Author Topic: Satire on various Social Issues - सामाजिक एवं विकास के मुद्दे और हास्य व्यंग्य  (Read 94841 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Dosto,

We have various esteemed Guest writer, blog writers, poet, young & creative poets here who have been writing various satire on social development and other issues.

We are inviting you all to write satire on any bad practice, systems and development issues here but in decent language. Hope this way you can convey your message on any issue and the people.

Regards,

M S Mehta

geetesh singh negi

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ब्वे की खैर :पलायन फर आधारित एक गढ़वाली व्यंग कथा


एक खाडू और एक खडूणी दगडी छन्नी का स्कूल मा पडदा छाई, धीरे-धीरे दुयुं मा प्यार व्हेय ग्याई ,सौं करार व्हेय ग्यीं की अब चाहे कुछ भी व्हेय जाव  पर जोड़ी दगडी नी  तोड़णी, साहब धूम धाम से व्हेय ग्या  बल ब्यो खाडू और  खडूणी कु , और कुछ साल मा व्हेय ग्यीं उन्का जोंल्यां नौना लुथी और बुथी |

अब साहब लुथी और बुथी  रोज सुबेर डांड जाण बैठी ग्यीं खाडू और  खडूणी दगडी चरणा खूण ,हूँण लगीं ग्यीं ज्वाँनं दुया ,

 लुथी और बुथी  छोटम भटेय देख्दा आणा छाई , दिक्का दद्दी थेय ,बिचरी सदनी खैरी का बीठगा ही उठाणी राई ,लुथी और बुथी सदनी वीन्का आंखों मा अस्धरा ही देख्दा अयं पर बिचरा कब्भी वींकी खैर नी समझ  साका आखिर उंल अब्भी सरया दुनिया देखि भी ता नी छैयी ,उंनकी दुनिया त बस गुठियार भटटी रौल और डांड तक ही बसीं   छाई |
 
एक दिन लुथी ल  बडू जिकुडू कैरी की खडूणी मा पूछ ही देय की माँ या बुडढी दद्दी  क्वा  च और सदनी रुन्णी ही किल्लेय  रेंद यखुली यखुली ?

खडूणी ब्वाल म्यार थौला व  दिक्का बोडी चा  ,हमरा सो-सम्भल्धरा ,दिक्का  बोडी कु एक नौनु चा ,जेथेय बोडी ल भोत ही लाड प्यार से भोत खैर खैकी की सैंत पालिकी अफ्फु भूखु रैकि अप्डू गफ्फ़ा खिल्लेकी  बडू कार,फिर अपड़ी कुड़ी पुंगड़ी धैरी की, कर्ज -पात कैरी की पढ़ना खूण दूर प्रदेश भ्याज़ ,नौनु पड़ी लेखी की प्रदेश मा साहब बणी ग्या और प्रदेश मा ही ब्वारी कैरी की वक्खी बसी ग्या ,पर माँ या मा रुणा की क्या बात चा या ता दिक्का दद्दी   खूण खुश  हुण की बात चा  ?  बुथी ल खडूणी म ब्वाल ,

ऩा म्यार थौला तिल पूरी बात नी सुणि मेरी अब्भि ,नौनु ब्वे थेय मिलण खूण आई छाई एक बार और बोलण  बैठी ग्या बोडी खूण " ब्वे त्यारू नौनु आज बडू साहब व्हेय ग्या प्रदेश मा और तू  छेई की आज भी यक्ख  घास कटणी ,मुंडम पाणि कु कस्यरा ल्याणी छेई और मोल लिप्णी छेई,कुई द्याखलू ता मेरी बड़ी बेज्ज़ती  हूण या  ,तू  चल मी दगडी प्रदेश म़ा छोडिकी ये कंडण्या पहाड़ थेय,अब येल तिथेय कुछ नी दिणु ,ठाट से रैह प्रदेश म़ा अपडा नाती -नतिणु  दगडी "

 बोडी गुस्सा मा पागल सी व्हेय  ग्या और एक झाँपट नौना पर लगाकि बोलंण बैठ "अरे  निर्भगी जै धरती ल त्वे सैंति-पाली की ,लिखेय पड़ेय  की  यु दिन दिखाई आज त्वे वीन्ही धरती खूण  ब्वे बुलंण मा भी शर्म चा आणि ,ता भोल तिल मेरी क्या कदर करण ? थू तेरी और थू च  तेरी  अफसर-गिरी खूण और थू  च  तेरी वीन्ही पडेय खूण जैंल त्वे  थी थेय यु नी सिखाई की ब्वे सिर्फ और सिर्फ ब्वे हुन्द "

बस व्हेय का बाद भट्टेय बोडी गौं मा छेंदी -कुटुंब दरी मा यखुली रैन्द ,नौनु छोड़ी दियाई पर घार नी छ्वाडू,अप्डू पहाड़ नी छ्वाडू , धन्य हो बोडी और बोडी कु पहाड़ प्रेम

लुथी और बुथी चम् -चम् जवान हुणा छाई फिर बहुत दिनों बाद एक दिन  खडूणी ल खाडू खूण ब्वाल " जी बुनेय आज यूँ थेय पल्या छाल कु बडू डांड दिखाई द्यावा , वक्ख खाण  -पीणा की भी खैर नी चा ,और यूँ थेय सिखणु खूण भी सब्भी धाणी की सुबिधा रैली "

बस इतगा बात सुणिकी लुथी और रूण लग्गी ग्यीं और बुथी ल ब्वाल  " माँ हम नी चाह्न्दा की प्रभात   हम दुया भी दिक्का दद्दी  का नौना जन व्हेय जौं र तू दिक्का दद्दी जन  धरु धरु म़ा रुन्णी रै,माँ हम खूण ता हमर यु छोटू और रौन्तेलु डांड ही स्वर्ग बराबर चा और हमर गुठियार ही सब कुछ चा ,जख हमल जलंम   धार ,दुसरा का डांड जैकी अपड़ी माँ थेय बिसराणं से ज्यादा हम अपडा ही डांड म़ा भूखी मोरुण पसंद करला "

बस इतगा सुणि की खडूणी  और खाडू खुश व्हेय ग्यीं और लुथी- बुथी और खडूणी  और खाडू  सब दगडी मा प्यार प्रेम से फिर से रैंणं लगी ग्यीं |




रचनाकार  :गीतेश सिंह नेगी ( सिंगापूर प्रवास से,सर्वाधिकार -सुरक्षित  )
अस्थाई निवास:  मुंबई /सहारनपुर
मूल निवासी:     ग्राम महर गावं मल्ला ,पट्टी कोलागाड
                   पोस्ट-तिलखोली,पौड़ी गढ़वाल ,उत्तराखंड 


Source:         म्यारा ब्लॉग "हिमालय की गोद से " व  " पहाड़ी फोरम " मा पूर्व-प्रकशित
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from   Parashar Gaur <parashargaur@yahoo.com>
t
parashargaur@yahoo.com
प्रिय गितेश,
   मैं तेरी लिखी द्वी कथा १-  क्या फटीच ,  अर २ - कुकरो   इन्साफ   पड़नी ! कथानक   बहुत सुंदर छना  !  आप यूँ  तईi  व्यंग छा बुना पर व्यंग वाली कुई बात  यख़म   सपष्ट नि दिखिणी छ !एक मुहावरा थै आपन   हरेक करेक्टर से अच्हो इस्तेमाल कोरी बुलाई,    जू एक आम बात  जरुर च  पर   दगड़ा दगडी बात सटीक भी छ ! उन वे पर ज्यादा लिखन लेक्म इनु कुछ नि न , पर
प्रयाश सुंदर छ ! एक बात वो क्या छ की कभी  कभी बातो थै सम्बोलिक तौर से भी बोली जै सकद बजाय बार बार वे सब्द  थै  रिपीट कैकी !  गद्वालिमा जब आप लिखदि ता    ज्यादा से जय्दा सब्द गड्वाली कै ह्विनी  अर  उकु ही प्र्यौग  किये जा   अछु होलू ,   बनस्पत हिंदी का. !    उदाहरन का वास्ता  "  कुकरो कु इन्साफ  "  अगर आप इन्साफ   की जगह   "   न्यौ  ' भी हवे सकुदु छो जू मेरा ख्याल माँ  कटक का हिसाब से  और  पाठगण का हिसाब से भी उपुक्त छ ! उन इन्साफ बहुत सै और साफ़  सबद च  यमा कवी द्वी राया निन    जू अपणी बात  कु  मतलब  बतौन्द !   पे सै को च गड्वाली का हिसाब से य दिखणी वाली बात च !  इनी कई जगह छन  जख हिंदी का सब्दो की जगह अपनी माँ बोली का सब्द लिखे जय सक्दन  या सकदा छा !
नी पौल की नई पवाणी ( कथा  /गीत/कबिता ) गितिश  आप कु स्वागत छ ! आप से पहाड़ बहुद उमीद करद/कनु छ की आणि वाली पीडी माँ कवीत  वीकी  सुध लीं ण वालू छा !
पराशर गौर
 कनाडा

geetesh singh negi

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गढ़वाली व्यंग कथा : कुक्करा कु इंसाफ


नयार का पल छाल ,बांज ,बुरांश और कुलाँ की डालियुं का छैल एक भोत ही सुन्दर और रौंत्यलू  गौं छाई | गौं की धार मा देबता कु एक मंदिर भी छाई|उन् त गौं मा पंद्रह -बीस कुड़ी छाई पर चलदी बस्दी मौ द्वि- तीन ही छाई एक मौ छाई दिक्का बोडी की जू छेंद नौना ब्वारी का हुन्द भी गौं मा यखुली दिन कटणी छाई और ज्वा रोग से बिलकुल हण-कट बणी छाई , दूसरी मौ छाई पांचू ब्वाडा की ,बिचरा द्वी मनखी छाई कुल मिला की ,बोडी और ब्वाडा ,आन औलाद त भगवान्  उन्का जोग मा लेख्णु ही बिसरी ग्या छाई और तीसरी मौ छाई जी बल झ्युन्तु काका की  की जू रेंदु छाई काकी और अपड़ी नौनी दगड मा |

अब साब किल्लेय  की गौं मा मनखी  त भोत की कम छाई इल्लेय दिक्का  बोडी ल एक कुक्कर पाल द्ये छाई , बोडी ल स्वाच कि एक त  कुक्कर धोक्का नी द्यालू  ,दुसरू येका बाना फर द्वि गफ्फा  रौट्टा का मी भी खौंलूँ   |
अब साहब कुक्कर थेय भी आखिर कैकू दगुडू चैणु ही छाई तब ,कुई नी मिलु त वेल मज़बूरी मा बिरलु और स्याल  थेय अप्डू दगड़या बणा देय,अब कैल बोलुणु भी क्या छाई अब ,सब अप्डू अप्डू मतलब से ही सही पर कुल मिल्ला कि  कटणा छाई अपड़ा अपड़ा दिन जन तन कैरी की  |

अब साहब दिक्का बोडी ल  भी  अपड़ी सब खैरी -विपदा का आंसू  भोटू कुक्कर मा लग्गा ही याली छाई ,बिचरु भोटू बोडी थेय अपड़ा नौना से भी जयादा मयालु लगदु छाई |

गौं कि धार मा देबता बांजा कि डाली मा अपड़ी खैर लगाणु छाई कि देख ले कन्नू  ज़मनू  आ ग्याई ये पहाड़ मा, ये  गौं मा ,कभी सूबेर शाम आन्द -जांद मनखियुं कु धुदरट ह्युं रेन्दु  छाई धार मा ,सूबेर शाम लोग- बाग़ मंदिर मा आन्दा जांदा छाई ,अपड़ा  सुख -दुःख ,खैरी -विपदा मी मा लगान्दा छाई ,मी भी सरया दिन मस्त रेन्दु  छाई | खूब आशिर्बाद-प्रेम दींदु छाई उन्थेय पर अब त मी भी अणमिलु  सी व्हेय ग्यु ,सालौं व्हेय ग्यीं मिथेय  भी यकुलांश मा ,मनखियुं थे देख्यां |

इन्नेह  बांजा कि डाली भी अपड़ी जिकड़ी कि खैर लगाण लग्गी  ग्या देबता मा  और वक्ख  ताल  पंदेरू भी तिम्ला कि डाली क समणी टुप- टुप रुण लग्युं छाई| बिचरू अपडा ज्वनि का वू दिन सम्लाणु छाई जब वेक ध्वार नजदीक गौं की ब्वारी - बेटीयूँ की सुबेर शाम कच्छडी लग्गीं रेंदी छाई और एक आजकू दिन च  की  कुई  बिरडी की भी नी आन्दु वे जन्हे ? क्या कन्न यु दिन भी देख्णु रह ग्या छाई वेक भी जोग मा ?

अचांणचक से द्वि दिन बाद दिक्का  बोडी  सदनी खुण ये गौं और भोटू थेय छोडिकी परलोक पैट्टी ग्या  छाई|

अब साब बिरलु ठाट से डंडली मा ट्वटूगु व्हेय कि आराम से स्याल दगड गप ठोकणू  छाई पर भोटू कुक्कर दिक्का बोडी की मौत से बहोत दुखी छाई आखिर बोडी की खैरी -विपदा भोटू  से ज्यादा गौं मा और जंणदू  भी कु छाई ?
अचांणचक से भोटू ल भोकुणु शुरू कैर द्या | बिरलु थेय भारी खीज उठ ,वेक्की निन्द  ख़राब जू हुणी छाई,आखिर वेल कुक्कर खूण  ब्वाल - क्या व्हेय रे निर्भगी ,किल्लेय   भोकुणु  छाई सीत्गा जोर से  ?
स्याल और मी त त्यारा दगडया  व्हेय ग्योव अब ,और इन् तिल क्या देखि याल पल छाल भई की खडू व्हेय की गालू चिरफड़णू छेई तू ?

कुक्कर ल  ब्वाल-  यार तू  भंड्या चकडैती ना कैर मी दगड  मिल एक  मनखी सी  द्याखू छाई पल छाल अब्भी
बिरलु और स्याल  चड़म से उठी की कुक्कर क समणी आ ग्यीं और पल छाल देखण लग्गी ग्यीं
बिरोला ल थोड़ी देर मा कुक्कर का कपाल  फर खैड़ा की एक चोट मार और ब्वाल - अरे छुचा क्या व्हेय गया त्वे थेय ?
मी और स्याल  त जाति का ही चंट  छोव पर निर्भगी तू  त कुक्कर छै कुक्कर ,कुछ त शर्म लिहाज़  कैरी  दी ,और कुछ ना त बोडी का रौट्टा की ही सही कुछ त एहसान मानी दी | जैखुंण तू भुक्णु क्या छै वू बोडी कु ही नौनु च रे , सैद  बोडी की खबर सुणीक घार बोडिकी आणु च बिचरु

इत्गा सुणीक स्याल  भी रम्श्यांण लग्गी ग्या ,सैद कुक्कर ल स्याल  मा कुछ दिन पैली बोडी की खैरी ठुंगा याली छैय,  स्याल  ल ब्वाल अगर जू  मी दानु नी हुन्दु त सेय थेय आज गौं मा आणि नी दिंदु  ,पर क्या कन्न ?

बस जी फिर क्या छाई इत्गा  सुणीक कुक्कर ल जोर जोर से भुक्णु शुरू कैरी द्याई

स्याल  ल स्यू-स्यू ब्वाल और कुक्कर धुदरट कैरी की बोडी का  नौना का जन्हे अटग ग्या ?




रचनाकार  :गीतेश सिंह नेगी ( सिंगापूर प्रवास से,सर्वाधिकार -सुरक्षित  )
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गढ़वाली लेख (व्यंग ) : हल्या नी मिलदु
झंकरी बोडी  कु नौनु प्रदेश भट्टेय बाल-बचौं दगडी १० साल बाद  गढ़वाल घूमणा  कु अन्यु  छाई , कुछ दिन खुण इन्न लग्णु छाई की जन्न बोडी फर फिर से  जान आये ग्ये व्होली ,नाती नतिणयु दगडी बोडी  खुश दिखेणी छाई और  नौना -बाला   भी पहली बार स्यारा-पुन्गडा खल्याण , नयार,बल्द-बखरा  और सुन्दर हैरा-भैरा डांडा देखि की भोत ही खुश हुन्या छाई,
बुना छाई - दादी त्या  अब हम यक्खी लहेंगे ?
हाँ नौना की ब्वारी जरूर अन्गरौं  की सी खईं सी लगणी  छाई ?
नौनल बवाल ब्वे अब ती खुण गढ़वाल मा क्यां की खैर च ? सड़क -पाणि,बिज़ली ,राशन -पाणि की दूकान ,डिश -टीवी ,फ्रिज ,गाडी सब्भी ता व्हेय  गिन गौं मा अब | आराम ही आराम चा त्वे खुण ब्वे अब त़ा

बस ब्बा बाकी त़ा सब ठीक चा पर अज्काल गढ़वाल मा "हल्या नी मिलदु " अब
बोतल देय की भी ना


रचनाकार  :गीतेश सिंह नेगी ( सिंगापूर प्रवास से,सर्वाधिकार -सुरक्षित  )
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Himalayan Warrior /पहाड़ी योद्धा

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wow. Great Brother.. Really interesting.

Can u also make satire on Uttarakhand Govt also ? Badly required for poor performance.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कुलानन्द घनशाला

 
जिठाणा कु भैसाब, सासू कू मांजी,
मेरू नौ लेकी भट्योन्दी च,
अपणा बुबा कु कुजाणी क्या ब्वलदि
पर मेरा बुबा कु पापा बोलणी च।
नांगा मुण्ड मां पल्लू धनु, धोती पैरण नि आंदी,
टी शर्ट-जींस पैरण मा जरा भी नी शरमांदी
झुकी सेवा लगौण मा कमर चसक पड़ जान्दी,
गाली़ अर गिच्चा चलौण मा द्वी हाथ अगाड़ी जान्दी।
बिना सौ सलाह का जब मर्जी मैत भाजी जान्दी,
फिक्वाˇ सी घ्ुामिघामी, ब्यखुनी हाथ हल्कैकी ऐ जान्दी,
काम काज कनु बुनै त जन लचुड़ी आई हो, टुप से जान्दी।
अर पकायूं खाणू सबसी पैली गाडी खै जान्दी
जरा कुछ ब्वलणे त बिना बाजौं का ही नचण बैठी जान्दी,
मां-बैणी गाल़-घात देकी धौ-धौ कै घिरे जान्दी।
गाड़-फाˇ , डांडा-फांस-जैर खाण की धमकी तक दे जान्दी,
कि दहेज अर वीं निर्भागी लब मैरिज की भी याद दिलै जान्दी
मिन बोली चुची ब्यो त ब्यो ही च,
दुनिया से बाकी बात थ्वींड़ी हांेयी च,
वींन गुरौं सी ठप-ठपाक मारी खबरदार,
ब्यो नी हमारी त लब मैरिज हांेई च।
शुभ दिन शुभ घड़ी देखी हाथ जोड़ी बोली मिन,
चुची नारी त देवी कु रूप होन्दु
वीन जुता की सी ठक्क चोट मारी,
हां नर भी त वींकु भगत होन्दू।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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विकास की भैंसी
 डा० नागेन्द्र जगूड़ी ‘नीलाम्बरम्’ 
-------------------


दिल्ली बिटेन चलदी ब्यांई भैंसी
अर देहरादून ऐकतैं बाखड़ि ५ैजांदी
जब पौंछदी उत्तरकाशी अर चमोली
अल्मोड़ा या पिथौरागढ़
डी० यम० का बंगला पर
तब तेखड़ा ५ै जांदी
तिसरा दिन एक लुटिया देंदी
जब पौंछदि ब्लॉक मा
बी० डी० ओं० का आफिस
तबरि दस्त रदां लग्यां
तब भैंसि सिर्फ पतलू मोˇ करदि
अर जब भैंसि पौंछदि- रंगतु-मंगतु का चौक मा
सौणु-बैसाकु का भैंसवाड़ा
तब भैंसा कू मोल़
भैंसा का ही ढामणा पर लग जांदू
अर यनु विकास देखिक तैं
गांधि जी कु यू चेला दंग रै जांदू।

Bhishma Kukreti

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Satire and Fatkar
                     Once upon a time , there were bulls in my village 
                                  Bhishma Kukreti
         When telephones were not available , I and my family had to visit Pahad or my village.. Thanks to mobile phone availability and news of Pahad available on Internet that now, I don’t need to show my snobbish, full of make up, urbanized, civilized, egotistical  face to our literate but uncivilized village fellows. On mobile phone, I can be in touch of villagers. By calling to my relatives or village fellows , I get some knowledge and  I boost myself to other migrated Pahadi in Mumbai that I have full knowledge of  Pahadi villages  and their grass root problems. I worship along with other deities the mobile phone  which is blessing for me that mobile phone don’t allow me not to visit my ancestral village.
 Yesterday, was a festival and to know what is happening in villages that I heighten in my opinion to other migrated Phadai in Mumbai , I called my uncle (my father’s far cousin) .
  I said, “ Oh ! Uncle ! Congratulations ! For this auspicious festival !”
  He shouted on me , “  What congratulations ? These days, festival are  tedious for we villagers.”
 I showed synthetic worry and sympathy , “ What did happen Kaka ?”   
 He yelled , “ Kharindu hwe ge !  I am on the way to other village which, is twenty  kilometer away .”
I asked, “ Is some body died that you are not present in village on   this festival ?”
He told, “ It is more than dieing our beloved. At least we get whisky after funeral from deceased’s family side”
 Now , I was really worried as some grave matter was there and I asked in pathos voice , “ What is so urgency that you need to go on foot to other village  which is twenty kilometer away from our village?”
 He replied unenthusiastically, “ You know , today we have to put oil on horns of bulls and offer them Peendo (barley  flour cake )  and sesame  oil.”
 I showed my knowledge arrogantly, “ Yes ! Kaka! On this auspicious day, every family worships bulls as symbol of our gratitude to bulls who are backbone of our agriculture,  put oil on their horns and  offer to bulls  Peendo and sesame oil. “
Kaka said, “ Since, no family in our village or nearby villages does farming, therefore, no family  has bulls, I have to go twenty kilometer away to other village where by default, a family has a pair of bulls…”
 I asked , “ What do you mean by defaults , there is a pair of bulls?”
Uncle answered, “ It is mistake of lone caw of that family that all the time she gave birth to male calves.”
Now understanding the case, I said, “ Thanks  the mistake of reverend caw and there is custom to kill the male calves before or after delivery as we Indians  kill the female child before her birth .”
 He supported, “ Yes 1 this is boon in the ruins that caw of that family gave birth to male calves only. I am overloaded by Peendo and sesame oil bottles to carry all the way to other village.”
 I asked shockingly, “ What do you mean by overloaded ?”
 He revealed, “ Since, I am the only male alive in ten families of  our village left because of migration , I am carrying Peendo and sesame oil bottles of ten  families .Now I am putting off phone as I have to climb high slope for fifteen kilometers.”
 I called to my far maternal  uncle of my ‘mamkot’ village and congratulated him . He angrily screamed,”  A very bad day ! “
 I asked, “ Is  there any damage ?”
 He answered, “ I am roaming village to village in search of a bull to put oil on  their horns, offering them Peendo and sesame oil.”
I asked, “ Could you not find a pair of bull in your area?”
 “ No , Forget about matured bulls , there is no single male calf in our area and now I am in the territory of other Tahsil as each one of us sells calf to Naziabad business men as soon as caw leaves providing milk” he said and put off phone.
  I called to a relative in my in law village, “ Sasur Ji ! Have you found bulls to offer Peendo and sesame oil ?”
 He answered , “ Oh Jawani Ji ! After visiting many villages , I got a family , which by default ha a pair of bull.”
 I asked, “ What do you mean by default?
“ This am was in Delhi. When Uttarakhand was created,  in great hope, he left a good paying job in Delhi and took farming a profession in village and bought bulls for plough.” he answered.
 I interpreted , “ Is he happy taking farming profession in village.”
 He rebuked , “ You fool! No body does farming in our modern village in Pahad. Since, other families don’t do farming , this man cant start farming.”
 I questioned, “ Then what for is he  having bulls “
 He replied , “  I don’t know about how he is  meeting his daily expenses. But I know that in each festival, villagers from four five Tahsils come here to offer Peendo and oil to his bulls. He doe not take prepared Peendo but takes barley, mustard, sesame oil  and charges one thousand rupees from each family for touching his  bulls.”
 I said, “ Oh ! “
 He said, “ I am standing in the long line of offerings to bulls. There are around four hundred men before me and three hundred after me in the line.”
I put off the phone as there was nothing   to ask.
Copyright @ Bhishma Kukreti, bckukreti@gmail.com
 

   




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Bhishma Kukreti

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Satire and Fatkar
        Blame Others to  Hide Our Own Weaknesses !
                        Bhishma Kukreti
  The other day, my old uncle (bada)  from village called me that while  cleaning the village, the cleaning people put all debris in our chauk (country yard before our houses). He asked me to talk to Gram Pradhan to remove debris from our chauk.
 I called from Mumbai to Gram Pradhan and said, “ Namaskar Pradhan kaka ! Please arrange to remove debris from our chauk .”
 Instead of accepting the mistake he growled on me , “ You silly Pravashi don’t know that what is happening in our village! “
  I asked, “ What has happened ? “
    Gram Pradhan explained, “ How can I work properly to remove your debris as  my opposition leader in village is involved in many criminal activities and you are bothered about your debris.”
   I asked, “ But Pradhan Kaka ! How come the criminal acts of your opposition leader is hurdle in removing debris from our chauk.”
 He replied, “ How come !  I can remove debris from your chauk , if a leader of next village is minting money through his Rashan shop.  “
 I surprisingly asked, “ Kaka , what is the relation of next village leader minting money through his Rashan shop with debris lying in our  chauk?”
 He answered with rage, “ You Mumbaikar Garhwalis cant understand that in another village, a village councilor beats his wife on weekly basis and we civilized people cant do anything .
  I asked , “ Kaka ! Tell me when will you arrange to remove debris from our chauk? “
  He shouted, “ you fool! Do not understand that in our area every teacher takes alcoholic drinks  every night and these teachers are now danger for the poise  teaching profession “
    I once again asked, “ But Pradhan kaka , teachers are not coming there to remove debris from our chauk “
  Gram Pradhan screamed , ’   You Pravashi cant understand that  Patwaris have increased their corruption fess exuberantly and now just for recording a complaint they are taking hundred rupees under the table.”
  I did not understand about new behaviour of Garm Pradhan . I cut off phone and called my own uncle (bwada/bada) and asked him, “ Bada ! Is garm Pradhan mad ? I was asking him debris problem and he was blaming whole world ?
 My bada (uncle) explained, “ No ! No ! Gram pradhan is not mad but he became wise. He attended a congress rally and leant many tricks. He learnt from Sonia Gandhi, Man Mohan Singh and Pranav Mukharji that when Congress is caught in corruption charges , non stopping of inflation etc then  blame opposition or Rashtriy Swayam Sangh  “
 I asked, “ Bada ! There is one word in Sanskrit for this learning . What is that ?”
 He told , “ Yatha Raja Tatha Praja means the subjects follow the ruler. Our village council chief is following Sonia Gandhi and Man Mohan Singh to blame others to hide his own weaknesses. “
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