छैल मा,
झूला खेल्दा छन छोरा,
वैकि जटा पकड़िक, 
जू गवाह छ मेरा गौं का,
प्यारा अतीत कू,
जैन देखि होला,
दादा, पड़दादा, झड़दादा,
जू आज पित्र बणिग्यन.
 
हमारा गौं कू एक ल्वार,
जैकु नौं थौ मूसा,
वेन रोपि थौ, छोट्टु बौड़ कू  डाळु,
अणसाळ कन्न की जगा फर,
जू आज एक प्राकृतिक धरोहर भिछ,
मेरा गौं की पछाण का रूप मा,
प्यारू पित्रू कू पाळ्युं "बौड़ कू डाळु".
रचना: जगमोहन सिंह  जयाड़ा "जिज्ञासु"
(९.८.२०१०)
दिल्ली प्रवास से.....
(सर्वाधिकार सुरक्षित, यंग उत्तराखण्ड, मेरा पहाड़, पहाड़ी फोरम  पर प्रकाशित)

Online एम.एस. मेहता /M S Mehta

  • msmehta@merapahad.com
  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 20,261
  • Karma: 75
  • Gender: Male
  • +91-9910532720
    • www.apnauttarakhand.com / www.creativeuttarakhand.com

अति सुंदर कविता लिखी छा जगमोहन जी

"अबत डौर लगणि छ"

भारी खुश होन्दु थौ,
यू पापी पराण,
यनु सोचिक,
मेरी प्यारी  जन्मभूमि,
देवभूमि उत्तराखण्ड छ.

उत्तराखण्ड की राजधानी,
उत्तराखंडी नेतौं की नगरी,
गैरसैण की सौत देरादूण,
वख बल अजग्याल,
थेंचि धोळि आलू की तरौं,
उत्तराखण्ड की मित्र पुलिसन,
सत्तापक्ष कू एक विधायक,
जबकि,
विधायक बोन्न थौ लग्युं,
अरे! मैं विधायक छौं.

क्या होलु?
उत्तराखंडी भै बन्धु,
देखा अब यनु होलु,
उत्तराखण्ड कू विकास,
हमारी भी टूटि सक्दि छन,
कमजोर हाथ गौणी,
ऊँका हाथन,
जौन नेता जी कू करि,
पलग पछोड़,
जबकि ऊ  एक थैलि का,
चट्टा बट्टा छन.

"अबत डौर लगणि छ",
कनुकै जौला, वे प्यारा मुल्क,
भौं कबरी, पहाड़ प्रेम मा,
ज्यु कनु छ जब जौलु,
खोजलु कर्ण कू कवच कुंडल.

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित, यंग उत्तराखण्ड, मेरा पहाड़, पहाड़ी फोरम पर प्रकाशित)
दिनांक:१३.७.२०१०

"जय १००८ मूल मूलनारायण जी की जय हो" !!

For any query mail to - msmehta@merapahad.com
 
www.hisalu.com

Offline sunder singh negi/तनहा इंसान

  • जो चला गया उसे भुल जा.
  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 572
  • Karma: 5
  • जो चला गया उसे भुल जा
    • www.merapahad.com
                      "एक बार मुझे"

हिला पहाड़ मुझे एक बार, अन्दर से, मेरी अनुभुति के लिए.
एक बार तो अवसर दे, मुझे पहाड़, मेरी अभिव्यक्ति के लिए.

मै नही जानता तु कितना विशाल है,
मै नही जानता तु कितना कठोर है,

एक बार मुझे टकराने दे पहाड़,
तेरी विशालता,कठोरता जानने के लिए.

मै नही जानता तु कितना ऊंचा है,
मै नही जानता तु कितना उतार है,

एक बार मुझे अवसर दे पहाड़,
चढने और उतरने के लिए.

मै नही जानता हु, कि तुझमे कितना विरहपन है, खामोशी है.
एक बार मुझे फिर आने दे पहाड़, वादी मे, बांसुरी वादन के लिए.

सुन्दर सिंह नेगी 11/08/2010.
« Last Edit: August 11, 2010, 03:10:18 PM by sunder singh negi »
बुरा होकर भी मै, बुराई नही करता।

Online Vinod Singh Gariya विनोद सिंह गड़िया

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 227
  • Karma: 5
  • Gender: Male
  • +919958456377
"तुम मांगते हो उत्तराखंड कहाँ से लाऊं ?"
 
तुम मांगते हो उत्तराखंड कहाँ से लाऊं ?
सूखने लगी गंगा, पिघलने लगा हिमालय !
उत्तरकाशी है जख्मी, पिथोरागढ़ है घायल !!
बागेश्वर को है बैचनी, पौड़ी में है बगावत !
कितना है दिल में दर्द, किस-किस को मैं दिखाऊ !
तुम मांग रहे हो उत्तराखंड कहाँ से लाऊं ?
 
मडुआ, झंगोरे की फसलें भूल,
खेतों में हैं जेरेनियम के  फूल,
गाँव की धार में रेसोर्ट बने ,
गाँव के बीच में स्विमिंग पूल !!
कैसा  विकास ? क्यों घमण्ड ?
तुम मांगते हो उत्तराखंड ?

खड्न्चों से विकास की बातें,
प्यासे दिन, अंधेरी रातें
जातिवाद का जहर यहाँ,
ठकेदारी का कहर यहाँ
घुटन सी होती है,  आखिर कहाँ जाऊँ ?
तुम मांगते हो उत्तराखंड कहाँ से लाऊं ?

वन कानूनों ने छीनी छाह,
वन आवाद और बंजर गाँव ,
खेतों की मेड़े टूट गयी,
बारानाज़ा संस्कृति छूट गयी '
क्या गढ़वाल, क्या कुमाऊ ?
तुम मांग रहे हो उत्तराखंड कहाँ से लाऊं ?

लुप्त हुए स्वावलंबी गाँव ,
कहाँ गयी आफर की छाव?
हथोड़े की ठक-ठक का साज़ ,
धोकनी की गर्मी का राज़,
रिंगाल के डाले और सूप ,
सैम्यो से बनती थी धूप,
कहाँ गया ग्रामीण उद्योग ?
क्यों लगा पलायन का रोग ?
यही था क्या "म्यर उत्तराखंड " भाऊ ?
तुम मांगते हो उत्तराखंड, कहाँ से लाऊं ?

हरेले के डिगारे, मकर संक्रांति के घुगुत खोये ,
घी त्यार का घी खोया ,
सब खोकर बेसुध सोये ,
म्यूजियम में है उत्तराखंड चलो दिखाऊ !
तुम मांगते हो उत्तराखंड, कहाँ से लाऊं ??

 
 
नोट : उत्तराखंड पर यह कविता मेरे एक दोस्त प्रमोद (राजा) द्वारा मुझे प्राप्त हुई है !
« Last Edit: August 12, 2010, 10:32:23 AM by विनोद सिंह गड़िया »
"जय माँ नन्दा सुनन्दा"

 

Related Topics

  Subject / Started by Replies Last post
44 Replies
1526 Views
Last post September 05, 2010, 11:31:59 PM
by Devbhoomi,Uttarakhand
16 Replies
570 Views
Last post July 15, 2010, 04:13:56 PM
by dramanainital
7 Replies
490 Views
Last post August 26, 2010, 12:06:33 AM
by Jagmohan Azad
4 Replies
144 Views
Last post July 05, 2010, 12:42:02 AM
by Devbhoomi,Uttarakhand
26 Replies
361 Views
Last post September 02, 2010, 08:27:37 PM
by एम.एस. मेहता /M S Mehta